विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 403, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें३९२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २९ ]
भौमोऽयं नरको नाम प्राग्ज्योतिषपुरेश्वरः ।
करोति सर्वभूतानामुपघातमरिन्दम ॥ ८
देवसिद्धासुरादीनां नृपाणां च जनार्दन ।
हृत्वा तु सोऽसुरः कन्या रुरोधे निजमन्दिरे ॥ ९
छत्रं यत्सलिलस्रावि तज्जहार प्रचेतसः ।
मन्दरस्य तथा शृङ्गं हृतवान्मणिपर्वतम् ॥ १०
अमृतस्राविणी दिव्ये मन्मातुः कृष्ण कुण्डले ।
जहार सोऽसुरोऽदित्या वाञ्छत्यैरावतं गजम् ॥ ११
दुर्नीतमेतद्गोविन्द मया तस्य निवेदितम् ।
यदत्र प्रति कर्तव्यं तत्स्वयं परिमृश्यताम् ॥ १२
श्रीपराशर उवाच
इति श्रुत्वा स्मितं कृत्वा भगवान्देवकीसुतः ।
गृहीत्वा वासवं हस्ते समुत्तस्थौ वरासनात् ॥ १३
सञ्चिन्त्यागतमारुह्य गरुडं गगनेचरम् ।
सत्यभामां समारोप्य ययौ प्राग्ज्योतिषं पुरम् ॥ १४
आरुह्यैरावतं नागं शक्रोऽपि त्रिदिवं ययौ ।
ततो जगाम कृष्णश्च पश्यतां द्वारकौकसाम् ॥ १५
प्राग्ज्योतिषपुरस्यापि समन्ताच्छतयोजनम् ।
आचिता मौरवैः पाशैः क्षुरान्तैर्भूर्द्विजोत्तम ॥ १६
तांश्चिच्छेद हरिः पाशान्क्षिप्त्वा चक्रं सुदर्शनम् ।
ततो मुरस्समुत्तस्थौ तं जघान च केशवः ॥ १७
मुरस्य तनयान्सप्त सहस्रांस्तांस्ततो हरिः ।
चक्रधाराग्निन्निर्दग्धांश्चकार शलभानिव ॥ १८
हत्वा मुरं हयग्रीवं तथा पञ्चजनं द्विज ।
प्राग्ज्योतिषपुरं धीमांस्त्वरावान्समुपाद्रवत् ॥ १९
नरकेणास्य तत्राभून्महासैन्येन संयुगम् ।
कृष्णस्य यत्र गोविन्दो जघ्ने दैत्यान्सहस्रशः ॥ २०
शस्त्रास्त्रवर्षं मुञ्चन्तं तं भौमं नरकं बली ।
क्षिप्त्वा चक्रं द्विधा चक्रे चक्री दैतेयचक्रहा ॥ २१
हते तु नरके भूमिर्गृहीत्वादितिकुण्डले ।
उपतस्थे जगन्नाथं वाक्यं चेदमथाब्रवीत् ॥ २२
हिन्दी अनुवाद
हे शत्रुदमन! यह पृथिवीका पुत्र नरकासुर प्राग्ज्योतिषपुरका स्वामी है; इस समय यह सम्पूर्ण जीवोंका घात कर रहा है॥ ८ ॥ हे जनार्दन! उसने देवता, सिद्ध, असुर और राजा आदिकोंकी कन्याओंको बलात् लाकर अपने अन्तःपुरमें बन्द कर रखा है॥ ९ ॥ इस दैत्यने वरुणका जल बरसानेवाला छत्र और मन्दराचलका मणिपर्वत नामक शिखर भी हर लिया है॥ १० ॥
हे कृष्ण! उसने मेरी माता अदितिके अमृतस्रावी दोनों दिव्य कुण्डल ले लिये हैं और अब इस ऐरावत हाथीको भी लेना चाहता है॥ ११ ॥ हे गोविन्द! मैंने आपको उसकी ये सब अनीतियाँ सुना दी हैं; इनका जो प्रतीकार होना चाहिये, वह आप स्वयं विचार लें' '॥ १२ ॥
श्रीपराशरजी बोले— इन्द्रके ये वचन सुनकर श्रीदेवकीनन्दन मुसकाये और इन्द्रका हाथ पकड़कर अपने श्रेष्ठ आसनसे उठे ॥ १३ ॥ फिर स्मरण करते ही उपस्थित हुए आकाशगामी गरुडपर सत्यभामाको चढ़ाकर स्वयं चढ़े और प्राग्ज्योतिषपुरको चले ॥ १४ ॥ तदनन्तर इन्द्र भी ऐरावतपर चढ़कर देवलोकको गये तथा भगवान् कृष्णचन्द्र सब द्वारकावासियोंके देखते-देखते [नरकासुरको मारने] चले गये ॥ १५ ॥
हे द्विजोत्तम! प्राग्ज्योतिषपुरके चारों ओर पृथिवी सौ योजनतक मुर दैत्यके बनाये हुए छुरेकी धाराके समान अति तीक्ष्ण पाशोंसे घिरी हुई थी ॥ १६ ॥ भगवान्ने उन पाशोंको सुदर्शनचक्र फेंककर काट डाला; फिर मुर दैत्य भी सामना करनेके लिये उठा तब श्रीकेशवने उसे भी मार डाला ॥ १७ ॥ तदनन्तर श्रीहरिने मुरके सात हजार पुत्रोंको भी अपने चक्रकी धाररूप अग्निमें पतंगके समान भस्म कर दिया ॥ १८ ॥ हे द्विज! इस प्रकार मतिमान् भगवान्ने मुर, हयग्रीव एवं पंचजन आदि दैत्योंको मारकर बड़ी शीघ्रतासे प्राग्ज्योतिषपुरमें प्रवेश किया ॥ १९ ॥ वहाँ पहुँचकर भगवान्का अधिक सेनावाले नरकासुरसे युद्ध हुआ, जिसमें श्रीगोविन्दने उसके सहस्रों दैत्योंको मार डाला ॥ २० ॥ दैत्यदलका दलन करनेवाले महाबलवान् भगवान् चक्रपाणिने शस्त्रास्त्रकी वर्षा करते हुए भूमिपुत्र नरकासुरके सुदर्शनचक्र फेंककर दो टुकड़े कर दिये ॥ २१ ॥ नरकासुरके मरते ही पृथिवी अदितिके कुण्डल लेकर उपस्थित हुई और श्रीजगन्नाथसे कहने लगी ॥ २२ ॥