भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 406

अ० ३०] * पञ्चम अंश * ३९५

अस्वे स्वमिति भावोऽत्र यत्पुंसामुपजायते । अहं ममेति भावो यत्प्रायेणैवाभिजायते । संसारमातुर्मायायास्तवैतन्नाथ चेष्टितम् ॥ १५ यैः स्वधर्मपरैर्नाथ नरैराराधितो भवान् । ते तरन्त्यखिलामेतां मायामात्मविमुक्तये ॥ १६ ब्रह्माद्यास्सकला देवा मनुष्याः पशवस्तथा । विष्णुमायामहावर्त्तमोहान्धतमसावृताः ॥ १७ आराध्य त्वामभीप्सन्ते कामानात्मभवक्षयम् । यदेते पुरुषा माया सैवेयं भगवंस्तव ॥ १८ मया त्वं पुत्रकामिन्या वैरिपक्षजयाय च । आराधितो न मोक्षाय मायाविलसितं हि तत् ॥ १९ कौपीनाच्छादनप्राया वाञ्छा कल्पद्रुमादपि । जायते यदपुण्यानां सोऽपराधः स्वदोषजः ॥ २० तत्प्रसीदाखिलजगन्मायामोहकराव्वय । अज्ञानं ज्ञानसद्भावभूतं भूतेश नाशय ॥ २१ नमस्ते चक्रहस्ताय शार्ङ्गहस्ताय ते नमः । गदाहस्ताय ते विष्णो शङ्खहस्ताय ते नमः ॥ २२ एतत्पश्यामि ते रूपं स्थूलचिह्नोपलक्षितम् । न जानामि परं यत्ते प्रसीद परमेश्वर ॥ २३ श्रीपराशर उवाच अदित्यैवं स्तुतो विष्णुः प्रहस्याह सुरारणिम्* । माता देवि त्वमस्माकं प्रसीद वरदा भव ॥ २४ अदितिरुवाच एवमस्तु तथेच्छा ते त्वमशेषैस्सुरासुरैः । अजेयः पुरुषव्याघ्र मर्त्यलोके भविष्यसि ॥ २५ श्रीपराशर उवाच ततः कृष्णस्य पत्नी च शक्रपत्न्या सहादितिम् । सत्यभामा प्रणम्याह प्रसीदेति पुनः पुनः ॥ २६ अदितिरुवाच मत्प्रसादान्न ते सुभ्रु जरा वैरूप्यमेव वा । भविष्यत्यनवद्याङ्गि सुस्थिरं नवयौवनम् ॥ २७

* दीपयिवीम्

हे नाथ! पुरुषको जो अनात्मामें आत्मबुद्धि और 'मैं-मेरा' आदि भाव प्रायः उत्पन्न होते हैं वह सब आपकी जगज्जननी मायाका ही विलास है॥ १५॥ हे नाथ! जो स्वधर्मपरायण पुरुष आपकी आराधना करते हैं, वे अपने मोक्षके लिये इस सम्पूर्ण मायाको पार कर जाते हैं॥ १६॥ ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण देवगण तथा मनुष्य और पशु आदि सभी विष्णुमायारूप महान् आवर्तमें पड़कर मोहरूप अन्धकारसे आवृत हैं॥ १७॥ हे भगवन्! [जन्म और मरणके चक्रमें पड़े हुए] ये पुरुष जीवके भव-बन्धनको नष्ट करनेवाले आपकी आराधना करके भी जो नाना प्रकारकी कामनाएँ ही माँगते हैं, यह आपकी माया ही है॥ १८॥ मैंने भी पुत्रोंकी जयकामनासे शत्रुपक्षको पराजित करनेके लिये ही आपकी आराधना की है, मोक्षके लिये नहीं। यह भी आपकी मायाका ही विलास है॥ १९॥ पुण्यहीन पुरुषोंको जो कल्पवृक्षसे भी कौपीन और आच्छादन-वस्त्रमात्रकी ही कामना होती है यह उनका कर्म-दोष-जन्य अपराध ही है॥ २०॥

हे अखिलजगन्माया-मोहकारी अव्यय प्रभो! आप प्रसन्न होइये और हे भूतेश्वर! 'मैं ज्ञानवान् हूँ' मेरे इस अज्ञानको नष्ट कीजिये॥ २१॥ हे चक्रपाणे! आपको नमस्कार है, हे शार्ङ्गधर! आपको नमस्कार है; हे गदाधर! आपको नमस्कार है; हे शंखपाणे! हे विष्णो! आपको बारम्बार नमस्कार है॥ २२॥ मैं स्थूल चिह्नोंसे प्रतीत होनेवाले आपके इस रूपको ही देखती हूँ; आपके वास्तविक परस्वरूपको मैं नहीं जानती; हे परमेश्वर! आप प्रसन्न होइये॥ २३॥

**श्रीपराशरजी बोले—**अदितिद्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर भगवान् विष्णु देवमातासे हँसकर बोले—"हे देवि! तुम तो हमारी माता हो; तुम प्रसन्न होकर हमें वरदायिनी होओ"॥ २४॥

**अदिति बोली—**हे पुरुषसिंह! तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो। तुम मर्त्यलोकमें सम्पूर्ण सुरासुरोंसे अजेय होगे॥ २५॥

**श्रीपराशरजी बोले—**तदनन्तर शक्रपत्नी शचीके सहित कृष्णप्रिया सत्यभामाने अदितिको पुनः-पुनः प्रणाम करके कहा—"माता! आप प्रसन्न होइये"॥ २६॥

**अदिति बोली—**हे सुन्दर भृकुटिवाली! मेरी कृपासे तुझे कभी वृद्धावस्था या विरूपता व्याप्त न होगी। हे अनिन्दितांगि! तेरा नवयौवन सदा स्थिर रहेगा॥ २७॥