भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 401

३९० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २८


तस्या विवाहे रामाद्या यादवा हरिणा सह।
रुक्मिणो नगरं जग्मुर्नाम्ना भोजकटं द्विज॥ ९
विवाहे तत्र निर्वृत्ते प्रद्युम्नेस्तु महात्मनः।
कलिङ्गराजप्रमुखा रुक्मिणं वाक्यमब्रुवन्॥ १०
अनक्षज्ञो हली द्यूते तथास्य व्यसनं महत्।
न जयामो बलं कस्माद्द्यूतेनैनं महाबलम्॥ ११
श्रीपराशर उवाच
तथेति तानाह नृपान्रुक्मी बलमदान्वितः।
सभायां सह रामेण चक्रे द्यूतं च वै तदा॥ १२
सहस्रमेकं निष्काणां रुक्मिणा विजितो बलः।
द्वितीयेऽपि पणे चान्यत्सहस्रं रुक्मिणा जितः॥ १३
ततो दशसहस्राणि निष्काणां पणमाददे।
बलभद्रोऽजयत्तानि रुक्मी द्यूतविदां वरः॥ १४
ततो जहास स्वनवत्कलिङ्गाधिपतिर्द्विज।
दन्तान्विदर्शयन्मूढो रुक्मी चाह मदोद्धतः॥ १५
अविद्योऽयं मया द्यूते बलभद्रः पराजितः।
मुधैवाक्षावलेपान्धो योऽवमेनेऽक्षकोविदान्॥ १६
दृष्ट्वा कलिङ्गराजन्तं प्रकाशदशनाननम्।
रुक्मिणं चापि दुर्वाक्यं कोपं चक्रे हलायुधः॥ १७
ततः कोपपरीतात्मा निष्ककोटिं समाददे।
ग्लहं जग्राह रुक्मी च तदर्थेऽक्षानपातयत्॥ १८
अजयद्बलदेवस्तं प्राहोच्चैर्विजितं मया।
मयेति रुक्मी प्राहोच्चैरलीकोक्तेरलं बल॥ १९
त्वयोक्तोऽयं ग्लहस्सत्यं न मयैषोऽनुमोदितः।
एवं त्वया चेद्विजितं विजितं न मया कथम्॥ २०
श्रीपराशर उवाच
अथान्तरिक्षे वागुच्चैः प्राह गम्भीरनादिनी।
बलदेवस्य तं कोपं वर्द्धयन्ती महात्मनः॥ २१
जितं बलेन धर्मेण रुक्मिणा भाषितं मृषा।
अनुक्त्वापि वचः किञ्चित्कृतं भवति कर्मणा॥ २२
ततो बलः समुत्थाय कोपसंरक्तलोचनः।
जघानाष्टापदेनैव रुक्मिणं स महाबलः॥ २३


हिन्दी अनुवाद:

हे द्विज! उसके विवाहमें सम्मिलित होनेके लिये कृष्णचन्द्रके साथ बलभद्र आदि अन्य यादवगण भी रुक्मीकी राजधानी भोजकट नामक नगरको गये॥ ९॥ जब प्रद्युम्न-पुत्र महात्मा अनिरुद्धका विवाह-संस्कार हो चुका तो कलिंगराज आदि राजाओंने रुक्मीसे कहा—॥ १०॥ "ये बलभद्र द्यूतक्रीड़ा [अच्छी तरह] जानते तो हैं नहीं तथापि इन्हें उसका व्यसन बहुत है; तो फिर हम इन महाबली रामको जुएसे ही क्यों न जीत लें?"॥ ११॥

श्रीपराशरजी बोले— तब बलके मदसे उन्मत्त रुक्मीने उन राजाओंसे कहा—'बहुत अच्छा' और सभामें बलरामजीके साथ द्यूतक्रीड़ा आरम्भ कर दी॥ १२॥ रुक्मीने पहले ही दाँवमें बलरामजीसे एक सहस्र निष्क जीते तथा दूसरे दाँवमें एक सहस्र निष्क और जीत लिये॥ १३॥ तब बलभद्रजीने दस हजार निष्कका एक दाँव और लगाया। उसे भी पक्के जुआरी रुक्मीने ही जीत लिया॥ १४॥ हे द्विज! इसपर मूढ़ कलिंगराज दाँत दिखाता हुआ जोरसे हँसने लगा और मदोन्मत्त रुक्मीने कहा—॥ १५॥ "द्यूतक्रीड़ासे अनभिज्ञ इन बलभद्रजीको मैंने हरा दिया है; ये वृथा ही अक्षके घमण्डसे अन्धे होकर अक्षकुशल पुरुषोंका अपमान करते थे"॥ १६॥

इस प्रकार कलिंगराजको दाँत दिखाते और रुक्मीको दुर्वाक्य कहते देख हलायुध बलभद्रजी अत्यन्त क्रोधित हुए॥ १७॥ तब उन्होंने अत्यन्त कुपित होकर करोड़ निष्कका दाँव लगाया और रुक्मीने भी उसे ग्रहणकर उसके निमित्त पाँसे फेंके॥ १८॥ उसे बलदेवजीने ही जीता और वे जोरसे बोल उठे, 'मैंने जीता।' इसपर रुक्मी भी चिल्लाकर बोला—'बलराम! असत्य बोलनेसे कुछ लाभ नहीं हो सकता, यह दाँव भी मैंने ही जीता है॥ १९॥ आपने इस दाँवके विषयमें जिक्र अवश्य किया था, किंतु मैंने उसका अनुमोदन तो नहीं किया। इस प्रकार यदि आपने इसे जीता है तो मैंने भी क्यों नहीं जीता?"॥ २०॥

श्रीपराशरजी बोले— उसी समय महात्मा बलदेवजीके क्रोधको बढ़ाती हुई आकाशवाणीने गम्भीर स्वरमें कहा—॥ २१॥ "इस दाँवको धर्मानुसार तो बलरामजी ही जीते हैं; रुक्मी झूठ बोलता है क्योंकि [अनुमोदनसूचक] वचन न कहनेपर भी [पाँसे फेंकने आदि] कार्यसे वह अनुमोदित ही माना जायगा"॥ २२॥

तब क्रोधसे अरुणनयन हुए महाबली बलभद्रजीने उठकर रुक्मीको जुआ खेलनेके पाँसोंसे ही मार डाला॥ २३॥