भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 390

अ० २३ ]
*पञ्चम अंश*
३७९


पुनरप्याजगामाथ जरासन्धो बलान्वितः ।
जितश्च रामकृष्णाभ्यामपक्रान्तो द्विजोत्तम ॥ १०

हे द्विजोत्तम! जरासन्ध फिर उतनी ही सेना लेकर आया, किन्तु राम और कृष्णसे पराजित होकर भाग गया ॥ १० ॥

दश चाष्टौ च सङ्ग्रामानेवमत्यन्तदुर्मदः ।
यदुभिर्मागधो राजा चक्रे कृष्णपुरोगमैः ॥ ११

इस प्रकार अत्यन्त दुर्धर्ष मगधराज जरासन्धने राम और कृष्ण आदि यादवोंसे अट्ठारह बार युद्ध किया ॥ ११ ॥

सर्वेष्वेतेषु युद्धेषु यादवैस्स पराजितः ।
अपक्रान्तो जरासन्धस्स्वल्पसैन्यैर्बलाधिकः ॥ १२

इन सभी युद्धोंमें अधिक सैन्यशाली जरासन्ध थोड़ी-सी सेनावाले यदुवंशियोंसे हारकर भाग गया ॥ १२ ॥

न तद्वलं यादवानां विजितं यदनेकंशः ।
तत्तु सन्निधिमाहात्म्यं विष्णोरंशस्य चक्रिणः ॥ १३

यादवोंकी थोड़ी-सी सेना भी जो [उसकी अनेक बड़ी सेनाओंसे] पराजित न हुई, यह सब भगवान् विष्णुके अंशावतार श्रीकृष्णचन्द्रकी सन्निधिका ही माहात्म्य था ॥ १३ ॥

मनुष्यधर्मशीलस्य लीला सा जगतीपतेः ।
अस्त्राण्यनेकरूपाणि यदरातिषु मुञ्चति ॥ १४

उन मानवधर्मशील जगत्पतिकी यह लीला ही है जो कि ये अपने शत्रुओंपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र छोड़ रहे हैं ॥ १४ ॥

मनसैव जगत्सृष्टिं संहारं च करोति यः ।
तस्यारिपक्षक्षपणे कियानुद्यमविस्तरः ॥ १५

जो केवल संकल्पमात्रसे ही संसारकी उत्पत्ति और संहार कर देते हैं, उन्हें अपने शत्रुपक्षका नाश करनेके लिये भला उद्योग फैलानेकी कितनी आवश्यकता है? ॥ १५ ॥

तथापि यो मनुष्याणां धर्मस्तमनुवर्तते ।
कुर्वन्बलवता सन्धिं हीनैर्युद्धं करोत्यसौ ॥ १६

तथापि वे बलवानोंसे सन्धि और बलहीनोंसे युद्ध करके मानव-धर्मोंका अनुवर्तन कर रहे थे ॥ १६ ॥

साम चोपप्रदानं च तथा भेदं च दर्शयन् ।
करोति दण्डपातं च क्वचिदेव पलायनम् ॥ १७

वे कहीं साम, कहीं दान और कहीं भेदनीतिका व्यवहार करते थे तथा कहीं दण्ड देते और कहींसे स्वयं भाग भी जाते थे ॥ १७ ॥

मनुष्यदेहिनां चेष्टामित्येवमनुवर्तते ।
लीला जगत्पतेस्तस्यच्छन्दतः परिवर्तते ॥ १८

इस प्रकार मानवदेहधारियोंकी चेष्टाओंका अनुवर्तन करते हुए श्रीजगत्पतिकी अपनी इच्छानुसार लीलाएँ होती रहती थीं ॥ १८ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥


तेईसवाँ अध्याय

द्वारका-दुर्गकी रचना, कालयवनका भस्म होना तथा मुचुकुन्दकृत भगवत्स्तुति

श्रीपराशर उवाच

श्रीपराशरजी बोले—

गार्ग्यं गोष्ठ्यां द्विजं श्यालषण्ढ इत्युक्तवान्द्विज ।
यदूनां सन्निधौ सर्वे जहसुर्यादवास्तदा ॥ १

हे द्विज! एक बार महर्षि गार्ग्यसे उनके सालेने यादवोंकी गोष्ठीमें नपुंसक कह दिया। उस समय समस्त यदुवंशी हँस पड़े ॥ १ ॥

ततः कोपपरीतात्मा दक्षिणापथमेत्य सः ।
सुतमिच्छंस्तपस्तेपे यदुचक्रभयावहम् ॥ २

तब गार्ग्यने अत्यन्त कुपित हो दक्षिण-समुद्रके तटपर जा यादवसेनाको भयभीत करनेवाले पुत्रकी प्राप्तिके लिये तपस्या की ॥ २ ॥

आराधयन्महादेवं लोहचूर्णमभक्षयत् ।
ददौ वरं च तुष्टोऽस्मै वर्षे तु द्वादशे हरः ॥ ३

उन्होंने श्रीमहादेवजीकी उपासना करते हुए केवल लोहचूर्ण भक्षण किया तब भगवान् शंकरने बारहवें वर्षमें प्रसन्न होकर उन्हें अभीष्ट वर दिया ॥ ३ ॥

सन्तोषयामास च तं यवनेशो ह्यनात्मजः ।
तद्योषित्सङ्गमाच्चास्य पुत्रोऽभूद्दलिसन्निभः ॥ ४

एक पुत्रहीन यवनराजाने महर्षि गार्ग्यकी अत्यन्त सेवाकर उन्हें सन्तुष्ट किया, उसकी स्त्रीके संगसे ही इनके एक भौंरेके समान कृष्णवर्ण बालक हुआ ॥ ४ ॥