विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 392, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 392
अ० २३ ] * पञ्चम अंश * ३८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सोऽपि प्रविष्टो यवनो दृष्ट्वा शय्यागतं नृपम्।<br>पादेन ताडयामास मत्वा कृष्णं सुदुर्मतिः ॥ १९<br>उत्थाय मुचुकुन्दोऽपि ददर्श यवनं नृपः ॥ २०<br>दृष्टमात्रश्च तेनासौ जज्वल यवनोऽग्निना।<br>तत्क्रोधजेन मैत्रेय भस्मीभूतश्च तत्क्षणात् ॥ २१<br><br>स हि देवासुरे युद्धे गतो हत्वा महासुरान्।<br>निद्रार्त्तस्सुमहाकालं निद्रां वव्रे वरं सुरान् ॥ २२<br>प्रोक्तश्च देवैस्संसुप्तं यस्त्वामुत्थापयिष्यति।<br>देहजेनाग्निना सद्यस्स तु भस्मीभविष्यति ॥ २३<br><br>एवं दग्ध्वा स तं पापं दृष्ट्वा च मधुसूदनम्।<br>कस्त्वमित्याह सोऽप्याह जातोऽहं शशिनः कुले।<br>वसुदेवस्य तनयो यदोर्वंशसमुद्भवः ॥ २४<br>मुचुकुन्दोऽपि तत्रासौ वृद्धगार्ग्यवचोऽस्मरत् ॥ २५<br>संस्मृत्य प्रणिपत्यैनं सर्वं सर्वेश्वरं हरिम्।<br>प्राह ज्ञातो भवान्विष्णोरंशस्त्वं परमेश्वर ॥ २६<br><br>पुरा गार्ग्येण कथितमष्टाविंशतिमे युगे।<br>द्वापरान्ते हरेर्जन्म यदुवंशे भविष्यति ॥ २७<br>स त्वं प्राप्तो न सन्देहो मर्त्यानामुपकारकृत्।<br>तथापि सुमहत्तेजो नालं सोढुमहं तव ॥ २८<br><br>तथा हि सजलाम्भोदनादधीरतं तव।<br>वाक्यं नमति चैवोर्वी युष्मत्पादप्रपीडिता ॥ २९<br><br>देवासुरमहायुद्धे दैत्यसैन्यमहाभटाः।<br>न सेहुर्मम तेजस्ते त्वत्तेजो न सहाम्यहम् ॥ ३०<br><br>संसारपतितस्यैको जन्तोस्त्वं शरणं परम्।<br>प्रसीद त्वं प्रपन्नार्तिहर नाशय मेऽशुभम् ॥ ३१<br><br>त्वं पयोनिधयश्शैलसरितस्त्वं वनानि च।<br>मेदिनी गगनं वायुरापोऽग्निस्त्वं तथा मनः ॥ ३२<br><br>बुद्धिरव्याकृतप्राणाः प्राणेशस्त्वं तथा पुमान्।<br>पुंसः परतरं यच्च व्याप्यजन्मविकारवत् ॥ ३३<br><br>शब्दादिहीनमजरममेयं क्षयवर्जितम्।<br>अवृद्धिनाशं तद्ब्रह्म त्वमाद्यन्तविवर्जितम् ॥ ३४ | सो रहा था॥ १८॥ उस दुर्मति यवनने भी उस गुफामें जाकर सोये हुए राजाको कृष्ण समझकर लात मारी ॥ १९॥ उसके लात मारनेसे उठकर राजा मुचुकुन्दने उस यवनराजको देखा। हे मैत्रेय! उनके देखते ही वह यवन उसकी क्रोधाग्निसे जलकर भस्मीभूत हो गया ॥ २०-२१॥<br><br>पूर्वकालमें राजा मुचुकुन्द देवताओंकी ओरसे देवासुर-संग्राममें गये थे; असुरोंको मार चुकनेपर अत्यन्त निद्रालु होनेके कारण उन्होंने देवताओंसे बहुत समयतक सोनेका वर माँगा था ॥ २२॥ उस समय देवताओंने कहा था कि तुम्हारे शयन करनेपर तुम्हें जो कोई जगावेगा वह तुरन्त ही अपने शरीरसे उत्पन्न हुई अग्निसे जलकर भस्म हो जायगा ॥ २३॥<br><br>इस प्रकार पापी कालयवनको दग्ध कर चुकनेपर राजा मुचुकुन्दने श्रीमघुसूदनको देखकर पूछा—'आप कौन हैं?' तब भगवान्ने कहा—'मैं चन्द्रवंशके अन्तर्गत यदुकुलमें वसुदेवजीके पुत्ररूपसे उत्पन्न हुआ हूँ' ॥ २४॥ तब मुचुकुन्दको वृद्ध गार्ग्य मुनिके वचनोंका स्मरण हुआ। उनका स्मरण होते ही उन्होंने सर्वरूप सर्वेश्वर श्रीहरिको प्रणाम करके कहा—'हे परमेश्वर! मैंने आपको जान लिया है; आप साक्षात् भगवान् विष्णुके अंश हैं ॥ २५-२६॥<br><br>पूर्वकालमें गार्ग्य मुनिने कहा था कि अट्ठाईसवें युगमें द्वापरके अन्तमें यदुकुलमें श्रीहरिका जन्म होगा ॥ २७॥ निस्सन्देह आप भगवान् विष्णुके अंश हैं और मनुष्योंके उपकारके लिये ही अवतीर्ण हुए हैं तथापि मैं आपके महान् तेजको सहन करनेमें समर्थ नहीं हूँ ॥ २८॥ हे भगवन्! आपका शब्द सजल मेघकी घोर गर्जनाके समान अति गम्भीर है तथा आपके चरणोंसे पीडिता होकर पृथिवी झुकी हुई है ॥ २९॥<br><br>हे देव! देवासुर-महासंग्राममें दैत्य-सेनाके बड़े-बड़े योद्धागण भी मेरा तेज नहीं सह सके थे और मैं आपका तेज सहन नहीं कर सकता ॥ ३०॥<br><br>संसारमें पतित जीवोंके एकमात्र आप ही परम आश्रय हैं। हे शरणागतोंका दुःख दूर करनेवाले! आप प्रसन्न होइये और मेरे अमंगलोंको नष्ट कीजिये ॥ ३१॥<br><br>आप ही समुद्र हैं, आप ही पर्वत हैं, आप ही नदियाँ हैं और आप ही वन हैं तथा आप ही पृथिवी, आकाश, वायु, जल, अग्नि और मन हैं ॥ ३२॥<br><br>आप ही बुद्धि, अव्याकृत, प्राण और प्राणोंका अधिष्ठाता पुरुष हैं; तथा पुरुषसे भी परे जो व्यापक और जन्म तथा विकारसे शून्य तत्त्व है वह भी आप ही हैं ॥ ३३॥<br><br>जो शब्दादिसे रहित, अजर, अमेयं, अक्षय और नाश तथा वृद्धिसे रहित है, वह आद्यन्तहीन ब्रह्म भी आप ही हैं ॥ ३४॥ |