विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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३७२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २०
| विस्तारिताक्षियुगलो राजान्तःपुरयोषिताम्।<br>नागरस्त्रीसमूहश्च द्रष्टुं न विरराम तम्॥ ५३ | राजाके अन्तःपुरकी स्त्रियाँ तथा नगर निवासिनी महिलाएँ भी उन्हें एकटक देखते-देखते उपराम न हुईं॥ ५३॥ [वे परस्पर कहने लगीं—] “अरी सखियो! |
| सख्यः पश्यत कृष्णस्य मुखमत्यरुणेक्षणम्।<br>गजयुद्धकृतायासस्वेदाम्बुकणिकाचितम्॥ ५४ | अरुणनयनसे युक्त श्रीकृष्णचन्द्रका अति सुन्दर मुख तो देखो, जो कुवलयापीडके साथ युद्ध करनेके परिश्रमसे स्वेद बिन्दुपूर्ण होकर हिम-कण-सिंचित शरत्कालीन प्रफुल्ल |
| विकासिशिरदम्भोजमवश्यायजलोक्षितम्।<br>परिभूय स्थितं जन्म सफलं क्रियतां दृशः॥ ५५ | कमलको लज्जित कर रहा है। अरी! इसका दर्शन करके अपने नेत्रोंका होना सफल कर लो'॥ ५४-५५॥ |
| श्रीवत्साङ्कं महद्धाम बालस्यैतद्विलोक्यताम्।<br>विपक्षक्षपणं वक्षो भुजयुग्मं च भामिनि॥ ५६ | [एक स्त्री बोली—] “हे भामिनि! इस बालकका यह लक्ष्मी आदिका आश्रयभूत श्रीवत्सांकयुक्त वक्षःस्थल तथा शत्रुओंको पराजित करनेवाली इसकी दोनों भुजाएँ तो देखो!”॥ ५६॥ |
| किं न पश्यसि दुग्धेन्दुमृणालधवलाकृतिम्।<br>बलभद्रमिमं नीलपरिधानमुपागतम्॥ ५७ | [दूसरी०—] “अरी! क्या तुम नीलाम्बर धारण किये इन दुग्ध, चन्द्र अथवा कमलनालके समान शुभ्रवर्ण बलदेवजीको आते हुए नहीं देखती हो?”॥ ५७॥ |
| वल्गता मुष्टिकेनैव चाणूरेण तथा सखि।<br>क्रीडतो बलभद्रस्य हरेर्हास्यं विलोक्यताम्॥ ५८ | [तीसरी०—] “अरी सखियो! [अखाड़ेमें] चक्कर देकर घूमनेवाले चाणूर और मुष्टिकके साथ क्रीडा करते हुए बलभद्र तथा कृष्णका हँसना देख लो।”॥ ५८॥ |
| सख्यः पश्यत चाणूरं नियुद्धार्थमयं हरिः।<br>समुपैति न सन्त्यत्र किं वृद्धा मुक्तकारिणः॥ ५९ | [चौथी०—] “हाय! सखियो! देखो तो चाणूरसे लड़नेके लिये ये हरि आगे बढ़ रहे हैं; क्या इन्हें छुड़ानेवाले कोई भी बड़े-बूढ़े यहाँ नहीं हैं?”॥ ५९॥ |
| क्व यौवनोन्मुखीभूतसुकुमारतनुर्हरिः।<br>क्व वज्रकठिनाभोगशरीरोऽयं महासुरः॥ ६० | 'कहाँ तो यौवनमें प्रवेश करनेवाले सुकुमार-शरीर श्याम और कहाँ वज्रके समान कठोर शरीरवाला यह महान् असुर!'॥ ६०॥ ये दोनों नवयुवक तो बड़े ही |
| इमौ सुललितैरङ्गैर्वर्तेते नवयौवनौ।<br>दैतेयमल्लाश्चाणूरप्रमुखास्त्वतिदारुणाः॥ ६१ | सुकुमार शरीरवाले हैं, [किंतु इनके प्रतिपक्षी] ये चाणूर आदि दैत्य मल्ल अत्यन्त दारुण हैं॥ ६१॥ |
| नियुद्धप्राश्निकानां तु महानेष व्यतिक्रमः।<br>यद्बालबलिनोर्युद्धं मध्यस्थैस्समुपेक्ष्यते॥ ६२ | मल्लयुद्धके परीक्षकगणोंका यह बहुत बड़ा अन्याय है जो वे मध्यस्थ होकर भी इन बालक और बलवान् मल्लोंके बीच युद्ध करा रहे हैं॥ ६२॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>इत्थं पुरस्त्रीलोकस्य वदतश्चालयन्भुवम्।<br>ववल्ग बद्धकक्ष्योऽन्तर्जनस्य भगवान्हरिः॥ ६३ | श्रीपराशरजी बोले—नगरकी स्त्रियोंके इस प्रकार वार्तालाप करते समय भगवान् कृष्णचन्द्र अपनी कमर कसकर उन समस्त दर्शकोंके बीचमें पृथिवीको |
| बलभद्रोऽपि चास्फोट्य ववल्ग ललितं तथा।<br>पदे पदे तथा भूमिर्यन्न शीर्णा तदद्भुतम्॥ ६४ | कम्पायमान करते हुए रंगभूमिमें कूद पड़े॥ ६३॥ श्रीबलभद्रजी भी अपने भुजदण्डोंको ठोंकते हुए अति मनोहरभावसे उछलने लगे। उस समय उनके पद-पदपर पृथिवी नहीं फटी, यही बड़ा आश्चर्य है॥ ६४॥ |
| चाणूरेण ततः कृष्णो युयुधेऽमितविक्रमः।<br>नियुद्धकुशलो दैत्यो बलभद्रेण मुष्टिकः॥ ६५ | तदनन्तर अमित-विक्रम कृष्णचन्द्र चाणूरके साथ और द्वन्द्वयुद्धकुशल राक्षस मुष्टिक बलभद्रके साथ युद्ध |
| सन्निपातावधूतैस्तु चाणूरेण समं हरिः।<br>प्रक्षेपणैर्मुष्टिभिश्च कीलवज्रनिपातनैः॥ ६६ | करने लगे॥ ६५॥ कृष्णचन्द्र चाणूरके साथ परस्पर भिड़कर, |
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