भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 558 में से

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पृष्ठ 380

अ० २०] * पञ्चम अंश * ३६९


श्रीपराशर उवाच श्रुत्वैतदाह सा कुब्जा गृह्यतामिति सादरम्। अनुलेपनं च प्रददौ गात्रयोग्यमथोभयोः॥ ७ भक्तिच्छेदानुलिप्ताङ्गौ ततस्तौ पुरुषर्षभौ। सेन्द्रचापौ व्यराजेतां सितकृष्णाविवाम्बुदौ॥ ८ ततस्तां चिबुके शौरिरुल्लापनविधानवित्। उत्पाट्य तोलयामास द्व्यङ्गुलेनाग्रपाणिना॥ ९ चकर्ष पद्भ्यां च तदा ऋजुत्वं केशवोऽनयत्। ततस्सा ऋजुतां प्राप्ता योषितामभवद्वरा॥ १० विलासगलितं प्राह प्रेमगर्भभरालसम्। वस्त्रे प्रगृह्य गोविन्दं मम गेहं व्रजेति वै॥ ११ एवमुक्तस्तया शौरी रामस्यालोक्य चाननम्। प्रहस्य कुब्जां तामाह नैकवक्रामनिन्दिताम्॥ १२ आयास्ये भवतीगेहमिति तां प्रहसन्हरिः। विससर्ज जहासोच्चै रामस्यालोक्य चाननम्॥ १३ भक्तिभेदानुलिप्ताङ्गौ नीलपीताम्बरौ तु तौ। धनुश्शालां ततो यातौ चित्रमाल्योपशोभितौ॥ १४ आयागं तद्धनूरत्नं ताभ्यां पृष्टैस्तु रक्षिभिः। आख्याते सहसा कृष्णो गृहीत्वापूरयद्धनुः॥ १५ ततः पूरयता तेन भज्यमानं बलाद्धनुः। चकार सुमहच्छब्दं मथुरा येन पूरिता॥ १६ अनुयुक्तौ ततस्तौ तु भग्ने धनुषि रक्षिभिः। रक्षिसैन्यं निहत्योभौ निष्क्रान्तौ कार्मुकालयात्॥ १७ अक्रूरागमवृत्तान्तमुपलभ्य महद्धनुः। भग्नं श्रुत्वा च कंसोऽपि प्राह चाणूरमुष्टिकौ॥ १८ कंस उवाच गोपालदारकौ प्राप्तौ भवद्भ्यां तु ममाग्रतः। मल्लयुद्धेन हन्तव्यौ मम प्राणहरौ हि तौ॥ १९ नियुद्धे तद्विनांशेन भवद्भ्यां तोषितो ह्यहम्। दास्याम्यभिमतान्कामानान्द्यथैतौ महाबलौ॥ २०


श्रीपराशरजी बोले- यह सुनकर कुब्जाने कहा— 'लीजिये' और फिर उन दोनोंको आदरपूर्वक उनके शरीरयोग्य चन्दनादि दिये॥ ७॥ उस समय वे दोनों पुरुषश्रेष्ठ [कपोल आदि अंगोंमें] पत्ररचनाविधिसे यथावत् अनुलिप्त होकर इन्द्रधनुषयुक्त श्याम और श्वेत मेघके समान सुशोभित हुए॥ ८॥ तत्पश्चात् उल्लापन (सीधे करनेकी)-विधिके जाननेवाले भगवान् कृष्णचन्द्रने उसकी ठोड़ीमें अपनी आगेकी दो अंगुलियाँ लगा उसे उचकाकर हिलाया तथा उसके पैर अपने पैरोंसे दबा लिये। इस प्रकार श्रीकृष्णने उसे ऋजुकाय (सीधे शरीरवाली) कर दी। तब सीधी हो जानेपर वह सम्पूर्ण स्त्रियोंमें सुन्दरी हो गयी॥ ९-१०॥

तब वह श्रीगोविन्दका पल्ला पकड़कर अन्तर्गर्भित प्रेम-भारसे अलसायी हुई विलासगलित वाणीमें बोली— 'आप मेरे घर चलिये'॥ ११॥ उसके ऐसा कहनेपर श्रीकृष्णचन्द्रने उस कुब्जासे, जो पहले अनेक अंगोंसे टेढ़ी थी, परंतु अब सुन्दरी हो गयी थी, बलरामजीके मुखकी ओर देखकर हँसते हुए कहा—॥ १२॥ 'हाँ, तुम्हारे घर भी आऊँगा'— ऐसा कहकर श्रीहरिने उसे मुसकाते हुए विदा किया और बलभद्रजीके मुखकी ओर देखते हुए जोर-जोरसे हँसने लगे॥ १३॥

तदनन्तर पत्र-रचनादि विधिसे अनुलिप्त तथा चित्र-विचित्र मालाओंसे सुशोभित राम और कृष्ण क्रमशः नीलाम्बर और पीताम्बर धारण किये हुए यज्ञशालातक आये॥ १४॥ वहाँ पहुँचकर उन्होंने यज्ञरक्षकोंसे उस यज्ञके उद्देश्यस्वरूप धनुषके विषयमें पूछा और उनके बतलानेपर श्रीकृष्णचन्द्रने उसे सहसा उठाकर प्रत्यंचा (डोरी) चढ़ा दी॥ १५॥ उसपर बलपूर्वक प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह धनुष टूट गया, उस समय उसने ऐसा घोर शब्द किया कि उससे सम्पूर्ण मथुरापुरी गूँज उठी॥ १६॥ तब धनुष टूट जानेपर उसके रक्षकोंके उनपर आक्रमण किया, उस रक्षक सेनाका संहार कर वे दोनों बालक धनुश्शालासे बाहर आये॥ १७॥

तदनन्तर अक्रूरके आनेका समाचार पाकर तथा उस महान् धनुषको भग्न हुआ सुनकर कंसने चाणूर और मुष्टिकसे कहा॥ १८॥

कंस बोला- यहाँ दोनों गोपालबालक आ गये हैं। वे मेरा प्राण-हरण करनेवाले हैं, अतः तुम दोनों मल्लयुद्धसे उन्हें मेरे सामने मार डालो। यदि तुमलोग मल्लयुद्धमें उन दोनोंका विनाश करके मुझे सन्तुष्ट कर