भारतकोश
संग्रह पर लौटें

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

अ० २३ ] * पञ्चम अंश * ३८१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सोऽपि प्रविष्टो यवनो दृष्ट्वा शय्यागतं नृपम्।<br>पादेन ताडयामास मत्वा कृष्णं सुदुर्मतिः ॥ १९<br>उत्थाय मुचुकुन्दोऽपि ददर्श यवनं नृपः ॥ २०<br>दृष्टमात्रश्च तेनासौ जज्वल यवनोऽग्निना।<br>तत्क्रोधजेन मैत्रेय भस्मीभूतश्च तत्क्षणात् ॥ २१<br><br>स हि देवासुरे युद्धे गतो हत्वा महासुरान्।<br>निद्रार्त्तस्सुमहाकालं निद्रां वव्रे वरं सुरान् ॥ २२<br>प्रोक्तश्च देवैस्संसुप्तं यस्त्वामुत्थापयिष्यति।<br>देहजेनाग्निना सद्यस्स तु भस्मीभविष्यति ॥ २३<br><br>एवं दग्ध्वा स तं पापं दृष्ट्वा च मधुसूदनम्।<br>कस्त्वमित्याह सोऽप्याह जातोऽहं शशिनः कुले।<br>वसुदेवस्य तनयो यदोर्वंशसमुद्भवः ॥ २४<br>मुचुकुन्दोऽपि तत्रासौ वृद्धगार्ग्यवचोऽस्मरत् ॥ २५<br>संस्मृत्य प्रणिपत्यैनं सर्वं सर्वेश्वरं हरिम्।<br>प्राह ज्ञातो भवान्विष्णोरंशस्त्वं परमेश्वर ॥ २६<br><br>पुरा गार्ग्येण कथितमष्टाविंशतिमे युगे।<br>द्वापरान्ते हरेर्जन्म यदुवंशे भविष्यति ॥ २७<br>स त्वं प्राप्तो न सन्देहो मर्त्यानामुपकारकृत्।<br>तथापि सुमहत्तेजो नालं सोढुमहं तव ॥ २८<br><br>तथा हि सजलाम्भोदनादधीरतं तव।<br>वाक्यं नमति चैवोर्वी युष्मत्पादप्रपीडिता ॥ २९<br><br>देवासुरमहायुद्धे दैत्यसैन्यमहाभटाः।<br>न सेहुर्मम तेजस्ते त्वत्तेजो न सहाम्यहम् ॥ ३०<br><br>संसारपतितस्यैको जन्तोस्त्वं शरणं परम्।<br>प्रसीद त्वं प्रपन्नार्तिहर नाशय मेऽशुभम् ॥ ३१<br><br>त्वं पयोनिधयश्शैलसरितस्त्वं वनानि च।<br>मेदिनी गगनं वायुरापोऽग्निस्त्वं तथा मनः ॥ ३२<br><br>बुद्धिरव्याकृतप्राणाः प्राणेशस्त्वं तथा पुमान्।<br>पुंसः परतरं यच्च व्याप्यजन्मविकारवत् ॥ ३३<br><br>शब्दादिहीनमजरममेयं क्षयवर्जितम्।<br>अवृद्धिनाशं तद्ब्रह्म त्वमाद्यन्तविवर्जितम् ॥ ३४सो रहा था॥ १८॥ उस दुर्मति यवनने भी उस गुफामें जाकर सोये हुए राजाको कृष्ण समझकर लात मारी ॥ १९॥ उसके लात मारनेसे उठकर राजा मुचुकुन्दने उस यवनराजको देखा। हे मैत्रेय! उनके देखते ही वह यवन उसकी क्रोधाग्निसे जलकर भस्मीभूत हो गया ॥ २०-२१॥<br><br>पूर्वकालमें राजा मुचुकुन्द देवताओंकी ओरसे देवासुर-संग्राममें गये थे; असुरोंको मार चुकनेपर अत्यन्त निद्रालु होनेके कारण उन्होंने देवताओंसे बहुत समयतक सोनेका वर माँगा था ॥ २२॥ उस समय देवताओंने कहा था कि तुम्हारे शयन करनेपर तुम्हें जो कोई जगावेगा वह तुरन्त ही अपने शरीरसे उत्पन्न हुई अग्निसे जलकर भस्म हो जायगा ॥ २३॥<br><br>इस प्रकार पापी कालयवनको दग्ध कर चुकनेपर राजा मुचुकुन्दने श्रीमघुसूदनको देखकर पूछा—'आप कौन हैं?' तब भगवान्‌ने कहा—'मैं चन्द्रवंशके अन्तर्गत यदुकुलमें वसुदेवजीके पुत्ररूपसे उत्पन्न हुआ हूँ' ॥ २४॥ तब मुचुकुन्दको वृद्ध गार्ग्य मुनिके वचनोंका स्मरण हुआ। उनका स्मरण होते ही उन्होंने सर्वरूप सर्वेश्वर श्रीहरिको प्रणाम करके कहा—'हे परमेश्वर! मैंने आपको जान लिया है; आप साक्षात् भगवान् विष्णुके अंश हैं ॥ २५-२६॥<br><br>पूर्वकालमें गार्ग्य मुनिने कहा था कि अट्ठाईसवें युगमें द्वापरके अन्तमें यदुकुलमें श्रीहरिका जन्म होगा ॥ २७॥ निस्सन्देह आप भगवान् विष्णुके अंश हैं और मनुष्योंके उपकारके लिये ही अवतीर्ण हुए हैं तथापि मैं आपके महान् तेजको सहन करनेमें समर्थ नहीं हूँ ॥ २८॥ हे भगवन्! आपका शब्द सजल मेघकी घोर गर्जनाके समान अति गम्भीर है तथा आपके चरणोंसे पीडिता होकर पृथिवी झुकी हुई है ॥ २९॥<br><br>हे देव! देवासुर-महासंग्राममें दैत्य-सेनाके बड़े-बड़े योद्धागण भी मेरा तेज नहीं सह सके थे और मैं आपका तेज सहन नहीं कर सकता ॥ ३०॥<br><br>संसारमें पतित जीवोंके एकमात्र आप ही परम आश्रय हैं। हे शरणागतोंका दुःख दूर करनेवाले! आप प्रसन्न होइये और मेरे अमंगलोंको नष्ट कीजिये ॥ ३१॥<br><br>आप ही समुद्र हैं, आप ही पर्वत हैं, आप ही नदियाँ हैं और आप ही वन हैं तथा आप ही पृथिवी, आकाश, वायु, जल, अग्नि और मन हैं ॥ ३२॥<br><br>आप ही बुद्धि, अव्याकृत, प्राण और प्राणोंका अधिष्ठाता पुरुष हैं; तथा पुरुषसे भी परे जो व्यापक और जन्म तथा विकारसे शून्य तत्त्व है वह भी आप ही हैं ॥ ३३॥<br><br>जो शब्दादिसे रहित, अजर, अमेयं, अक्षय और नाश तथा वृद्धिसे रहित है, वह आद्यन्तहीन ब्रह्म भी आप ही हैं ॥ ३४॥

३८२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २३


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
त्वत्तोऽमरास्सपितरो यक्षगन्धर्वकिन्नराः।<br>सिद्धाश्चाप्सरसस्त्वत्तो मनुष्याः पशवः खगाः॥ ३५<br>सरीसृपा मृगास्सर्वे त्वत्तस्सर्वे महीरुहाः।<br>यच्च भूतं भविष्यं च किञ्चिदत्र चराचरम्॥ ३६आपहीसे देवता, पितृगण, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध और अप्सरागण उत्पन्न हुए हैं। आपहीसे मनुष्य, पशु, पक्षी, सरीसृप और मृग आदि हुए हैं तथा आपहीसे सम्पूर्ण वृक्ष और जो कुछ भी भूत-भविष्यत् चराचर जगत् है वह सब हुआ है॥ ३५-३६॥
मूर्त्तामूर्त्तं तथा चापि स्थूलं सूक्ष्मतरं तथा।<br>तत्सर्वं त्वं जगत्कर्ता नास्ति किञ्चित्त्वया विना॥ ३७हे प्रभो! मूर्त्त-अमूर्त्त, स्थूल-सूक्ष्म तथा और भी जो कुछ है वह सब आप जगत्कर्ता ही हैं,आपसे भिन्न और कुछ भी नहीं है॥ ३७॥
मया संसारचक्रेऽस्मिन्भ्रमता भगवन् सदा।<br>तापत्रयाभिभूतेन न प्राप्ता निर्वृतिः क्वचित्॥ ३८हे भगवन्! तापत्रयसे अभिभूत होकर सर्वदा इस संसार-चक्रमें भ्रमण करते हुए मुझे कभी शान्ति प्राप्त नहीं हुई॥ ३८॥
दुःखान्येव सुखानीति मृगतृष्णा जलाशया।<br>मया नाथ गृहीतानि तानि तापाय मेऽभवन्॥ ३९हे नाथ! जलकी आशासे मृगतृष्णाके समान मैंने दुःखोंको ही सुख समझकर ग्रहण किया था; परन्तु वे मेरे सन्तापके ही कारण हुए॥ ३९॥
राज्यमुर्वी बलं कोशो मित्रपक्षस्तथात्मजाः।<br>भार्या भृत्यजनो ये च शब्दाद्या विषयाः प्रभो॥ ४०<br>सुखबुद्ध्या मया सर्वं गृहीतमिदमव्ययम्।<br>परिणामे तदेवेश तापात्मकमभून्मम॥ ४१हे प्रभो! राज्य, पृथिवी, सेना, कोश, मित्रपक्ष, पुत्रगण, स्त्री तथा सेवक आदि और शब्दादि विषय इन सबको मैंने अविनाशी तथा सुख-बुद्धिसे ही अपनाया था; किन्तु हे ईश! परिणाममें वे ही दुःखरूप सिद्ध हुए॥ ४०-४१॥
देवलोकगतिं प्राप्तो नाथ देवगणोऽपि हि।<br>मत्तस्साहाय्यकामोऽभूच्छाश्वती कुत्र निर्वृतिः॥ ४२हे नाथ! जब देवलोक प्राप्त करके भी देवताओंको मेरी सहायताकी इच्छा हुई तो उस (स्वर्गलोक)-में भी नित्य-शान्ति कहाँ है?॥ ४२॥
त्वामनाराध्य जगतां सर्वेषां प्रभवास्पदम्।<br>शाश्वती प्राप्यते केन परमेश्वर निर्वृतिः॥ ४३हे परमेश्वर! सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिके आदि-स्थान आपकी आराधना किये बिना कौन शाश्वत शान्ति प्राप्त कर सकता है?॥ ४३॥
त्वन्मायामूढमनसो जन्ममृत्युजरादिकान्।<br>अवाप्य तापानपश्यन्ति प्रेतराजमनन्तरम्॥ ४४हे प्रभो! आपकी मायासे मूढ़ हुए पुरुष जन्म, मृत्यु और जरा आदि सन्तापोंको भोगते हुए अन्तमें यमराजका दर्शन करते हैं॥ ४४॥
ततो निजक्रियासूतिं नरकेष्वतिदारुणम्।<br>प्राप्नुवन्ति नरा दुःखमस्वरूपविदस्तव॥ ४५आपके स्वरूपको न जाननेवाले पुरुष नरकोंमें पड़कर अपने कर्मोंके फलस्वरूप नाना प्रकारके दारुण क्लेश पाते हैं॥ ४५॥
अहमत्यन्तविषयी मोहितस्तव मायया।<br>ममत्वगर्वगर्त्तान्तर्भ्रमामि परमेश्वर॥ ४६हे परमेश्वर! मैं अत्यन्त विषयी हूँ और आपकी मायासे मोहित होकर ममत्वाभिमानके गड्ढेमें भटकता रहा हूँ॥ ४६॥
सोऽहं त्वां शरणमपारमप्रमेयं<br>सम्प्राप्तः परमपदं यतो न किञ्चित्।<br>संसारभ्रमपरितापतप्तचेता<br>निर्वाणे परिणतधाम्नि साभिलाषः॥ ४७वही मैं आज अपार और अप्रमेय परमपदरूप आप परमेश्वरकी शरणमें आया हूँ जिससे भिन्न दूसरा कुछ भी नहीं है और संसारभ्रमणके खेदसे खिन्न-चित्त होकर मैं निरतिशय तेजोमय निर्वाणस्वरूप आपका ही अभिलाषी हूँ"॥ ४७॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे त्रयोविंशोऽध्यायः॥ २३॥

अ० २४] * पञ्चम अंश * ३८३

चौबीसवाँ अध्याय

मुचुकुन्दका तपस्याके लिये प्रस्थान और बलरामजीकी व्रजयात्रा

संस्कृतहिन्दी अनुवाद
श्रीपराशर उवाच<br>इत्थं स्तुतस्तदा तेन मुचुकुन्देन धीमता।<br>प्राहेशः सर्वभूतानामनादिनिधनो हरिः॥ १<br><br>श्रीभगवानुवाच<br>यथाभिवाञ्छितान्दिव्यान्गच्छ लोकान्नराधिप।<br>अव्याहतपरैश्वर्यो मत्प्रसादोपबृंहितः॥ २<br>भुक्त्वा दिव्यान्महाभोगान्भविष्यसि महाकुले।<br>जातिस्मरो मत्प्रसादात्ततो मोक्षमवाप्स्यसि॥ ३<br><br>श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्तः प्रणिपत्येशं जगतामच्युतं नृपः।<br>गुहामुखाद्विनिष्क्रान्तस्स ददर्शाल्पकान्नरान्॥ ४<br>ततः कलियुगं मत्वा प्राप्तं तप्तुं नृपस्तपः।<br>नरनारायणस्थानं प्रययौ गन्धमादनम्॥ ५<br>कृष्णोऽपि घातयित्वारिमुपायेन हि तद्बलम्।<br>जग्राह मथुरामेत्य हस्त्यश्वस्यन्दनोज्ज्वलम्॥ ६<br>आनीय चोग्रसेनाय द्वारवत्यां न्यवेदयत्।<br>पराभवनिश्शङ्कं बभूव च यदोः कुलम्॥ ७<br>बलदेवोऽपि मैत्रेय प्रशान्ताखिलविग्रहः।<br>ज्ञातिदर्शनसोत्कण्ठः प्रययौ नन्दगोकुलम्॥ ८<br>ततो गोपांश्च गोपीश्च यथा पूर्वममित्रजित्।<br>तथैवाभ्यवदत्प्रेम्णा बहुमानपुरस्सरम्॥ ९<br>स कैश्चित्सम्परिष्वक्तः कांश्चिच्च परिषस्वजे।<br>हास्यं चक्रे समं कैश्चिद्गोपैर्गोपीजनैस्तथा॥ १०<br>प्रियाण्यनेकान्यवदन् गोपास्तत्र हलायुधम्।<br>गोप्यश्च प्रेमकुपिताः प्रोचुस्सेर्ष्यमथापराः॥ ११<br>गोप्यः पप्रच्छुरपरा नागरीजनवल्लभः।<br>कच्चिदास्ते सुखं कृष्णश्चलप्रेमल्वात्मकः॥ १२<br>अस्मच्चेष्टामपहसन्न कच्चित्पुरयोषिताम्।<br>सौभाग्यमानमधिकं करोति क्षणसौहृदः॥ १३श्रीपराशरजी बोले— परम बुद्धिमान् राजा मुचुकुन्दके इस प्रकार स्तुति करनेपर सर्वभूतोंके ईश्वर अनादिनिधन भगवान् हरि बोले॥ १॥<br><br>श्रीभगवान्ने कहा— हे नरेश्वर! तुम अपने अभिमत दिव्य लोकोंको जाओ; मेरी कृपासे तुम्हें अव्याहत परम ऐश्वर्य प्राप्त होगा॥ २॥ वहाँ अत्यन्त दिव्य भोगोंको भोगकर तुम अन्तमें एक महान् कुलमें जन्म लोगे, उस समय तुम्हें अपने पूर्वजन्मका स्मरण रहेगा और फिर मेरी कृपासे तुम मोक्षपद प्राप्त करोगे॥ ३॥<br><br>श्रीपराशरजी बोले— भगवान्के इस प्रकार कहनेपर राजा मुचुकुन्दने जगदीश्वर श्रीअच्युतको प्रणाम किया और गुफासे निकलकर देखा कि लोग बहुत छोटे-छोटे हो गये हैं॥ ४॥ उस समय कलियुगको वर्तमान समझकर राजा तपस्या करनेके लिये श्रीनरनारायणके स्थान गन्धमादनपर्वतपर चले गये॥ ५॥ इस प्रकार कृष्णचन्द्रने उपायपूर्वक शत्रुको नष्टकर फिर मथुरामें आ उसकी हाथी, घोड़े और रथादिसे सुशोभित सेनाको अपने वशीभूत किया और उसे द्वारकामें लाकर राजा उग्रसेनको अर्पण कर दिया। तबसे यदुवंश शत्रुओंके दमनसे निःशंक हो गया॥ ६-७॥<br><br>हे मैत्रेय! इस सम्पूर्ण विग्रहके शान्त हो जानेपर बलदेवजी अपने बान्धवोंके दर्शनकी उत्कण्ठासे नन्दजीके गोकुलको गये॥ ८॥ वहाँ पहुँचकर शत्रुजित् बलभद्रजीने गोप और गोपियोंका पहलेहीकी भाँति अति आदर और प्रेमके साथ अभिवादन किया॥ ९॥ किसीने उनका आलिंगन किया और किसीको उन्होंने गले लगाया तथा किन्हीं गोप और गोपियोंके साथ उन्होंने हास-परिहास किया॥ १०॥ गोपोंने बलरामजीसे अनेकों प्रिय वचन कहे तथा गोपियोंमेंसे कोई प्रणयकुपित होकर बोलीं और किन्हींने उपालम्भयुक्त बातें की॥ ११॥<br><br>किन्हीं अन्य गोपियोंने पूछा—चंचल एवं अल्प प्रेम करना ही जिनका स्वभाव है, वे नगर-नारियोंके प्राणाधार कृष्ण तो आनन्दमें हैं न?॥ १२॥ वे क्षणिक स्नेहवाले नन्दनन्दन हमारी चेष्टाओंका उपहास करते हुए क्या नगरकी महिलाओंके सौभाग्यका मान नहीं बढ़ाया करते?॥ १३॥
३८४* श्रीविष्णुपुराण *[अ० २५
कच्चित्स्मरति नः कृष्णो गीतानुगमनं कलम्।<br>अप्यसौ मातरं द्रष्टुं सकृदप्यागमिष्यति ॥ १४<br>अथवा किं तदालापैः क्रियन्तामपराः कथाः।<br>यस्यास्माभिर्विना तेन विनास्माकं भविष्यति ॥ १५<br>पिता माता तथा भ्राता भर्ता बन्धुजनश्च किम्।<br>सन्त्यक्तस्तत्कृतेऽस्माभिरकृतज्ञध्वजो हि सः ॥ १६<br>तथापि कच्चिदालापमिहागमनसंश्रयम्।<br>करोति कृष्णो वक्तव्यं भवता राम नानृतम् ॥ १७<br>दामोदरोऽसौ गोविन्दः पुरस्त्रीसक्तमानसः।<br>अपेतप्रीतिरस्मासु दुर्दर्शः प्रतिभाति नः ॥ १८क्या कृष्णचन्द्र कभी हमारे गीतानुयायी मनोहर स्वरका स्मरण करते हैं? क्या वे एक बार अपनी माताको भी देखनेके लिये यहाँ आवेंगे? ॥ १४ ॥ अथवा अब उनकी बात करनेसे हमें क्या प्रयोजन है, कोई और बात करो। जब उनकी हमारे बिना निभ गयी तो हम भी उनके बिना निभा ही लेंगी ॥ १५ ॥ क्या माता, क्या पिता, क्या बन्धु, क्या पति और क्या कुटुम्बके लोग? हमने उनके लिये सभीको छोड़ दिया, किन्तु वे तो अकृतज्ञोंकी ध्वजा ही निकले ॥ १६ ॥ तथापि बलरामजी! सच-सच बतलाइये क्या कृष्ण कभी यहाँ आनेके विषयमें भी कोई बातचीत करते हैं? ॥ १७ ॥ हमें ऐसा प्रतीत होता है कि दामोदर कृष्णका चित्त नागरी-नारियोंमें फँस गया है; हममें अब उनकी प्रीति नहीं है, अतः अब हमें तो उनका दर्शन दुर्लभ ही जान पड़ता है ॥ १८ ॥
श्रीपराशर उवाच<br>आमन्त्रितश्च कृष्णेति पुनर्द्दामोदरेति च।<br>जहसुस्सुस्वरं गोप्यो हरिणा हृतचेतसः ॥ १९<br>सन्देशैस्साममधुरैः प्रेमगर्भैरगर्विर्तैः।<br>रामेणाश्वासिता गोप्यः कृष्णस्यातिमनोहरैः ॥ २०<br>गोपैश्च पूर्ववद्रामः परिहासमनोहराः।<br>कथाश्चकार रेमे च सह तैर्व्रजभूमिषु ॥ २१श्रीपराशरजी बोले— तदनन्तर श्रीहरिने जिनका चित्त हर लिया है, वे गोपियाँ बलरामजीको कृष्ण और दामोदर कहकर सम्बोधन करने लगीं और फिर उच्चस्वरसे हँसने लगीं ॥ १९ ॥ तब बलभद्रजीने कृष्णचन्द्रका अति मनोहर और शान्तिमय, प्रेमगर्भित और गर्वहीन सन्देश सुनाकर गोपियोंको सान्त्वना दी ॥ २० ॥ तथा गोपोंके साथ हास्य करते हुए उन्होंने पहलेकी भाँति बहुत-सी मनोहर बातें कीं और उनके साथ व्रजभूमिमें नाना प्रकारकी लीलाएँ करते रहे ॥ २१ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥


पचीसवाँ अध्याय

बलभद्रजीका व्रज-विहार तथा यमुनाकर्षण

श्रीपराशर उवाच<br>वने विचरतस्तस्य सह गोपैर्महात्मनः।<br>मानुषच्छद्मरूपस्य शेषस्य धरणीधृतः ॥ १<br>निष्पादितोरुकार्यस्य कार्येणोर्वीप्रचारिणः।<br>उपभोगार्थमत्यर्थं वरुणः प्राह वारुणीम् ॥ २<br>अभीष्टा सर्वदा यस्य मदिरे त्वं महौजसः।<br>अनन्तस्योपभोगाय तस्य गच्छ मुदे शुभे ॥ ३<br>इत्युक्ता वारुणी तेन सन्निधानमथाकरोत्।<br>वृन्दावनसमुत्पन्नकदम्बतरुकोटरे ॥ ४श्रीपराशरजी बोले— अपने कार्योंसे पृथिवीको विचलित करनेवाले, बड़े विकट कार्य करनेवाले, धरणीधर शेषजीके अवतार माया-मानवरूप महात्मा बलरामजीको गोपोंके साथ वनमें विचरते देख उनके उपभोगके लिये वरुणने वारुणी (मदिरा)-से कहा— ॥ १-२ ॥ "हे मदिरे! जिन महाबलशाली अनन्तदेवको तुम सर्वदा प्रिय हो; हे शुभे! तुम उनके उपभोग और प्रसन्नताके लिये जाओ" ॥ ३ ॥ वरुणकी ऐसी आज्ञा होनेपर वारुणी वृन्दावनमें उत्पन्न हुए कदम्ब-वृक्षके कोटरमें रहने लगी ॥ ४ ॥

अ० २५ ] * पञ्चम अंश * ३८५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विचरन् बलदेवोऽपि मदिरागन्धमुत्तमम्।<br/>आघ्राय मदिरार्षमवापाथ वराननः॥ ५<br/>ततः कदम्बात्सहसा मद्यधारां स लाङ्गली।<br/>पतन्तीं वीक्ष्य मैत्रेय प्रययौ परमां मुदम्॥ ६<br/>पपौ च गोपगोपीभिस्समुपेतो मुदान्वितः।<br/>प्रगीयमानो ललितं गीतवाद्यविशारदैः॥ ७तब मनोहर मुखवाले बलदेवजीको वनमें विचरते हुए मदिराकी अति उत्तम गन्ध सूँघनेसे उसे पीनेकी इच्छा हुई॥५॥ हे मैत्रेय! उसी समय कदम्बसे मद्यकी धारा गिरती देख हलधारी बलरामजी बड़े प्रसन्न हुए॥६॥ तथा गाने-बजानेमें कुशल गोप और गोपियोंके मधुर स्वरसे गाते हुए उन्होंने उनके साथ प्रसन्नतापूर्वक मद्यपान किया॥७॥
स मत्तोऽत्यन्तघर्माम्भः कणिकामौक्तिकोज्ज्वलः।<br/>आगच्छ यमुने स्नातुमिच्छामीत्याह विह्वलः॥ ८<br/>तस्य वाचं नदी सा तु मत्तोक्तामवमत्य वै।<br/>नाजगाम ततः क्रुद्धो हलं जग्राह लाङ्गली॥ ९<br/>गृहीत्वा तां हलान्तेन चकर्ष मदविह्वलः।<br/>पापे नायासि नायासि गम्यतामिच्छयान्यतः॥ १०<br/>साकृष्टा सहसा तेन मार्गं सन्त्यज्य निम्नगा।<br/>यत्रास्ते बलभद्रोऽसौ प्लावयामास तद्वनम्॥ ११<br/>शरीरिणी तदाभ्येत्य त्रासविह्वललोचना।<br/>प्रसीदेत्यब्रवीद्रामं मुञ्च मां मुसलायुध॥ १२<br/>ततस्तस्याः सुवचनमाकर्ण्य स हलायुधः।<br/>सोऽब्रवीदवजानासि मम शौर्यंबले नदि।<br/>सोऽहं त्वां हलपातेन नयिष्यामि सहस्रधा॥ १३तदनन्तर अत्यन्त घामके कारण स्वेद-बिन्दुरूप मोतियोंसे सुशोभित मदोन्मत्त बलरामजीने विह्वल होकर कहा—"यमुने! आ, मैं स्नान करना चाहता हूँ"॥८॥ उनके वाक्यको उन्मत्तका प्रलाप समझकर यमुनाने उसपर कुछ भी ध्यान न दिया और वह वहाँ न आयी। इसपर हलधरने क्रोधित होकर अपना हल उठाया॥९॥ और मदसे विह्वल होकर यमुनाको हलकी नोकसे पकड़कर खींचते हुए कहा—"अरी पापिनि! तू नहीं आती थी! अच्छा अब [यदि शक्ति हो तो] इच्छानुसार अन्यत्र जा तो सही॥१०॥" इस प्रकार बलरामजीके खींचनेपर यमुनाने अकस्मात् अपना मार्ग छोड़ दिया और जिस वनमें बलरामजी खड़े थे उसे आप्लावित कर दिया॥११॥<br/>तब वह शरीर धारणकर बलरामजीके पास आयी और भयवश डबडबाती आँखोंसे कहने लगी—"हे मुसलायुध! आप प्रसन्न होइये और मुझे छोड़ दीजिये"॥१२॥ उसके उन मधुर वचनोंको सुनकर हलायुध बलभद्रजीने कहा—"अरी नदि! क्या तू मेरे बल-वीर्यकी अवज्ञा करती है? देख, इस हलसे मैं अभी तेरे हजारों टुकड़े कर डालूँगा"॥१३॥
श्रीपराशर उवाच<br/>इत्युक्त्यातिसन्त्रान्तात्तया नद्या प्रसादितः।<br/>भूभागे प्लाविते तस्मिन्मुमोच यमुनां बलः॥ १४<br/>ततस्नातस्य वै कान्तिरजायत महात्मनः॥ १५<br/>अवतंसोत्पलं चारु गृहीत्वैकं च कुण्डलम्।<br/>वरुणप्रहितां चास्मै मालाम्लानपङ्कजाम्।<br/>समुद्राभे तथा वस्त्रे नीले लक्ष्मीरयच्छत॥ १६<br/>कृतावतंसस्स तदा चारुकुण्डलभूषितः।<br/>नीलाम्बरधरस्रग्वी शुशुभे कान्तिसंयुतः॥ १७<br/>इत्थं विभूषितो रेमे तत्र रामस्तथा व्रजे।<br/>मासद्वयेन यातश्च स पुनर्द्वारकां पुरीम्॥ १८<br/>रेवतीं नाम तनयां रैवतस्य महीपतेः।<br/>उपयेमे बलस्तस्यां जज्ञाते निशठोल्मुकौ॥ १९श्रीपराशरजी बोले—बलरामजीद्वारा इस प्रकार कही जानेसे भयभीत हुई यमुनाके उस भू-भागमें बहने लगनेपर उन्होंने प्रसन्न होकर उसे छोड़ दिया॥१४॥ उस समय स्नान करनेपर महात्मा बलरामजीकी अत्यन्त शोभा हुई। तब लक्ष्मीजीने [सशरीर प्रकट होकर] उन्हें एक सुन्दर कर्णफूल, एक कुण्डल, एक वरुणकी भेजी हुई कभी न कुम्हलानेवाले कमल-पुष्पोंकी माला और दो समुद्रके समान कान्तिवाले नीलवर्ण वस्त्र दिये॥१५-१६॥ उन कर्णफूल, सुन्दर कुण्डल, नीलाम्बर और पुष्प-मालाको धारणकर श्रीबलरामजी अतिशय कान्तियुक्त हो सुशोभित होने लगे॥१७॥ इस प्रकार विभूषित होकर श्रीबलभद्रजीने व्रजमें अनेकों लीलाएँ कीं और फिर दो मास पश्चात् द्वारकापुरीको चले आये॥१८॥ वहाँ आकर बलदेवजीने राजा रैवतकी पुत्री रेवतीसे विवाह किया; उससे उनके निशठ और उल्मुक नामक दो पुत्र हुए॥१९॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे पञ्चविंशोऽध्यायः॥ २५॥

३८६ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० २६

छब्बीसवाँ अध्याय

रुक्मिणी-हरण

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले— विदर्भदेशान्तर्गत कुण्डिनपुर नामक नगरमें भीष्मक नामक एक राजा थे। उनके रुक्मी नामक पुत्र और रुक्मिणी नामकी एक सुमुखी कन्या थी ॥ १ ॥ श्रीकृष्णने रुक्मिणीकी और चारुहासिनी रुक्मिणीने श्रीकृष्णचन्द्रकी अभिलाषा की, किंतु भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके प्रार्थना करनेपर भी उनसे द्वेष करनेके कारण रुक्मीने उन्हें रुक्मिणी न दी ॥ २ ॥ महापराक्रमी भीष्मकने जरासन्धकी प्रेरणासे रुक्मीसे सहमत होकर शिशुपालको रुक्मिणी देनेका निश्चय किया ॥ ३ ॥ तब शिशुपालके हितैषी जरासन्ध आदि सम्पूर्ण राजागण विवाहमें सम्मिलित होनेके लिये भीष्मकके नगरमें गये ॥ ४ ॥ इधर बलभद्र आदि यदुवंशियोंके सहित श्रीकृष्णचन्द्र भी चेदिराजका विवाहोत्सव देखनेके लिये कुण्डिनपुर आये ॥ ५ ॥
भीष्मकः कुण्डिने राजा विदर्भविषयेऽभवत्।<br>रुक्मी तस्याभवत्पुत्रो रुक्मिणी च वरानना ॥ १
रुक्मिणीं चकमे कृष्णस्सा च तं चारुहासिनी।<br>न ददौ याचते चैनां रुक्मी द्वेषेण चक्रिणे ॥ २
ददौ च शिशुपालाय जरासन्धप्रचोदितः।<br>भीष्मको रुक्मिणा सार्धं रुक्मिणीमुरुविक्रमः ॥ ३
विवाहार्थं ततः सर्वे जरासन्धमुखा नृपाः।<br>भीष्मकस्य पुरं जग्मुशिशुपालप्रियैषिणः ॥ ४
कृष्णोऽपि बलभद्राद्यैर्यदुभिः परिवारितः।<br>प्रययौ कुण्डिनं द्रष्टुं विवाहं चैद्यभूपतेः ॥ ५
श्वोभाविनि विवाहे तु तां कन्यां हृतवान्हरिः।<br>विपक्षभारमासज्य रामादिष्वथ बन्धुषु ॥ ६तदनन्तर विवाहका एक दिन रहनेपर अपने विपक्षियोंका भार बलभद्र आदि बन्धुओंको सौंपकर श्रीहरिने उस कन्याका हरण कर लिया ॥ ६ ॥ तब श्रीमान् पौण्ड्रक, दन्तवक्त्र, विदूरथ, शिशुपाल, जरासन्ध और शाल्व आदि राजाओंने क्रोधित होकर श्रीहरिको मारनेका महान् उद्योग किया, किन्तु वे सब बलराम आदि यदुश्रेष्ठोंसे मुठभेड़ होनेपर पराजित हो गये ॥ ७-८ ॥ तब रुक्मीने यह प्रतिज्ञाकर कि 'मैं युद्धमें कृष्णको मारे बिना कुण्डिनपुरमें प्रवेश न करूँगा' कृष्णको मारनेके लिये उनका पीछा किया ॥ ९ ॥ किन्तु श्रीकृष्णने लीलासे ही हाथी, घोड़े, रथ और पदातियोंसे युक्त उसकी सेनाको नष्ट करके उसे जीत लिया और पृथिवीमें गिरा दिया ॥ १० ॥
ततश्च पौण्ड्रकश्श्रीमान्दन्तवक्त्रो विदूरथः।<br>शिशुपालजरासन्धशाल्वाद्याश्च महीभृतः ॥ ७
कुपितास्ते हरिं हन्तुं चक्रुरुद्योगमुत्तमम्।<br>निर्जिताश्च समागम्य रामाद्यैर्यदुपुङ्गवैः ॥ ८
कुण्डिनं न प्रवेक्ष्यामि हाहत्वा युधि केशवम्।<br>कृत्वा प्रतिज्ञां रुक्मी च हन्तुं कृष्णमनुद्रुतः ॥ ९
हत्वा बलं सनागाश्वं पत्तिस्यन्दनसङ्कुलम्।<br>निर्जितः पातितश्चोर्व्यां लीलयैव स चक्रिणा ॥ १०
निर्जित्य रुक्मिणं सम्यगुपयेमे च रुक्मिणीम्।<br>राक्षसेन विवाहेन सम्प्राप्तां मधुसूदनः ॥ ११इस प्रकार रुक्मीको युद्धमें परास्तकर श्रीमधुसूदनने राक्षसविवाहसे मिली हुई रुक्मिणीका सम्यक् (वेदोक्त) रीतिसे पाणिग्रहण किया ॥ ११ ॥ उससे उनके कामदेवके अंशसे उत्पन्न हुए वीर्यवान् प्रद्युम्नजीका जन्म हुआ, जिन्हें शम्बरासुर हर ले गया था और फिर जिन्होंने [काल-क्रमसे] शम्बरासुरका वध किया था ॥ १२ ॥
तस्यां जज्ञे च प्रद्युम्नो मदनांशस्सवीर्यवान्।<br>जहार शम्बरो यं वै यो जघान च शम्बरम् ॥ १२

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥


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अ० २७ ] * पञ्चम अंश * ३८७

सत्ताईसवाँ अध्याय

प्रद्युम्न-हरण तथा शम्बर-वध

श्रीमैत्रेय उवाच**श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे मुने! वीरवर प्रद्युम्नको शम्बरासुरने कैसे हरण किया था? और फिर उस महाबली शम्बरको प्रद्युम्नने कैसे मारा?॥१॥ जिसको पहले उसने हरण किया था उसीने पीछे उसे किस प्रकार मार डाला? हे गुरो! मैं यह सम्पूर्ण प्रसंग विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ॥२॥
शम्बरेण हृतो वीरः प्रद्युम्नः स कथं मुने।<br>शम्बरः स महावीर्यः प्रद्युम्नेन कथं हतः॥ १
यस्तेनापहृतः पूर्वं स कथं विजघान तम्।<br>एतद्विस्तरतः श्रोतुमिच्छामि सकलं गुरो॥ २
श्रीपराशर उवाच**श्रीपराशरजी बोले—**हे मुने! कालके समान विकराल शम्बरासुरने प्रद्युम्नको, जन्म लेनेके छठे ही दिन 'यह मेरा मारनेवाला है' ऐसा जानकर सूतिकागृहसे हर लिया॥३॥ उसको हरण करके शम्बरासुरने लवणसमुद्रमें डाल दिया, जो तरंगमालाजनित आवर्तोंसे पूर्ण और बड़े भयानक मकरोंका घर है॥४॥ वहाँ फेंके हुए उस बालकको एक मत्स्यने निगल लिया, किन्तु वह उसकी जठराग्निसे जलकर भी न मरा॥५॥<br>कालान्तरमें कुछ मछेरोंने उसे अन्य मछलियोंके साथ अपने जालमें फँसाया और असुरश्रेष्ठ शम्बरको निवेदन किया॥६॥ उसकी नाममात्रकी पत्नी मायावती सम्पूर्ण अन्तःपुरकी स्वामिनी थी और वह सुलक्षणा सम्पूर्ण सूदों (रसोइयों)-का आधिपत्य करती थी॥७॥ उस मछलीका पेट चीरते ही उसमें एक अति सुन्दर बालक दिखायी दिया जो दग्ध हुए कामवृक्षका प्रथम अंकुर था॥८॥ 'तब यह कौन है और किस प्रकार इस मछलीके पेटमें डाला गया' इस प्रकार अत्यन्त आश्चर्यचकित हुई उस सुन्दरीसे देवर्षि नारदने आकर कहा—॥९॥ "हे सुन्दर भुकुटिवाली! यह सम्पूर्ण जगत्के स्थिति और संहारकर्ता भगवान् विष्णुका पुत्र है; इसे शम्बरासुरने सूतिकागृहसे चुराकर समुद्रमें फेंक दिया था। वहाँ इसे यह मत्स्य निगल गया और अब इसीके द्वारा यह तेरे घर आ गया है। तू इस नररत्नका विश्वस्त होकर पालन कर"॥१०-११॥
षष्ठेऽह्नि जातमात्रं तु प्रद्युम्नं सूतिकागृहात्।<br>ममैष हन्तेति मुने हतवान्कालशम्बरः॥ ३
हृत्वा चिक्षेप चैवैनं ग्राहोग्रे लवणार्णवे।<br>कल्लोलजनितावर्ते सुघोरे मकरालये॥ ४
पातितं तत्र चैवैको मत्स्यो जग्राह बालकम्।<br>न ममार च तस्यापि जठराग्निप्रदीपितः॥ ५
मत्स्यबन्धैश्च मत्स्योऽसौ मत्स्यैरन्यैस्सह द्विज।<br>घातितोऽसुरवर्याय शम्बराय निवेदितः॥ ६
तस्य मायावती नामपत्नी सर्वगृहेश्वरी।<br>कारयामास सूदानामाधिपत्यमनिन्दिता॥ ७
दारिते मत्स्यजठरे सा ददर्शातिशोभनम्।<br>कुमारं मन्मथतरोर्दग्धस्य प्रथमाङ्कुरम्॥ ८
कोऽयं कथमयं मत्स्यजठरे प्रिविवेशितः।<br>इत्येवं कौतुकाविष्टां तन्वीं प्राहार्थ नारदः॥ ९
अयं समस्तजगतः स्थितिसंहारकारिणः।<br>शम्बरेण हृतो विष्णोस्तनयः सूतिकागृहात्॥ १०
क्षिप्तस्समुद्रे मत्स्येन निगीर्णस्ते गृहं गतः।<br>नररत्नमिदं सुभ्रु विस्रब्धा परिपालय॥ ११
श्रीपराशर उवाच**श्रीपराशरजी बोले—**नारदजीके ऐसा कहनेपर मायावतीने उस बालककी अतिशय सुन्दरतासे मोहित हो बाल्यावस्थासे ही उसका अति अनुरागपूर्वक पालन किया॥१२॥ हे महामते! जिस समय वह नवयौवनके समागमसे सुशोभित हुआ तब वह गजगामिनी उसके प्रति कामनायुक्त अनुराग प्रकट करने लगी॥१३॥
नारदेनैवमुक्ता सा पालयामास तं शिशुम्।<br>बाल्यादेवातिरागेण रूपातिशयमोहिता॥ १२
स यदा यौवनाभोगभूषितोऽभून्महामते।<br>साभिलाषा तदा सापि बभूव गजगामिनी॥ १३

३८८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २७

मायावती ददौ तस्मै मायास्सर्वा महामुने। प्रद्युम्नायानुरागान्धा तन्न्यस्तहृदयेक्षणा ॥ १४ प्रसज्जन्तीं तु तां प्राह स कार्ष्णिः कमलेक्षणाम्। मातृत्वमपहायाद्य किमेवं वर्तसेऽन्यथा ॥ १५ सा तस्मै कथयामास न पुत्रस्त्वं ममेति वै। तनयं त्वामयं विष्णोर्हृतवान्कालशम्बरः ॥ १६ क्षिप्तः समुद्रे मत्स्यस्य सम्प्राप्तो जठरान्मया। सा हि रोदिति ते माता कान्ताद्याप्यतिवत्सला ॥ १७ श्रीपराशर उवाच इत्युक्तश्शम्बरं युद्धे प्रद्युम्नः स समाह्वयत्। क्रोधाकुलीकृतमना युयुधे च महाबलः ॥ १८ हत्वा सैन्यमशेषं तु तस्य दैत्यस्य यादवः। सप्त माया व्यतिक्रम्य मायां प्रयुयुजेऽष्टमीम् ॥ १९ तया जघान तं दैत्यं मायया कालशम्बरम्। उत्पत्य च तया सार्धमाजगाम पितुः पुरम् ॥ २० अन्तःपुरे निपतितं मायावत्या समन्वितम्। तं दृष्ट्वा कृष्णसङ्कल्पा बभूवुः कृष्णयोषितः ॥ २१ रुक्मिणी साभवत्प्रेम्णा सास्रदृष्टिरनिन्दिता। धन्यायाः खल्वयं पुत्रो वर्तते नवयौवने ॥ २२ अस्मिन्वयसि पुत्रो मे प्रद्युम्नो यदि जीवति। सभाshortlyत्या जननी वत्स सा त्वया का विभूषिता ॥ २३ अथवा यादृशः स्नेहो मम यादृग्वपुस्तव। हरेरपत्यं सुव्यक्तं भवान्वत्स भविष्यति ॥ २४ श्रीपराशर उवाच एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तस्सह कृष्णेन नारदः। अन्तःपुरचरां देवीं रुक्मिणीं प्राह हर्षयन् ॥ २५ एष ते तनयः सुभ्रु हत्वा शम्बरमागतः। हृतो येनाभवद्वालो भवत्यास्सूतिकागृहात् ॥ २६ इयं मायावती भार्या तनयस्यास्य ते सती। शम्बरस्य न भार्येयं श्रूयतामत्र कारणम् ॥ २७ मन्मथे तु गते नाशं तदुद्भवपरायणा। शम्बरं मोहयामास मायारूपेण रूपिणी ॥ २८

हे महामुने! जो अपना हृदय और नेत्र प्रद्युम्नमें अर्पित कर चुकी थी उस मायावतीने अनुरागसे अन्धी होकर उसे सब प्रकारकी माया सिखा दी ॥ १४॥ इस प्रकार अपने ऊपर आसक्त हुई उस कमललोचनासे कृष्णनन्दन प्रद्युम्नने कहा—"आज तुम मातृभावको छोड़कर यह अन्य प्रकारका भाव क्यों प्रकट करती हो?" ॥ १५॥ तब मायावतीने कहा—"तुम मेरे पुत्र नहीं हो, तुम भगवान् विष्णुके तनय हो। तुम्हें कालशम्बरने हरकर समुद्रमें फेंक दिया था; तुम मुझे एक मत्स्यके उदरमें मिले हो। हे कान्त! आपकी पुत्रवत्सला जननी आज भी रोती होगी" ॥ १६-१७॥

श्रीपराशरजी बोले—मायावतीके इस प्रकार कहनेपर महाबलवान् प्रद्युम्नजीने क्रोधसे विह्वल हो शम्बरासुरको युद्धके लिये ललकारा और उससे युद्ध करने लगे ॥ १८॥ यादवश्रेष्ठ प्रद्युम्नजीने उस दैत्यकी सम्पूर्ण सेना मार डाली और उसकी सात मायाओंको जीतकर स्वयं आठवीं मायाका प्रयोग किया ॥ १९॥ उस मायासे उन्होंने दैत्यराज कालशम्बरको मार डाला और मायावतीके साथ [विमानद्वारा] उड़कर आकाशमार्गसे अपने पिताके नगरमें आ गये ॥ २०॥

मायावतीके सहित अन्तःपुरमें उतरनेपर श्रीकृष्णचन्द्रकी रानियोंने उन्हें देखकर कृष्ण ही समझा ॥ २१॥ किन्तु अनिन्दिता रुक्मिणीके नेत्रोंमें प्रेमवश आँसू भर आये और वे कहने लगीं—"अवश्य ही यह नवयौवनको प्राप्त हुआ किसी बड़भागिनीका पुत्र है ॥ २२॥ यदि मेरा पुत्र प्रद्युम्न जीवित होगा तो उसकी भी यही आयु होगी। हे वत्स! तू ठीक-ठीक बता तूने किस भाग्यवती जननीको विभूषित किया है? ॥ २३॥ अथवा, बेटा! जैसा मुझे तेरे प्रति स्नेह हो रहा है और जैसा तेरा स्वरूप है, उससे मुझे ऐसा भी प्रतीत होता है कि तू श्रीहरिका ही पुत्र है" ॥ २४॥

श्रीपराशरजी बोले—इसी समय श्रीकृष्णचन्द्रके साथ वहाँ नारदजी आ गये। उन्होंने अन्तःपुरनिवासिनी देवी रुक्मिणीको आनन्दित करते हुए कहा— ॥ २५॥ "हे सुभ्रु! यह तेरा ही पुत्र है। यह शम्बरासुरको मारकर आ रहा है, जिसने कि इसे बाल्यावस्थामें सूतिकागृहसे हर लिया था ॥ २६॥ यह सती मायावती भी तेरे पुत्रकी ही स्त्री है; यह शम्बरासुरकी पत्नी नहीं है। इसका कारण सुन ॥ २७॥ पूर्वकालमें कामदेवके भस्म हो जानेपर उसके पुनर्जन्मकी प्रतीक्षा करती हुई इसने अपने मायामयरूपसे शम्बरासुरको मोहित किया था ॥ २८॥

अ० २८ ] * पञ्चम अंश * ३८९

विहाराद्युपभोगेषु रूपं मायामयं शुभम्।
दर्शयामास दैत्यस्य तस्येयं मदिरेक्षणा ॥ २९

कामोऽवतीर्णः पुत्रस्ते तस्येयं दयिता रतिः।
विशङ्का नात्र कर्तव्या स्नुषेयं तव शोभने ॥ ३०

ततो हर्षसमाविष्टौ रुक्मिणीकेशवौ तदा।
नगरी च समस्ता सा साधुसाध्वित्यभाषत ॥ ३१

चिरं नष्टेन पुत्रेण सङ्गतां प्रेक्ष्य रुक्मिणीम्।
अवाप विस्मयं सर्वो द्वारवत्यां तदा जनः ॥ ३२

यह मत्तविलोचना उस दैत्यको विहारादि उपभोगोंके समय अपने अति सुन्दर मायामय रूप दिखलाती रहती थी॥ २९॥ कामदेवने ही तेरे पुत्ररूपसे जन्म लिया है और यह सुन्दरी उसकी प्रिया रति ही है। हे शोभने! यह तेरी पुत्रवधू है, इसमें तू किसी प्रकारकी विपरीत शंका न कर'॥ ३०॥

यह सुनकर रुक्मिणी और कृष्णको अतिशय आनन्द हुआ तथा समस्त द्वारकापुरी भी 'साधु-साधु' कहने लगी॥ ३१॥ उस समय चिरकालसे खोये हुए पुत्रके साथ रुक्मिणीका समागम हुआ देख द्वारकापुरीके सभी नागरिकोंको बड़ा आश्चर्य हुआ॥ ३२॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥


अट्ठाईसवाँ अध्याय

रुक्मीका वध

श्रीपराशर उवाच

चारुदेष्णं सुदेष्णं च चारुदेहं च वीर्यवान्।
सुषेणं चारुगुप्तं च भद्रचारुं तथा परम् ॥ १

चारुविन्दं सुचारुं च चारुं च बलिनां वरम्।
रुक्मिण्यजनयत्पुत्रान्कन्यां चारुमतीं तथा ॥ २

अन्याश्च भार्याः कृष्णस्य बभूवुः सप्त शोभनाः।
कालिन्दी मित्रविन्दा च सत्या नाग्नजिती तथा ॥ ३

देवी जाम्बवती चापि रोहिणी कामरूपिणी।
मद्रराजसुता चान्या सुशीला शीलमण्डना ॥ ४

सात्राजिती सत्यभामा लक्ष्मणा चारुहासिनी।
षोडशासन् सहस्राणि स्त्रीणामन्यानि चक्रिणः ॥ ५

प्रद्युम्नोऽपि महावीर्यो रुक्मिणस्तनयां शुभाम्।
स्वयंवर तां जग्राह सा च तं तनयं हरेः ॥ ६

तस्यामस्याभवत्पुत्रो महाबलपराक्रमः।
अनिरुद्धो रणेऽरुद्धवीर्योदधिररिन्दमः ॥ ७

तस्यापि रुक्मिणः पौत्रीं वरयामास केशवः।
दौहित्राय ददौ रुक्मी तां स्पर्द्धन्नपि चक्रिणा ॥ ८

श्रीपराशरजी बोले—हे मैत्रेय! रुक्मिणीके [प्रद्युम्नके अतिरिक्त] चारुदेष्ण, सुदेष्ण, वीर्यवान्, चारुदेह, सुषेण, चारुगुप्त, भद्रचारु, चारुविन्द, सुचारु और बलवानोंमें श्रेष्ठ चारु नामक पुत्र तथा चारुमती नामकी एक कन्या हुई॥ १-२॥ रुक्मिणीके अतिरिक्त श्रीकृष्णचन्द्रके कालिन्दी, मित्रविन्दा, नग्नजित्की पुत्री सत्या, जाम्बवान्‌की पुत्री कामरूपिणी रोहिणी, अति-शीलवती मद्रराजसुता सुशीला भद्रा, सत्राजित्की पुत्री सत्यभामा और चारुहासिनी लक्ष्मणा—ये अति सुन्दरी सात स्त्रियाँ और थीं, इनके सिवा उनके सोलह हजार स्त्रियाँ और भी थीं॥ ३-५॥

महावीर प्रद्युम्नने रुक्मीकी सुन्दरी कन्याको और उस कन्याने भी भगवान्‌के पुत्र प्रद्युम्नजीको स्वयंवरमें ग्रहण किया॥ ६॥ उससे प्रद्युम्नजीके अनिरुद्ध नामक एक महाबलपराक्रमसम्पन्न पुत्र हुआ जो युद्धमें रुद्ध (प्रतिहत) न होनेवाला, बलका समुद्र तथा शत्रुओंका दमन करनेवाला था॥ ७॥ कृष्णचन्द्रने उस (अनिरुद्ध)-के लिये भी रुक्मीकी पौत्रीका वरण किया और रुक्मीने कृष्णचन्द्रसे ईर्ष्या रखते हुए भी अपने दौहित्रको अपनी पौत्री देना स्वीकार कर लिया॥ ८॥

३९० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २८


तस्या विवाहे रामाद्या यादवा हरिणा सह।
रुक्मिणो नगरं जग्मुर्नाम्ना भोजकटं द्विज॥ ९
विवाहे तत्र निर्वृत्ते प्रद्युम्नेस्तु महात्मनः।
कलिङ्गराजप्रमुखा रुक्मिणं वाक्यमब्रुवन्॥ १०
अनक्षज्ञो हली द्यूते तथास्य व्यसनं महत्।
न जयामो बलं कस्माद्द्यूतेनैनं महाबलम्॥ ११
श्रीपराशर उवाच
तथेति तानाह नृपान्रुक्मी बलमदान्वितः।
सभायां सह रामेण चक्रे द्यूतं च वै तदा॥ १२
सहस्रमेकं निष्काणां रुक्मिणा विजितो बलः।
द्वितीयेऽपि पणे चान्यत्सहस्रं रुक्मिणा जितः॥ १३
ततो दशसहस्राणि निष्काणां पणमाददे।
बलभद्रोऽजयत्तानि रुक्मी द्यूतविदां वरः॥ १४
ततो जहास स्वनवत्कलिङ्गाधिपतिर्द्विज।
दन्तान्विदर्शयन्मूढो रुक्मी चाह मदोद्धतः॥ १५
अविद्योऽयं मया द्यूते बलभद्रः पराजितः।
मुधैवाक्षावलेपान्धो योऽवमेनेऽक्षकोविदान्॥ १६
दृष्ट्वा कलिङ्गराजन्तं प्रकाशदशनाननम्।
रुक्मिणं चापि दुर्वाक्यं कोपं चक्रे हलायुधः॥ १७
ततः कोपपरीतात्मा निष्ककोटिं समाददे।
ग्लहं जग्राह रुक्मी च तदर्थेऽक्षानपातयत्॥ १८
अजयद्बलदेवस्तं प्राहोच्चैर्विजितं मया।
मयेति रुक्मी प्राहोच्चैरलीकोक्तेरलं बल॥ १९
त्वयोक्तोऽयं ग्लहस्सत्यं न मयैषोऽनुमोदितः।
एवं त्वया चेद्विजितं विजितं न मया कथम्॥ २०
श्रीपराशर उवाच
अथान्तरिक्षे वागुच्चैः प्राह गम्भीरनादिनी।
बलदेवस्य तं कोपं वर्द्धयन्ती महात्मनः॥ २१
जितं बलेन धर्मेण रुक्मिणा भाषितं मृषा।
अनुक्त्वापि वचः किञ्चित्कृतं भवति कर्मणा॥ २२
ततो बलः समुत्थाय कोपसंरक्तलोचनः।
जघानाष्टापदेनैव रुक्मिणं स महाबलः॥ २३


हिन्दी अनुवाद:

हे द्विज! उसके विवाहमें सम्मिलित होनेके लिये कृष्णचन्द्रके साथ बलभद्र आदि अन्य यादवगण भी रुक्मीकी राजधानी भोजकट नामक नगरको गये॥ ९॥ जब प्रद्युम्न-पुत्र महात्मा अनिरुद्धका विवाह-संस्कार हो चुका तो कलिंगराज आदि राजाओंने रुक्मीसे कहा—॥ १०॥ "ये बलभद्र द्यूतक्रीड़ा [अच्छी तरह] जानते तो हैं नहीं तथापि इन्हें उसका व्यसन बहुत है; तो फिर हम इन महाबली रामको जुएसे ही क्यों न जीत लें?"॥ ११॥

श्रीपराशरजी बोले— तब बलके मदसे उन्मत्त रुक्मीने उन राजाओंसे कहा—'बहुत अच्छा' और सभामें बलरामजीके साथ द्यूतक्रीड़ा आरम्भ कर दी॥ १२॥ रुक्मीने पहले ही दाँवमें बलरामजीसे एक सहस्र निष्क जीते तथा दूसरे दाँवमें एक सहस्र निष्क और जीत लिये॥ १३॥ तब बलभद्रजीने दस हजार निष्कका एक दाँव और लगाया। उसे भी पक्के जुआरी रुक्मीने ही जीत लिया॥ १४॥ हे द्विज! इसपर मूढ़ कलिंगराज दाँत दिखाता हुआ जोरसे हँसने लगा और मदोन्मत्त रुक्मीने कहा—॥ १५॥ "द्यूतक्रीड़ासे अनभिज्ञ इन बलभद्रजीको मैंने हरा दिया है; ये वृथा ही अक्षके घमण्डसे अन्धे होकर अक्षकुशल पुरुषोंका अपमान करते थे"॥ १६॥

इस प्रकार कलिंगराजको दाँत दिखाते और रुक्मीको दुर्वाक्य कहते देख हलायुध बलभद्रजी अत्यन्त क्रोधित हुए॥ १७॥ तब उन्होंने अत्यन्त कुपित होकर करोड़ निष्कका दाँव लगाया और रुक्मीने भी उसे ग्रहणकर उसके निमित्त पाँसे फेंके॥ १८॥ उसे बलदेवजीने ही जीता और वे जोरसे बोल उठे, 'मैंने जीता।' इसपर रुक्मी भी चिल्लाकर बोला—'बलराम! असत्य बोलनेसे कुछ लाभ नहीं हो सकता, यह दाँव भी मैंने ही जीता है॥ १९॥ आपने इस दाँवके विषयमें जिक्र अवश्य किया था, किंतु मैंने उसका अनुमोदन तो नहीं किया। इस प्रकार यदि आपने इसे जीता है तो मैंने भी क्यों नहीं जीता?"॥ २०॥

श्रीपराशरजी बोले— उसी समय महात्मा बलदेवजीके क्रोधको बढ़ाती हुई आकाशवाणीने गम्भीर स्वरमें कहा—॥ २१॥ "इस दाँवको धर्मानुसार तो बलरामजी ही जीते हैं; रुक्मी झूठ बोलता है क्योंकि [अनुमोदनसूचक] वचन न कहनेपर भी [पाँसे फेंकने आदि] कार्यसे वह अनुमोदित ही माना जायगा"॥ २२॥

तब क्रोधसे अरुणनयन हुए महाबली बलभद्रजीने उठकर रुक्मीको जुआ खेलनेके पाँसोंसे ही मार डाला॥ २३॥

अ० २९ ] * पञ्चम अंश * ३९१


कलिङ्गराजं चादाय विस्फुरन्तं बलाद्बलः।<br>बभञ्ज दन्तान्कुपितो यैः प्रकाशं जहास सः॥ २४<br>आकृष्य च महास्तम्भं जातरूपमयं बलः।<br>जघान तान्ये तत्पक्षे भूभृतः कुपितो भृशम्॥ २५<br>ततो हाहाकृतं सर्वं पलायनपरं द्विज।<br>तद्राजमण्डलं भीतं बभूव कुपिते बले॥ २६<br>बलेन निहतं दृष्ट्वा रुक्मिणं मधुसूदनः।<br>नोवाच किञ्चिन्मैत्रेय रुक्मिणीबलयोर्भयात्॥ २७<br>ततोऽनिरुद्धमादाय कृतदारं द्विजोत्तम।<br>द्वारकामाजगामाथ यदुचक्रं च केशवः॥ २८फिर फड़कते हुए कलिंगराजको बलपूर्वक पकड़कर बलरामजीने उसके दाँत, जिन्हें दिखलाता हुआ वह हँसा था, तोड़ दिये॥ २४॥ इनके सिवा उसके पक्षके और भी जो कोई राजालोग थे, उन्हें बलरामजीने अत्यन्त कुपित होकर एक सुवर्णमय स्तम्भ उखाड़कर उससे मार डाला॥ २५॥ हे द्विज! उस समय बलरामजीके कुपित होनेसे हाहाकार मच गया और सम्पूर्ण राजालोग भयभीत होकर भागने लगे॥ २६॥<br>हे मैत्रेय! उस समय रुक्मीको मारा गया देख श्रीमधुसूदनने एक ओर रुक्मिणीके और दूसरी ओर बलरामजीके भयसे कुछ भी नहीं कहा॥ २७॥ तदनन्तर, हे द्विजश्रेष्ठ! यादवोंके सहित श्रीकृष्णचन्द्र सपत्नीक अनिरुद्धको लेकर द्वारकापुरीमें चले आये॥ २८॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽशेऽष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८॥


ऊनतीसवाँ अध्याय

नरकासुरका वध

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
द्वारवत्यां स्थिते कृष्णे शक्रस्त्रिभुवनेश्वरः।<br>आजगामाथ मैत्रेय मत्तैरावतपृष्ठगः॥ १<br>प्रविश्य द्वारकां सोऽथ समेत्य हरिणा ततः।<br>कथयामास दैत्यस्य नरकस्य विचेष्टितम्॥ २<br>त्वया नाथेन देवानां मनुष्यत्वेऽपि तिष्ठता।<br>प्रशमं सर्वदुःखानि नीतानि मधुसूदन॥ ३<br>तपस्विव्यसनार्थाय सोऽरिष्टो धेनुकस्तथा।<br>प्रवृत्तो यस्तथा केशी ते सर्वे निहतास्त्वया॥ ४<br>कंसः कुवलयापीडः पूतना बालघातिनी।<br>नाशं नीतास्त्वया सर्वे येऽन्ये जगदुपद्रवाः॥ ५<br>युष्मद्दोर्दण्डसम्भूतिपरित्राते जगत्त्रये।<br>यज्ञ्वयज्ञांशसम्प्राप्त्या तृप्तिं यान्ति दिवौकसः॥ ६<br>सोऽहं साम्प्रतमायातो यन्निमित्तं जनार्दन।<br>तच्छ्रुत्वा तत्प्रतीकारप्रयत्नं कर्तुमर्हसि॥ ७हे मैत्रेय! एक बार जब श्रीभगवान् द्वारकामें ही थे त्रिभुवनपति इन्द्र अपने मत्त गजराज ऐरावतपर चढ़कर उनके पास आये॥ १॥ द्वारकामें आकर वे भगवान्से मिले और उनसे नरकासुरके अत्याचारोंका वर्णन किया॥ २॥ [वे बोले—] “हे मधुसूदन! इस समय मनुष्यरूपमें स्थित होकर भी आप सम्पूर्ण देवताओंके स्वामीने हमारे समस्त दुःखोंको शान्त कर दिया है॥ ३॥ जो अरिष्ट, धेनुक और केशी आदि असुर सर्वदा तपस्वियोंको क्लेशित करते रहते थे उन सबको आपने मार डाला॥ ४॥ कंस, कुवलयापीड और बालघातिनी पूतना तथा और भी जो-जो संसारके उपद्रवरूप थे उन सबको आपने नष्ट कर दिया॥ ५॥ आपके बाहुदण्डकी सत्तासे त्रिलोकीके सुरक्षित हो जानेके कारण याजकोंके दिये हुए यज्ञभागोंको प्राप्तकर देवगण तृप्त हो रहे हैं॥ ६॥ हे जनार्दन! इस समय जिस निमित्तसे मैं आपके पास उपस्थित हुआ हूँ, उसे सुनकर आप उसके प्रतीकारका प्रयत्न करें॥ ७॥

३९२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २९ ]


भौमोऽयं नरको नाम प्राग्ज्योतिषपुरेश्वरः ।
करोति सर्वभूतानामुपघातमरिन्दम ॥ ८
देवसिद्धासुरादीनां नृपाणां च जनार्दन ।
हृत्वा तु सोऽसुरः कन्या रुरोधे निजमन्दिरे ॥ ९
छत्रं यत्सलिलस्रावि तज्जहार प्रचेतसः ।
मन्दरस्य तथा शृङ्गं हृतवान्मणिपर्वतम् ॥ १०
अमृतस्राविणी दिव्ये मन्मातुः कृष्ण कुण्डले ।
जहार सोऽसुरोऽदित्या वाञ्छत्यैरावतं गजम् ॥ ११
दुर्नीतमेतद्गोविन्द मया तस्य निवेदितम् ।
यदत्र प्रति कर्तव्यं तत्स्वयं परिमृश्यताम् ॥ १२

श्रीपराशर उवाच

इति श्रुत्वा स्मितं कृत्वा भगवान्देवकीसुतः ।
गृहीत्वा वासवं हस्ते समुत्तस्थौ वरासनात् ॥ १३
सञ्चिन्त्यागतमारुह्य गरुडं गगनेचरम् ।
सत्यभामां समारोप्य ययौ प्राग्ज्योतिषं पुरम् ॥ १४
आरुह्यैरावतं नागं शक्रोऽपि त्रिदिवं ययौ ।
ततो जगाम कृष्णश्च पश्यतां द्वारकौकसाम् ॥ १५
प्राग्ज्योतिषपुरस्यापि समन्ताच्छतयोजनम् ।
आचिता मौरवैः पाशैः क्षुरान्तैर्भूर्द्विजोत्तम ॥ १६
तांश्चिच्छेद हरिः पाशान्क्षिप्त्वा चक्रं सुदर्शनम् ।
ततो मुरस्समुत्तस्थौ तं जघान च केशवः ॥ १७
मुरस्य तनयान्सप्त सहस्रांस्तांस्ततो हरिः ।
चक्रधाराग्निन्निर्दग्धांश्चकार शलभानिव ॥ १८
हत्वा मुरं हयग्रीवं तथा पञ्चजनं द्विज ।
प्राग्ज्योतिषपुरं धीमांस्त्वरावान्समुपाद्रवत् ॥ १९
नरकेणास्य तत्राभून्महासैन्येन संयुगम् ।
कृष्णस्य यत्र गोविन्दो जघ्ने दैत्यान्सहस्रशः ॥ २०
शस्त्रास्त्रवर्षं मुञ्चन्तं तं भौमं नरकं बली ।
क्षिप्त्वा चक्रं द्विधा चक्रे चक्री दैतेयचक्रहा ॥ २१
हते तु नरके भूमिर्गृहीत्वादितिकुण्डले ।
उपतस्थे जगन्नाथं वाक्यं चेदमथाब्रवीत् ॥ २२


हिन्दी अनुवाद

हे शत्रुदमन! यह पृथिवीका पुत्र नरकासुर प्राग्ज्योतिषपुरका स्वामी है; इस समय यह सम्पूर्ण जीवोंका घात कर रहा है॥ ८ ॥ हे जनार्दन! उसने देवता, सिद्ध, असुर और राजा आदिकोंकी कन्याओंको बलात् लाकर अपने अन्तःपुरमें बन्द कर रखा है॥ ९ ॥ इस दैत्यने वरुणका जल बरसानेवाला छत्र और मन्दराचलका मणिपर्वत नामक शिखर भी हर लिया है॥ १० ॥

हे कृष्ण! उसने मेरी माता अदितिके अमृतस्रावी दोनों दिव्य कुण्डल ले लिये हैं और अब इस ऐरावत हाथीको भी लेना चाहता है॥ ११ ॥ हे गोविन्द! मैंने आपको उसकी ये सब अनीतियाँ सुना दी हैं; इनका जो प्रतीकार होना चाहिये, वह आप स्वयं विचार लें' '॥ १२ ॥

श्रीपराशरजी बोले— इन्द्रके ये वचन सुनकर श्रीदेवकीनन्दन मुसकाये और इन्द्रका हाथ पकड़कर अपने श्रेष्ठ आसनसे उठे ॥ १३ ॥ फिर स्मरण करते ही उपस्थित हुए आकाशगामी गरुडपर सत्यभामाको चढ़ाकर स्वयं चढ़े और प्राग्ज्योतिषपुरको चले ॥ १४ ॥ तदनन्तर इन्द्र भी ऐरावतपर चढ़कर देवलोकको गये तथा भगवान् कृष्णचन्द्र सब द्वारकावासियोंके देखते-देखते [नरकासुरको मारने] चले गये ॥ १५ ॥

हे द्विजोत्तम! प्राग्ज्योतिषपुरके चारों ओर पृथिवी सौ योजनतक मुर दैत्यके बनाये हुए छुरेकी धाराके समान अति तीक्ष्ण पाशोंसे घिरी हुई थी ॥ १६ ॥ भगवान्ने उन पाशोंको सुदर्शनचक्र फेंककर काट डाला; फिर मुर दैत्य भी सामना करनेके लिये उठा तब श्रीकेशवने उसे भी मार डाला ॥ १७ ॥ तदनन्तर श्रीहरिने मुरके सात हजार पुत्रोंको भी अपने चक्रकी धाररूप अग्निमें पतंगके समान भस्म कर दिया ॥ १८ ॥ हे द्विज! इस प्रकार मतिमान् भगवान्ने मुर, हयग्रीव एवं पंचजन आदि दैत्योंको मारकर बड़ी शीघ्रतासे प्राग्ज्योतिषपुरमें प्रवेश किया ॥ १९ ॥ वहाँ पहुँचकर भगवान्का अधिक सेनावाले नरकासुरसे युद्ध हुआ, जिसमें श्रीगोविन्दने उसके सहस्रों दैत्योंको मार डाला ॥ २० ॥ दैत्यदलका दलन करनेवाले महाबलवान् भगवान् चक्रपाणिने शस्त्रास्त्रकी वर्षा करते हुए भूमिपुत्र नरकासुरके सुदर्शनचक्र फेंककर दो टुकड़े कर दिये ॥ २१ ॥ नरकासुरके मरते ही पृथिवी अदितिके कुण्डल लेकर उपस्थित हुई और श्रीजगन्नाथसे कहने लगी ॥ २२ ॥

अ० २९ ] * पञ्चम अंश * ३९३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पृथ्व्युवाच<br>यदाहमुद्धृता नाथ त्वया सूकरमूर्तिना।<br>त्वत्स्पर्शसम्भवः पुत्रस्तदायं मय्यजायत॥ २३<br><br>सोऽयं त्वयैव दत्तो मे त्वयैव विनिपातितः।<br>गृहाण कुण्डले चेमे पालयास्य च सन्ततिम्॥ २४<br><br>भारावतरणार्थाय ममैव भगवानिमम्।<br>अंशेन लोकमायात: प्रसादसुमुखः प्रभो॥ २५<br><br>त्वं कर्ता च विकर्ता च संहर्ता प्रभवोऽव्ययः।<br>जगतां त्वं जगद्रूपः स्तूयतेऽच्युत किं तव॥ २६<br><br>व्याप्तिर्व्याप्यं क्रिया कर्ता कार्यं च भगवान्यथा।<br>सर्वभूतात्मभूतस्य स्तूयते तव किं तथा॥ २७<br><br>परमात्मा च भूतात्मा त्वमात्मा चाव्ययो भवान्।<br>यथा तथा स्तुतिर्नाथ किमर्थं ते प्रवर्तते॥ २८<br><br>प्रसीद सर्वभूतात्मन्नरकेण तु यत्कृतम्।<br>तत्क्षम्यतामदोषाय त्वत्सुतस्त्वन्निपातितः॥ २९<br><br>श्रीपराशर उवाच<br>तथेति चोक्त्वा धरणीं भगवान्भूतभावनः।<br>रत्नानि नरकावासाज्जग्राह मुनिसत्तम॥ ३०<br><br>कन्यापुरे स कन्यानां षोडशातुलविक्रमः।<br>शताधिकानि ददृशे सहस्राणि महामुने॥ ३१<br><br>चतुर्दंष्ट्रान्गजांश्चाग्र्यान् षट्सहस्रांश्च दृष्टवान्।<br>काम्बोजानां तथाश्वानां नियुतान्येकविंशतिम्॥ ३२<br><br>ताः कन्यास्तांस्तथा नागांस्तानश्वान् द्वारकां पुरीम्।<br>प्रापयामास गोविन्दस्सद्यो नरककिङ्करैः॥ ३३<br><br>ददृशे वारुणं छत्रं तथैव मणिपर्वतम्।<br>आरोपयामास हरिर्गरुडे पतगेश्वरे॥ ३४<br><br>आरुह्य च स्वयं कृष्णस्सत्यभामासहायवान्।<br>अदित्याः कुण्डले दातुं जगाम त्रिदशालयम्॥ ३५पृथिवी बोली—हे नाथ! जिस समय वराहरूप धारणकर आपने मेरा उद्धार किया था, उसी समय आपके स्पर्शसे मेरे यह पुत्र उत्पन्न हुआ था॥ २३॥ इस प्रकार आपनेही मुझे यह पुत्र दिया था और अब आपनेही इसको नष्ट किया है; आप ये कुण्डल लीजिये और अब इसकी सन्तानकी रक्षा कीजिये॥ २४॥ हे प्रभो! मेरे ऊपर प्रसन्न होकर ही आप मेरा भार उतारनेके लिये अपने अंशसे इस लोकमें अवतीर्ण हुए हैं॥ २५॥ हे अच्युत! इस जगत्के आप ही कर्ता, आप ही विकर्ता (पोषक) और आप ही हर्ता (संहारक) हैं; आप ही इसकी उत्पत्ति और लयके स्थान हैं तथा आप ही जगतरूप हैं। फिर हम आपकी स्तुति किस प्रकार करें?॥ २६॥ हे भगवन्! जब कि व्याप्ति, व्याप्य, क्रिया, कर्ता और कार्यरूप आप ही हैं, तब सबके आत्मस्वरूप आपकी किस प्रकार स्तुति की जा सकती है?॥ २७॥ हे नाथ! जब आप ही परमात्मा, आप ही भूतात्मा और आप ही अव्यय जीवात्मा हैं, तब किस वस्तुको लेकर आपकी स्तुति हो सकती है?॥ २८॥ हे सर्वभूतात्मन्! आप प्रसन्न होइये और इस नरकासुरके सम्पूर्ण अपराध क्षमा कीजिये। निश्चय ही आपने अपने पुत्रको निर्दोष करनेके लिये ही स्वयं मारा है॥ २९॥<br><br>श्रीपराशरजी बोले—हे मुनिश्रेष्ठ! तदनन्तर भगवान् भूतभावनने पृथिवीसे कहा—"तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो" और फिर नरकासुरके महलसे नाना प्रकारके रत्न लिये॥ ३०॥ हे महामुने! अतुलविक्रम श्रीभगवान्ने नरकासुरके कन्यान्तःपुरमें जाकर सोलह हजार एक सौ कन्याएँ देखीं॥ ३१॥ तथा चार दाँतवाले छः हजार गजश्रेष्ठ और इक्कीस लाख काम्बोजदेशीय अश्व देखे॥ ३२॥ उन कन्याओं, हाथियों और घोड़ोंको श्रीकृष्णचन्द्रने नरकासुरके सेवकोंद्वारा तुरन्त ही द्वारकापुरी पहुँचावा दिया॥ ३३॥<br><br>तदनन्तर भगवान्ने वरुणका छत्र और मणिपर्वत देखा, उन्हें उठाकर उन्होंने पक्षिराज गरुडपर रख लिया॥ ३४॥ और सत्यभामाके सहित स्वयं भी उसीपर चढ़कर अदितिके कुण्डल देनेके लिये स्वर्गलोकको गये॥ ३५॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे एकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥

३९४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३०


तीसवाँ अध्याय

पारिजात-हरण

श्रीपराशर उवाच

गरुडो वारुणं छत्रं तथैव मणिपर्वतम्।
सभार्यं च हृषीकेशं लीलयैव वहन्ययौ ॥ १

ततश्शङ्खमुपाध्मासीत्स्वर्गद्वारगतो हरिः।
उपत्तस्थुस्तथा देवास्सार्घ्यहस्ता जनार्दनम् ॥ २

स देवैरर्चितः कृष्णो देवमातुर्निवेशनम्।
सिताभ्रशिखराकारं प्रविश्य ददृशेऽदितिम् ॥ ३

स तां प्रणम्य शक्रेण सह ते कुण्डलोत्तमे।
ददौ नरकनाशं च शशंसास्यै जनार्दनः ॥ ४

ततः प्रीता जगन्माता धातारं जगतां हरिम्।
तुष्टावादितिरव्यग्रा कृत्वा तत्प्रवणं मनः ॥ ५

अदितिरुवाच

नमस्ते पुण्डरीकाक्ष भक्तानामभयंकर।
सनातनात्मन् सर्वात्मन् भूतात्मन् भूतभावन ॥ ६

प्रणेतर्मनसो बुद्धेरिन्द्रियाणां गुणात्मक।
त्रिगुणातीत निर्द्वन्द्व शुद्धसत्त्व हृदि स्थित ॥ ७

सितदीर्घादिनिशेषकल्पनापरिवर्जित।
जन्मादिभिरसंस्पृष्ट स्वप्नादिपरिवर्जित ॥ ८

सन्ध्या रात्रिरहो भूमिर्र्गगनं वायुरम्बु च।
हुताशनो मनो बुद्धिर्भूतादिस्त्वं तथाच्युत ॥ ९

सर्गस्थितिविनाशानां कर्ता कर्तृपतिर्भवान्।
ब्रह्मविष्णुशिवाख्याभिरात्ममूर्तिभिरीश्वर ॥ १०

देवा दैत्यास्तथा यक्षा राक्षसास्सिद्धपन्नगाः।
कूष्माण्डाश्च पिशाचाश्च गन्धर्वा मनुजास्तथा ॥ ११

पशवश्च मृगाश्चैव पतंगाश्च सरीसृपाः।
वृक्षगुल्मलता बह्व्यः समस्तास्तृणजातयः ॥ १२

स्थूला मध्यास्तथा सूक्ष्मात्सूक्ष्मात्सूक्ष्मतराश्च ये।
देहभेदा भवान् सर्वे ये केचित्पुर्गलाश्रयाः ॥ १३

माया तवेयमज्ञातपरमार्थर्तिमोहिनी।
अनात्मन्यात्मविज्ञानं यया मूढो निरुद्ध्यते ॥ १४


श्रीपराशरजी बोले— पक्षिराज गरुड उस वारुणछत्र, मणिपर्वत और सत्यभामाके सहित श्रीकृष्णचन्द्रको लीलासे-ही लेकर चलने लगे॥ १॥ स्वर्गके द्वारपर पहुँचते ही श्रीहरिने अपना शंख बजाया। उसका शब्द सुनते ही देवगण अर्घ्य लेकर भगवान्‌के सामने उपस्थित हुए॥ २॥ देवताओंसे पूजित होकर श्रीकृष्णचन्द्रजीने देवमाता अदितिके श्वेत मेघशिखरके समान गृहमें जाकर उनका दर्शन किया॥ ३॥ तब श्रीजनार्दनने इन्द्रके साथ देवमाताको प्रणामकर उसके अत्युत्तम कुण्डल दिये और उसे नरक-वधका वृत्तान्त सुनाया॥ ४॥ तदनन्तर जगन्माता अदितिने प्रसन्नतापूर्वक तन्मय होकर जगद्धाता श्रीहरिकी अव्यग्रभावसे स्तुति की॥ ५॥

अदिति बोली— हे कमलनयन! हे भक्तोंको अभय करनेवाले! हे सनातनस्वरूप! हे सर्वात्मन्! हे भूतस्वरूप! हे भूतभावन! आपको नमस्कार है॥ ६॥ हे मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके रचयिता! हे गुणस्वरूप! हे त्रिगुणातीत! हे निर्द्वन्द्व! हे शुद्धसत्त्व! हे अन्तर्यामिन्! आपको नमस्कार है॥ ७॥ हे नाथ! आप श्वेत, दीर्घ आदि सम्पूर्ण कल्पनाओंसे रहित हैं, जन्मादि विकारोंसे पृथक् हैं तथा स्वप्नादि अवस्थात्रयसे परे हैं; आपको नमस्कार है॥ ८॥ हे अच्युत! सन्ध्या, रात्रि, दिन, भूमि, आकाश, वायु, जल, अग्नि, मन, बुद्धि और अहंकार—ये सब आप ही हैं॥ ९॥

हे ईश्वर! आप ब्रह्मा, विष्णु और शिव नामक अपनी मूर्तियोंसे जगत्‌की उत्पत्ति, स्थिति और नाशके कर्ता हैं तथा आप कर्ताओंके भी स्वामी हैं॥ १०॥ देवता, दैत्य, यक्ष, राक्षस, सिद्ध, पन्नग (नाग), कूष्माण्ड, पिशाच, गन्धर्व, मनुष्य, पशु, मृग, पतंग, सरीसृप (साँप), अनेकों वृक्ष, गुल्म और लताएँ, समस्त तृणजातियाँ तथा स्थूल मध्यम सूक्ष्म और सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म जितने देह-भेद पुद्गल (परमाणु)-के आश्रित हैं वे सब आप ही हैं॥ ११—१३॥

हे प्रभो! आपकी माया ही परमार्थतत्त्वके न जाननेवाले पुरुषोंको मोहित करनेवाली है, जिससे मूढ पुरुष अनात्मामें आत्मबुद्धि करके बन्धनमें पड़ जाते हैं॥ १४॥

अ० ३०] * पञ्चम अंश * ३९५

अस्वे स्वमिति भावोऽत्र यत्पुंसामुपजायते । अहं ममेति भावो यत्प्रायेणैवाभिजायते । संसारमातुर्मायायास्तवैतन्नाथ चेष्टितम् ॥ १५ यैः स्वधर्मपरैर्नाथ नरैराराधितो भवान् । ते तरन्त्यखिलामेतां मायामात्मविमुक्तये ॥ १६ ब्रह्माद्यास्सकला देवा मनुष्याः पशवस्तथा । विष्णुमायामहावर्त्तमोहान्धतमसावृताः ॥ १७ आराध्य त्वामभीप्सन्ते कामानात्मभवक्षयम् । यदेते पुरुषा माया सैवेयं भगवंस्तव ॥ १८ मया त्वं पुत्रकामिन्या वैरिपक्षजयाय च । आराधितो न मोक्षाय मायाविलसितं हि तत् ॥ १९ कौपीनाच्छादनप्राया वाञ्छा कल्पद्रुमादपि । जायते यदपुण्यानां सोऽपराधः स्वदोषजः ॥ २० तत्प्रसीदाखिलजगन्मायामोहकराव्वय । अज्ञानं ज्ञानसद्भावभूतं भूतेश नाशय ॥ २१ नमस्ते चक्रहस्ताय शार्ङ्गहस्ताय ते नमः । गदाहस्ताय ते विष्णो शङ्खहस्ताय ते नमः ॥ २२ एतत्पश्यामि ते रूपं स्थूलचिह्नोपलक्षितम् । न जानामि परं यत्ते प्रसीद परमेश्वर ॥ २३ श्रीपराशर उवाच अदित्यैवं स्तुतो विष्णुः प्रहस्याह सुरारणिम्* । माता देवि त्वमस्माकं प्रसीद वरदा भव ॥ २४ अदितिरुवाच एवमस्तु तथेच्छा ते त्वमशेषैस्सुरासुरैः । अजेयः पुरुषव्याघ्र मर्त्यलोके भविष्यसि ॥ २५ श्रीपराशर उवाच ततः कृष्णस्य पत्नी च शक्रपत्न्या सहादितिम् । सत्यभामा प्रणम्याह प्रसीदेति पुनः पुनः ॥ २६ अदितिरुवाच मत्प्रसादान्न ते सुभ्रु जरा वैरूप्यमेव वा । भविष्यत्यनवद्याङ्गि सुस्थिरं नवयौवनम् ॥ २७

* दीपयिवीम्

हे नाथ! पुरुषको जो अनात्मामें आत्मबुद्धि और 'मैं-मेरा' आदि भाव प्रायः उत्पन्न होते हैं वह सब आपकी जगज्जननी मायाका ही विलास है॥ १५॥ हे नाथ! जो स्वधर्मपरायण पुरुष आपकी आराधना करते हैं, वे अपने मोक्षके लिये इस सम्पूर्ण मायाको पार कर जाते हैं॥ १६॥ ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण देवगण तथा मनुष्य और पशु आदि सभी विष्णुमायारूप महान् आवर्तमें पड़कर मोहरूप अन्धकारसे आवृत हैं॥ १७॥ हे भगवन्! [जन्म और मरणके चक्रमें पड़े हुए] ये पुरुष जीवके भव-बन्धनको नष्ट करनेवाले आपकी आराधना करके भी जो नाना प्रकारकी कामनाएँ ही माँगते हैं, यह आपकी माया ही है॥ १८॥ मैंने भी पुत्रोंकी जयकामनासे शत्रुपक्षको पराजित करनेके लिये ही आपकी आराधना की है, मोक्षके लिये नहीं। यह भी आपकी मायाका ही विलास है॥ १९॥ पुण्यहीन पुरुषोंको जो कल्पवृक्षसे भी कौपीन और आच्छादन-वस्त्रमात्रकी ही कामना होती है यह उनका कर्म-दोष-जन्य अपराध ही है॥ २०॥

हे अखिलजगन्माया-मोहकारी अव्यय प्रभो! आप प्रसन्न होइये और हे भूतेश्वर! 'मैं ज्ञानवान् हूँ' मेरे इस अज्ञानको नष्ट कीजिये॥ २१॥ हे चक्रपाणे! आपको नमस्कार है, हे शार्ङ्गधर! आपको नमस्कार है; हे गदाधर! आपको नमस्कार है; हे शंखपाणे! हे विष्णो! आपको बारम्बार नमस्कार है॥ २२॥ मैं स्थूल चिह्नोंसे प्रतीत होनेवाले आपके इस रूपको ही देखती हूँ; आपके वास्तविक परस्वरूपको मैं नहीं जानती; हे परमेश्वर! आप प्रसन्न होइये॥ २३॥

**श्रीपराशरजी बोले—**अदितिद्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर भगवान् विष्णु देवमातासे हँसकर बोले—"हे देवि! तुम तो हमारी माता हो; तुम प्रसन्न होकर हमें वरदायिनी होओ"॥ २४॥

**अदिति बोली—**हे पुरुषसिंह! तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो। तुम मर्त्यलोकमें सम्पूर्ण सुरासुरोंसे अजेय होगे॥ २५॥

**श्रीपराशरजी बोले—**तदनन्तर शक्रपत्नी शचीके सहित कृष्णप्रिया सत्यभामाने अदितिको पुनः-पुनः प्रणाम करके कहा—"माता! आप प्रसन्न होइये"॥ २६॥

**अदिति बोली—**हे सुन्दर भृकुटिवाली! मेरी कृपासे तुझे कभी वृद्धावस्था या विरूपता व्याप्त न होगी। हे अनिन्दितांगि! तेरा नवयौवन सदा स्थिर रहेगा॥ २७॥

३९६ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० ३०

श्रीपराशर उवाच अदित्या तु कृतानुज्ञो देवराजो जनार्दनम्। यथावत्पूजयामास बहुमानपुरस्सरम्॥ २८ शची च सत्यभामायै पारिजातस्य पुष्पकम्। न ददौ मानुषीं मत्वा स्वयं पुष्पैरलङ्कृता॥ २९ ततो ददर्श कृष्णोऽपि सत्यभामासहायवान्। देवोद्यानानि हृद्यानि नन्दनादीनि सत्तम॥ ३० ददर्श च सुगन्धाढ्यं मञ्जरीपुञ्जधारिणम्। नित्याह्लादकरं ताम्रबालपल्लवशोभितम्॥ ३१ मथ्यमानेऽमृते जातं जातरूपोपमत्वचम्। पारिजातं जगन्नाथः केशवः केशिसूदनः॥ ३२ तुतोष परमप्रीत्या तरुराजमनुत्तमम्। तं दृष्ट्वा प्राह गोविन्दं सत्यभामा द्विजोत्तम। कस्मान्न द्वारकामेष नीयते कृष्ण पादपः॥ ३३ यदि चेत्त्वद्वचः सत्यं त्वमत्यर्थं प्रियेति मे। मद्गेहनिष्कुटार्थाय तदयं नीयतां तरुः॥ ३४ न मे जाम्बवती तादृगभीष्टा न च रुक्मिणी। सत्ये यथा त्वमित्युक्तं त्वया कृष्णासकृत्प्रियम्॥ ३५ सत्यं तद्यदि गोविन्द नोपचारकृतं मम। तदस्तु पारिजातोऽयं मम गेहविभूषणम्॥ ३६ बिभ्रती पारिजातस्य केशपक्षेण मञ्जरीम्। सपत्नीनामहं मध्ये शोभेयमिति कामये॥ ३७

श्रीपराशर उवाच इत्युक्तस्स प्रहस्यैनां पारिजातं गरुत्मति। आरोपयामास हरिस्तमूचुर्वनरक्षिणः॥ ३८ भो शची देवराजस्य महिषी तत्परिग्रहम्। पारिजातं न गोविन्द हर्तुमर्हसि पादपम्॥ ३९ उत्पन्नो देवराजाय दत्तस्सोऽपि ददौ पुनः। महिष्यै सुमहाभाग देव्यै शच्यै कुतूहलात्॥ ४० शचीविभूषणार्थाय देवैरमृतमन्थने। उत्पादितोऽयं न क्षेमी गृहीत्वैनं गमिष्यसि॥ ४१

श्रीपराशरजी बोले— तदनन्तर अदितिकी आज्ञासे देवराजने अत्यन्त आदर-सत्कारके साथ श्रीकृष्णचन्द्रका पूजन किया॥ २८॥ किन्तु कल्पवृक्षके पुष्पोंसे अलंकृता इन्द्राणीने सत्यभामाको मानुषी समझकर वे पुष्प न दिये॥ २९॥ हे साधुश्रेष्ठ! तदनन्तर सत्यभामाके सहित श्रीकृष्णचन्द्रने भी देवताओंके नन्दन आदि मनोहर उद्यानोंको देखा॥ ३०॥ वहाँपर केशिनिषूदन जगन्नाथ श्रीकृष्णने सुगन्धपूर्ण मंजरी-पुंजधारी, नित्याह्लादकारी और ताम्रवर्ण बाल पत्तोंसे सुशोभित, अमृत-मन्थनके समय प्रकट हुआ तथा सुनहरी छालवाला पारिजात-वृक्ष देखा॥ ३१-३२॥

हे द्विजोत्तम! उस अत्युत्तम वृक्षराजको देखकर परम प्रीतिवश सत्यभामा अति प्रसन्न हुई और श्रीगोविन्दसे बोली— “हे कृष्ण! इस वृक्षको द्वारकापुरी क्यों नहीं ले चलते?॥ ३३॥ यदि आपका यह वचन कि 'तुम ही मेरी अत्यन्त प्रिया हो' सत्य है तो मेरे गृहोद्यानमें लगानेके लिये इस वृक्षको ले चलिये॥ ३४॥ हे कृष्ण! आपने कई बार मुझसे यह प्रिय वाक्य कहा है कि 'हे सत्ये! मुझे तू जितनी प्यारी है उतनी न जाम्बवती है और न रुक्मिणी ही'॥ ३५॥ हे गोविन्द! यदि आपका यह कथन सत्य है—केवल मुझे बहलाना ही नहीं है—तो यह पारिजातवृक्ष मेरे गृहका भूषण हो॥ ३६॥ मेरी ऐसी इच्छा है कि मैं अपने केश-कलापोंमें पारिजातपुष्प गूँथकर अपनी अन्य सपत्नियोंमें सुशोभित होऊँ"॥ ३७॥

श्रीपराशरजी बोले— सत्यभामाके इस प्रकार कहनेपर श्रीहरिने हँसते हुए उस पारिजातवृक्षको गरुडपर रख लिया; तब नन्दनवनके रक्षकोंनो कहा—॥ ३८॥ "हे गोविन्द! देवराज इन्द्रकी पत्नी जो महारानी शची हैं यह पारिजातवृक्ष उनकी सम्पत्ति है, आप इसका हरण न कीजिये॥ ३९॥ क्षीर-समुद्रसे उत्पन्न होनेके अनन्तर यह देवराजको दिया गया था; फिर हे महाभाग! देवराजने कुतूहलवश इसे अपनी महिषी शचीदेवीको दे दिया है॥ ४०॥ समुद्र-मन्थनके समय शचीको विभूषित करनेके लिये ही देवताओंने इसे उत्पन्न किया था; इसे लेकर आप कुशलपूर्वक नहीं जा सकेंगे॥ ४१॥

अ० ३० ] * पञ्चम अंश * ३९७


देवराजो मुखप्रेक्षी यस्यास्तस्याः परिग्रहम्।
मौढ्यात्प्रार्थयसे क्षेमी गृहीत्वैनं हि को व्रजेत् ॥ ४२
अवश्यमस्य देवेन्द्रो निष्कृतिं कृष्ण यास्यति ।
वज्रोद्यतकरं शक्रमनुयास्यन्ति चामराः ॥ ४३
तदलं सकलैर्देवैर्विरोधेन तवाच्युत।
विपाककटु यत्कर्म तन्न शंसन्ति पण्डिताः ॥ ४४

श्रीपराशर उवाच
इत्युक्ते तैरूवाचैतान् सत्यभामातिकोपिनी ।
का शची पारिजातस्य को वा शक्रस्सुराधिपः ॥ ४५
सामान्यस्सर्वलोकस्य यद्येषोऽमृतमन्थने ।
समुत्पन्नस्तरुः कस्मादेको गृह्णाति वासवः ॥ ४६
यथा सुरा यथैवेन्दुर्यथा श्रीर्वनरक्षिणः।
सामान्यस्सर्वलोकस्य पारिजातस्तथा द्रुमः ॥ ४७
भर्तृबाहुमहागर्वाद्वृणद्ध्येनमथो शची।
तत्कथ्यतामलं क्षान्त्या सत्या हारयति द्रुमम् ॥ ४८
कथ्यतां च द्रुतं गत्वा पौलोम्या वचनं मम।
सत्यभामा वदत्येतदिति गर्वोद्धताक्षरम् ॥ ४९
यदि त्वं दयिता भर्तुर्यदि वश्यः पतिस्तव।
मद्भर्तुर्हरतो वृक्षं तत्कारय निवारणम् ॥ ५०
जानामि ते पतिं शक्रं जानामि त्रिदशेश्वरम्।
पारिजातं तथाप्येनं मानुषी हारयामि ते ॥ ५१

श्रीपराशर उवाच
इत्युक्ता रक्षिणो गत्वा शच्याः प्रोचुर्यथोदितम्।
श्रुत्वा चोत्साहयामास शची शक्रं सुराधिपम् ॥ ५२
ततस्समस्तदेवानां सैन्यैः परिवृतो हरिम्।
प्रययौ पारिजातार्थमिन्द्रो योद्धुं द्विजोत्तम ॥ ५३
ततः परिघनिस्त्रिंशगदाशूलवरायुधाः।
बभूवुस्त्रिदशास्सज्जाः शक्रे वज्रकरे स्थिते ॥ ५४
ततो निरीक्ष्य गोविन्दो नागराजोपरिस्थितम्।
शक्रं देवपरीवारं युद्धाय समुपस्थितम् ॥ ५५
चकार शङ्खनिर्घोषं दिशश्शब्देन पूरयन्।
मुमोच शरसङ्घातान्सहस्रायुतशश्शितान् ॥ ५६


देवराज भी जिसका मुँह देखते रहते हैं, उस शचीकी सम्पत्ति इस पारिजातकी इच्छा आप मूढताहीसे करते हैं; इसे लेकर भला कौन सकुशल जा सकता है? ॥ ४२ ॥ हे कृष्ण ! देवराज इन्द्र इस वृक्षका बदला चुकानेके लिये अवश्य ही वज्र लेकर उद्यत होंगे और फिर देवगण भी अवश्य ही उनका अनुगमन करेंगे ॥ ४३ ॥ अतः हे अच्युत ! समस्त देवताओंके साथ रार बढ़ानेसे आपका कोई लाभ नहीं; क्योंकि जिस कर्मका परिणाम कटु होता है, पण्डितजन उसे अच्छा नहीं कहते” ॥ ४४ ॥

श्रीपराशरजी बोले— उद्यान-रक्षकोंके इस प्रकार कहनेपर सत्यभामाने अत्यन्त क्रुद्ध होकर कहा—“शची अथवा देवराज इन्द्र ही इस पारिजातके कौन होते हैं? ॥ ४५ ॥ यदि यह अमृत-मन्थनके समय उत्पन्न हुआ है, तो सबकी समान सम्पत्ति है। अकेला इन्द्र ही इसे कैसे ले सकता है? ॥ ४६ ॥ अरे वनरक्षको ! जिस प्रकार [समुद्रसे उत्पन्न हुए] मदिरा, चन्द्रमा और लक्ष्मीका सब लोग समानतासे भोग करते हैं, उसी प्रकार पारिजातवृक्ष भी सभीकी सम्पत्ति है ॥ ४७ ॥ यदि पतिके बाहुबलसे गर्विता होकर शचीने ही इसपर अपना अधिकार जमा रखा है तो उससे कहना कि सत्यभामा उस वृक्षको हरण कराकर लिये जाती है, तुम्हें क्षमा करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ४८ ॥ अरे मालियो ! तुम तुरन्त जाकर मेरे ये शब्द शचीसे कहो कि सत्यभामा अत्यन्त गर्वपूर्वक कड़े अक्षरोंमें यह कहती है कि यदि तुम अपने पतिको अत्यन्त प्यारी हो और वे तुम्हारे वशीभूत हैं तो मेरे पतिको पारिजात हरण करनेसे रोकें ॥ ४९-५० ॥ मैं तुम्हारे पति शक्रको जानती हूँ और यह भी जानती हूँ कि वे देवताओंके स्वामी हैं तथापि मैं मानवी ही तुम्हारे इस पारिजातवृक्षको लिये जाती हूँ” ॥ ५१ ॥

श्रीपराशरजी बोले— सत्यभामाके इस प्रकार कहनेपर वनरक्षकोंने शचीके पास जाकर उससे सम्पूर्ण वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों कह दिया। यह सब सुनकर शचीने अपने पति देवराज इन्द्रको उत्साहित किया ॥ ५२ ॥ हे द्विजोत्तम ! तब देवराज इन्द्र पारिजातवृक्षको छुड़ानेके लिये सम्पूर्ण देवसेनाके सहित श्रीहरिसे लड़नेके लिये चले ॥ ५३ ॥ जिस समय इन्द्रने अपने हाथमें वज्र लिया उसी समय सम्पूर्ण देवगण परिघ, निस्त्रिंश, गदा और शूल आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो गये ॥ ५४ ॥ तदनन्तर देवसेनासे घिरे हुए ऐरावतारूढ इन्द्रको युद्धके लिये उद्यत देख श्रीगोविन्दने सम्पूर्ण दिशाओंको शब्दायमान करते हुए शंख-ध्वनि की और हजारों-लाखों तीखे बाण छोड़े ॥ ५५-५६ ॥

३९८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३०


ततो दिशो नभश्चैव दृष्ट्वा शरशतैश्चितम्।<br>मुमुचुस्त्रिदशास्सर्वे ह्यस्त्रशस्त्राण्यनेकशः ॥ ५७इस प्रकार सम्पूर्ण दिशाओं और आकाशको सैकड़ों बाणोंसे पूर्ण देख देवताओने अनेकों अस्त्र-शस्त्र छोड़े ॥ ५७ ॥
एकैकमस्त्रं शस्त्रं च देवैर्मुक्तं सहस्रशः ।<br>चिच्छेद लीलयैवेशो जगतां मधुसूदनः ॥ ५८त्रिलोकीके स्वामी श्रीमधुसूदनने देवताओंके छोड़े हुए प्रत्येक अस्त्र-शस्त्रके लीलासे ही हजारों टुकड़े कर दिये ॥ ५८ ॥
पाशं सलिलराजस्य समाकृष्योरगाशनः ।<br>चकार खण्डशश्चञ्च्वा बालपन्नगदेहवत् ॥ ५९सर्पाहारी गरुडने जलाधिपति वरुणके पाशको खींचकर अपनी चोंचसे सर्पके बच्चेके समान उसके कितने ही टुकड़े कर डाले ॥ ५९ ॥
यमेन प्रहितं दण्डं गदाविक्षेपखण्डितम्।<br>पृथिव्यां पातयामास भगवान् देवकीसूतः ॥ ६०श्रीदेवकीनन्दनने यमके फेंके हुए दण्डको अपनी गदासे खण्ड-खण्ड कर पृथिवीपर गिरा दिया ॥ ६० ॥
शिबिकां च धनेशस्य चक्रेण तिलशो विभुः ।<br>चकार शौरिरर्कं च दृष्टिदृष्टहतौजसम्॥ ६१कुबेरके विमानको भगवान्ने सुदर्शनचक्रद्वारा तिल-तिल कर डाला और सूर्यको अपनी तेजोमय दृष्टिसे देखकर ही निस्तेज कर दिया ॥ ६१ ॥
नीतोऽग्निशीततां बाणैर्द्राविता वसवो दिशः ।<br>चक्रविच्छिन्नशूलाग्रा रुद्रा भुवि निपातिताः ॥ ६२भगवान्ने तदनन्तर बाण बरसाकर अग्निको शीतल कर दिया और वसुओंको दिशा-विदिशाओंमें भगा दिया तथा अपने चक्रसे त्रिशूलोंकी नोंक काटकर रुद्रगणको पृथिवीपर गिरा दिया ॥ ६२ ॥
साध्या विश्वेऽथ मरुतो गन्धर्वाश्चैव सायकैः ।<br>शार्ङ्गिणा प्रेरितैरस्ता व्योम्नि शाल्मलितूलवत् ॥ ६३भगवान्के चलाये हुए बाणोंसे साध्यगण, विश्वेदेवगण, मरुद्गण और गन्धर्वगण सेमलकी रूईके समान आकाशमें ही लीन हो गये ॥ ६३ ॥
गरुत्मानपि तुण्डेन पक्षाभ्यां च नखाङ्कुरैः ।<br>भक्षयंस्ताडयन् देवान् दारयंश्च चचार वै ॥ ६४श्रीभगवान्के साथ गरुडजी भी अपनी चोंच, पंख और पंजोंसे देवताओंको खाते, मारते और फाड़ते फिर रहे थे ॥ ६४ ॥
ततश्शरसहस्रेण देवेन्द्रमधुसूदनौ ।<br>परस्परं ववर्षतु धाराभिरिव तोयदौ ॥ ६५फिर जिस प्रकार दो मेघ जलकी धाराएँ बरसाते हों उसी प्रकार देवराज इन्द्र और श्रीमधुसूदन एक-दूसरेपर बाण बरसाने लगे ॥ ६५ ॥
ऐरावतेन गरुडो युयुधे तत्र संकुले ।<br>देवैस्समस्तैर्युयुधे शक्रेण च जनार्दनः ॥ ६६उस युद्धमें गरुडजी ऐरावतके साथ और श्रीकृष्णचन्द्र इन्द्र तथा सम्पूर्ण देवताओंके साथ लड़ रहे थे ॥ ६६ ॥
भिन्नेष्वशेषबाणेषु शस्त्रेष्वस्त्रेषु च त्वरन्।<br>जग्राह वासवो वज्रं कृष्णश्चक्रं सुदर्शनम् ॥ ६७सम्पूर्ण बाणोंके चूक जाने और अस्त्र-शस्त्रोंके कट जानेपर इन्द्रने शीघ्रतासे वज्र और कृष्णने सुदर्शनचक्र हाथमें लिया ॥ ६७ ॥
ततो हाहाकृतं सर्वं त्रैलोक्यं द्विजसत्तम ।<br>वज्रचक्रकरौ दृष्ट्वा देवराजजनार्दनौ ॥ ६८हे द्विजश्रेष्ठ! उस समय सम्पूर्ण त्रिलोकीमें इन्द्र और कृष्णचन्द्रको क्रमशः वज्र और चक्र लिये हुए देखकर हाहाकार मच गया ॥ ६८ ॥
क्षिप्तं वज्रमथेन्द्रेण जग्राह भगवान्हरिः ।<br>न मुमोच तदा चक्रं शक्रं तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ६९श्रीहरिने इन्द्रके छोड़े हुए वज्रको अपने हाथोंसे पकड़ लिया और स्वयं चक्र न छोड़कर इन्द्रसे कहा—"अरे, ठहर!" ॥ ६९ ॥
प्रणष्टवज्रं देवेन्द्रं गरुडक्षतवाहनम्।<br>सत्यभामाब्रवीद्वीरं पलायनपरायणम्॥ ७०इस प्रकार वज्र छिन जाने और अपने वाहन ऐरावतके गरुडद्वारा क्षत-विक्षत हो जानेके कारण भागते हुए वीर इन्द्रसे सत्यभामाने कहा— ॥ ७० ॥
त्रैलोक्येश न ते युक्तं शचीभर्तुः पलायनम्।<br>पारिजातस्रगाभोगा त्वामुपस्थास्यते शची ॥ ७१"हे त्रैलोक्येश्वर! तुम शचीके पति हो, तुम्हें इस प्रकार युद्धमें पीठ दिखलाना उचित नहीं है। तुम भागो मत, पारिजात-पुष्पोंकी मालासे विभूषिता होकर शची शीघ्र ही तुम्हारे पास आवेगी ॥ ७१ ॥

अ० ३० ]

  • पञ्चम अंश *

३९९

कीदृशं देवराज्यं ते पारिजातस्वगुञ्ज्वलाम् । अपश्यतो यथापूर्वं प्रणयाभ्यागतां शचीम् ॥ ७२ अलं शक्र प्रयासेन न व्रीडां गन्तुमर्हसि । नीयतां पारिजातोऽयं देवाससन्तु गतव्यथाः ॥ ७३ पतिगर्विवलेपेन बहुमानपुरस्सरम् । न ददर्श गृहं यातामुपचारेण मां शची ॥ ७४ स्त्रीत्वादगुरुचित्ताहं स्वभर्तृश्लाघनापरा । ततः कृतवती शक्र भवता सह विग्रहम् ॥ ७५ तदलं पारिजातेन परस्वेन हूतेन मे । रूपेण गर्विता सा तु भर्त्रा का स्त्री न गर्विता ॥ ७६

श्रीपराशर उवाच

इत्युक्तो वै निववृते देवराजस्तथा द्विज । प्राह चैनामलं चण्डि सख्युः खेदोक्तिविस्तैरः ॥ ७७ न चापि सर्गसंहारस्थितिकर्ताखिलस्य यः । जितस्य तेन मे व्रीडा जायते विश्वरूपिणा ॥ ७८ यस्माज्जगत्सकलमेतदनादिमध्या- द्यस्मिन्मृतश्च न भविष्यति सर्वभूतात् । तेनोद्भवप्रलयपालनकारणेन व्रीडा कथं भवति देवि निराकृतस्य ॥ ७९ सकलभुवनसूतिर्मूर्तिरल्पाल्यसूक्ष्मा विदितसकलवेदैर्ज्ञायते यस्य नान्यैः । तमजमकृतमीशं शाश्वतं स्वेच्छयैन जगदुपकृतिमर्त्य को विजेतुं समर्थः ॥ ८०

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमोऽशो त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥

अब प्रेमवश अपने पास आयी हुई शचीको पहलेकी भाँति पारिजात-पुष्पकी मालासे अलंकृत न देखकर तुम्हें देवराजत्वका क्या सुख होगा ? ॥ ७२ ॥ हे शक्र ! अब तुम्हें अधिक प्रयास करनेकी आवश्यकता नहीं है, तुम संकोच मत करो; इस पारिजात-वृक्षको ले जाओ। इसे पाकर देवगण सन्तापरहित हों ॥ ७३ ॥ अपने पतिके बाहुबलसे अत्यन्त गर्विता शचीने अपने घर जानेपर भी मुझे कुछ अधिक सम्मानकी दृष्टिसे नहीं देखा था ॥ ७४ ॥ स्त्री होनेसे मेरा चित्त भी अधिक गम्भीर नहीं है, इसलिये मैंने भी अपने पतिका गौरव प्रकट करनेके लिये ही तुमसे यह लड़ाई ठानी थी ॥ ७५ ॥ मुझे दूसरेकी सम्पत्ति इस पारिजातको ले जानेकी क्या आवश्यकता है ? शची अपने रूप और पतिके कारण गर्विता है तो ऐसी कौन-सी स्त्री है जो इस प्रकार गर्वाली न हो ?" ॥ ७६ ॥

श्रीपराशरजी बोले—हे द्विज ! सत्यभामाके इस प्रकार कहनेपर देवराज लौट आये और बोले—"हे क्रोधिते ! मैं तुम्हारा सुहृद् हूँ, अतः मेरे लिये ऐसी वैमनस्य बढानेवाली उक्तियोंके विस्तार करनेका कोई प्रयोजन नहीं है ? ॥ ७७ ॥ जो सम्पूर्ण जगत्को उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाले हैं, उन विश्वरूप प्रभुसे पराजित होनेमें भी मुझे कोई संकोच नहीं है ॥ ७८ ॥ जिस आदि और मध्यरहित प्रभुसे यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है, जिसमें यह स्थित है और फिर जिसमें लीन होकर अन्तमें यह न रहेगा; हे देवि ! जगत्की उत्पत्ति, प्रलय और पालनके कारण उस परमात्मासे ही परास्त होनेमें मुझे कैसे लज्जा हो सकती है ? ॥ ७९ ॥ जिसकी अत्यन्त अल्प और सूक्ष्म मूर्तिको, जो सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न करनेवाली है, सम्पूर्ण वेदोंको जाननेवाले अन्य पुरुष भी नहीं जान पाते तथा जिसने जगत्के उपकारके लिये अपनी इच्छासे ही मनुष्यरूप धारण किया है उस अजन्मा, अकर्ता और नित्य ईश्वरको जीतनेमें कौन समर्थ है ?" ॥ ८० ॥

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४००
* श्रीविष्णुपुराण *
[ अ० ३१


इकतीसवाँ अध्याय

भगवान्‌का द्वारकापुरीमें लौटना और सोलह हजार एक सौ कन्याओंसे विवाह करना

श्रीपराशर उवाच
संस्तुतो भगवानित्थं देवराजेन केशवः।
प्रहस्य भावगम्भीरमुवाचेन्द्रं द्विजोत्तम॥ १

श्रीपराशरजी बोले— हे द्विजोत्तम! इन्द्रने जब इस प्रकार स्तुति की तो भगवान् कृष्णचन्द्र गम्भीर-भावसे हँसते हुए इस प्रकार बोले—॥ १॥


श्रीकृष्ण उवाच
देवराजो भवानिन्द्रो वयं मर्त्या जगत्पते।
क्षन्तव्यं भवतैवेदमपराधं कृतं मम॥ २
पारिजाततरुश्चायं नीयतामुचितास्पदम्।
गृहीतोऽयं मया शक्र सत्यावचनकारणात्॥ ३
वज्रं चेदं गृहाण त्वं यदत्र प्रहितं त्वया।
तवैवैतत्प्रहरणं शक्र वैरिविदारणम्॥ ४

श्रीकृष्णजी बोले— हे जगत्पते! आप देवराज इन्द्र हैं और हम मरणधर्मा मनुष्य हैं। हमने आपका जो अपराध किया है उसे आप क्षमा करें॥ २॥ मैंने जो यह पारिजातवृक्ष लिया था इसे इसके योग्य स्थान (नन्दनवन)-को ले जाइये। हे शक्र! मैंने तो इसे सत्यभामाके कहनेसे ही ले लिया था॥ ३॥ और आपने जो वज्र फेंका था उसे भी ले लीजिये; क्योंकि हे शक्र! यह शत्रुओंको नष्ट करनेवाला शस्त्र आपकाही है॥ ४॥


इन्द्र उवाच
विमोहयसि मामीश मर्त्योऽहमिति किं वदन्।
जानीमस्त्वं भगवतो न तु सूक्ष्मविदो वयम्॥ ५
योऽसि सोऽसि जगत्त्राणप्रवृत्तो नाथ संस्थितः।
जगतश्शल्यनिष्कर्षं करोष्यसुरसूदन॥ ६
नीयतां पारिजातोऽयं कृष्ण द्वारवतीं पुरीम्।
मर्त्यलोके त्वया त्यक्ते नायं संस्थास्यते भुवि॥ ७
देवदेव जगन्नाथ कृष्ण विष्णो महाभुज।
शङ्खचक्रगदापाणे क्षमस्वैतद्व्यतिक्रमम्॥ ८

इन्द्र बोले— हे ईश! 'मैं मनुष्य हूँ' ऐसा कहकर मुझे क्यों मोहित करते हैं? हे भगवन्! मैं तो आपके इस सगुणस्वरूपको ही जानता हूँ, हम आपके सूक्ष्म-स्वरूपको जाननेवाले नहीं हैं॥ ५॥ हे नाथ! आप जो हैं वही हैं, [हम तो इतना ही जानते हैं कि] हे दैत्यदलन! आप लोकरक्षामें तत्पर हैं और इस संसारके काँटोंको निकाल रहे हैं॥ ६॥ हे कृष्ण! इस पारिजात-वृक्षको आप द्वारकापुरी ले जाइये, जिस समय आप मर्त्यलोक छोड़ देंगे, उस समय वह भूर्लोकमें नहीं रहेगा॥ ७॥ हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे कृष्ण! हे विष्णो! हे महाबाहो! हे शंखचक्रगदापाणे! मेरी इस धृष्टताको क्षमा कीजिये॥ ८॥


श्रीपराशर उवाच
तथेत्युक्त्वा च देवेन्द्रमाजगाम भुवं हरिः।
प्रसक्तैः सिद्धगन्धर्वैः स्तूयमानः सुर्षिभिः॥ ९
ततश्शङ्खमुपाध्माय द्वारकोपरि संस्थितः।
हर्षमुत्पादयामास द्वारकावासिनां द्विज॥ १०
अवतीर्याथ गरुडात्सत्यभामासहायवान्।
निष्कूटे स्थापयामास पारिजातं महातरुम्॥ ११
यमभ्येत्य जनस्सर्वो जातिं स्मरति पौर्विकीम्।
वास्यते यस्य पुष्योत्थगन्धेनोर्वी त्रियोजनम्॥ १२

श्रीपराशरजी बोले— तदनन्तर श्रीहरि देवराजसे 'तुम्हारी जैसी इच्छा है वैसा ही सही' ऐसा कहकर सिद्ध, गन्धर्व और देवर्षिगणसे स्तुत हो भूर्लोकमें चले आये॥ ९॥ हे द्विज! द्वारकापुरीके ऊपर पहुँचकर श्रीकृष्णचन्द्रने [अपने आनेकी सूचना देते हुए] शंख बजाकर द्वारकावासियोंको आनन्दित किया॥ १०॥ तदनन्तर सत्यभामाके सहित गरुडसे उतरकर उस पारिजात-महावृक्षको [सत्यभामाके] गृहोद्यानमें लगा दिया॥ ११॥ जिसके पास आकर सब मनुष्योंको अपने पूर्वजन्मका स्मरण हो आता है और जिसके पुष्पोंसे निकली हुई गन्धसे तीन योजनतक पृथिवी सुगन्धित रहती है॥ १२॥


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