भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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३७० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २०

न्यायतोऽन्यायतो वापि भवद्भ्यां तौ ममाहितौ। हन्तव्यौ तद्वधाद्राज्यं सामान्यं वां भविष्यति ॥ २१ इत्यादिश्य स तौ मल्लौ ततश्चाहूय हस्तिपम्। प्रोवाचोच्चैस्त्वया मल्लसमाजद्वारि कुञ्जरः ॥ २२ स्थाप्यः कुवलयापीडस्तेन तौ गोपदारकौ। घातनीयौ नियुद्धाय रङ्गद्वारमुपागतौ ॥ २३ तमप्याज्ञाप्य दृष्ट्वा च सर्वान्मञ्चानुपार्कतान्। आसन्नमरणः कंसः सूर्योदयमुदैक्षत ॥ २४ ततः समस्तमञ्चेषु नागरस्स तदा जनः। राजमञ्चेषु चारूढास्सह भृत्यैर्नराधिपाः॥ २५ मल्लप्राश्निकवर्गश्च रङ्गमध्यसमीपगः। कृतः कंसेन कंसोऽपि तुङ्गमञ्चे व्यवस्थितः ॥ २६ अन्तःपुराणां मञ्चाश्च तथान्ये परिकल्पिताः। अन्ये च वारमुख्यानामन्थे नागरयोषिताम् ॥ २७ नन्दगोपादयोगोपा मञ्चेष्वन्येष्ववस्थिताः। अक्रूरवसुदेवौ च मञ्चप्रान्ते व्यवस्थितौ ॥ २८ नागरीयोषितां मध्ये देवकीपुत्रगृद्धिनी। अन्तकालेऽपि पुत्रस्य द्रक्ष्यामीति मुखं स्थिता ॥ २९ वाद्यमानेषु तूर्येषु चाणूरे चापि वल्गति। हाहाकारपरे लोके ह्यास्फोटयति मुष्टिके ॥ ३० ईषद्व्रसन्तौ तौ वीरौ बलभद्रजनार्दनौ। गोपवेषधरौ बालौ रङ्गद्वारमुपागतौ ॥ ३१ ततः कुवलयापीडो महामात्रप्रचोदितः। अभ्यधावत वेगेन हन्तुं गोपकुमारकौ ॥ ३२ हाहाकारो महाञ्जज्ञे रङ्गमध्ये द्विजोत्तम। बलदेवोऽनुजं दृष्ट्वा वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ३३ हन्तव्यो हि महाभाग नागोऽयं शत्रुचोदितः ॥ ३४ इत्युक्तस्सोऽग्रजेनाथ बलदेवेन वै द्विज। सिंहनादं ततश्चक्रे माधवः परवीरहा॥ ३५ करेण करमाकृष्य तस्य केशिनिषूदनः। भ्रामयामास तं शौरिरैरावतसमं बले ॥ ३६

दोगे तो मैं तुम्हारी समस्त इच्छाएं पूर्ण कर दूँगा; मेरे इस कथनको तुम मिथ्या न समझना। तुम न्यायसे अथवा अन्यायसे मेरे इन महाबलवान् अपकारियोंको अवश्य मार डालो। उनके मारे जानेपर यह सारा राज्य [ हमारा और ] तुम दोनोंका सामान्य होगा ॥ १९-२१ ॥

मल्लोंको इस प्रकार आज्ञा दे कंसने अपने महावतको बुलाया और उसे आज्ञा दी कि तू कुवलयापीड हाथीको मल्लोंकी रंगभूमिके द्वारपर खड़ा रख और जब वे गोपकुमार युद्धके लिये यहाँ आवें तो उन्हें इससे नष्ट करा दे ॥ २२-२३ ॥ इस प्रकार उसे आज्ञा देकर और समस्त सिंहासनोंको यथावत् रखे देखकर, जिसकी मृत्यु पास आ गयी है वह कंस सूर्योदयकी प्रतीक्षा करने लगा ॥ २४ ॥

प्रातःकाल होनेपर समस्त मंचोंपर नागरिक लोग और राजमंचोंपर अपने अनुचरोंके सहित राजालोग बैठे ॥ २५ ॥ तदनन्तर रंगभूमिके मध्यभागके समीप कंसने युद्धपरीक्षकोंको बैठाया और फिर स्वयं आप भी एक ऊँचे सिंहासनपर बैठा ॥ २६ ॥ वहाँ अन्तःपुरकी स्त्रियोंके लिये पृथक् मचान बनाये गये थे तथा मुख्य-मुख्य वारांगनाओं और नगरकी महिलाओंके लिये भी अलग-अलग मंच थे ॥ २७ ॥ कुछ अन्य मंचोंपर नन्दगोप आदि गोपगण बिठाये गये थे और उन मंचोंके पास ही अक्रूर और वसुदेवजी बैठे थे ॥ २८ ॥ नगरकी नारियोंके बीचमें 'चलो, अन्तकालमें ही पुत्रका मुख तो देख लूँगी' ऐसा विचारकर पुत्रके लिये मंगलकामना करती हुई देवकीजी बैठी थीं ॥ २९ ॥

तदनन्तर जिस समय तूर्य आदिके बजने तथा चाणूरके अत्यन्त उछलने और मुष्टिकके ताल ठोंकनेपर दर्शकगण हाहाकार कर रहे थे, गोपवेषधारी वीर बालक बलभद्र और कृष्ण कुछ हँसते हुए रंगभूमिके द्वारपर आये ॥ ३०-३१ ॥ वहाँ आते ही महावतकी प्रेरणासे कुवलयापीड नामक हाथी उन दोनों गोपकुमारोंको मारनेके लिये बड़े वेगसे दौड़ा ॥ ३२ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! उस समय रंगभूमिमें महान् हाहाकार मच गया तथा बलदेवजीने अपने अनुज कृष्णकी ओर देखकर कहा- "हे महाभाग ! इस हाथीको शत्रुने ही प्रेरित किया है; अतः इसे मार डालना चाहिये" ॥ ३३-३४ ॥

हे द्विज ! ज्येष्ठ भ्राता बलरामजीके ऐसा कहनेपर शत्रुसूदन श्रीश्यामसुन्दरने बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ३५ ॥ फिर केशिनिषूदन भगवान् श्रीकृष्णने बलमें ऐरावतके समान उस महाबली हाथीकी सूँड अपने हाथसे पकड़कर उसे घुमाया ॥ ३६ ॥