भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 404, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 404

अ० २९ ] * पञ्चम अंश * ३९३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पृथ्व्युवाच<br>यदाहमुद्धृता नाथ त्वया सूकरमूर्तिना।<br>त्वत्स्पर्शसम्भवः पुत्रस्तदायं मय्यजायत॥ २३<br><br>सोऽयं त्वयैव दत्तो मे त्वयैव विनिपातितः।<br>गृहाण कुण्डले चेमे पालयास्य च सन्ततिम्॥ २४<br><br>भारावतरणार्थाय ममैव भगवानिमम्।<br>अंशेन लोकमायात: प्रसादसुमुखः प्रभो॥ २५<br><br>त्वं कर्ता च विकर्ता च संहर्ता प्रभवोऽव्ययः।<br>जगतां त्वं जगद्रूपः स्तूयतेऽच्युत किं तव॥ २६<br><br>व्याप्तिर्व्याप्यं क्रिया कर्ता कार्यं च भगवान्यथा।<br>सर्वभूतात्मभूतस्य स्तूयते तव किं तथा॥ २७<br><br>परमात्मा च भूतात्मा त्वमात्मा चाव्ययो भवान्।<br>यथा तथा स्तुतिर्नाथ किमर्थं ते प्रवर्तते॥ २८<br><br>प्रसीद सर्वभूतात्मन्नरकेण तु यत्कृतम्।<br>तत्क्षम्यतामदोषाय त्वत्सुतस्त्वन्निपातितः॥ २९<br><br>श्रीपराशर उवाच<br>तथेति चोक्त्वा धरणीं भगवान्भूतभावनः।<br>रत्नानि नरकावासाज्जग्राह मुनिसत्तम॥ ३०<br><br>कन्यापुरे स कन्यानां षोडशातुलविक्रमः।<br>शताधिकानि ददृशे सहस्राणि महामुने॥ ३१<br><br>चतुर्दंष्ट्रान्गजांश्चाग्र्यान् षट्सहस्रांश्च दृष्टवान्।<br>काम्बोजानां तथाश्वानां नियुतान्येकविंशतिम्॥ ३२<br><br>ताः कन्यास्तांस्तथा नागांस्तानश्वान् द्वारकां पुरीम्।<br>प्रापयामास गोविन्दस्सद्यो नरककिङ्करैः॥ ३३<br><br>ददृशे वारुणं छत्रं तथैव मणिपर्वतम्।<br>आरोपयामास हरिर्गरुडे पतगेश्वरे॥ ३४<br><br>आरुह्य च स्वयं कृष्णस्सत्यभामासहायवान्।<br>अदित्याः कुण्डले दातुं जगाम त्रिदशालयम्॥ ३५पृथिवी बोली—हे नाथ! जिस समय वराहरूप धारणकर आपने मेरा उद्धार किया था, उसी समय आपके स्पर्शसे मेरे यह पुत्र उत्पन्न हुआ था॥ २३॥ इस प्रकार आपनेही मुझे यह पुत्र दिया था और अब आपनेही इसको नष्ट किया है; आप ये कुण्डल लीजिये और अब इसकी सन्तानकी रक्षा कीजिये॥ २४॥ हे प्रभो! मेरे ऊपर प्रसन्न होकर ही आप मेरा भार उतारनेके लिये अपने अंशसे इस लोकमें अवतीर्ण हुए हैं॥ २५॥ हे अच्युत! इस जगत्के आप ही कर्ता, आप ही विकर्ता (पोषक) और आप ही हर्ता (संहारक) हैं; आप ही इसकी उत्पत्ति और लयके स्थान हैं तथा आप ही जगतरूप हैं। फिर हम आपकी स्तुति किस प्रकार करें?॥ २६॥ हे भगवन्! जब कि व्याप्ति, व्याप्य, क्रिया, कर्ता और कार्यरूप आप ही हैं, तब सबके आत्मस्वरूप आपकी किस प्रकार स्तुति की जा सकती है?॥ २७॥ हे नाथ! जब आप ही परमात्मा, आप ही भूतात्मा और आप ही अव्यय जीवात्मा हैं, तब किस वस्तुको लेकर आपकी स्तुति हो सकती है?॥ २८॥ हे सर्वभूतात्मन्! आप प्रसन्न होइये और इस नरकासुरके सम्पूर्ण अपराध क्षमा कीजिये। निश्चय ही आपने अपने पुत्रको निर्दोष करनेके लिये ही स्वयं मारा है॥ २९॥<br><br>श्रीपराशरजी बोले—हे मुनिश्रेष्ठ! तदनन्तर भगवान् भूतभावनने पृथिवीसे कहा—"तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो" और फिर नरकासुरके महलसे नाना प्रकारके रत्न लिये॥ ३०॥ हे महामुने! अतुलविक्रम श्रीभगवान्ने नरकासुरके कन्यान्तःपुरमें जाकर सोलह हजार एक सौ कन्याएँ देखीं॥ ३१॥ तथा चार दाँतवाले छः हजार गजश्रेष्ठ और इक्कीस लाख काम्बोजदेशीय अश्व देखे॥ ३२॥ उन कन्याओं, हाथियों और घोड़ोंको श्रीकृष्णचन्द्रने नरकासुरके सेवकोंद्वारा तुरन्त ही द्वारकापुरी पहुँचावा दिया॥ ३३॥<br><br>तदनन्तर भगवान्ने वरुणका छत्र और मणिपर्वत देखा, उन्हें उठाकर उन्होंने पक्षिराज गरुडपर रख लिया॥ ३४॥ और सत्यभामाके सहित स्वयं भी उसीपर चढ़कर अदितिके कुण्डल देनेके लिये स्वर्गलोकको गये॥ ३५॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे एकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥