भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 407

३९६ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० ३०

श्रीपराशर उवाच अदित्या तु कृतानुज्ञो देवराजो जनार्दनम्। यथावत्पूजयामास बहुमानपुरस्सरम्॥ २८ शची च सत्यभामायै पारिजातस्य पुष्पकम्। न ददौ मानुषीं मत्वा स्वयं पुष्पैरलङ्कृता॥ २९ ततो ददर्श कृष्णोऽपि सत्यभामासहायवान्। देवोद्यानानि हृद्यानि नन्दनादीनि सत्तम॥ ३० ददर्श च सुगन्धाढ्यं मञ्जरीपुञ्जधारिणम्। नित्याह्लादकरं ताम्रबालपल्लवशोभितम्॥ ३१ मथ्यमानेऽमृते जातं जातरूपोपमत्वचम्। पारिजातं जगन्नाथः केशवः केशिसूदनः॥ ३२ तुतोष परमप्रीत्या तरुराजमनुत्तमम्। तं दृष्ट्वा प्राह गोविन्दं सत्यभामा द्विजोत्तम। कस्मान्न द्वारकामेष नीयते कृष्ण पादपः॥ ३३ यदि चेत्त्वद्वचः सत्यं त्वमत्यर्थं प्रियेति मे। मद्गेहनिष्कुटार्थाय तदयं नीयतां तरुः॥ ३४ न मे जाम्बवती तादृगभीष्टा न च रुक्मिणी। सत्ये यथा त्वमित्युक्तं त्वया कृष्णासकृत्प्रियम्॥ ३५ सत्यं तद्यदि गोविन्द नोपचारकृतं मम। तदस्तु पारिजातोऽयं मम गेहविभूषणम्॥ ३६ बिभ्रती पारिजातस्य केशपक्षेण मञ्जरीम्। सपत्नीनामहं मध्ये शोभेयमिति कामये॥ ३७

श्रीपराशर उवाच इत्युक्तस्स प्रहस्यैनां पारिजातं गरुत्मति। आरोपयामास हरिस्तमूचुर्वनरक्षिणः॥ ३८ भो शची देवराजस्य महिषी तत्परिग्रहम्। पारिजातं न गोविन्द हर्तुमर्हसि पादपम्॥ ३९ उत्पन्नो देवराजाय दत्तस्सोऽपि ददौ पुनः। महिष्यै सुमहाभाग देव्यै शच्यै कुतूहलात्॥ ४० शचीविभूषणार्थाय देवैरमृतमन्थने। उत्पादितोऽयं न क्षेमी गृहीत्वैनं गमिष्यसि॥ ४१

श्रीपराशरजी बोले— तदनन्तर अदितिकी आज्ञासे देवराजने अत्यन्त आदर-सत्कारके साथ श्रीकृष्णचन्द्रका पूजन किया॥ २८॥ किन्तु कल्पवृक्षके पुष्पोंसे अलंकृता इन्द्राणीने सत्यभामाको मानुषी समझकर वे पुष्प न दिये॥ २९॥ हे साधुश्रेष्ठ! तदनन्तर सत्यभामाके सहित श्रीकृष्णचन्द्रने भी देवताओंके नन्दन आदि मनोहर उद्यानोंको देखा॥ ३०॥ वहाँपर केशिनिषूदन जगन्नाथ श्रीकृष्णने सुगन्धपूर्ण मंजरी-पुंजधारी, नित्याह्लादकारी और ताम्रवर्ण बाल पत्तोंसे सुशोभित, अमृत-मन्थनके समय प्रकट हुआ तथा सुनहरी छालवाला पारिजात-वृक्ष देखा॥ ३१-३२॥

हे द्विजोत्तम! उस अत्युत्तम वृक्षराजको देखकर परम प्रीतिवश सत्यभामा अति प्रसन्न हुई और श्रीगोविन्दसे बोली— “हे कृष्ण! इस वृक्षको द्वारकापुरी क्यों नहीं ले चलते?॥ ३३॥ यदि आपका यह वचन कि 'तुम ही मेरी अत्यन्त प्रिया हो' सत्य है तो मेरे गृहोद्यानमें लगानेके लिये इस वृक्षको ले चलिये॥ ३४॥ हे कृष्ण! आपने कई बार मुझसे यह प्रिय वाक्य कहा है कि 'हे सत्ये! मुझे तू जितनी प्यारी है उतनी न जाम्बवती है और न रुक्मिणी ही'॥ ३५॥ हे गोविन्द! यदि आपका यह कथन सत्य है—केवल मुझे बहलाना ही नहीं है—तो यह पारिजातवृक्ष मेरे गृहका भूषण हो॥ ३६॥ मेरी ऐसी इच्छा है कि मैं अपने केश-कलापोंमें पारिजातपुष्प गूँथकर अपनी अन्य सपत्नियोंमें सुशोभित होऊँ"॥ ३७॥

श्रीपराशरजी बोले— सत्यभामाके इस प्रकार कहनेपर श्रीहरिने हँसते हुए उस पारिजातवृक्षको गरुडपर रख लिया; तब नन्दनवनके रक्षकोंनो कहा—॥ ३८॥ "हे गोविन्द! देवराज इन्द्रकी पत्नी जो महारानी शची हैं यह पारिजातवृक्ष उनकी सम्पत्ति है, आप इसका हरण न कीजिये॥ ३९॥ क्षीर-समुद्रसे उत्पन्न होनेके अनन्तर यह देवराजको दिया गया था; फिर हे महाभाग! देवराजने कुतूहलवश इसे अपनी महिषी शचीदेवीको दे दिया है॥ ४०॥ समुद्र-मन्थनके समय शचीको विभूषित करनेके लिये ही देवताओंने इसे उत्पन्न किया था; इसे लेकर आप कुशलपूर्वक नहीं जा सकेंगे॥ ४१॥