विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 371, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें३६० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १७
पितृपुत्रसुहृद्भ्रातृमातृबन्धुमयीमिमाम् । यन्मायां नालमुत्तुर्तुं जगत्तस्मै नमो नमः ॥ १३ तरत्यविद्यां विततां हृदि यस्मिन्निवेशिते । योगमायाममेयाय तस्मै विद्यात्मने नमः ॥ १४ यज्वभिर्यज्ञपुरुषो वासुदेवश्च सात्वतैः । वेदान्तवेदिभिर्विष्णुः प्रोच्यते यो नतोऽस्मि तम् ॥ १५ यथा यत्र जगद्धाग्नि धातर्येतत्प्रतिष्ठितम् । सदसत्तेन सत्येन मय्यसौ यातु सौम्यताम् ॥ १६ स्मृते सकलकल्याणभाजनं यत्र जायते । पुरुषस्तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम् ॥ १७ श्रीपराशर उवाच इत्थं सञ्चिन्तयन्विष्णुं भक्तिनम्रात्ममानसः । अक्रूरो गोकुलं प्राप्तः किञ्चित्सूर्ये विराजति ॥ १८ स ददर्श तदा कृष्णमादावादोहने गवाम् । वत्समध्यगतं फुल्लनीलोत्पलदलच्छविम् ॥ १९ प्रफुल्लपद्मपत्राक्षं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम् । प्रलम्बबाहुमायामतुङ्गोरःस्थलमुन्नसम् ॥ २० सविलासस्मिताधारं बिभ्राणं मुखपङ्कजम् । तुङ्गरक्तनखं पद्भ्यां धरण्यां सुप्रतिष्ठितम् ॥ २१ बिभ्राणं वाससी पीते वन्यपुष्पविभूषितम् । सेन्दुनीलाचलाभं तं सिताम्भोजावतंसकम् ॥ २२ हंसकुन्देन्दुधवलं नीलाम्बरधरं द्विज । तस्यानु बलभद्रं च ददर्श यदुनन्दनम् ॥ २३ प्रांशुमुत्तुङ्गबाहुंसं विकासिमुखपङ्कजम् । मेघमालापरिवृतं कैलासाद्रिमिवापरम् ॥ २४ तौ दृष्ट्वा विकसद्वक्त्रसरोजः स महामतिः । पुलकाञ्चितसर्वाङ्गस्तदाक्रूरोऽभवन्मुने ॥ २५ तदेतत्परमं धाम तदेतत्परमं पदम् । भगवद्वासुदेवांशो द्विधा योऽयं व्यवस्थितः ॥ २६ साफल्यमक्ष्णोर्युगमेतदत्र दृष्टे जगद्धातरि यातमुच्चैः ।
'जिनकी इस पिता, पुत्र, सुहृद्, भ्राता, माता और बन्धुरूपिणी मायाको पार करनेमें संसार सर्वथा असमर्थ है, उन मायापतिको बारम्बार नमस्कार है॥ १३॥ जिनमें हृदयको लगा देनेसे पुरुष इस योगमायारूप विस्तृत अविद्याको पार कर जाता है, उन विद्यास्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है॥ १४॥ जिन्हें याज्ञिकलोग 'यज्ञपुरुष', सात्वत (यादव अथवा भगवद्भक्त)-गण 'वासुदेव' और वेदान्तवेत्ता 'विष्णु' कहते हैं उन्हें बारम्बार नमस्कार है॥ १५॥ जिस (सत्य)-से यह सदसद्रूप जगत् उस जगदाधार विधातामें ही स्थित है उस सत्यबलसे ही वे प्रभु मुझपर प्रसन्न हों॥ १६॥ जिनके स्मरणमात्रसे पुरुष सर्वथा कल्याणपात्र हो जाता है, मैं सर्वदा उन अजन्मा हरिकी शरणमें प्राप्त होता हूँ' ॥ १७ ॥
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय ! भक्तिविनम्रचित्त अक्रूरजी इस प्रकार श्रीविष्णुभगवान्का चिन्तन करते कुछ-कुछ सूर्य रहते ही गोकुलमें पहुँच गये ॥ १८॥ वहाँ पहुँचनेपर पहले उन्होंने खिले हुए नीलकमलकी-सी कान्तिवाले श्रीकृष्णचन्द्रको गौओंके दोहनस्थानमें बछड़ोंके बीच विराजमान देखा ॥ १९॥ जिनके नेत्र खिले हुए कमलके समान थे, वक्षःस्थलमें श्रीवत्स-चिह्न सुशोभित था, भुजाएँ लम्बी-लम्बी थीं, वक्षःस्थल विशाल और ऊँचा था तथा नासिका उन्नत थी ॥ २०॥ जो सविलास हास्ययुक्त मनोहर मुखारविन्दसे सुशोभित थे तथा उन्नत और रक्तनखयुक्त चरणोंसे पृथिवीपर विराजमान थे ॥ २१॥ जो दो पीताम्बर धारण किये थे, वन्यपुष्पोंसे विभूषित थे तथा जिनका श्वेत कमलके आभूषणोंसे युक्त श्याम शरीर सचन्द्र नीलाचलके समान सुशोभित था ॥ २२ ॥
हे द्विज ! श्रीब्रजचन्द्रके पीछे उन्होंने हंस, कुन्द और चन्द्रमाके समान गौरवर्ण नीलाम्बरधारी यदुनन्दन श्रीबलभद्रजीको देखा ॥ २३ ॥ विशाल भुजदण्ड, उन्नत स्कन्ध और विकसित मुखारविन्द श्रीबलभद्रजी मेघमालासे घिरे हुए दूसरे कैलासपर्वतके समान जान पड़ते थे ॥ २४ ॥
हे मुने ! उन दोनों बालकोंको देखकर महामति अक्रूरजीका मुखकमल प्रफुल्लित हो गया तथा उनके सर्वाङ्गमें पुलकावली छा गयी ॥ २५ ॥ [और वे मन-ही-मन कहने लगे-] इन दो रूपोंमें जो यह भगवान् वासुदेवका अंश स्थित है वही परमधाम है और वही परमपद है ॥ २६॥ इन जगद्विधाताके दर्शन पाकर आज मेरे नेत्रयुगल तो सफल हो गये; किंतु क्या अब