विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० २९ ] * पञ्चम अंश * ३९१
| कलिङ्गराजं चादाय विस्फुरन्तं बलाद्बलः।<br>बभञ्ज दन्तान्कुपितो यैः प्रकाशं जहास सः॥ २४<br>आकृष्य च महास्तम्भं जातरूपमयं बलः।<br>जघान तान्ये तत्पक्षे भूभृतः कुपितो भृशम्॥ २५<br>ततो हाहाकृतं सर्वं पलायनपरं द्विज।<br>तद्राजमण्डलं भीतं बभूव कुपिते बले॥ २६<br>बलेन निहतं दृष्ट्वा रुक्मिणं मधुसूदनः।<br>नोवाच किञ्चिन्मैत्रेय रुक्मिणीबलयोर्भयात्॥ २७<br>ततोऽनिरुद्धमादाय कृतदारं द्विजोत्तम।<br>द्वारकामाजगामाथ यदुचक्रं च केशवः॥ २८ | फिर फड़कते हुए कलिंगराजको बलपूर्वक पकड़कर बलरामजीने उसके दाँत, जिन्हें दिखलाता हुआ वह हँसा था, तोड़ दिये॥ २४॥ इनके सिवा उसके पक्षके और भी जो कोई राजालोग थे, उन्हें बलरामजीने अत्यन्त कुपित होकर एक सुवर्णमय स्तम्भ उखाड़कर उससे मार डाला॥ २५॥ हे द्विज! उस समय बलरामजीके कुपित होनेसे हाहाकार मच गया और सम्पूर्ण राजालोग भयभीत होकर भागने लगे॥ २६॥<br>हे मैत्रेय! उस समय रुक्मीको मारा गया देख श्रीमधुसूदनने एक ओर रुक्मिणीके और दूसरी ओर बलरामजीके भयसे कुछ भी नहीं कहा॥ २७॥ तदनन्तर, हे द्विजश्रेष्ठ! यादवोंके सहित श्रीकृष्णचन्द्र सपत्नीक अनिरुद्धको लेकर द्वारकापुरीमें चले आये॥ २८॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽशेऽष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८॥
ऊनतीसवाँ अध्याय
नरकासुरका वध
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| द्वारवत्यां स्थिते कृष्णे शक्रस्त्रिभुवनेश्वरः।<br>आजगामाथ मैत्रेय मत्तैरावतपृष्ठगः॥ १<br>प्रविश्य द्वारकां सोऽथ समेत्य हरिणा ततः।<br>कथयामास दैत्यस्य नरकस्य विचेष्टितम्॥ २<br>त्वया नाथेन देवानां मनुष्यत्वेऽपि तिष्ठता।<br>प्रशमं सर्वदुःखानि नीतानि मधुसूदन॥ ३<br>तपस्विव्यसनार्थाय सोऽरिष्टो धेनुकस्तथा।<br>प्रवृत्तो यस्तथा केशी ते सर्वे निहतास्त्वया॥ ४<br>कंसः कुवलयापीडः पूतना बालघातिनी।<br>नाशं नीतास्त्वया सर्वे येऽन्ये जगदुपद्रवाः॥ ५<br>युष्मद्दोर्दण्डसम्भूतिपरित्राते जगत्त्रये।<br>यज्ञ्वयज्ञांशसम्प्राप्त्या तृप्तिं यान्ति दिवौकसः॥ ६<br>सोऽहं साम्प्रतमायातो यन्निमित्तं जनार्दन।<br>तच्छ्रुत्वा तत्प्रतीकारप्रयत्नं कर्तुमर्हसि॥ ७ | हे मैत्रेय! एक बार जब श्रीभगवान् द्वारकामें ही थे त्रिभुवनपति इन्द्र अपने मत्त गजराज ऐरावतपर चढ़कर उनके पास आये॥ १॥ द्वारकामें आकर वे भगवान्से मिले और उनसे नरकासुरके अत्याचारोंका वर्णन किया॥ २॥ [वे बोले—] “हे मधुसूदन! इस समय मनुष्यरूपमें स्थित होकर भी आप सम्पूर्ण देवताओंके स्वामीने हमारे समस्त दुःखोंको शान्त कर दिया है॥ ३॥ जो अरिष्ट, धेनुक और केशी आदि असुर सर्वदा तपस्वियोंको क्लेशित करते रहते थे उन सबको आपने मार डाला॥ ४॥ कंस, कुवलयापीड और बालघातिनी पूतना तथा और भी जो-जो संसारके उपद्रवरूप थे उन सबको आपने नष्ट कर दिया॥ ५॥ आपके बाहुदण्डकी सत्तासे त्रिलोकीके सुरक्षित हो जानेके कारण याजकोंके दिये हुए यज्ञभागोंको प्राप्तकर देवगण तृप्त हो रहे हैं॥ ६॥ हे जनार्दन! इस समय जिस निमित्तसे मैं आपके पास उपस्थित हुआ हूँ, उसे सुनकर आप उसके प्रतीकारका प्रयत्न करें॥ ७॥ |