भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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३८० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २३

तं कालयवनं नाम राज्ये स्वे यवनेश्वरः।
अभिषिच्य वनं यातो वज्राग्रकठिनोरसम्॥ ५

स तु वीर्यमदोन्मत्तः पृथिव्यां बलिनो नृपान्।
अपृच्छन्नारदस्तस्मै कथयामास यादवान्॥ ६

म्लेच्छकोटिसहस्राणां सहस्रैस्सोऽभिसंवृतः।
गजाश्वरथसम्पन्नैश्चकार परमोद्यमम्॥ ७

प्रययौ सोऽव्यवच्छिन्नं छिन्नयानो दिने दिने।
यादवान्प्रति सामर्षो मैत्रेय मथुरां पुरीम्॥ ८

कृष्णोऽपि चिन्तयामास क्षपितं यादवं बलम्।
यवनेन रणे गम्यं मागधस्य भविष्यति॥ ९

मागधस्य बलं क्षीणं स कालयवनो बली।
हन्तैतदेवमायातं यदूनां व्यसनं द्विधा॥ १०

तस्माद्दुर्गं करिष्यामि यदूनामरिदुर्जयम्।
स्त्रियोऽपि यत्र युद्धेयुः किं पुनर्वृष्णिपुङ्गवाः॥ ११

मयि मत्ते प्रमत्ते वा सुप्ते प्रवसितेऽपि वा।
यादवाभिभवं दुष्टा मा कुर्वन्त्वरयोऽधिकाः॥ १२

इति सञ्चिन्त्य गोविन्दो योजनानां महोदधिम्।
ययाचे द्वादश पुरीं द्वारकां तत्र निर्ममे॥ १३

महोद्यानां महावप्रां तटाकशतशोभिताम्।
प्रासादगृहसम्बाधामिन्द्रस्येवामरावतीम्॥ १४

मथुरावासिनं लोकं तत्रानीय जनार्दनः।
आसन्ने कालयवने मथुरां च स्वयं ययौ॥ १५

बहिरावासिते सैन्ये मथुराया निरायुधः।
निर्जगाम च गोविन्दो ददर्श यवनश्च तम्॥ १६

स ज्ञात्वा वासुदेवं तं बाहुप्रहरणं नृपः।
अनुयातो महायोगिचेतोभिः प्राप्यते न यः॥ १७

तेनानुयातः कृष्णोऽपि प्रविवेश महागुहाम्।
यत्र शेते महावीर्यो मुचुकुन्दो नरेश्वरः॥ १८

वह यवनराज उस कालयवन नामक बालकको, जिसका वक्षःस्थल वज्रके समान कठोर था, अपने राज्यपदपर अभिषिक्त कर स्वयं वनको चला गया॥ ५॥
तदनन्तर वीर्यमदोन्मत्त कालयवनने नारदजीसे पूछा कि पृथिवीपर बलवान् राजा कौन-कौनसे हैं? इसपर नारदजीने उसे यादवोंको ही सबसे अधिक बलशाली बतलाया॥ ६॥ यह सुनकर कालयवनने हजारों हाथी, घोड़े और रथोंके सहित सहस्रों करोड़ म्लेच्छसेनाको साथ ले बड़ी भारी तैयारी की॥ ७॥ और यादवोंके प्रति क्रुद्ध होकर वह प्रतिदिन [हाथी, घोड़े आदिके थक जानेपर] उन वाहनोंका त्याग करता हुआ [अन्य वाहनोंपर चढ़कर] अविच्छिन्न-गतिसे मथुरापुरीपर चढ़ आया॥ ८॥
[एक ओर जरासन्धका आक्रमण और दूसरी ओर कालयवनकी चढ़ाई देखकर] श्रीकृष्णचन्द्रने सोचा— "यवनोंके साथ युद्ध करनेसे क्षीण हुई यादव-सेना अवश्य ही मगधनरेशसे पराजित हो जायगी॥ ९॥ और यदि प्रथम मगधनरेशसे लड़ते हैं तो उससे क्षीण हुई यादवसेनाको बलवान् कालयवन नष्ट कर देगा। हाय! इस प्रकार यादवोंपर [एक ही साथ] यह दो तरहकी आपत्ति आ पहुँची है॥ १०॥ अतः मैं यादवोंके लिये एक ऐसा दुर्जय दुर्ग तैयार कराता हूँ जिसमें बैठकर वृष्णिश्रेष्ठ यादवोंकी तो बात ही क्या है, स्त्रियाँ भी युद्ध कर सकें॥ ११॥ उस दुर्गमें रहनेपर यदि मैं मत्त, प्रमत्त (असावधान), सोया अथवा कहीं बाहर भी गया होऊँ तब भी, अधिक-से-अधिक दुष्ट शत्रुगण भी यादवोंको पराभूत न कर सकें"॥ १२॥
ऐसा विचारकर श्रीगोविन्दने समुद्रसे बारह योजन भूमि माँगी और उसमें द्वारकापुरी निर्माण की॥ १३॥ जो इन्द्रकी अमरावतीपुरीके समान महान् उद्यान, गहरी खाई, सैकड़ों सरोवर तथा अनेकों महलोंसे सुशोभित थी॥ १४॥ कालयवनके समीप आ जानेपर श्रीजनार्दन सम्पूर्ण मथुरा-निवासियोंको द्वारकामें ले आये और फिर स्वयं मथुरा लौट गये॥ १५॥ जब कालयवनकी सेनाने मथुराको घेर लिया तो श्रीकृष्णचन्द्र बिना शस्त्र लिये मथुरासे बाहर निकल आये। तब यवनराज कालयवनने उन्हें देखा॥ १६॥ महायोगेश्वरोंका चित्त भी जिन्हें प्राप्त नहीं कर पाता उन्हीं वासुदेवको केवल बाहुरूप शस्त्रोंसे ही युक्त [अर्थात् खाली हाथ] देखकर वह उनके पीछे दौड़ा॥ १७॥
कालयवनसे पीछा किये जाते हुए श्रीकृष्णचन्द्र उस महा गुहामें घुस गये जिसमें महावीर्यशाली राजा मुचुकुन्द