विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 370, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १७ ] * पञ्चम अंश * ३५९
सत्रहवाँ अध्याय
अक्रूरजीकी गोकुलयात्रा
श्रीपराशर उवाच अक्रूरोऽपि विनिष्क्रम्य स्यन्दनेनाशुगामिना । कृष्णसंदर्शनाकाङ्क्षी प्रययौ नन्दगोकुलम् ॥ १
चिन्तयामास चाक्रूरो नास्ति धन्यतरो मया । योऽहमंशावतीर्णस्य मुखं द्रक्ष्यामि चक्रिणः ॥ २
अद्य मे सफलं जन्म सुप्रभाताभवन्निशा । यदुन्निद्राभपत्राक्षं विष्णोर्द्रक्ष्याम्यहं मुखम् ॥ ३
पापं हरति यत्पुंसां स्मृतं सङ्कल्पनामयम् । तत्पुण्डरीकनयनं विष्णोर्द्रक्ष्याम्यहं मुखम् ॥ ४
विनिर्जग्मुर्यतो वेदा वेदाङ्गानrendered्यखिलानि च । द्रक्ष्यामि तत्परं धाम धाम्नां भगवतो मुखम् ॥ ५
यज्ञेषु यज्ञपुरुषः पुरुषैः पुरुषोत्तमः । इज्यते योऽखिलाधारस्तं द्रक्ष्यामि जगत्पतिम् ॥ ६
इष्ट्वा यमिन्द्रो यज्ञानां शतेनामरराजताम् । अवाप तमनन्तादिमहं द्रक्ष्यामि केशवम् ॥ ७
न ब्रह्मा नेन्द्ररुद्राश्विवस्वादित्यमरुद्गणाः । यस्य स्वरूपं जानन्ति प्रत्यक्षं याति मे हरिः ॥ ८
सर्वात्मा सर्ववित्सर्वस्सर्वभूतेष्ववस्थितः । यो ह्यचिन्त्योऽव्ययो व्यापी स वक्ष्यति मया सह ॥ ९
मत्स्यकूर्मवराहाश्वसिंह्रूपादिभिः स्थितिम् । चकार जगतो योऽजः सोऽद्य मां प्रलपिष्यति ॥ १०
साम्प्रतं च जगत्स्वामी कार्यमात्महृदि स्थितम् । कर्तुं मनुष्यतां प्राप्तस्स्वेच्छादेहधृगव्ययः ॥ ११
योऽनन्तः पृथिवीं धत्ते शेखरस्थितिसंस्थिताम् । सोऽवतीर्णो जगत्यर्थे मामक्रूरेति वक्ष्यति ॥ १२
श्रीपराशरजी बोले— अक्रूरजी भी तुरंत ही मथुरापुरीसे निकलकर श्रीकृष्ण-दर्शनकी लालसासे एक शीघ्रगामी रथद्वारा नन्दजीके गोकुलको चले ॥ १ ॥ अक्रूरजी सोचने लगे 'आज मुझ-जैसा बड़भागी और कोई नहीं है; क्योंकि अपने अंशसे अवतीर्ण चक्रधारी श्रीविष्णुभगवान्का मुख मैं अपने नेत्रोंसे देखूँगा ॥ २ ॥ आज मेरा जन्म सफल हो गया; आजकी रात्रि [अवश्य] सुन्दर प्रभातवाली थी, जिससे कि मैं आज खिले हुए कमलके समान नेत्रवाले श्रीविष्णुभगवान्के मुखका दर्शन करूँगा ॥ ३ ॥ प्रभुका जो संकल्पमय मुखारविन्द स्मरणमात्रसे पुरुषोंके पापोंको दूर कर देता है, आज मैं विष्णुभगवान्के उसी कमलनयन मुखको देखूँगा ॥ ४ ॥ जिससे सम्पूर्ण वेद और वेदांगोंकी उत्पत्ति हुई है, आज मैं सम्पूर्ण तेजस्वियोंके परम आश्रय उसी भगवत्-मुखारविन्दका दर्शन करूँगा ॥ ५ ॥ समस्त पुरुषोंके द्वारा यज्ञोंमें जिन अखिल विश्वके आधारभूत पुरुषोत्तमका यज्ञपुरुषरूपसे यजन (पूजन) किया जाता है, आज मैं उन्हीं जगत्पतिका दर्शन करूँगा ॥ ६ ॥ जिनका सौ यज्ञोंसे यजन करके इन्द्रने देवराज-पदवी प्राप्त की है, आज मैं उन्हीं अनादि और अनन्त केशवका दर्शन करूँगा ॥ ७ ॥ जिनके स्वरूपको ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अश्विनीकुमार, वसुगण, आदित्य और मरुद्गण आदि कोई भी नहीं जानते आज वे ही हरि मेरे नेत्रोंके विषय होंगे ॥ ८ ॥ जो सर्वात्मा, सर्वज्ञ, सर्वस्वरूप और सब भूतोंमें अवस्थित हैं तथा जो अचिन्त्य, अव्यय और सर्वव्यापक हैं, अहो! आज स्वयं वे ही मेरे साथ बातें करेंगे ॥ ९ ॥ जिन अजन्माने मत्स्य, कूर्म, वराह, हयग्रीव और नृसिंह आदि रूप धारणकर जगत्की रक्षा की है, आज वे ही मुझसे वार्तालाप करेंगे ॥ १० ॥
'इस समय उन अव्ययात्मा जगत्प्रभुने अपने मनमें सोचा हुआ कार्य करनेके लिये अपनी ही इच्छासे मनुष्य-देह धारण किया है ॥ ११ ॥ जो अनन्त (शेषजी) अपने मस्तकपर रखी हुई पृथिवीको धारण करते हैं, संसारके हितके लिये अवतीर्ण हुए वे ही आज मुझसे 'अक्रूर' कहकर बोलेंगे ॥ १२ ॥