भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 405

३९४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३०


तीसवाँ अध्याय

पारिजात-हरण

श्रीपराशर उवाच

गरुडो वारुणं छत्रं तथैव मणिपर्वतम्।
सभार्यं च हृषीकेशं लीलयैव वहन्ययौ ॥ १

ततश्शङ्खमुपाध्मासीत्स्वर्गद्वारगतो हरिः।
उपत्तस्थुस्तथा देवास्सार्घ्यहस्ता जनार्दनम् ॥ २

स देवैरर्चितः कृष्णो देवमातुर्निवेशनम्।
सिताभ्रशिखराकारं प्रविश्य ददृशेऽदितिम् ॥ ३

स तां प्रणम्य शक्रेण सह ते कुण्डलोत्तमे।
ददौ नरकनाशं च शशंसास्यै जनार्दनः ॥ ४

ततः प्रीता जगन्माता धातारं जगतां हरिम्।
तुष्टावादितिरव्यग्रा कृत्वा तत्प्रवणं मनः ॥ ५

अदितिरुवाच

नमस्ते पुण्डरीकाक्ष भक्तानामभयंकर।
सनातनात्मन् सर्वात्मन् भूतात्मन् भूतभावन ॥ ६

प्रणेतर्मनसो बुद्धेरिन्द्रियाणां गुणात्मक।
त्रिगुणातीत निर्द्वन्द्व शुद्धसत्त्व हृदि स्थित ॥ ७

सितदीर्घादिनिशेषकल्पनापरिवर्जित।
जन्मादिभिरसंस्पृष्ट स्वप्नादिपरिवर्जित ॥ ८

सन्ध्या रात्रिरहो भूमिर्र्गगनं वायुरम्बु च।
हुताशनो मनो बुद्धिर्भूतादिस्त्वं तथाच्युत ॥ ९

सर्गस्थितिविनाशानां कर्ता कर्तृपतिर्भवान्।
ब्रह्मविष्णुशिवाख्याभिरात्ममूर्तिभिरीश्वर ॥ १०

देवा दैत्यास्तथा यक्षा राक्षसास्सिद्धपन्नगाः।
कूष्माण्डाश्च पिशाचाश्च गन्धर्वा मनुजास्तथा ॥ ११

पशवश्च मृगाश्चैव पतंगाश्च सरीसृपाः।
वृक्षगुल्मलता बह्व्यः समस्तास्तृणजातयः ॥ १२

स्थूला मध्यास्तथा सूक्ष्मात्सूक्ष्मात्सूक्ष्मतराश्च ये।
देहभेदा भवान् सर्वे ये केचित्पुर्गलाश्रयाः ॥ १३

माया तवेयमज्ञातपरमार्थर्तिमोहिनी।
अनात्मन्यात्मविज्ञानं यया मूढो निरुद्ध्यते ॥ १४


श्रीपराशरजी बोले— पक्षिराज गरुड उस वारुणछत्र, मणिपर्वत और सत्यभामाके सहित श्रीकृष्णचन्द्रको लीलासे-ही लेकर चलने लगे॥ १॥ स्वर्गके द्वारपर पहुँचते ही श्रीहरिने अपना शंख बजाया। उसका शब्द सुनते ही देवगण अर्घ्य लेकर भगवान्‌के सामने उपस्थित हुए॥ २॥ देवताओंसे पूजित होकर श्रीकृष्णचन्द्रजीने देवमाता अदितिके श्वेत मेघशिखरके समान गृहमें जाकर उनका दर्शन किया॥ ३॥ तब श्रीजनार्दनने इन्द्रके साथ देवमाताको प्रणामकर उसके अत्युत्तम कुण्डल दिये और उसे नरक-वधका वृत्तान्त सुनाया॥ ४॥ तदनन्तर जगन्माता अदितिने प्रसन्नतापूर्वक तन्मय होकर जगद्धाता श्रीहरिकी अव्यग्रभावसे स्तुति की॥ ५॥

अदिति बोली— हे कमलनयन! हे भक्तोंको अभय करनेवाले! हे सनातनस्वरूप! हे सर्वात्मन्! हे भूतस्वरूप! हे भूतभावन! आपको नमस्कार है॥ ६॥ हे मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके रचयिता! हे गुणस्वरूप! हे त्रिगुणातीत! हे निर्द्वन्द्व! हे शुद्धसत्त्व! हे अन्तर्यामिन्! आपको नमस्कार है॥ ७॥ हे नाथ! आप श्वेत, दीर्घ आदि सम्पूर्ण कल्पनाओंसे रहित हैं, जन्मादि विकारोंसे पृथक् हैं तथा स्वप्नादि अवस्थात्रयसे परे हैं; आपको नमस्कार है॥ ८॥ हे अच्युत! सन्ध्या, रात्रि, दिन, भूमि, आकाश, वायु, जल, अग्नि, मन, बुद्धि और अहंकार—ये सब आप ही हैं॥ ९॥

हे ईश्वर! आप ब्रह्मा, विष्णु और शिव नामक अपनी मूर्तियोंसे जगत्‌की उत्पत्ति, स्थिति और नाशके कर्ता हैं तथा आप कर्ताओंके भी स्वामी हैं॥ १०॥ देवता, दैत्य, यक्ष, राक्षस, सिद्ध, पन्नग (नाग), कूष्माण्ड, पिशाच, गन्धर्व, मनुष्य, पशु, मृग, पतंग, सरीसृप (साँप), अनेकों वृक्ष, गुल्म और लताएँ, समस्त तृणजातियाँ तथा स्थूल मध्यम सूक्ष्म और सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म जितने देह-भेद पुद्गल (परमाणु)-के आश्रित हैं वे सब आप ही हैं॥ ११—१३॥

हे प्रभो! आपकी माया ही परमार्थतत्त्वके न जाननेवाले पुरुषोंको मोहित करनेवाली है, जिससे मूढ पुरुष अनात्मामें आत्मबुद्धि करके बन्धनमें पड़ जाते हैं॥ १४॥

विष्णु पुराण · पृष्ठ 405, कुल 558 में से · BharatKosha