भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 384

अ० २० ] * पञ्चम अंश * ३७३


पादोद्भूतैः प्रमृष्टैश्च तयोर्युद्धमभून्महत् ॥ ६७
अशस्त्रमतिघोरं तत्तयोर्युद्धं सुदारुणम् ।
बलप्राणविनिष्पाद्यं समाजोत्सवसन्निधौ ॥ ६८
यावद्यावच्च चाणूरो युयुधे हरिणा सह ।
प्राणहानिमवापाग्र्यां तावत्तावल्लवाल्लवम् ॥ ६९
कृष्णोऽपि युयुधे तेन लीलयैव जगन्मयः ।
खेदाच्चालयता कोपान्निजशेखरकेसरम् ॥ ७०
बलक्षयं विवृद्धिं च दृष्ट्वा चाणूरकृष्णयोः ।
वारयामास तूर्याणि कंसः कोपपरायणः ॥ ७१
मृदङ्गादिषु तूर्येषु प्रतिषिद्धेषु तत्क्षणात् ।
खे सङ्गतान्यवादयन्त देवतूर्याण्यनेकशः ॥ ७२
जय गोविन्द चाणूरं जहि केशव दानवम् ।
अन्तर्द्धानगता देवास्तमूचुरतिहर्षिताः ॥ ७३
चाणूरेण चिरं कालं क्रीडित्वा मधुसूदनः ।
उत्थाप्य भ्रामयामास तद्वधाय कृतोद्यमः ॥ ७४
भ्रामयित्वा शतगुणं दैत्यमल्लममित्रजित् ।
भूमावास्फोटयामास गगने गतजीवितम् ॥ ७५
भूमावास्फोटितस्तेन चाणूरः शतधाभवत् ।
रक्तस्रावमहापङ्कां चकार च तदा भुवम् ॥ ७६
बलदेवोऽपि तत्कालं मुष्टिकेन महाबलः ।
युयुधे दैत्यमल्लेन चाणूरेण यथा हरिः ॥ ७७
सोऽप्येनं मुष्टिना मूर्ध्नि वक्षस्याहत्य जानुना ।
पातयित्वा धरापृष्ठे निष्पिपेष गतायुषम् ॥ ७८
कृष्णास्तोशलकं भूयो मल्लराजं महाबलम् ।
वाममुष्टिप्रहारेण पातयामास भूतले ॥ ७९
चाणूरे निहते मल्ले मुष्टिके विनिपातिते ।
नीते क्षयं तोशलके सर्वे मल्लाः प्रदुद्रुवुः ॥ ८०
ववल्गातुस्ततो रङ्गे कृष्णसङ्कर्षणावुभौ ।
समानवयसो गोपान्बलादाकृष्य हर्षितौ ॥ ८१


नीचे गिराकर, उछालकर, घूँसे और वज्रके समान कोहनी मारकर, पैरोंसे ठोकर मारकर तथा एक-दूसरेके अंगोंको रगड़कर लड़ने लगे। उस समय उनमें महान् युद्ध होने लगा ॥ ६६-६७ ॥

इस प्रकार उस समाजोत्सवके समीप केवल बल और प्राणशक्तिसे ही सम्पन्न होनेवाला उनका अति भयंकर और दारुण शस्त्रहीन युद्ध हुआ ॥ ६८ ॥ चाणूर जैसे-जैसे भगवान्‌से भिड़ता गया वैसे-ही-वैसे उसकी प्राणशक्ति थोड़ी-थोड़ी करके अत्यन्त क्षीण होती गयी ॥ ६९ ॥ जगन्मय भगवान् कृष्ण भी, श्रम और कोपके कारण अपने पुष्पमय शिरोभूषणोंमें लगे हुए केशरको हिलानेवाले उस चाणूरसे लीलापूर्वक लड़ने लगे ॥ ७० ॥ उस समय चाणूरके बलका क्षय और कृष्णचन्द्रके बलका उदय देख कंसने खीझकर तूर्य आदि बाजे बन्द करा दिये ॥ ७१ ॥ रंगभूमिमें मृदंग और तूर्य आदिके बन्द हो जानेपर आकाशमें अनेक दिव्य तूर्य एक साथ बजने लगे ॥ ७२ ॥ और देवगण अत्यन्त हर्षित होकर अलक्षितभावसे कहने लगे—‘‘हे गोविन्द ! आपकी जय हो। हे केशव ! आप शीघ्र ही इस चाणूर दानवको मार डालिये।’’ ॥ ७३ ॥

भगवान् मधुसूदन बहुत देरतक चाणूरके साथ खेल करते रहे, फिर उसका वध करनेके लिये उद्यत होकर उसे उठाकर घुमाया ॥ ७४ ॥ शत्रुविजयी श्रीकृष्णचन्द्रने उस दैत्य मल्लको सैकड़ों बार घुमाकर आकाशमें ही निर्जीव हो जानेपर पृथिवीपर पटक दिया ॥ ७५ ॥ भगवान्‌के द्वारा पृथिवीपर गिराये जाते ही चाणूरके शरीरके सैकड़ों टुकड़े हो गये और उस समय उसने रक्तस्रावसे पृथिवीको अत्यन्त कीचड़मय कर दिया ॥ ७६ ॥ इधर, जिस प्रकार भगवान् कृष्ण चाणूरसे लड़ रहे थे, उसी प्रकार महाबली बलभद्रजी भी उस समय दैत्य मल्ल मुष्टिकसे भिड़े हुए थे ॥ ७७ ॥ बलरामजीने उसके मस्तकपर घूँसोंसे तथा वक्षःस्थलमें जानुसे प्रहार किया और उस गतायु दैत्यको पृथिवीपर पटककर रौंद डाला ॥ ७८ ॥

तदनन्तर श्रीकृष्णचन्द्रने महाबली मल्लराज तोशलको बायें हाथसे घूँसा मारकर पृथिवीपर गिरा दिया ॥ ७९ ॥ मल्लश्रेष्ठ चाणूर और मुष्टिकके मारे जानेपर तथा मल्लराज तोशलके नष्ट होनेपर समस्त मल्लगण भाग गये ॥ ८० ॥ तब कृष्ण और संकर्षण अपने समवयस्क गोपोंको बलपूर्वक खींचकर [आलिंगन करते हुए] हर्षसे रंगभूमिमें उछलने लगे ॥ ८१ ॥