विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 386, कुल 558 में से
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अ० २० ]
* पञ्चम अंश *
३७५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यज्ञैस्त्वमिज्यसेऽचिन्त्य सर्वदेवमयाच्युत।<br>त्वमेव यज्ञो यष्टा च यज्वनां परमेश्वर॥ ९७ | हे अचिन्त्य! हे सर्वदेवमय! हे अच्युत! समस्त यज्ञोंसे आपहीका यजन किया जाता है तथा हे परमेश्वर! आप ही यज्ञ करनेवालोंके यष्टा और यज्ञस्वरूप हैं॥ ९७॥ |
| समुद्भवस्समस्तस्य जगतस्त्वं जनार्दन॥ ९८<br>सापह्नवं मम मनो यदेतत्त्वयि जायते।<br>देवक्याश्चात्मजप्रीत्या तदत्यन्तविडम्बना॥ ९९ | हे जनार्दन! आप तो सम्पूर्ण जगत्के उत्पत्ति-स्थान हैं, आपके प्रति पुत्रवात्सल्यके कारण जो मेरा और देवकीका चित्त भ्रान्तियुक्त हो रहा है यह बड़ी ही हँसीकी बात है॥ ९८-९९॥ |
| त्वं कर्ता सर्वभूतानामनादिनिधनो भवान्।<br>त्वां मनुष्यस्य कस्यैषा जिह्वा पुत्रेति वक्ष्यति॥ १०० | आप आदि और अन्तसे रहित हैं तथा समस्त प्राणियोंके उत्पत्तिकर्त्ता हैं, ऐसा कौन मनुष्य है जिसकी जिह्वा आपको ‘पुत्र’ कहकर सम्बोधन करेगी?॥ १००॥ |
| जगदेतज्जगन्नाथ सम्भूतनिखिलं यतः।<br>कया युक्त्या विना मायां सोऽस्मत्तः सम्भविष्यति॥ १०१ | हे जगन्नाथ! जिन आपसे यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है वही आप बिना मायाशक्तिके और किस प्रकार हमसे उत्पन्न हो सकते हैं॥ १०१॥ |
| यस्मिन्प्रतिष्ठितं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्।<br>स कोष्ठोत्सङ्गशयनो मानुषो जायते कथम्॥ १०२ | जिसमें सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत् स्थित है वह प्रभु कुक्षि (कोख) और गोदमें शयन करनेवाला मनुष्य कैसे हो सकता है?॥ १०२॥ |
| स त्वं प्रसीद परमेश्वर पाहि विश्व-<br> मंशावतारकरणैर्न ममासि पुत्रः।<br>आब्रह्मपादपमिदं जगदेतदीश<br> त्वत्तो विमोहयसि किं पुरुषोत्तमस्मान्॥ १०३ | हे परमेश्वर! वही आप हमपर प्रसन्न होइये और अपने अंशावतारसे विश्वकी रक्षा कीजिये। आप मेरे पुत्र नहीं हैं। हे ईश! ब्रह्मासे लेकर वृक्षादिपर्यन्त यह सम्पूर्ण जगत् आपहीसे उत्पन्न हुआ है, फिर हे पुरुषोत्तम! आप हमें क्यों मोहित कर रहे हैं?॥ १०३॥ |
| मायाविमोहितदृशा तनयो ममेति<br> कंसाद्भयं कृतमपास्तभयातितीव्रम्।<br>नीतोऽसि गोकुलमरातिभयाकुलेन<br> वृद्धिं गतोऽसि मम नास्ति ममत्वमीश॥ १०४ | हे निर्भय! ‘आप मेरे पुत्र हैं’ इस मायासे मोहित होकर मैंने कंससे अत्यन्त भय माना था और उस शत्रुके भयसे ही मैं आपको गोकुल ले गया था। हे ईश! आप वहीं रहकर इतने बड़े हुए हैं, इसलिये अब आपमें मेरी ममता नहीं रही है॥ १०४॥ |
| कर्माणि रुद्रमरुदश्विशतक्रतूनां<br> साध्यानि यस्य न भवन्ति निरीक्षितानि।<br>त्वं विष्णुरीश जगतामुपकारहेतोः<br> प्राप्तोऽसि नः परिगतो विगतो हि मोहः॥ १०५ | अबतक मैंने आपके ऐसे अनेक कर्म देखे हैं जो रुद्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार और इन्द्रके लिये भी साध्य नहीं हैं। अब मेरा मोह दूर हो गया है। हे ईश! [मैंने निश्चयपूर्वक जान लिया है कि] आप साक्षात् श्रीविष्णुभगवान् ही जगत्के उपकारके लिये प्रकट हुए हैं॥ १०५॥ |
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इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे विंशोऽध्यायः॥ २०॥
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