विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 389, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 389
३७८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २२
| यस्य नादेन दैत्यानां बलहानिरजायत।<br>देवानां ववृधे तेजो यात्यधर्मश्च सङ्क्षयम्॥ २९ | जिसके शब्दसे दैत्योंका बल नष्ट हो जाता है, देवताओंका तेज बढ़ता है और अधर्मका क्षय होता है॥ २९॥ |
| तं पाञ्चजन्यमापूर्य गत्वा यमपुरं हरिः।<br>बलदेवश्च बलवान्जित्वा वैवस्वतं यमम्॥ ३० | तदनन्तर उस पांचजन्य शंखको बजाते हुए श्रीकृष्णचन्द्र और बलवान् बलराम यमपुरको गये और सूर्यपुत्र यमको जीतकर यमयातना भोगते हुए उस बालकको पूर्ववत् शरीरयुक्तकर उसके पिताको दे दिया॥ ३०-३१॥ |
| तं बालं यातनासंस्थं यथापूर्वशरीरिणम्।<br>पित्रे प्रदत्तवान्कृष्णो बलश्च बलिनां वरः॥ ३१ | |
| मथुरां च पुनः प्राप्तावुग्रसेनेन पालिताम्।<br>प्रहृष्टपुरुषस्त्रीकामुभौ रामजनार्दनौ॥ ३२ | इसके पश्चात् वे राम और कृष्ण राजा उग्रसेनद्वारा परिपालित मथुरापुरीमें, जहाँके स्त्री-पुरुष [उनके आगमनसे] आनन्दित हो रहे थे, पधारे॥ ३२॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे एकविंशोऽध्यायः॥ २१॥
बाईसवाँ अध्याय
जरासन्धकी पराजय
| श्रीपराशर उवाच | |
|---|---|
| जरासन्धसुते कंस उपयेमे महाबलः।<br>अस्तिं प्राप्तिं च मैत्रेय तयोर्भर्तृहणं हरिम्॥ १ | श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! महाबली कंसने जरासन्धकी पुत्री अस्ति और प्राप्तिके साथ विवाह किया था, अतः वह अत्यन्त बलिष्ठ मगधराज क्रोधपूर्वक एक बहुत बड़ी सेना लेकर अपनी पुत्रियोंके स्वामी कंसको मारनेवाले श्रीहरिको यादवोंके सहित मारनेकी इच्छासे मथुरापर चढ़ आया॥ १-२॥ |
| महाबलपरीवारो मगधाधिपतिर्बली।<br>हन्तुमभ्याययौ कोपाज्जरासन्धस्सयादवम्॥ २ | |
| उपेत्य मथुरां सोऽथ रुरोध मगधेश्वरः।<br>अक्षौहिणीभिस्सैन्यस्य त्रयोविंशतिभिर्वृतः॥ ३ | मगधेश्वर जरासन्धने तेईस अक्षौहिणी सेनाके सहित आकर मथुराको चारों ओरसे घेर लिया॥ ३॥ |
| निष्क्रम्याल्पपरीचारावुभौ रामजनार्दनौ।<br>युयुधाते समं तस्य बलिनौ बलिसैनिकैः॥ ४ | तब महाबली राम और जनार्दन थोड़ी-सी सेनाके साथ नगरसे निकलकर जरासन्धके प्रबल सैनिकोंसे युद्ध करने लगे॥ ४॥ |
| ततो रामश्च कृष्णश्च मतिं चक्रतुरञ्जसा।<br>आयुधानां पुराणानामादाने मुनिसत्तम॥ ५ | हे मुनिश्रेष्ठ! उस समय राम और कृष्णने अपने पुरातन शस्त्रोंको ग्रहण करनेका विचार किया॥ ५॥ |
| अनन्तरं हरेश्चाङ्गं तूणौ चाक्षयसायकौ।<br>आकाशादागतौ विप्र तथा कौमोदकी गदा॥ ६ | हे विप्र! हरिके स्मरण करते ही उनका शार्ङ्ग धनुष, अक्षय बाणयुक्त दो तरकश और कौमोदकी नामकी गदा आकाशसे आकर उपस्थित हो गये॥ ६॥ |
| हलं च बलभद्रस्य गगनादागतं महत्।<br>मनसोऽभिमतं विप्र सुनन्दं मुसलं तथा॥ ७ | हे द्विज! बलभद्रजीके पास भी उनका मनोवांछित महान् हल और सुनन्द नामक मूसल आकाशसे आ गये॥ ७॥ |
| ततो युद्धे पराजित्य ससैन्यं मगधाधिपम्।<br>पुरीं विविशतुर्वीरावुभौ रामजनार्दनौ॥ ८ | तदनन्तर दोनों वीर राम और कृष्ण सेनाके सहित मगधराजको युद्धमें हराकर मथुरापुरीमें चले आये॥ ८॥ |
| जिते तस्मिन्सुदुर्वृत्ते जरासन्धे महामुने।<br>जीवमाने गते कृष्णास्तेनामन्यत नाजितम्॥ ९ | हे महामुने! दुराचारी जरासन्धको जीत लेनेपर भी उसके जीवित चले जानेके कारण कृष्णचन्द्रने अपनेको अपराजित नहीं समझा॥ ९॥ |