भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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अ० २१ ] * पञ्चम अंश * ३७७

गच्छेदं ब्रूहि वायो त्वमलं गर्वेण वासव।<br>दीयतामुग्रसेनाय सुधर्मा भवता सभा॥ १४<br>कृष्णो ब्रवीति राजार्हमेतद्रत्नमनुत्तमम्।<br>सुधर्माख्यसभा युक्तमस्यां यदुभिरासितुम्॥ १५<br>श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्तः पवनो गत्वा सर्वमाह शचीपतिम्।<br>ददौ सोऽपि सुधर्माख्यां सभां वायोः पुरन्दरः॥ १६<br>वायुना चाहृतां दिव्यां सभां ते यदुपूङ्गवाः।<br>बुभुजुस्सर्वरत्नाढ्यां गोविन्दभुजसंश्रयाः॥ १७<br>विदिताखिलविज्ञानौ सर्वज्ञानमयावपि।<br>शिष्याचार्यक्रमं वीरौ ख्यापयन्तौ यदूत्तमौ॥ १८<br>ततस्सान्दीपनिं काश्यमवन्तिपुरवासिनम्<br>विद्यार्थं जग्मतुर्बालौ कृतोपनयनक्रमौ॥ १९<br>वेदाभ्यासकृतप्रीती सङ्कर्षणजनार्दनौ।<br>तस्य शिष्यत्वमभ्येत्य गुरुवृत्तिपरौ हि तौ।<br>दर्शयाञ्चक्रतुर्वीरावाचारमखिले जने॥ २०<br>सरहस्यं धनुर्वेदं ससङ्ग्रहमधीयताम्।<br>अहोरात्रचतुष्षष्ट्या तदद्भुतमभूद्द्विज॥ २१<br>सान्दीपनि रसम्भाव्यं तयोः कर्मातिमानुषम्।<br>विचिन्त्य तौ तदा मेने प्राप्तौ चन्द्रदिवाकरौ॥ २२<br>साङ्गांश्च चतुरो वेदान्सर्वशास्त्राणि चैव हि।<br>अस्त्रग्राममशेषं च प्रोक्तमात्रमवाप्य तौ॥ २३<br>ऊचतुर्ब्रियतां या ते दातव्या गुरुदक्षिणा॥ २४<br>सोऽप्यतीन्द्रियमालोक्य तयोः कर्म महामतिः।<br>अयाचत मृतं पुत्रं प्रभासे लवणार्णवे॥ २५<br>गृहीतास्त्रौ ततस्तौ तु सार्घ्यहस्तो महोदधिः।<br>उवाच न मया पुत्रो हतस्सान्दीपनेरिति॥ २६<br>दैत्यः पञ्चजनो नाम शङ्खरूपस्स बालकम्।<br>जग्राह योऽस्ति सलिले ममैवासुरसूदन॥ २७<br>श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्तोऽन्तर्जलं गत्वा हत्वा पञ्चजनं च तम्।<br>कृष्णो जग्राह तस्यास्थिप्रभवं शङ्खमुत्तमम्॥ २८‘‘हे वायो! तुम जाओ और इन्द्रसे कहो कि हे वासव! व्यर्थ गर्व छोड़कर तुम उग्रसेनको अपनी सुधर्मा नामकी सभा दो॥ १४॥ कृष्णचन्द्रकी आज्ञा है कि यह सुधर्मा-सभा नामक सर्वोत्तम रत्न राजाके ही योग्य है इसमें यादवोंका विराजमान होना उपयुक्त है’’॥ १५॥<br>**श्रीपराशरजी बोले—**भगवान्‌की ऐसी आज्ञा होनेपर वायुने यह सारा समाचार इन्द्रसे जाकर कह दिया और इन्द्रने भी तुरन्त ही अपनी सुधर्मा नामकी सभा वायुको दे दी॥ १६॥ वायुद्वारा लायी हुई उस सर्वरत्न-सम्पन्न दिव्य सभाका सम्पूर्ण भोग वे यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णचन्द्रकी भुजाओंके आश्रित रहकर करने लगे॥ १७॥<br>तदनन्तर समस्त विज्ञानोंको जानते हुए और सर्वज्ञान-सम्पन्न होते हुए भी वीरवर कृष्ण और बलराम गुरु-शिष्य-सम्बन्धको प्रकाशित करनेके लिये उपनयन-संस्कारके अनन्तर विद्योपार्जनके लिये काशीमें उत्पन्न हुए अवन्तिपुरवासी सान्दीपनि मुनिके यहाँ गये॥ १८-१९॥ वीर संकर्षण और जनार्दन सान्दीपनिका शिष्यत्व स्वीकार कर वेदाभ्यासपरायण हो यथायोग्य गुरुशुश्रूषादिमें प्रवृत्त रह सम्पूर्ण लोगोंको यथोचित शिष्टाचार प्रदर्शित करने लगे॥ २०॥ हे द्विज! यह बड़े आश्चर्यकी बात हुई कि उन्होंने केवल चौंसठ दिनमें रहस्य (अस्त्र-मन्त्रोपनिषद्) और संग्रह (अस्त्रप्रयोग)-के सहित सम्पूर्ण धनुर्वेद सीख लिया॥ २१॥ सान्दीपनिने जब उनके इस असम्भव और अतिमानुष-कर्मको देखा तो यही समझा कि साक्षात् सूर्य और चन्द्रमा ही मेरे घर आ गये हैं॥ २२॥ उन दोनोंने अंगोंसहित चारों वेद, सम्पूर्ण शास्त्र और सब प्रकारकी अस्त्रविद्या एक बार सुनते ही प्राप्त कर ली और फिर गुरुजीसे कहा—‘‘कहिये, आपको क्या गुरुदक्षिणा दें?’’॥ २३-२४॥ महामति सान्दीपनिने उनके अतीन्द्रिय-कर्म देखकर प्रभासक्षेत्रके खारे समुद्रमें डूबकर मरे हुए अपने पुत्रको माँगा॥ २५॥ तदनन्तर जब वे शस्त्र ग्रहणकर समुद्रके पास पहुँचे तो समुद्र अर्घ्य लेकर उनके सम्मुख उपस्थित हुआ और कहा—‘‘मैंने सान्दीपनिका पुत्र हरण नहीं किया॥ २६॥ हे दैत्यदवन! मेरे जलमें ही पंचजन नामक एक दैत्य शंखरूपसे रहता है; उसीने उस बालकको पकड़ लिया था’’॥ २७॥<br>**श्रीपराशरजी बोले—**समुद्रके इस प्रकार कहनेपर कृष्णचन्द्रने जलके भीतर जाकर पंचजनका वध किया और उसकी अस्थियोंसे उत्पन्न हुए शंखको ले लिया॥ २८॥

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