भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 382

अ० २०] * पञ्चम अंश * ३७१

ईशोऽपि सर्वजगतां बाललीलानुसारतः । क्रीडित्वा सुचिरं कृष्णः करिदन्तपदान्तरे ॥ ३७ उत्पाट्य वामदन्तं तु दक्षिणेनैव पाणिना । ताडयामास यन्तारं तस्यासीच्छतधा शिरः ॥ ३८ दक्षिणं दन्तमुत्पाट्य बलभद्रोऽपि तत्क्षणात् । सरोषस्तेन पार्श्वस्थान् गजपालानपोथयत् ॥ ३९ ततस्तूत्प्लुत्य वेगेन रौहिणेयो महाबलः । जघान वामपादेन मस्तके हस्तिनं रुषा ॥ ४० स पपात हतस्तेन बलभद्रेण लीलया । सहस्त्राक्षेण वज्रेण ताडितः पर्वतो यथा ॥ ४१ हत्वा कुवलयापीडं हस्त्यारोहप्रचोदितम् । मदासृगनुलिप्ताङ्गौ हस्तिदन्तवरायुधौ ॥ ४२ मृगमध्ये यथा सिंहौ गर्वलीलावलोकनौ । प्रविष्टौ सुमहद्रङ्गं बलभद्रजनार्दनौ ॥ ४३ हाहाकारो महाञ्जज्ञे महारेङ्गे त्वनन्तरम् । कृष्णोऽयं बलभद्रोऽयमिति लोकस्य विस्मयः ॥ ४४ सोऽयं येन हता घोरा पूतना बालघातिनी । क्षिप्तं तु शकटं येन भग्नौ तु यमलार्जुनौ ॥ ४५ सोऽयं यः कालियं नागं ममर्दोरुह्य बालकः । धृतो गोवर्द्धनो येन सप्तरात्रं महागिरिः ॥ ४६ अरिष्टो धेनुकः केशी लीलयैव महात्मना । निहता येन दुर्वृत्ता दृश्यतामेष सोऽच्युतः ॥ ४७ अयं चास्य महाबाहुर्बलभद्रोऽग्रतोऽग्रजः । प्रयाति लीलया योषिन्मनोनयननन्दनः ॥ ४८ अयं स कथ्यते प्राज्ञैः पुराणार्थविशारदैः । गोपालो यादवं वंशं मग्नमभ्युद्धरिष्यति ॥ ४९ अयं हि सर्वलोकस्य विष्णोरखिलजन्मनः । अवतीर्णो महीमंशो नूनं भारहरो भुवः ॥ ५० इत्येवं वर्णिते पौरै रामे कृष्णे च तत्क्षणात् । उरस्तताप देवक्याः स्नेहस्नुतपयोधरम् ॥ ५१ महोत्सवमिवासाद्य पुत्राननविलोकनात् । युवेव वसुदेवोऽभूद्विहायाभ्यागतां जराम् ॥ ५२

भगवान् कृष्ण यद्यपि सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं तथापि उन्होंने बहुत देरतक उस हाथीके दाँत और चरणोंके बीचमें खेलते-खेलते अपने दाएँ हाथसे उसका बायाँ दाँत उखाड़कर उससे महावतपर प्रहार किया। इससे उसके सिरके सैकड़ों टुकड़े हो गये ॥ ३७-३८ ॥ उसी समय बलभद्रजीने भी क्रोधपूर्वक उसका दायाँ दाँत उखाड़कर उससे आस-पास खड़े हुए महावतोंको मार डाला ॥ ३९ ॥ तदनन्तर महाबली रोहिणीनन्दनने रोषपूर्वक अति वेगसे उछलकर उस हाथीके मस्तकपर अपनी बायीं लात मारी ॥ ४० ॥ इस प्रकार वह हाथी बलभद्रजीद्वारा लीलापूर्वक मारा जाकर इन्द्र-वज्रसे आहत पर्वतके समान गिर पड़ा ॥ ४१ ॥

तब महावतसे प्रेरित कुवलयापीडको मारकर उसके मद और रक्तसे लथपथ राम और कृष्ण उसके दाँतोंको लिये हुए गर्वयुक्त लीलामयी चितवनसे निहारते उस महान् रंगभूमिमें इस प्रकार आये जैसे मृगसमूहके बीचमें सिंह चला जाता है ॥ ४२-४३ ॥ उस समय महान् रंगभूमिमें बड़ा कोलाहल होने लगा और सब लोगोंमें 'ये कृष्ण हैं, ये बलभद्र हैं' ऐसा विस्मय छा गया ॥ ४४ ॥

[वे कहने लगे-] “जिसने बालघातिनी घोर राक्षसी पूतनाको मारा था, शकटको उलट दिया था और यमलार्जुनको उखाड़ डाला था वह यही है। जिस बालकने कालियनागके ऊपर चढ़कर उसका मान मर्दन किया था और सात रात्रितक महापर्वत गोवर्द्धनको अपने हाथपर धारण किया था वह यही है ॥ ४५-४६ ॥ जिस महात्माने अरिष्टासुर, धेनुकासुर और केशी आदि दुष्टोंको लीलासे ही मार डाला था; देखो, वह अच्युत यही हैं ॥ ४७ ॥ ये इनके आगे इनके बड़े भाई महाबाहु बलभद्रजी हैं जो बड़े लीलापूर्वक चल रहे हैं। ये स्त्रियोंके मन और नयनोंको बड़ा ही आनन्द देनेवाले हैं? ॥ ४८ ॥ पुराणार्थवेत्ता विद्वान् लोग कहते हैं कि ये गोपालजी डूबे हुए यदुवंशका उद्धार करेंगे ॥ ४९ ॥ ये सर्वलोकमय और सर्वकारण भगवान् विष्णुके ही अंश हैं, इन्होंने पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही भूमिपर अवतार लिया है" ॥ ५० ॥

राम और कृष्णके विषयमें पुरवासियोंके इस प्रकार कहते समय देवकीके स्तनोंसे स्नेहके कारण दूध बहने लगा और उनके हृदयमें बड़ा अनुताप हुआ ॥ ५१ ॥ पुत्रोंका मुख देखनेसे अत्यन्त उल्लास-सा प्राप्त होनेके कारण वसुदेवजी भी मानो आयी हुई जराको छोड़कर फिरसे नवयुवक-से हो गये ॥ ५२ ॥