भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 387

३७६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २१


इक्कीसवाँ अध्याय

उग्रसेनका राज्याभिषेक तथा भगवान्‌का विद्याध्ययन

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श्रीपराशर उवाच
तौ समुत्पन्नविज्ञानौ भगवत्कर्मदर्शनात्।
देवकीवसुदेवौ तु दृष्ट्वा मायां पुनर्हरिः।
मोहाय यदुचक्रस्य विततान स वैष्णवीम्॥ १
उवाच चाम्ब हे तात चिरादुत्कण्ठितेन मे।
भवन्तौ कंसभीतेन दृष्टौ सङ्कर्षणेन च॥ २
कुर्वतां याति यः कालो मातापित्रोरपूजनम्।
तत्खण्डमायुषो व्यर्थमसाधूनां हि जायते॥ ३
गुरुदेवद्विजातीनां मातापित्रोश्च पूजनम्।
कुर्वतां सफलः कालो देहिनां तात जायते॥ ४
तत्क्षन्तव्यमिदं सर्वमतिक्रमकृतं पितः।
कंसवीर्यप्रतापाभ्यामावयोः परवश्ययोः॥ ५
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्त्वाथ प्रणम्योभौ यदुवृद्धाननुक्रमात्।
यथावदभिपूज्याथ चक्रतुः पौरमाननम्॥ ६
कंसपत्न्यस्ततः कंसं परिवार्य हतं भुवि।
विलेपुर्मातरश्चास्य दुःखशोकपरिप्लुताः॥ ७
बहुप्रकारमत्यर्थं पश्चात्तापातुरो हरिः।
तास्समाशवासयामास स्वयमस्त्राविलेक्षणः॥ ८
उग्रसेनं ततो बन्धान्मुमोच मधुसूदनः।
अभ्यषिञ्चत्तदैवैनं निजराज्ये हतात्मजम्॥ ९
राज्येऽभिषिक्तः कृष्णेन यदुसिंहस्सुतस्य सः।
चकार प्रेतकार्याणि ये चान्ये तत्र घातिताः॥ १०
कृतौर्ध्वदैहिकं चैनं सिंहासनगतं हरिः।
उवाचाज्ञापय विभो यत्कार्यमविशङ्कितः॥ ११
ययातिशापाद्द्यंशोऽयमराज्यार्होऽपि साम्प्रतम्।
मयि भृत्ये स्थिते देवानाज्ञापयतु किं नृपैः॥ १२
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्त्वा सोऽस्मरद्वायुमाजगाम च तत्क्षणात्।
उवाच चैनं भगवान्केशवः कार्यमानुषः॥ १३

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श्रीपराशरजी बोले— अपने अति अद्भुत कर्मोंको देखनेसे वसुदेव और देवकीको विज्ञान उत्पन्न हुआ देखकर भगवान्‌ने यदुवंशियोंको मोहित करनेके लिये अपनी वैष्णवी मायाका विस्तार किया॥ १॥ और बोले—'‘हे मात:! हे पिताजी! बलरामजी और मैं बहुत दिनोंसे कंसके भयसे छिपे हुए आपके दर्शनोंके लिये उत्कण्ठित थे, सो आज आपका दर्शन हुआ है॥ २॥ जो समय माता-पिताकी सेवा किये बिना बीतता है वह असाधु पुरुषोंकी ही आयुका भाग व्यर्थ जाता है॥ ३॥ हे तात! गुरु, देव, ब्राह्मण और माता-पिताका पूजन करते रहनेसे देहधारियोंका जीवन सफल हो जाता है॥ ४॥ अतः हे तात! कंसके वीर्य और प्रतापसे भीत हम परवशोंसे जो कुछ अपराध हुआ हो वह क्षमा करें'’॥ ५॥
श्रीपराशरजी बोले— राम और कृष्णने इस प्रकार कह माता-पिताको प्रणाम किया और फिर क्रमशः समस्त यदुवृद्धोंका यथायोग्य अभिवादन कर पुरवासियोंका सम्मान किया॥ ६॥ उस समय कंसकी पत्नियाँ और माताएँ पृथिवीपर पड़े हुए मृतक कंसको घेरकर दुःख-शोकसे पूर्ण हो विलाप करने लगीं॥ ७॥ तब कृष्णचन्द्रने भी अत्यन्त पश्चात्तापसे विह्वल हो स्वयं आँखोंमें आँसू भरकर उन्हें अनेकों प्रकारसे ढाँढ़स बँधाया॥ ८॥
तदनन्तर श्रीमधुसूदनने उग्रसेनको बन्धनसे मुक्त किया और पुत्रके मारे जानेपर उन्हें अपने राज्यपदपर अभिषिक्त किया॥ ९॥ श्रीकृष्णचन्द्रद्वारा राज्याभिषिक्त होकर यदुश्रेष्ठ उग्रसेनने अपने पुत्र तथा और भी जो लोग वहाँ मारे गये थे, उन सबके और्ध्वदैहिक कर्म किये॥ १०॥ और्ध्वदैहिक कर्मोंसे निवृत्त होनेपर सिंहासनारूढ़ उग्रसेनसे श्रीहरि बोले—'‘हे विभो! हमारे योग्य जो सेवा हो उसके लिये हमें निश्शंक होकर आज्ञा दीजिये॥ ११॥ ययातिके शाप होनेसे यद्यपि हमारा वंश राज्यका अधिकारी नहीं है तथापि इस समय मुझ दासके रहते हुए राजाओंको तो क्या, आप देवताओंको भी आज्ञा दे सकते हैं'’॥ १२॥
श्रीपराशरजी बोले— उग्रसेनसे इस प्रकार कह [धर्मसंस्थापनादि] कार्यसिद्धिके लिये मनुष्यरूप धारण करने-वाले भगवान् कृष्णने वायुका स्मरण किया और वह उसी समय वहाँ उपस्थित हो गया। तब भगवान्‌ने उससे कहा—॥ १३॥

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