भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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३७४* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० २०

कंसोऽपि कोपरक्ताक्षः प्राहोच्चैर्यायतानरान्।
गोपावेतौ समाजाद्धान्निष्क्राम्येतां बलादितः॥ ८२
नन्दोऽपि गृह्यतां पापो निर्गलैरायसैरहि।
अवृद्धार्हेण दण्डेन वसुदेवोऽपि वध्यताम्॥ ८३
वल्गन्ति गोपाः कृष्णेन ये चेमे सहिताः पुरः।
गावो निगृह्यतामेषां यच्चास्ति वसु किञ्चन॥ ८४
एवमाज्ञापयन्तं तु प्रहस्य मधुसूदनः।
उत्प्लुत्यारुह्य तं मञ्चं कंसं जग्राह वेगतः॥ ८५
केशेष्वाकृष्य विगलत्किरीटमवनीतले।
स कंसं पातयामास तस्योपरि पपात च॥ ८६
अशेषजगदाधारगुरुणा पततोपरि।
कृष्णेन त्याजितः प्राणानुग्रसेनात्मजो नृपः॥ ८७
मृतस्य केशेषु तदा गृहीत्वा मधुसूदनः।
चकर्ष देहं कंसस्य रङ्गमध्ये महाबलः॥ ८८
गौरवेणातिमहता परिघा तेन कृष्यता।
कृता कंसस्य देहेन वेगेनेव महाम्भसः॥ ८९
कंसे गृहीते कृष्णेन तद्भ्राताऽभ्यागतो रुषा।
सुमाली बलभद्रेण लीलयैव निपातितः॥ ९०
ततो हाहाकृतं सर्वमासीत्तद्रङ्गमण्डलम्।
अवज्ञया हतं दृष्ट्वा कृष्णेन मथुरेश्वरम्॥ ९१
कृष्णोऽपि वसुदेवस्य पादौ जग्राह सत्वरः।
देवक्याश्च महाबाहुर्बलदेवसहायवान्॥ ९२
उत्थाप्य वसुदेवस्तं देवकी च जनार्दनम्।
स्मृतजन्मोक्तवचनौ तावेव प्रणतौ स्थितौ॥ ९३
श्रीवसुदेव उवाच
प्रसीद सीदतां दत्तो देवानां यो वरः प्रभो।
तथावयोः प्रसादेन कृतोद्धारस्स केशव॥ ९४
आराधितो यद्भगवानवतीर्णो गृहे मम।
दुर्वृत्तनिधनार्थाय तेन नः पावितं कुलम्॥ ९५
त्वमन्तः सर्वभूतानां सर्वभूतमयः स्थितः।
प्रवर्तन्ते समस्तात्मंस्त्वत्तो भूतभविष्यती॥ ९६


तदनन्तर कंसने क्रोधसे नेत्र लाल करके वहाँ एकत्रित हुए पुरुषोंसे कहा—"अरे! इस समाजसे इन ग्वालबालोंको बलपूर्वक निकाल दो॥ ८२॥ पापी नन्दको लोहेकी श्रृंखलामें बाँधकर पकड़ लो तथा वृद्ध पुरुषोंके अयोग्य दण्ड देकर वसुदेवको भी मार डालो॥ ८३॥ मेरे सामने कृष्णके साथ ये जितने गोपबालक उछल रहे हैं इन सबको भी मार डालो तथा इनकी गौएँ और जो कुछ अन्य धन हो वह सब छीन लो"॥ ८४॥ जिस समय कंस इस प्रकार आज्ञा दे रहा था, उसी समय श्रीमधुसूदन हँसते-हँसते उछलकर मंचपर चढ़ गये और शीघ्रतासे उसे पकड़ लिया॥ ८५॥ भगवान् कृष्णने उसके केशोंको खींचकर उसे पृथिवीपर पटक दिया तथा उसके ऊपर आप भी कूद पड़े, इस समय उसका मुकुट सिरसे खिसककर अलग जा पड़ा॥ ८६॥ सम्पूर्ण जगत्के आधार भगवान् कृष्णके ऊपर गिरते ही उग्रसेनात्मज राजा कंसने अपने प्राण छोड़ दिये॥ ८७॥ तब महाबली कृष्णचन्द्रने मृतक कंसके केश पकड़कर उसके देहको रंगभूमिमें घसीटा॥ ८८॥ कंसका देह बहुत भारी था, इसलिये उसे घसीटनेसे जलके महान् वेगसे हुई दरारके समान पृथिवीपर परिघा बन गयी॥ ८९॥

श्रीकृष्णचन्द्रद्वारा कंसके पकड़ लिये जानेपर उसके भाई सुमालीने क्रोधपूर्वक आक्रमण किया। उसे बलरामजीने लीलासे ही मार डाला॥ ९०॥ इस प्रकार मथुरापति कंसको कृष्णचन्द्रद्वारा अवज्ञापूर्वक मरा हुआ देखकर रंगभूमिमें उपस्थित सम्पूर्ण जनता हाहाकार करने लगी॥ ९१॥ उसी समय महाबाहु कृष्णचन्द्र बलदेवजी-सहित वसुदेव और देवकीके चरण पकड़ लिये॥ ९२॥ तब वसुदेव और देवकीको पूर्वजन्ममें कहे हुए भगवद्वाक्योंका स्मरण हो आया और उन्होंने श्रीजनार्दनको पृथिवीपरसे उठा लिया तथा उनके सामने प्रणतभावसे खड़े हो गये॥ ९३॥

श्रीवसुदेवजी बोले—हे प्रभो! अब आप हमपर प्रसन्न होइये। हे केशव! आपने आर्त देवगणोंको जो वर दिया था, वह हम दोनोंपर अनुग्रह करके पूर्ण कर दिया॥ ९४॥ भगवन्! आपने जो मेरी आराधनासे दुष्टजनोंके नाशके लिये मेरे घरमें जन्म लिया, उससे हमारे कुलको पवित्र कर दिया है॥ ९५॥ आप सर्वभूतमय हैं और समस्त भूतोंके भीतर स्थित हैं। हे समस्तात्मन्! भूत और भविष्यत् आपहीसे प्रवृत्त होते हैं॥ ९६॥