विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३९६ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० ३०
श्रीपराशर उवाच अदित्या तु कृतानुज्ञो देवराजो जनार्दनम्। यथावत्पूजयामास बहुमानपुरस्सरम्॥ २८ शची च सत्यभामायै पारिजातस्य पुष्पकम्। न ददौ मानुषीं मत्वा स्वयं पुष्पैरलङ्कृता॥ २९ ततो ददर्श कृष्णोऽपि सत्यभामासहायवान्। देवोद्यानानि हृद्यानि नन्दनादीनि सत्तम॥ ३० ददर्श च सुगन्धाढ्यं मञ्जरीपुञ्जधारिणम्। नित्याह्लादकरं ताम्रबालपल्लवशोभितम्॥ ३१ मथ्यमानेऽमृते जातं जातरूपोपमत्वचम्। पारिजातं जगन्नाथः केशवः केशिसूदनः॥ ३२ तुतोष परमप्रीत्या तरुराजमनुत्तमम्। तं दृष्ट्वा प्राह गोविन्दं सत्यभामा द्विजोत्तम। कस्मान्न द्वारकामेष नीयते कृष्ण पादपः॥ ३३ यदि चेत्त्वद्वचः सत्यं त्वमत्यर्थं प्रियेति मे। मद्गेहनिष्कुटार्थाय तदयं नीयतां तरुः॥ ३४ न मे जाम्बवती तादृगभीष्टा न च रुक्मिणी। सत्ये यथा त्वमित्युक्तं त्वया कृष्णासकृत्प्रियम्॥ ३५ सत्यं तद्यदि गोविन्द नोपचारकृतं मम। तदस्तु पारिजातोऽयं मम गेहविभूषणम्॥ ३६ बिभ्रती पारिजातस्य केशपक्षेण मञ्जरीम्। सपत्नीनामहं मध्ये शोभेयमिति कामये॥ ३७
श्रीपराशर उवाच इत्युक्तस्स प्रहस्यैनां पारिजातं गरुत्मति। आरोपयामास हरिस्तमूचुर्वनरक्षिणः॥ ३८ भो शची देवराजस्य महिषी तत्परिग्रहम्। पारिजातं न गोविन्द हर्तुमर्हसि पादपम्॥ ३९ उत्पन्नो देवराजाय दत्तस्सोऽपि ददौ पुनः। महिष्यै सुमहाभाग देव्यै शच्यै कुतूहलात्॥ ४० शचीविभूषणार्थाय देवैरमृतमन्थने। उत्पादितोऽयं न क्षेमी गृहीत्वैनं गमिष्यसि॥ ४१
श्रीपराशरजी बोले— तदनन्तर अदितिकी आज्ञासे देवराजने अत्यन्त आदर-सत्कारके साथ श्रीकृष्णचन्द्रका पूजन किया॥ २८॥ किन्तु कल्पवृक्षके पुष्पोंसे अलंकृता इन्द्राणीने सत्यभामाको मानुषी समझकर वे पुष्प न दिये॥ २९॥ हे साधुश्रेष्ठ! तदनन्तर सत्यभामाके सहित श्रीकृष्णचन्द्रने भी देवताओंके नन्दन आदि मनोहर उद्यानोंको देखा॥ ३०॥ वहाँपर केशिनिषूदन जगन्नाथ श्रीकृष्णने सुगन्धपूर्ण मंजरी-पुंजधारी, नित्याह्लादकारी और ताम्रवर्ण बाल पत्तोंसे सुशोभित, अमृत-मन्थनके समय प्रकट हुआ तथा सुनहरी छालवाला पारिजात-वृक्ष देखा॥ ३१-३२॥
हे द्विजोत्तम! उस अत्युत्तम वृक्षराजको देखकर परम प्रीतिवश सत्यभामा अति प्रसन्न हुई और श्रीगोविन्दसे बोली— “हे कृष्ण! इस वृक्षको द्वारकापुरी क्यों नहीं ले चलते?॥ ३३॥ यदि आपका यह वचन कि 'तुम ही मेरी अत्यन्त प्रिया हो' सत्य है तो मेरे गृहोद्यानमें लगानेके लिये इस वृक्षको ले चलिये॥ ३४॥ हे कृष्ण! आपने कई बार मुझसे यह प्रिय वाक्य कहा है कि 'हे सत्ये! मुझे तू जितनी प्यारी है उतनी न जाम्बवती है और न रुक्मिणी ही'॥ ३५॥ हे गोविन्द! यदि आपका यह कथन सत्य है—केवल मुझे बहलाना ही नहीं है—तो यह पारिजातवृक्ष मेरे गृहका भूषण हो॥ ३६॥ मेरी ऐसी इच्छा है कि मैं अपने केश-कलापोंमें पारिजातपुष्प गूँथकर अपनी अन्य सपत्नियोंमें सुशोभित होऊँ"॥ ३७॥
श्रीपराशरजी बोले— सत्यभामाके इस प्रकार कहनेपर श्रीहरिने हँसते हुए उस पारिजातवृक्षको गरुडपर रख लिया; तब नन्दनवनके रक्षकोंनो कहा—॥ ३८॥ "हे गोविन्द! देवराज इन्द्रकी पत्नी जो महारानी शची हैं यह पारिजातवृक्ष उनकी सम्पत्ति है, आप इसका हरण न कीजिये॥ ३९॥ क्षीर-समुद्रसे उत्पन्न होनेके अनन्तर यह देवराजको दिया गया था; फिर हे महाभाग! देवराजने कुतूहलवश इसे अपनी महिषी शचीदेवीको दे दिया है॥ ४०॥ समुद्र-मन्थनके समय शचीको विभूषित करनेके लिये ही देवताओंने इसे उत्पन्न किया था; इसे लेकर आप कुशलपूर्वक नहीं जा सकेंगे॥ ४१॥
अ० ३० ] * पञ्चम अंश * ३९७
देवराजो मुखप्रेक्षी यस्यास्तस्याः परिग्रहम्।
मौढ्यात्प्रार्थयसे क्षेमी गृहीत्वैनं हि को व्रजेत् ॥ ४२
अवश्यमस्य देवेन्द्रो निष्कृतिं कृष्ण यास्यति ।
वज्रोद्यतकरं शक्रमनुयास्यन्ति चामराः ॥ ४३
तदलं सकलैर्देवैर्विरोधेन तवाच्युत।
विपाककटु यत्कर्म तन्न शंसन्ति पण्डिताः ॥ ४४
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्ते तैरूवाचैतान् सत्यभामातिकोपिनी ।
का शची पारिजातस्य को वा शक्रस्सुराधिपः ॥ ४५
सामान्यस्सर्वलोकस्य यद्येषोऽमृतमन्थने ।
समुत्पन्नस्तरुः कस्मादेको गृह्णाति वासवः ॥ ४६
यथा सुरा यथैवेन्दुर्यथा श्रीर्वनरक्षिणः।
सामान्यस्सर्वलोकस्य पारिजातस्तथा द्रुमः ॥ ४७
भर्तृबाहुमहागर्वाद्वृणद्ध्येनमथो शची।
तत्कथ्यतामलं क्षान्त्या सत्या हारयति द्रुमम् ॥ ४८
कथ्यतां च द्रुतं गत्वा पौलोम्या वचनं मम।
सत्यभामा वदत्येतदिति गर्वोद्धताक्षरम् ॥ ४९
यदि त्वं दयिता भर्तुर्यदि वश्यः पतिस्तव।
मद्भर्तुर्हरतो वृक्षं तत्कारय निवारणम् ॥ ५०
जानामि ते पतिं शक्रं जानामि त्रिदशेश्वरम्।
पारिजातं तथाप्येनं मानुषी हारयामि ते ॥ ५१
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्ता रक्षिणो गत्वा शच्याः प्रोचुर्यथोदितम्।
श्रुत्वा चोत्साहयामास शची शक्रं सुराधिपम् ॥ ५२
ततस्समस्तदेवानां सैन्यैः परिवृतो हरिम्।
प्रययौ पारिजातार्थमिन्द्रो योद्धुं द्विजोत्तम ॥ ५३
ततः परिघनिस्त्रिंशगदाशूलवरायुधाः।
बभूवुस्त्रिदशास्सज्जाः शक्रे वज्रकरे स्थिते ॥ ५४
ततो निरीक्ष्य गोविन्दो नागराजोपरिस्थितम्।
शक्रं देवपरीवारं युद्धाय समुपस्थितम् ॥ ५५
चकार शङ्खनिर्घोषं दिशश्शब्देन पूरयन्।
मुमोच शरसङ्घातान्सहस्रायुतशश्शितान् ॥ ५६
देवराज भी जिसका मुँह देखते रहते हैं, उस शचीकी सम्पत्ति इस पारिजातकी इच्छा आप मूढताहीसे करते हैं; इसे लेकर भला कौन सकुशल जा सकता है? ॥ ४२ ॥ हे कृष्ण ! देवराज इन्द्र इस वृक्षका बदला चुकानेके लिये अवश्य ही वज्र लेकर उद्यत होंगे और फिर देवगण भी अवश्य ही उनका अनुगमन करेंगे ॥ ४३ ॥ अतः हे अच्युत ! समस्त देवताओंके साथ रार बढ़ानेसे आपका कोई लाभ नहीं; क्योंकि जिस कर्मका परिणाम कटु होता है, पण्डितजन उसे अच्छा नहीं कहते” ॥ ४४ ॥
श्रीपराशरजी बोले— उद्यान-रक्षकोंके इस प्रकार कहनेपर सत्यभामाने अत्यन्त क्रुद्ध होकर कहा—“शची अथवा देवराज इन्द्र ही इस पारिजातके कौन होते हैं? ॥ ४५ ॥ यदि यह अमृत-मन्थनके समय उत्पन्न हुआ है, तो सबकी समान सम्पत्ति है। अकेला इन्द्र ही इसे कैसे ले सकता है? ॥ ४६ ॥ अरे वनरक्षको ! जिस प्रकार [समुद्रसे उत्पन्न हुए] मदिरा, चन्द्रमा और लक्ष्मीका सब लोग समानतासे भोग करते हैं, उसी प्रकार पारिजातवृक्ष भी सभीकी सम्पत्ति है ॥ ४७ ॥ यदि पतिके बाहुबलसे गर्विता होकर शचीने ही इसपर अपना अधिकार जमा रखा है तो उससे कहना कि सत्यभामा उस वृक्षको हरण कराकर लिये जाती है, तुम्हें क्षमा करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ४८ ॥ अरे मालियो ! तुम तुरन्त जाकर मेरे ये शब्द शचीसे कहो कि सत्यभामा अत्यन्त गर्वपूर्वक कड़े अक्षरोंमें यह कहती है कि यदि तुम अपने पतिको अत्यन्त प्यारी हो और वे तुम्हारे वशीभूत हैं तो मेरे पतिको पारिजात हरण करनेसे रोकें ॥ ४९-५० ॥ मैं तुम्हारे पति शक्रको जानती हूँ और यह भी जानती हूँ कि वे देवताओंके स्वामी हैं तथापि मैं मानवी ही तुम्हारे इस पारिजातवृक्षको लिये जाती हूँ” ॥ ५१ ॥
श्रीपराशरजी बोले— सत्यभामाके इस प्रकार कहनेपर वनरक्षकोंने शचीके पास जाकर उससे सम्पूर्ण वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों कह दिया। यह सब सुनकर शचीने अपने पति देवराज इन्द्रको उत्साहित किया ॥ ५२ ॥ हे द्विजोत्तम ! तब देवराज इन्द्र पारिजातवृक्षको छुड़ानेके लिये सम्पूर्ण देवसेनाके सहित श्रीहरिसे लड़नेके लिये चले ॥ ५३ ॥ जिस समय इन्द्रने अपने हाथमें वज्र लिया उसी समय सम्पूर्ण देवगण परिघ, निस्त्रिंश, गदा और शूल आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो गये ॥ ५४ ॥ तदनन्तर देवसेनासे घिरे हुए ऐरावतारूढ इन्द्रको युद्धके लिये उद्यत देख श्रीगोविन्दने सम्पूर्ण दिशाओंको शब्दायमान करते हुए शंख-ध्वनि की और हजारों-लाखों तीखे बाण छोड़े ॥ ५५-५६ ॥
३९८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३०
| ततो दिशो नभश्चैव दृष्ट्वा शरशतैश्चितम्।<br>मुमुचुस्त्रिदशास्सर्वे ह्यस्त्रशस्त्राण्यनेकशः ॥ ५७ | इस प्रकार सम्पूर्ण दिशाओं और आकाशको सैकड़ों बाणोंसे पूर्ण देख देवताओने अनेकों अस्त्र-शस्त्र छोड़े ॥ ५७ ॥ |
| एकैकमस्त्रं शस्त्रं च देवैर्मुक्तं सहस्रशः ।<br>चिच्छेद लीलयैवेशो जगतां मधुसूदनः ॥ ५८ | त्रिलोकीके स्वामी श्रीमधुसूदनने देवताओंके छोड़े हुए प्रत्येक अस्त्र-शस्त्रके लीलासे ही हजारों टुकड़े कर दिये ॥ ५८ ॥ |
| पाशं सलिलराजस्य समाकृष्योरगाशनः ।<br>चकार खण्डशश्चञ्च्वा बालपन्नगदेहवत् ॥ ५९ | सर्पाहारी गरुडने जलाधिपति वरुणके पाशको खींचकर अपनी चोंचसे सर्पके बच्चेके समान उसके कितने ही टुकड़े कर डाले ॥ ५९ ॥ |
| यमेन प्रहितं दण्डं गदाविक्षेपखण्डितम्।<br>पृथिव्यां पातयामास भगवान् देवकीसूतः ॥ ६० | श्रीदेवकीनन्दनने यमके फेंके हुए दण्डको अपनी गदासे खण्ड-खण्ड कर पृथिवीपर गिरा दिया ॥ ६० ॥ |
| शिबिकां च धनेशस्य चक्रेण तिलशो विभुः ।<br>चकार शौरिरर्कं च दृष्टिदृष्टहतौजसम्॥ ६१ | कुबेरके विमानको भगवान्ने सुदर्शनचक्रद्वारा तिल-तिल कर डाला और सूर्यको अपनी तेजोमय दृष्टिसे देखकर ही निस्तेज कर दिया ॥ ६१ ॥ |
| नीतोऽग्निशीततां बाणैर्द्राविता वसवो दिशः ।<br>चक्रविच्छिन्नशूलाग्रा रुद्रा भुवि निपातिताः ॥ ६२ | भगवान्ने तदनन्तर बाण बरसाकर अग्निको शीतल कर दिया और वसुओंको दिशा-विदिशाओंमें भगा दिया तथा अपने चक्रसे त्रिशूलोंकी नोंक काटकर रुद्रगणको पृथिवीपर गिरा दिया ॥ ६२ ॥ |
| साध्या विश्वेऽथ मरुतो गन्धर्वाश्चैव सायकैः ।<br>शार्ङ्गिणा प्रेरितैरस्ता व्योम्नि शाल्मलितूलवत् ॥ ६३ | भगवान्के चलाये हुए बाणोंसे साध्यगण, विश्वेदेवगण, मरुद्गण और गन्धर्वगण सेमलकी रूईके समान आकाशमें ही लीन हो गये ॥ ६३ ॥ |
| गरुत्मानपि तुण्डेन पक्षाभ्यां च नखाङ्कुरैः ।<br>भक्षयंस्ताडयन् देवान् दारयंश्च चचार वै ॥ ६४ | श्रीभगवान्के साथ गरुडजी भी अपनी चोंच, पंख और पंजोंसे देवताओंको खाते, मारते और फाड़ते फिर रहे थे ॥ ६४ ॥ |
| ततश्शरसहस्रेण देवेन्द्रमधुसूदनौ ।<br>परस्परं ववर्षतु धाराभिरिव तोयदौ ॥ ६५ | फिर जिस प्रकार दो मेघ जलकी धाराएँ बरसाते हों उसी प्रकार देवराज इन्द्र और श्रीमधुसूदन एक-दूसरेपर बाण बरसाने लगे ॥ ६५ ॥ |
| ऐरावतेन गरुडो युयुधे तत्र संकुले ।<br>देवैस्समस्तैर्युयुधे शक्रेण च जनार्दनः ॥ ६६ | उस युद्धमें गरुडजी ऐरावतके साथ और श्रीकृष्णचन्द्र इन्द्र तथा सम्पूर्ण देवताओंके साथ लड़ रहे थे ॥ ६६ ॥ |
| भिन्नेष्वशेषबाणेषु शस्त्रेष्वस्त्रेषु च त्वरन्।<br>जग्राह वासवो वज्रं कृष्णश्चक्रं सुदर्शनम् ॥ ६७ | सम्पूर्ण बाणोंके चूक जाने और अस्त्र-शस्त्रोंके कट जानेपर इन्द्रने शीघ्रतासे वज्र और कृष्णने सुदर्शनचक्र हाथमें लिया ॥ ६७ ॥ |
| ततो हाहाकृतं सर्वं त्रैलोक्यं द्विजसत्तम ।<br>वज्रचक्रकरौ दृष्ट्वा देवराजजनार्दनौ ॥ ६८ | हे द्विजश्रेष्ठ! उस समय सम्पूर्ण त्रिलोकीमें इन्द्र और कृष्णचन्द्रको क्रमशः वज्र और चक्र लिये हुए देखकर हाहाकार मच गया ॥ ६८ ॥ |
| क्षिप्तं वज्रमथेन्द्रेण जग्राह भगवान्हरिः ।<br>न मुमोच तदा चक्रं शक्रं तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ६९ | श्रीहरिने इन्द्रके छोड़े हुए वज्रको अपने हाथोंसे पकड़ लिया और स्वयं चक्र न छोड़कर इन्द्रसे कहा—"अरे, ठहर!" ॥ ६९ ॥ |
| प्रणष्टवज्रं देवेन्द्रं गरुडक्षतवाहनम्।<br>सत्यभामाब्रवीद्वीरं पलायनपरायणम्॥ ७० | इस प्रकार वज्र छिन जाने और अपने वाहन ऐरावतके गरुडद्वारा क्षत-विक्षत हो जानेके कारण भागते हुए वीर इन्द्रसे सत्यभामाने कहा— ॥ ७० ॥ |
| त्रैलोक्येश न ते युक्तं शचीभर्तुः पलायनम्।<br>पारिजातस्रगाभोगा त्वामुपस्थास्यते शची ॥ ७१ | "हे त्रैलोक्येश्वर! तुम शचीके पति हो, तुम्हें इस प्रकार युद्धमें पीठ दिखलाना उचित नहीं है। तुम भागो मत, पारिजात-पुष्पोंकी मालासे विभूषिता होकर शची शीघ्र ही तुम्हारे पास आवेगी ॥ ७१ ॥ |
अ० ३० ]
- पञ्चम अंश *
३९९
कीदृशं देवराज्यं ते पारिजातस्वगुञ्ज्वलाम् । अपश्यतो यथापूर्वं प्रणयाभ्यागतां शचीम् ॥ ७२ अलं शक्र प्रयासेन न व्रीडां गन्तुमर्हसि । नीयतां पारिजातोऽयं देवाससन्तु गतव्यथाः ॥ ७३ पतिगर्विवलेपेन बहुमानपुरस्सरम् । न ददर्श गृहं यातामुपचारेण मां शची ॥ ७४ स्त्रीत्वादगुरुचित्ताहं स्वभर्तृश्लाघनापरा । ततः कृतवती शक्र भवता सह विग्रहम् ॥ ७५ तदलं पारिजातेन परस्वेन हूतेन मे । रूपेण गर्विता सा तु भर्त्रा का स्त्री न गर्विता ॥ ७६
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्तो वै निववृते देवराजस्तथा द्विज । प्राह चैनामलं चण्डि सख्युः खेदोक्तिविस्तैरः ॥ ७७ न चापि सर्गसंहारस्थितिकर्ताखिलस्य यः । जितस्य तेन मे व्रीडा जायते विश्वरूपिणा ॥ ७८ यस्माज्जगत्सकलमेतदनादिमध्या- द्यस्मिन्मृतश्च न भविष्यति सर्वभूतात् । तेनोद्भवप्रलयपालनकारणेन व्रीडा कथं भवति देवि निराकृतस्य ॥ ७९ सकलभुवनसूतिर्मूर्तिरल्पाल्यसूक्ष्मा विदितसकलवेदैर्ज्ञायते यस्य नान्यैः । तमजमकृतमीशं शाश्वतं स्वेच्छयैन जगदुपकृतिमर्त्य को विजेतुं समर्थः ॥ ८०
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमोऽशो त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
अब प्रेमवश अपने पास आयी हुई शचीको पहलेकी भाँति पारिजात-पुष्पकी मालासे अलंकृत न देखकर तुम्हें देवराजत्वका क्या सुख होगा ? ॥ ७२ ॥ हे शक्र ! अब तुम्हें अधिक प्रयास करनेकी आवश्यकता नहीं है, तुम संकोच मत करो; इस पारिजात-वृक्षको ले जाओ। इसे पाकर देवगण सन्तापरहित हों ॥ ७३ ॥ अपने पतिके बाहुबलसे अत्यन्त गर्विता शचीने अपने घर जानेपर भी मुझे कुछ अधिक सम्मानकी दृष्टिसे नहीं देखा था ॥ ७४ ॥ स्त्री होनेसे मेरा चित्त भी अधिक गम्भीर नहीं है, इसलिये मैंने भी अपने पतिका गौरव प्रकट करनेके लिये ही तुमसे यह लड़ाई ठानी थी ॥ ७५ ॥ मुझे दूसरेकी सम्पत्ति इस पारिजातको ले जानेकी क्या आवश्यकता है ? शची अपने रूप और पतिके कारण गर्विता है तो ऐसी कौन-सी स्त्री है जो इस प्रकार गर्वाली न हो ?" ॥ ७६ ॥
श्रीपराशरजी बोले—हे द्विज ! सत्यभामाके इस प्रकार कहनेपर देवराज लौट आये और बोले—"हे क्रोधिते ! मैं तुम्हारा सुहृद् हूँ, अतः मेरे लिये ऐसी वैमनस्य बढानेवाली उक्तियोंके विस्तार करनेका कोई प्रयोजन नहीं है ? ॥ ७७ ॥ जो सम्पूर्ण जगत्को उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाले हैं, उन विश्वरूप प्रभुसे पराजित होनेमें भी मुझे कोई संकोच नहीं है ॥ ७८ ॥ जिस आदि और मध्यरहित प्रभुसे यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है, जिसमें यह स्थित है और फिर जिसमें लीन होकर अन्तमें यह न रहेगा; हे देवि ! जगत्की उत्पत्ति, प्रलय और पालनके कारण उस परमात्मासे ही परास्त होनेमें मुझे कैसे लज्जा हो सकती है ? ॥ ७९ ॥ जिसकी अत्यन्त अल्प और सूक्ष्म मूर्तिको, जो सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न करनेवाली है, सम्पूर्ण वेदोंको जाननेवाले अन्य पुरुष भी नहीं जान पाते तथा जिसने जगत्के उपकारके लिये अपनी इच्छासे ही मनुष्यरूप धारण किया है उस अजन्मा, अकर्ता और नित्य ईश्वरको जीतनेमें कौन समर्थ है ?" ॥ ८० ॥
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४००
* श्रीविष्णुपुराण *
[ अ० ३१
इकतीसवाँ अध्याय
भगवान्का द्वारकापुरीमें लौटना और सोलह हजार एक सौ कन्याओंसे विवाह करना
श्रीपराशर उवाच
संस्तुतो भगवानित्थं देवराजेन केशवः।
प्रहस्य भावगम्भीरमुवाचेन्द्रं द्विजोत्तम॥ १
श्रीपराशरजी बोले— हे द्विजोत्तम! इन्द्रने जब इस प्रकार स्तुति की तो भगवान् कृष्णचन्द्र गम्भीर-भावसे हँसते हुए इस प्रकार बोले—॥ १॥
श्रीकृष्ण उवाच
देवराजो भवानिन्द्रो वयं मर्त्या जगत्पते।
क्षन्तव्यं भवतैवेदमपराधं कृतं मम॥ २
पारिजाततरुश्चायं नीयतामुचितास्पदम्।
गृहीतोऽयं मया शक्र सत्यावचनकारणात्॥ ३
वज्रं चेदं गृहाण त्वं यदत्र प्रहितं त्वया।
तवैवैतत्प्रहरणं शक्र वैरिविदारणम्॥ ४
श्रीकृष्णजी बोले— हे जगत्पते! आप देवराज इन्द्र हैं और हम मरणधर्मा मनुष्य हैं। हमने आपका जो अपराध किया है उसे आप क्षमा करें॥ २॥ मैंने जो यह पारिजातवृक्ष लिया था इसे इसके योग्य स्थान (नन्दनवन)-को ले जाइये। हे शक्र! मैंने तो इसे सत्यभामाके कहनेसे ही ले लिया था॥ ३॥ और आपने जो वज्र फेंका था उसे भी ले लीजिये; क्योंकि हे शक्र! यह शत्रुओंको नष्ट करनेवाला शस्त्र आपकाही है॥ ४॥
इन्द्र उवाच
विमोहयसि मामीश मर्त्योऽहमिति किं वदन्।
जानीमस्त्वं भगवतो न तु सूक्ष्मविदो वयम्॥ ५
योऽसि सोऽसि जगत्त्राणप्रवृत्तो नाथ संस्थितः।
जगतश्शल्यनिष्कर्षं करोष्यसुरसूदन॥ ६
नीयतां पारिजातोऽयं कृष्ण द्वारवतीं पुरीम्।
मर्त्यलोके त्वया त्यक्ते नायं संस्थास्यते भुवि॥ ७
देवदेव जगन्नाथ कृष्ण विष्णो महाभुज।
शङ्खचक्रगदापाणे क्षमस्वैतद्व्यतिक्रमम्॥ ८
इन्द्र बोले— हे ईश! 'मैं मनुष्य हूँ' ऐसा कहकर मुझे क्यों मोहित करते हैं? हे भगवन्! मैं तो आपके इस सगुणस्वरूपको ही जानता हूँ, हम आपके सूक्ष्म-स्वरूपको जाननेवाले नहीं हैं॥ ५॥ हे नाथ! आप जो हैं वही हैं, [हम तो इतना ही जानते हैं कि] हे दैत्यदलन! आप लोकरक्षामें तत्पर हैं और इस संसारके काँटोंको निकाल रहे हैं॥ ६॥ हे कृष्ण! इस पारिजात-वृक्षको आप द्वारकापुरी ले जाइये, जिस समय आप मर्त्यलोक छोड़ देंगे, उस समय वह भूर्लोकमें नहीं रहेगा॥ ७॥ हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे कृष्ण! हे विष्णो! हे महाबाहो! हे शंखचक्रगदापाणे! मेरी इस धृष्टताको क्षमा कीजिये॥ ८॥
श्रीपराशर उवाच
तथेत्युक्त्वा च देवेन्द्रमाजगाम भुवं हरिः।
प्रसक्तैः सिद्धगन्धर्वैः स्तूयमानः सुर्षिभिः॥ ९
ततश्शङ्खमुपाध्माय द्वारकोपरि संस्थितः।
हर्षमुत्पादयामास द्वारकावासिनां द्विज॥ १०
अवतीर्याथ गरुडात्सत्यभामासहायवान्।
निष्कूटे स्थापयामास पारिजातं महातरुम्॥ ११
यमभ्येत्य जनस्सर्वो जातिं स्मरति पौर्विकीम्।
वास्यते यस्य पुष्योत्थगन्धेनोर्वी त्रियोजनम्॥ १२
श्रीपराशरजी बोले— तदनन्तर श्रीहरि देवराजसे 'तुम्हारी जैसी इच्छा है वैसा ही सही' ऐसा कहकर सिद्ध, गन्धर्व और देवर्षिगणसे स्तुत हो भूर्लोकमें चले आये॥ ९॥ हे द्विज! द्वारकापुरीके ऊपर पहुँचकर श्रीकृष्णचन्द्रने [अपने आनेकी सूचना देते हुए] शंख बजाकर द्वारकावासियोंको आनन्दित किया॥ १०॥ तदनन्तर सत्यभामाके सहित गरुडसे उतरकर उस पारिजात-महावृक्षको [सत्यभामाके] गृहोद्यानमें लगा दिया॥ ११॥ जिसके पास आकर सब मनुष्योंको अपने पूर्वजन्मका स्मरण हो आता है और जिसके पुष्पोंसे निकली हुई गन्धसे तीन योजनतक पृथिवी सुगन्धित रहती है॥ १२॥
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अ० ३२] * पञ्चम अंश * ४०१
ततस्ते यादवास्सर्वे देहबन्धानमानुषान्।
ददृशुः पादपे तस्मिन् कुर्वन्तो मुखदर्शनम्॥ १३
किंकरैस्समुपानीतं हस्त्यश्वादि ततो धनम्।
विभज्य प्रददौ कृष्णो बान्धवानां महामतिः॥ १४
कन्याश्च कृष्णो जग्राह नरकस्य परिग्रहान्॥ १५
ततः काले शुभे प्राप्ते उपयेमे जनार्दनः।
ताः कन्या नरकेणासन्सर्वतो यास्समाहृताः॥ १६
एकस्मिन्नेव गोविन्दः काले तासां महामुने।
जग्राह विधिवत्पाणीन्पृथग्गेहेषु धर्मतः॥ १७
षोडशस्त्रीसहस्राणि शतमेकं ततोऽधिकम्।
तावन्ति चक्रे रूपाणि भगवान् मधुसूदनः॥ १८
एकैकमेव ताः कन्या मेनिरे मधुसूदनः।
ममैव पाणिग्रहणं मैत्रेय कृतवानिति॥ १९
निशासु च जगत्स्रष्टा तासां गेहेषु केशवः।
उवास विप्र सर्वासां विश्वरूपधरो हरिः॥ २०
यादवोंने उस वृक्षके पास जाकर अपना मुख देखा तो उन्हें अपना शरीर अमानुष दिखलायी दिया॥ १३॥
तदनन्तर महामति श्रीकृष्णचन्द्रने नरकासुरके सेवकोंद्वारा लाये हुए हाथी-घोड़े आदि धनको अपने बन्धु-बान्धवोंमें बाँट दिया और नरकासुरकी वरण की हुई कन्याओंको स्वयं ले लिया॥ १४-१५॥
शुभ समय प्राप्त होनेपर श्रीजनार्दनने उन समस्त कन्याओंके साथ, जिन्हें नरकासुर बलात् हर लाया था, विवाह किया॥ १६॥
हे महामुने! श्रीगोविन्दने एक ही समय पृथक्-पृथक् भवनोंमें उन सबके साथ विधिवत् धर्मपूर्वक पाणिग्रहण किया॥ १७॥
वे सोलह हजार एक सौ स्त्रियाँ थीं; उन सबके साथ पाणिग्रहण करते समय श्रीमघुसूदने इतने ही रूप बना लिये॥ १८॥
हे मैत्रेय! परंतु उस समय प्रत्येक कन्या 'भगवान्ने मेरा ही पाणिग्रहण किया है' इस प्रकार उन्हें एक ही समझ रही थी॥ १९॥
हे विप्र! जगत्स्रष्टा विश्वरूपधारी श्रीहरि रात्रिके समय उन सभीके घरोंमें रहते थे॥ २०॥
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे एकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥
बत्तीसवाँ अध्याय
उषा-चरित्र
श्रीपराशर उवाच
प्रद्युम्नाद्या हरेः पुत्रा रुक्मिण्यां कथितास्तव।
भानुर्भौमेरिकाद्यांश्च सत्यभामा व्यजायत॥ १
दीप्तिमत्ताम्रपक्षाद्या रोहिण्यां तनया हरेः।
बभूवुर्जाम्बवत्यां च साम्बाद्या बलशालिनः॥ २
तनया भद्रविन्दाद्या नाग्नजित्यां महाबलाः।
सङ्ग्रामजित्प्रधानास्तु शैव्यायां च हरेस्सुताः॥ ३
वृकाद्याश्च सुता माद्र्यां गात्रवत्प्रमुखांस्तुतान्।
अवाप लक्ष्मणा पुत्रान्कालिन्द्याश्च श्रुतादयः॥ ४
अन्यासां चैव भार्याणां समुत्पन्नानि चक्रिणः।
अष्टायुतानि पुत्राणां सहस्राणि शतं तथा॥ ५
श्रीपराशरजी बोले— रुक्मिणीके गर्भसे उत्पन्न हुए भगवान्के प्रद्युम्न आदि पुत्रोंका वर्णन हम पहले ही कर चुके हैं; सत्यभामाने भानु और भौमेरिक आदिको जन्म दिया॥ १॥
श्रीहरिके रोहिणीके गर्भसे दीप्तिमान् और ताम्रपक्ष आदि तथा जाम्बवतीसे बलशाली साम्ब आदि पुत्र हुए॥ २॥
नाग्नजिती (सत्या)-से महाबली भद्रविन्द आदि और शैव्या (मित्रविन्दा)-से संग्रामजित् आदि उत्पन्न हुए॥ ३॥
माद्रीसे वृक आदि, लक्ष्मणासे गात्रवान् आदि तथा कालिन्दीसे श्रुत आदि पुत्रोंका जन्म हुआ॥ ४॥
इसी प्रकार भगवान्की अन्य स्त्रियोंके भी आठ अयुत आठ हजार आठ सौ (अट्ठासी हजार आठ सौ) पुत्र हुए॥ ५॥
४०२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३२
| प्रद्युम्नः प्रथमस्तेषां सर्वेषां रुक्मिणीसुतः ।<br>प्रद्युम्नादनिरुद्धोऽभूद्वज्रस्तस्मादजायत ॥ ६<br>अनिरुद्धो रणेऽरुद्धो बलेः पौत्रीं महाबलः ।<br>उषां बाणस्य तनयामुपयेमे द्विजोत्तम ॥ ७<br>यत्र युद्धमभूद्घोरं हरिशङ्करयोर्महत् ।<br>छिन्नं सहस्रं बाहूनां यत्र बाणस्य चक्रिणा ॥ ८ | इन सब पुत्रोंमें रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न सबसे बड़े थे; प्रद्युम्नसे अनिरुद्धका जन्म हुआ और अनिरुद्धसे वज्र उत्पन्न हुआ ॥ ६ ॥ हे द्विजोत्तम ! महाबली अनिरुद्ध युद्धमें किसीसे रोके नहीं जा सकते थे। उन्होंने बलिकी पौत्री एवं बाणासुरकी पुत्री उषासे विवाह किया था ॥ ७ ॥ उस विवाहमें श्रीहरि और भगवान् शंकरका घोर युद्ध हुआ था और श्रीकृष्णचन्द्रने बाणासुरकी सहस्र भुजाएँ काट डाली थीं ॥ ८ ॥ |
| श्रीमैत्रेय उवाच<br>कथं युद्धमभूद्ब्रह्मन्नुषार्थे हरकृष्णयोः ।<br>कथं क्षयं च बाणस्य बाहूनां कृतवान्हरिः ॥ ९<br>एतत्सर्वं महाभाग ममाख्यातुं त्वमर्हसि ।<br>महत्कौतूहलं जातं कथां श्रोतुमिमां हरेः ॥ १० | **श्रीमैत्रेयजी बोले—**हे ब्रह्मन् ! उषाके लिये श्रीमहादेव और कृष्णका युद्ध क्यों हुआ और श्रीहरिने बाणासुरकी भुजाएँ क्यों काट डालीं ? ॥ ९ ॥ हे महाभाग ! आप मुझसे यह सम्पूर्ण वृत्तान्त कहिये; मुझे श्रीहरिकी यह कथा सुननेका बड़ा कौतूहल हो रहा है ॥ १० ॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>उषा बाणसुता विप्र पार्वतीं सह शम्भुना ।<br>क्रीडन्तीमुपलक्ष्योच्चैः स्पृहां चक्रे तदाश्रयाम् ॥ ११<br>ततस्सकलचित्तज्ञा गौरी तामाह भामिनीम् ।<br>अलमत्यर्थतापेन भर्त्रा त्वमपि रंस्यसे ॥ १२<br>इत्युक्ता सा तया चक्रे कदेति मतिमात्मनः ।<br>को वा भर्ता ममेत्याह पुनस्तामाह पार्वती ॥ १३ | **श्रीपराशरजी बोले—**हे विप्र ! एक बार बाणासुरकी पुत्री उषाने श्रीशंकरके साथ पार्वतीजीको क्रीडा करती देख स्वयं भी अपने पतिके साथ रमण करनेकी इच्छा की ॥ ११ ॥ तब सर्वान्तर्यामिनी श्रीपार्वतीजीने उस सुकुमारीसे कहा—'तू अधिक सन्तप्त मत हो, यथासमय तू भी अपने पतिके साथ रमण करेगी' ॥ १२ ॥ पार्वतीजीके ऐसा कहनेपर उषाने मन-ही-मन यह सोचकर कि 'न जाने ऐसा कब होगा ? और मेरा पति भी कौन होगा ?' [इस सम्बन्धमें] पार्वतीजीसे पूछा, तब पार्वतीजीने उससे फिर कहा— ॥ १३ ॥ |
| पार्वत्युवाच<br>वैशाखशुक्लद्वादश्यां स्वप्ने योऽभिभवं तव ।<br>करिष्यति स ते भर्ता राजपुत्रि भविष्यति ॥ १४ | **पार्वतीजी बोलीं—**हे राजपुत्रि ! वैशाख शुक्ला द्वादशीकी रात्रिको जो पुरुष स्वप्नमें तुझसे हठात् सम्भोग करेगा वही तेरा पति होगा ॥ १४ ॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>तस्यां तिथावुषास्वप्ने यथा देव्या समीरितम् ।<br>तथैवाभिभवं चक्रे कश्चिद्रागं च तत्र सा ॥ १५<br>ततः प्रबुद्धा पुरुषमपश्यन्ती समुत्सुका ।<br>क्व गतोऽसीति निर्लज्जा मैत्रेयोक्तवती सखीम् ॥ १६<br>बाणस्य मन्त्री कुम्भाण्डश्चित्रलेखा च तत्सुता ।<br>तस्याः सख्यभवत्सा च प्राह कोऽयं त्वयोच्यते ॥ १७<br>यदा लज्जाकुला नास्यै कथयामास सा सखी ।<br>तदा विश्वासमानीय सर्वमेवाभ्यवादयत् ॥ १८ | **श्रीपराशरजी बोले—**तदनन्तर उसी तिथिको उषाकी स्वप्नावस्थामें किसी पुरुषने उससे, जैसा श्रीपार्वतीदेवीने कहा था, उसी प्रकार सम्भोग किया और उसका भी उसमें अनुराग हो गया ॥ १५ ॥ हे मैत्रेय ! तब उसके बाद स्वप्नसे जगनेपर जब उसने उस पुरुषको न देखा तो वह उसे देखनेके लिये अत्यन्त उत्सुक होकर अपनी सखीकी ओर लक्ष्य करके निर्लज्जतापूर्वक कहने लगी—"हे नाथ ! आप कहाँ चले गये ?" ॥ १६ ॥<br>बाणासुरका मन्त्री कुम्भाण्ड था; उसकी चित्रलेखा नामकी पुत्री थी, वह उषाकी सखी थी, [उषाका यह प्रलाप सुनकर] उसने पूछा—"यह तुम किसके विषयमें कह रही हो ?" ॥ १७ ॥ किन्तु जब लज्जावश उषाने उसे कुछ भी न बतलाया तब चित्रलेखाने [सब बात गुप्त रखनेका] विश्वास दिलाकर उषासे सब वृत्तान्त कहला लिया ॥ १८ ॥ |
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अ० ३२ ] * पञ्चम अंश * ४०३
विदितार्था तु तामाह पुनश्चोषा यथोदितम्। देव्या तथैव तत्प्राप्तौ यो ह्युपायः कुरुष्व तम्॥ १९
चित्रलेखोवाच दुर्विज्ञेयमिदं वक्तुं प्राप्तुं वापि न शक्यते। तथापि किञ्चित्कर्तव्यमुपकारं प्रिये तव ॥ २० सप्ताष्टदिनपर्यन्तं तावत्कालः प्रतीक्ष्यताम्। इत्युक्त्वाभ्यन्तरं गत्वा उपायं तमथाकरोत्॥ २१
श्रीपराशर उवाच ततः पटे सुरान्दैत्यानान्धर्वांश्च प्रधानतः। मनुष्यांश्च विलिख्यास्यै चित्रलेखा व्यदर्शयत्॥ २२ अपास्य सा तु गन्धर्वांस्तथोरगसुरासुरान्। मनुष्येषु ददौ दृष्टिं तेष्वप्यन्धकवृष्णिषु॥ २३ कृष्णरामौ विलोक्यासीत्सुभ्रूल्लज्जाजडेव सा। प्रद्युम्नदर्शने व्रीडादृष्टिं निन्येऽन्यतो द्विज ॥ २४ दृष्टमात्रे ततः कान्ते प्रद्युम्नतनये द्विज। दृष्ट्वात्यर्थविलासिन्या लज्जा क्वापि निराकृता ॥ २५ सोऽयं सोऽयमितीत्युक्ते तया सा योगगामिनी। चित्रलेखाब्रवीदेनामुषां बाणसुतां तदा॥ २६
चित्रलेखोवाच अयं कृष्णस्य पौत्रस्ते भर्ता देव्या प्रसादितः। अनिरुद्ध इति ख्यातः प्रख्यातः प्रियदर्शनः॥ २७ प्राप्नोषि यदि भर्तारमिमं प्राप्तं त्वयाखिलम्। दुष्प्रवेशा पुरी पूर्वं द्वारका कृष्णपालिता ॥ २८ तथापि यत्नाद्भर्तारमानयिष्यामि ते सखि। रहस्यमेतद्वक्तव्यं न कस्यचिदपि त्वया॥ २९ अचिरादागमिष्यामि सहस्व विरहं मम। ययौ द्वारवतीं चोषां समाश्वास्य ततः सखीम्॥ ३०
चित्रलेखाके सब बात जान लेनेपर उषाने जो कुछ श्रीपार्वतीजीने कहा था, वह भी उसे सुना दिया और कहा कि अब जिस प्रकार उसका पुनः समागम हो वही उपाय करो ॥ १९ ॥
चित्रलेखाने कहा—हे प्रिये! तुमने जिस पुरुषको देखा है उसे तो जानना भी बहुत कठिन है फिर उसे बतलाना या पाना कैसे हो सकता है? तथापि मैं तुम्हारा कुछ-न-कुछ उपकार तो करूँगी ही ॥ २० ॥ तुम सात या आठ दिनतक मेरी प्रतीक्षा करना—ऐसा कहकर वह अपने घरके भीतर गयी और उस पुरुषको ढूँढनेका उपाय करने लगी ॥ २१ ॥
श्रीपराशरजी बोले—तदनन्तर [सात-आठ दिन पश्चात् लौटकर] चित्रलेखाने चित्रपटपर मुख्य-मुख्य देवता, दैत्य, गन्धर्व और मनुष्योंके चित्र लिखकर उषाको दिखलाये ॥ २२ ॥ तब उषाने गन्धर्व, नाग, देवता और दैत्य आदिको छोड़कर केवल मनुष्योंपर और उनमें भी विशेषतः अन्धक और वृष्णिवंशी यादवोंपर ही दृष्टि दी ॥ २३ ॥ हे द्विज! राम और कृष्णके चित्र देखकर वह सुन्दर भृकुटिवाली लज्जासे जडवत् हो गयी तथा प्रद्युम्नको देखकर उसने लज्जावश अपनी दृष्टि हटा ली ॥ २४ ॥ तत्पश्चात् प्रद्युम्नतनय प्रियतम अनिरुद्धजीको देखते ही उस अत्यन्त विलासिनीकी लज्जा मानो कहीं चली गयी ॥ २५ ॥ [वह बोल उठी]—'वह यही है, वह यही है।' उसके इस प्रकार कहनेपर योगगामिनी चित्रलेखाने उस बाणासुरकी कन्यासे कहा—॥ २६ ॥
चित्रलेखा बोली—देवीने प्रसन्न होकर यह कृष्णका पौत्र ही तेरा पति निश्चित किया है; इसका नाम अनिरुद्ध है और यह अपनी सुन्दरताके लिये प्रसिद्ध है ॥ २७ ॥ यदि तुझको यह पति मिल गया तब तो तूने मानो सभी कुछ पा लिया; किन्तु कृष्णचन्द्रद्वारा सुरक्षित द्वारकापुरीमें पहले प्रवेश ही करना कठिन है ॥ २८ ॥ तथापि हे सखि! किसी उपायसे मैं तेरे पतिको लाऊँगी ही, तू इस गुप्त रहस्यको किसीसे भी न कहना ॥ २९ ॥ मैं शीघ्र ही आऊँगी, इतनी देर तू मेरे वियोगको सहन कर। अपनी सखी उषाको इस प्रकार ढाढस बँधाकर चित्रलेखा द्वारकापुरीको गयी ॥ ३० ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
| ४०४ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ३३ |
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तैंतीसवाँ अध्याय
श्रीकृष्ण और बाणासुरका युद्ध
श्रीपराशर उवाच
बाणोऽपि प्रणिपत्याग्रे मैत्रेयाह त्रिलोचनम्।
देव बाहुसहस्रेण निर्विण्णोऽस्म्याहवं विना॥ १
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! एक बार बाणासुरने भी भगवान् त्रिलोचनको प्रणाम करके कहा था कि हे देव! बिना युद्धके इन हजार भुजाओंसे मुझे बड़ा ही खेद हो रहा है॥ १॥
कच्चिन्ममैषां बाहूनां साफल्यजनको रणः।
भविष्यति विना युद्धं भाराय मम किं भुजैः॥ २
क्या कभी मेरी इन भुजाओंको सफल करनेवाला युद्ध होगा? भला बिना युद्धके इन भाररूप भुजाओंसे मुझे लाभ ही क्या है?॥ २॥
श्रीशंकर उवाच
मयूरध्वजभङ्गस्ते यदा बाण भविष्यति।
पिशिताशिजनानन्दं प्राप्स्यसे त्वं तदा रणम्॥ ३
श्रीशंकरजी बोले— हे बाणासुर! जिस समय तेरी मयूरचिह्नवाली ध्वजा टूट जायगी, उसी समय तेरे सामने मांसभोजी यक्ष-पिशाचादिको आनन्द देनेवाला युद्ध उपस्थित होगा॥ ३॥
श्रीपराशर उवाच
ततः प्रणम्य वरदं शम्भुमभ्यागतो गृहम्।
सभग्नं ध्वजमालोक्य हृष्टो हर्षं पुनर्ययौ॥ ४
श्रीपराशरजी बोले— तदनन्तर, वरदायक श्रीशंकरको प्रणामकर बाणासुर अपने घर आया और फिर कालान्तरमें उस ध्वजाको टूटी देखकर अति आनन्दित हुआ॥ ४॥
एतस्मिन्नेव काले तु योगविद्याबलेन तम्।
अनिरुद्धमथानिन्ये चित्रलेखा वराप्सराः॥ ५
इसी समय अप्सराश्रेष्ठ चित्रलेखा अपने योगबलसे अनिरुद्धको वहाँ ले आयी॥ ५॥
कन्यान्तःपुरमभ्येत्य रममाणं सहोषया।
विज्ञाय रक्षिणो गत्वा शशंसुर्दैत्यभूपतेः॥ ६
अनिरुद्धको कन्यान्तःपुरमें आकर उषाके साथ रमण करता जान अन्तःपुररक्षकोंने सम्पूर्ण वृत्तान्त दैत्यराज बाणासुरसे कह दिया॥ ६॥
व्यादिष्टं किंकराणां तु सैन्यं तेन महात्मना।
जघान परिघं घोरमादाय परवीरहा॥ ७
तब महावीर बाणासुरने अपने सेवकोंको उससे युद्ध करनेकी आज्ञा दी; किंतु शत्रु-दमन अनिरुद्धने अपने सम्मुख आनेपर उस सम्पूर्ण सेनाको एक लोहमय दण्डसे मार डाला॥ ७॥
हतेषु तेषु बाणोऽपि रथस्थस्तद्वधोद्यतः।
युध्यमानो यथाशक्ति यदुवीरेण निर्जितः॥ ८
अपने सेवकोंके मारे जानेपर बाणासुर अनिरुद्धको मार डालनेकी इच्छासे रथपर चढ़कर उनके साथ युद्ध करने लगा; किंतु अपनी शक्तिभर युद्ध करनेपर भी वह यदुवीर अनिरुद्धजीसे परास्त हो गया॥ ८॥
मायया युयुधे तेन स तदा मन्त्रिचोदितः।
ततस्तं पन्नगास्त्रेण बबन्ध यदुनन्दनम्॥ ९
तब वह मन्त्रियोंकी प्रेरणासे मायापूर्वक युद्ध करने लगा और यदुनन्दन अनिरुद्धको नागपाशसे बाँध लिया॥ ९॥
द्वारवत्यां क्व यातोऽसावनिरुद्धेति जल्पताम्।
यदूनामाचचक्षे तं बद्धं बाणेन नारदः॥ १०
इधर द्वारकापुरीमें जिस समय समस्त यादवोंमें यह चर्चा हो रही थी कि ‘अनिरुद्ध कहाँ गये?’ उसी समय देवर्षि नारदने उनके बाणासुरद्वारा बाँधे जानेकी सूचना दी॥ १०॥
तं शोणितपुरं नीतं श्रुत्वा विद्याविदग्धया।
योषिता प्रत्ययं जग्मुर्यादवा नामरैरिति॥ ११
नारदजीके मुखसे योगविद्यामें निपुण युवती चित्रलेखाद्वारा उन्हें शोणितपुर ले जाये गये सुनकर यादवोंको विश्वास हो गया कि देवताओंने उन्हें नहीं चुराया*॥ ११॥
ततो गरुडमारुह्य स्मृतमात्रागतं हरिः।
बलप्रद्युम्नसहितो बाणस्य प्रययौ पुरम्॥ १२
तब स्मरणमात्रसे उपस्थित हुए गरुडपर
* अबतक यादवगण यही सोच रहे थे कि पारिजात हरणसे चिढ़कर देवता ही अनिरुद्धको चुरा ले गये हैं।
अ० ३३ ] * पञ्चम अंश * ४०५
पुरप्रवेशे प्रमथैर्युद्धमासीन्महात्मनः।
ययौ बाणपुराभ्याशं नीत्वा तान्सङ्क्षयं हरिः॥ १३
ततस्त्रिपादस्त्रिशिरा ज्वरो माहेश्वरो महान्।
बाणरक्षार्थमभ्येत्य युयुधे शार्ङ्गधन्वना॥ १४
तद्भस्मस्पर्शसम्भूततापः कृष्णाङ्गसङ्गमात्।
अवाप बलदेवोऽपि श्रममामीलितेक्षणः॥ १५
ततस्स युद्ध्यमानस्तु सह देवेन शार्ङ्गिणा।
वैष्णवेन ज्वरेणाशु कृष्णदेहान्निराकृतः॥ १६
नारायणभुजाघातपरिपीडनविह्वलम् ।
तं वीक्ष्य क्षम्यतामस्येत्याह देवः पितामहः॥ १७
ततश्च क्षान्तमेवेति प्रोच्य तं वैष्णवं ज्वरम्।
आत्मन्येव लयं निन्ये भगवान्मधुसूदनः॥ १८
ज्वर उवाच
मम त्वया समं युद्धं ये स्मरिष्यन्ति मानवाः।
विज्वरास्ते भविष्यन्तीत्युक्त्वा चैनं ययौ ज्वरः॥ १९
ततोऽग्नीन्भगवान्पञ्च जित्वा नीत्वा तथा क्षयम्।
दानवानां बलं कृष्णश्चूर्णयामास लीलया॥ २०
ततस्समस्तसैन्येन दैतेयानां बलेस्सुतः।
युयुधे शङ्करश्चैव कार्त्तिकेयश्च शौरिणा॥ २१
हरिशङ्करयोर्युद्धमतीवासीत्सुदारुणम् ।
चुक्षुभुस्सकला लोकाः शस्त्रास्त्रांशुप्रतापिताः॥ २२
प्रलयोऽयमशेषस्य जगतो नूनमागतः।
मेनिरे त्रिदशास्तत्र वर्तमाने महारणे॥ २३
जृम्भकास्त्रेण गोविन्दो जृम्भयामास शंकरम्।
ततः प्रणेशुर्दैतेयाः प्रमथाश्च समन्ततः॥ २४
जृम्भाभिभूतस्तु हरो रथोपस्थ उपाविशत्।
न शशाक ततो योद्धुं कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा॥ २५
गरुडक्षतवाहश्च प्रद्युम्नास्त्रेण पीडितः।
कृष्णहुङ्कारनिर्धूतशक्तिश्चापययौ गुहः॥ २६
चढ़कर श्रीहरि बलराम और प्रद्युम्नके सहित बाणासुरकी राजधानीमें आये॥ १२॥ नगरमें घुसते ही उन तीनोंका भगवान् शंकरके पार्षद प्रमथगणोंसे युद्ध हुआ; उन्हें नष्ट करके श्रीहरि बाणासुरकी राजधानीके समीप चले गये॥ १३॥
तदनन्तर बाणासुरकी रक्षाके लिये तीन सिर और तीन पैरवाला माहेश्वर नामक महान् ज्वर आगे बढ़कर श्रीभगवान्से लड़ने लगा॥ १४॥ [उस ज्वरका ऐसा प्रभाव था कि] उसके फेंके हुए भस्मके स्पर्शसे सन्तप्त हुए श्रीकृष्णचन्द्रके शरीरका आलिंगन करनेपर बलदेवजीने भी शिथिल होकर नेत्र मूँद लिये॥ १५॥ इस प्रकार भगवान् शार्ङ्गधरके साथ [उनके शरीरमें व्याप्त होकर] युद्ध करते हुए उस माहेश्वर ज्वरको वैष्णव ज्वरने तुरंत उनके शरीरसे निकाल दिया॥ १६॥ उस समय श्रीनारायणकी भुजाओंके आघातसे उस माहेश्वर ज्वरको पीड़ित और विह्वल हुआ देखकर पितामह ब्रह्माजीने भगवान्से कहा—'इसे क्षमा कीजिये'॥ १७॥ तब भगवान् मधुसूदनने 'अच्छा, मैंने क्षमा की' ऐसा कहकर उस वैष्णव ज्वरको अपनेमें लीन कर लिया॥ १८॥
ज्वर बोला—जो मनुष्य आपके साथ मेरे इस युद्धका स्मरण करेंगे वे ज्वरहीन हो जायँगे, ऐसा कहकर वह चला गया॥ १९॥
तदनन्तर भगवान् कृष्णचन्द्रने पंचाग्नियोंको जीतकर नष्ट किया और फिर लीलासे ही दानवसेनाको नष्ट करने लगे॥ २०॥ तब सम्पूर्ण दैत्यसेनाके सहित बलि-पुत्र बाणासुर, भगवान् शंकर और स्वामिकार्त्तिकेयजी भगवान् कृष्णके साथ युद्ध करने लगे॥ २१॥ श्रीहरि और श्रीमहादेवजीका परस्पर बड़ा घोर युद्ध हुआ, इस युद्धमें प्रयुक्त शस्त्रास्त्रोंके किरणजालसे सन्तप्त होकर सम्पूर्ण लोक क्षुब्ध हो गये॥ २२॥ इस घोर युद्धके उपस्थित होनेपर देवताओंने समझा कि निश्चय ही यह सम्पूर्ण जगत्का प्रलयकाल आ गया है॥ २३॥ श्रीगोविन्दने जृम्भकास्त्र छोड़ा जिससे महादेवजी निद्रित-से होकर जमुहाई लेने लगे; उनकी ऐसी दशा देखकर दैत्य और प्रमथगण चारों ओर भागने लगे॥ २४॥ भगवान् शंकर निद्राभिभूत होकर रथके पिछले भागमें बैठ गये और फिर अनायास ही अद्भुत कर्म करनेवाले श्रीकृष्णचन्द्रसे युद्ध न कर सके॥ २५॥ तदनन्तर गरुड़द्वारा वाहनके नष्ट हो जानेसे, प्रद्युम्नजीके शस्त्रोंसे पीड़ित होनेसे तथा कृष्णचन्द्रके हुंकारसे शक्तिहीन हो जानेसे स्वामिकार्त्तिकेय भी भागने लगे॥ २६॥
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४०६ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० ३३
जृम्भिते शङ्करे नष्टे दैत्यसैन्ये गुहे जिते।
नीते प्रमथसैन्ये च सङ्ख्यं शार्ङ्गधन्वना॥ २७
नन्दिना संगृहीताश्वमधिरूढो महारथम्।
बाणस्तत्राययौ योद्धुं कृष्णकार्ष्णिबलैस्सह॥ २८
बलभद्रो महावीर्यो बाणसैन्यमनेकधा।
विव्याध बाणैः प्रभ्रश्य धर्मतश्च पलायत॥ २९
आकृष्य लाङ्गलाग्रेण मुसलेनाशु ताडितम्।
बलं बलेन ददृशे बाणो बाणैश्च चक्रिणा॥ ३०
ततः कृष्णेन बाणस्य युद्धमासीत्सुदारुणम्।
समस्यतोरिषून्दीप्तानकायत्राणविभेदिनः॥ ३१
कृष्णश्चिच्छेद बाणैस्तान्बाणेन प्रहिताञ्छितान्।
विव्याध केशवं बाणो बाणं विव्याध चक्रधृक्॥ ३२
मुमुचाते तथास्त्राणि बाणकृष्णौ जिगीषया।
परस्परं क्षतिकरौ लाघवादन्निशं द्विज॥ ३३
भिद्यमानेष्वशेषेषु शरेष्वस्त्रे च सीदति।
प्राचुर्येण ततो बाणं हन्तुं चक्रे हरिर्मनः॥ ३४
ततोऽर्कशतसङ्घाततेजसा सदृशद्युति।
जग्राह दैत्यचक्रारिर्हरिश्चक्रं सुदर्शनम्॥ ३५
मुञ्चतो बाणनाशाय ततश्चक्रं मधुद्विषः।
नग्ना दैतेयविद्याभूत्कोटारी पुरतो हरेः॥ ३६
तामग्रतो हरिर्दृष्ट्वा मीलिताक्षस्सुदर्शनम्।
मुमोच बाणमुद्दिश्यच्छेत्तुं बाहुवनं रिपोः॥ ३७
क्रमेण तत्तु बाहूनां बाणस्याच्युतचोदितम्।
छेदं चक्रेऽसुरापास्तशस्त्रौघक्षपणादृतम्॥ ३८
छिन्ने बाहुवने तत्तु करस्थं मधुसूदनः।
मुमुक्षुर्बाणनाशाय विज्ञातस्त्रिपुरद्विषा॥ ३९
समुपेत्याह गोविन्दं सामपूर्वमुमापतिः।
विलोक्य बाणं दोर्दण्डच्छेदासृक्स्राववर्षिणम्॥ ४०
इस प्रकार श्रीकृष्णचन्द्रद्वारा महादेवजीके निद्राभिभूत, दैत्य-सेनाके नष्ट, स्वामिकार्त्तिकेयके पराजित और शिवगणोंके क्षीण हो जानेपर कृष्ण, प्रद्युम्न और बलभद्रजीके साथ युद्ध करनेके लिये वहाँ बाणासुर साक्षात् नन्दीश्वरद्वारा हाँके जाते हुए महान् रथपर चढ़कर आया॥ २७-२८॥ उसके आते ही महावीर्यशाली बलभद्रजीने अनेकों बाण बरसाकर बाणासुरकी सेनाको छिन्न-भिन्न कर डाला; तब वह वीरधर्मसे भ्रष्ट होकर भागने लगी॥ २९॥ बाणासुरने देखा कि उसकी सेनाको बलभद्रजी बड़ी फुर्तीसे हलसे खींच-खींचकर मूसलसे मार रहे हैं और श्रीकृष्णचन्द्र उसे बाणोंसे बींधे डालते हैं॥ ३०॥ तब बाणासुरका श्रीकृष्णचन्द्रके साथ घोर युद्ध छिड़ गया। वे दोनों परस्पर कवचभेदी बाण छोड़ने लगे। परंतु भगवान् कृष्णने बाणासुरके छोड़े हुए तीखे बाणोंको अपने बाणोंसे काट डाला, और फिर बाणासुर कृष्णको तथा कृष्ण बाणासुरको बींधने लगे॥ ३१-३२॥ हे द्विज! उस समय परस्पर चोट करनेवाले बाणासुर और कृष्ण दोनों ही विजयकी इच्छासे निरन्तर शीघ्रतापूर्वक अस्त्र-शस्त्र छोड़ने लगे॥ ३३॥
अन्तमें, समस्त बाणोंके छिन्न और सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके निष्फल हो जानेपर श्रीहरिने बाणासुरको मार डालनेका विचार किया॥ ३४॥ तब दैत्यमण्डलके शत्रु भगवान् कृष्णने सैकड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान अपने सुदर्शनचक्रको हाथमें ले लिया॥ ३५॥
जिस समय भगवान् मधुसूदन बाणासुरको मारनेके लिये चक्र छोड़ना ही चाहते थे उसी समय दैत्योंकी विद्या (मन्त्रमयी कुलदेवी) कोटारी भगवान्के सामने नग्नावस्थामें उपस्थित हुई॥ ३६॥ उसे देखते ही भगवान्ने नेत्र मूँद लिये और बाणासुरको लक्ष्य करके उस शत्रु की भुजाओंके वनको काटनेके लिये सुदर्शनचक्र छोड़ा॥ ३७॥ भगवान् अच्युतके द्वारा प्रेरित उस चक्रने दैत्योंके छोड़े हुए अस्त्रसमूहको काटकर क्रमशः बाणासुरकी भुजाओंको काट डाला [केवल दो भुजाएँ छोड़ दीं]॥ ३८॥ तब त्रिपुरशत्रु भगवान् शंकर जान गये कि श्रीमधुसूदन बाणासुरके बाहुवनको काटकर अपने हाथमें आये हुए चक्रको उसका वध करनेके लिये फिर छोड़ना चाहते हैं॥ ३९॥ अतः बाणासुरको अपने खण्डित भुजदण्डोंसे लोहूकी धारा बहाते देख श्रीउमापतिने गोविन्दके पास आकर सामपूर्वक कहा—॥ ४०॥
अ० ३३ ] * पञ्चम अंश * [ ४०७
श्रीशंकर उवाच
कृष्ण कृष्ण जगन्नाथ जाने त्वां पुरुषोत्तमम्।
परेशं परमात्मानमनादिनिधनं हरिम् ॥ ४१
देवतियर्ङ्मनुष्येषु शरीरग्रहणात्मिका।
लीलेयं सर्वभूतस्य तव चेष्टोपलक्षणा ॥ ४२
तत्प्रसीदाभयं दत्तं बाणस्यास्य मया प्रभो।
तत्त्वया नानृतं कार्यं यन्मया व्याहृतं वचः ॥ ४३
अस्मत्संश्रयदृप्तोऽयं नापराधी तवाव्यय।
मया दत्तवरो दैत्यस्तत्त्वां क्षमयाम्यहम् ॥ ४४
श्रीशंकरजी बोले— हे कृष्ण! हे कृष्ण!! हे जगन्नाथ!! मैं यह जानता हूँ कि आप पुरुषोत्तम परमेश्वर, परमात्मा और आदि-अन्तसे रहित श्रीहरि हैं ॥ ४१ ॥ आप सर्वभूतमय हैं। आप जो देव, तिर्यक् और मनुष्यादि योनियोंमें शरीर धारण करते हैं यह आपकी स्वाधीन चेष्टाकी उपलक्षिका लीला ही है ॥ ४२ ॥ हे प्रभो! आप प्रसन्न होइये। मैंने इस बाणासुरको अभयदान दिया है। हे नाथ! मैंने जो वचन दिया है उसे आप मिथ्या न करें ॥ ४३ ॥ हे अव्यय! यह आपका अपराधी नहीं है; यह तो मेरा आश्रय पानेसे ही इतना गर्वीला हो गया है। इस दैत्यको मैंने ही वर दिया था, इसलिये मैं ही आपसे इसके लिये क्षमा कराता हूँ ॥ ४४ ॥
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्तः प्राह गोविन्दः शूलपाणिमुमापतिम्।
प्रसन्नवदनो भूत्वा गतामर्षोऽसुरं प्रति ॥ ४५
श्रीपराशरजी बोले— त्रिशूलपाणि भगवान् उमापतिके इस प्रकार कहनेपर श्रीगोविन्दने बाणासुरके प्रति क्रोधभाव त्याग दिया और प्रसन्नवदन होकर उनसे कहा— ॥ ४५ ॥
श्रीभगवानुवाच
युष्मद्दत्तवरो वाणो जीवतामेष शङ्कर।
त्वद्वाक्यगौरवादेतन्मया चक्रं निवर्तितम् ॥ ४६
त्वया यदभयं दत्तं तद्दत्तमखिलं मया।
मत्तोऽविभिन्नमात्मानं द्रष्टुमर्हसि शङ्कर ॥ ४७
योऽहं स त्वं जगच्चेदं सदेवासुरमानुषम्।
मत्तो नान्यदशेषं यत्तत्त्वं ज्ञातुमिहार्हसि ॥ ४८
अविद्यामोहितात्मानः पुरुषा भिन्नदर्शिनः।
वदन्ति भेदं पश्यन्ति चावयोरन्तरं हर ॥ ४९
प्रसन्नोऽहं गमिष्यामि त्वं गच्छ वृषभध्वज ॥ ५०
श्रीभगवान् बोले— हे शंकर! यदि आपने इसे वर दिया है तो यह बाणासुर जीवित रहे। आपके वचनका मान रखनेके लिये मैं इस चक्रको रोके लेता हूँ ॥ ४६ ॥ आपने जो अभय दिया है वह सब मैंने भी दे दिया। हे शंकर! आप अपनेको मुझसे सर्वथा अभिन्न देखें ॥ ४७ ॥ आप यह भली प्रकार समझ लें कि जो मैं हूँ सो आप हैं तथा यह सम्पूर्ण जगत्, देव, असुर और मनुष्य आदि कोई भी मुझसे भिन्न नहीं हैं ॥ ४८ ॥ हे हर! जिन लोगोंका चित्त अविद्यासे मोहित है, वे भिन्नदर्शी पुरुष ही हम दोनोंमें भेद देखते और बतलाते हैं। हे वृषभध्वज! मैं प्रसन्न हूँ, आप पधारिये, मैं भी अब जाऊँगा ॥ ४९-५० ॥
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्त्वा प्रययौ कृष्णः प्राद्युम्निर्यत्र तिष्ठति।
तद्बन्धफणिनो नेशुर्गरुडानिलपोथिताः ॥ ५१
ततोऽनिरुद्धमारोप्य सपत्नीकं गरुत्मति।
आजग्मुर्द्वारिकां रामकार्ष्णिदामोदराः पुरीम् ॥ ५२
पुत्रपौत्रैः परिवृतस्तत्र रेमे जनार्दनः।
देवीभिस्सततं विप्र भूभारतरणेच्छया ॥ ५३
श्रीपराशरजी बोले— इस प्रकार कहकर भगवान् कृष्ण जहाँ प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध थे वहाँ गये। उनके पहुँचते ही अनिरुद्धके बन्धनरूप समस्त नागगण गरुडके वेगसे उत्पन्न हुए वायुके प्रहारसे नष्ट हो गये ॥ ५१ ॥ तदनन्तर सपत्नीक अनिरुद्धको गरुडपर चढ़ाकर बलराम, प्रद्युम्न और कृष्णचन्द्र द्वाराकापुरीमें लौट आये ॥ ५२ ॥ हे विप्र! वहाँ भू-भार-हरणकी इच्छासे रहते हुए श्रीजनार्दन अपने पुत्र-पौत्रादिसे घिरे रहकर अपनी रानियोंके साथ रमण करने लगे ॥ ५३ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
| ४०८ | ॐ श्रीविष्णुपुराण ॐ | [ अ० ३४ |
|---|
चौंतीसवाँ अध्याय
पौण्ड्रक-वध तथा काशीदहन
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| श्रीमैत्रेय उवाच<br>चक्रे कर्म महच्छौरिर्बिभ्राणो मानुषीं तनुम्।<br>जिगाय शक्रं शर्वं च सर्वान्देवांश्च लीलया॥ १<br>यच्चान्यदकरोत्कर्म दिव्यचेष्टाविघातकृत्।<br>तत्कथ्यतां महाभाग परं कौतूहलं हि मे॥ २<br>श्रीपराशर उवाच<br>गदतो मम विप्रर्षे श्रूयतामिदमादरात्।<br>नरावतारे कृष्णेन दग्धा वाराणसी यथा॥ ३<br>पौण्ड्रको वासुदेवस्तु वासुदेवोऽभवद्भुवि।<br>अवतीर्णस्त्वमित्युक्तो जनैरज्ञानमोहितैः॥ ४<br>स मेने वासुदेवोऽहमवतीर्णो महीतले।<br>नष्टस्मृतिस्ततस्सर्वं विष्णुचिह्नमचीकरत्॥ ५<br>दूतं च प्रेषयामास कृष्णाय सुमहात्मने।<br>त्यक्त्वा चक्रादिकं चिह्नं मदीयं नाम चात्मनः॥ ६<br>वासुदेवात्मकं मूढ त्यक्त्वा सर्वमशेषतः।<br>आत्मनो जीवितार्थाय ततो मे प्रणतिं व्रज॥ ७<br>इत्युक्तस्सम्प्रहस्यैनं दूतं प्राह जनार्दनः।<br>निजचिह्नममं चक्रं समुत्स्रक्ष्ये त्वयीति वै॥ ८<br>वाच्यश्च पौण्ड्रको गत्वा त्वया दूत वचो मम।<br>ज्ञातस्तद्वाक्यसद्भावो यत्कार्यं तद्विधीयताम्॥ ९<br>गृहीतचिह्नवेषोऽहमागमिष्यामि ते पुरम्।<br>उत्स्रक्ष्यामि च तच्चक्रं निजचिह्नमसंशयम्॥ १०<br>आज्ञापूर्वं च यदिदमागच्छेति त्वयोदितम्।<br>सम्पादयिष्ये श्वस्तुभ्यं समागम्याविलम्बितम्॥ ११<br>शरणं ते समभ्येत्य कर्तास्मि नृपते तथा।<br>यथा त्वत्तो भयं भूयो न मे किञ्चिद्भविष्यति॥ १२<br>श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्तेऽपगते दूते संस्मृत्याभ्यागतं हरिः।<br>गरुत्मन्तमथारुह्य त्वरितस्तत्पुरं ययौ॥ १३ | श्रीमैत्रेयजी बोले—हे गुरो! श्रीविष्णुभगवान्ने मनुष्य-शरीर धारणकर जो लीलासे ही इन्द्र, शंकर और सम्पूर्ण देवगणको जीतकर महान् कर्म किये थे [वह मैं सुन चुका ]॥ १॥ इनके सिवा देवताओंकी चेष्टाओंका विघात करनेवाले उन्होंने और भी जो कर्म किये थे, हे महाभाग! वे सब मुझे सुनाइये; मुझे उनके सुननेका बड़ा कौतूहल हो रहा है॥ २॥<br>श्रीपराशरजी बोले—हे ब्रह्मर्षे! भगवान्ने मनुष्यावतार लेकर जिस प्रकार काशीपुरी जलायी थी वह मैं सुनाता हूँ, तुम ध्यान देकर सुनो॥ ३॥ पौण्ड्रकवंशीय वासुदेव नामक एक राजाको अज्ञानमोहित पुरुष 'आप वासुदेवरूपसे पृथिवीपर अवतीर्ण हुए हैं' ऐसा कहकर स्तुति किया करते थे॥ ४॥ अन्तमें वह भी यही मानने लगा कि 'मैं वासुदेवरूपसे पृथिवीमें अवतीर्ण हुआ हूँ!' इस प्रकार आत्मविस्मृत हो जानेसे उसने विष्णुभगवान्के समस्त चिह्न धारण कर लिये॥ ५॥ और महात्मा कृष्णचन्द्रके पास यह सन्देश लेकर दूत भेजा कि “हे मूढ़! अपने वासुदेव नामको छोड़कर मेरे चक्र आदि सम्पूर्ण चिह्नोंको छोड़ दे और यदि तुझे जीवनकी इच्छा है तो मेरी शरणमें आ”॥ ६-७॥<br>दूतने जब इसी प्रकार कहा तो श्रीजनार्दन उससे हँसकर बोले—“ठीक है, मैं अपने चिह्न चक्रको तेरे प्रति छोड़ूँगा। हे दूत! मेरी ओरसे तू पौण्ड्रकसे जाकर यह कहना कि मैंने तेरे वाक्यका वास्तविक भाव समझ लिया है, तुझे जो करना हो सो कर॥ ८-९॥ मैं अपने चिह्न और वेष धारणकर तेरे नगरमें आऊँगा और निस्सन्देह अपने चिह्न चक्रको तेरे ऊपर छोड़ूँगा॥ १०॥ ‘और तूने जो आज्ञा करते हुए ‘आ’ ऐसा कहा है, सो मैं उसे भी अवश्य पालन करूँगा और कल शीघ्र ही तेरे पास पहुँचूँगा॥ ११॥ हे राजन्! तेरी शरणमें आकर मैं वही उपाय करूँगा जिससे फिर तुझसे मुझे कोई भय न रहे॥ १२॥<br>श्रीपराशरजी बोले—श्रीकृष्णचन्द्रके ऐसा कहनेपर जब दूत चला गया तो भगवान् स्मरण करते ही उपस्थित हुए गरुडपर चढ़कर तुरंत उसकी राजधानीको चले॥ १३॥ |
अ० ३४ ] * पञ्चम अंश * ४०९
ततस्तु केशवोद्योगं श्रुत्वा काशिपत्तिस्तदा।
सर्वसैन्यपरीवारः पार्ष्णिग्राह उपाययौ॥ १४
ततो बलेन महता काशिराजबलेन च।
पौण्ड्रको वासुदेवोऽसौ केशवाभिमुखो ययौ॥ १५
तं ददर्श हरिर्दूरादुदारस्यन्दने स्थितम्।
चक्रहस्तं गदाशार्ङ्गबाहुं पाणिगताम्बुजम्॥ १६
स्रग्धरं पीतवसनं सुपर्णरचितध्वजम्।
वक्षःस्थले कृतं चास्य श्रीवत्सं ददृशे हरिः॥ १७
किरीटकुण्डलधरं नानारत्नोपशोभितम्।
तं दृष्ट्वा भावगम्भीरं जहास गरुडध्वजः॥ १८
युयुधे च बलेनास्य हस्त्यश्वबलिना द्विज।
निस्त्रिंशासिगदाशूलशक्तिकार्मुकशालिना॥ १९
क्षणेन शार्ङ्गनिर्मुक्तैश्शरैररिविदारणैः।
गदाचक्रनिपातैश्च सूदयामास तद्बलम्॥ २०
काशिराजबलं चैवं क्षयं नीत्वा जनार्दनः।
उवाच पौण्ड्रकं मूढमात्मचिह्नोपलक्षितम्॥ २१
श्रीभगवानुवाच
पौण्ड्रकोक्तं त्वया यत्तु दूतवक्त्रेण मां प्रति।
समुत्सृजेति चिह्नानि तत्ते सम्पादयाम्यहम्॥ २२
चक्रमेतत्त्समुत्सृष्टं गदेयं ते विसर्जिता।
गरुत्मानेष चोत्सृष्टस्समारोहतु ते ध्वजम्॥ २३
श्रीपराशर उवाच
इत्युच्चार्य विमुक्तेन चक्रेणासौ विदारितः।
पातितो गदया भग्नोध्वजश्चास्य गरुत्मता॥ २४
ततो हाहाकृते लोके काशिपुर्य्यधिपो बली।
युयुधे वासुदेवेन मित्रस्यापचितौ स्थितः॥ २५
ततश्शार्ङ्गधनुर्मुक्तैश्छित्त्वा तस्य शिरश्शरैः।
काशिपुर्य्यां स चिक्षेप कुर्वँल्लोकस्य विस्मयम्॥ २६
हत्वा तं पौण्ड्रकं शौरिः काशिराजं च सानुगम्।
पुनर्द्वारवतीं प्राप्तो रेमे स्वर्गगतो यथा॥ २७
तच्छिरः पतितं तत्र दृष्ट्वा काशिपतेः पुरे।
जनः किमेतदित्याहच्छिन्नं केनेति विस्मितः॥ २८
भगवान्के आक्रमणका समाचार सुनकर काशीनरेश भी उसका पृष्ठपोषक (सहायक) होकर अपनी सम्पूर्ण सेना ले उपस्थित हुआ॥ १४॥ तदनन्तर अपनी महान् सेनाके सहित काशीनरेशकी सेना लेकर पौण्ड्रक वासुदेव श्रीकृष्णचन्द्रके सम्मुख आया॥ १५॥ भगवान्ने दूरसे ही उसे हाथमें चक्र, गदा, शार्ङ्गधनुष और पद्म लिये एक उत्तम रथपर बैठे देखा॥ १६॥ श्रीहरिने देखा कि उसके कण्ठमें वैजयन्तीमाला है, शरीरमें पीताम्बर है, गरुडरचित ध्वजा है और वक्षःस्थलमें श्रीवत्सचिह्न हैं॥ १७॥ उसे नाना प्रकारके रत्नोंसे सुसज्जित किरीट और कुण्डल धारण किये देखकर श्रीगरुडध्वज भगवान् गम्भीरभावसे हँसने लगे॥ १८॥ और हे द्विज! उसकी हाथी-घोड़ोंसे बलिष्ठ तथा निस्त्रिंश खड्ग, गदा, शूल, शक्ति और धनुष आदिसे सुसज्जित सेनासे युद्ध करने लगे॥ १९॥ श्रीभगवान्ने एक क्षणमें ही अपने शार्ङ्गधनुषसे छोड़े हुए शत्रुओंको विदीर्ण करनेवाले तीक्ष्ण बाणों तथा गदा और चक्रसे उसकी सम्पूर्ण सेनाको नष्ट कर डाला॥ २०॥ इसी प्रकार काशिराजकी सेनाको भी नष्ट करके श्रीजनार्दनने अपने चिह्नोंसे युक्त मूढ़मति पौण्ड्रकसे कहा॥ २१॥
**श्रीभगवान् बोले—**हे पौण्ड्रक! मेरे प्रति तूने जो दूतके मुखसे यह कहलाया था कि मेरे चिह्नोंको छोड़ दे सो मैं तेरे सम्मुख उस आज्ञाको सम्पन्न करता हूँ॥ २२॥ देख, यह मैंने चक्र छोड़ दिया, यह तेरे ऊपर गदा भी छोड़ दी और यह गरुड भी छोड़े देता हूँ, यह तेरी ध्वजापर आरूढ़ हों॥ २३॥
**श्रीपराशरजी बोले—**ऐसा कहकर छोड़े हुए चक्रने पौण्ड्रकको विदीर्ण कर डाला, गदाने नीचे गिरा दिया और गरुडने उसकी ध्वजा तोड़ डाली॥ २४॥ तदनन्तर सम्पूर्ण सेनामें हाहाकार मच जानेपर अपने मित्रका बदला चुकानेके लिये खड़ा हुआ काशीनरेश श्रीवासुदेवसे लड़ने लगा॥ २५॥ तब भगवान्ने शार्ङ्गधनुषसे छोड़े हुए एक बाणसे उसका सिर काटकर सम्पूर्ण लोगोंको विस्मित करते हुए काशीपुरीमें फेंक दिया॥ २६॥ इस प्रकार पौण्ड्रक और काशीनरेशको अनुचरों-सहित मारकर भगवान् फिर द्वारकाको लौट आये और वहाँ स्वर्ग सदृश सुखका अनुभव करते हुए रमण करने लगे॥ २७॥
इधर काशीपुरीमें काशिराजका सिर गिरा देख सम्पूर्ण नगरनिवासी विस्मयपूर्वक कहने लगे—'यह क्या हुआ? इसे किसने काट डाला?'॥ २८॥
| ४१० | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ३४ |
|---|
ज्ञात्वा तं वासुदेवेन हतं तस्य सुतस्ततः।
पुरोहितेन सहितस्तोषयामास शङ्करम्॥ २९
अविमुक्ते महाक्षेत्रे तोषितस्तेन शङ्करः।
वरं वृणीष्वेति तदा तं प्रोवाच नृपात्मजम्॥ ३०
स वव्रे भगवन्कृत्या पितृहन्तुर्वधाय मे।
समुत्तिष्ठतु कृष्णस्य त्वत्प्रसादान्महेश्वर॥ ३१
श्रीपराशर उवाच
एवं भविष्यतीत्युक्ते दक्षिणाग्नेरनन्तरम्।
महाकृत्या समुत्तस्थौ तस्यैवाग्नेर्विनाशिनी॥ ३२
ततो ज्वालाकरालास्या ज्वलत्केशकपालिका।
कृष्ण कृष्णेति कुपिता कृत्या द्वारवतीं ययौ॥ ३३
तामवेक्ष्य जनस्त्रासाच्चिञ्चल्ललोचनो मुने।
ययौ शरण्यं जगतां शरणं मधुसूदनम्॥ ३४
काशिराजसुतेनेयमाराध्य वृषभध्वजम्।
उत्पादिता महाकृत्येत्यवगम्याथ चक्रिणा॥ ३५
जहि कृत्यामिमामुग्रां वह्निज्वालाजटालकाम्।
चक्रमुत्सृष्टमक्षेषु क्रीडासक्तेन लीलया॥ ३६
तदग्निमालाजटिलज्वालोद्गारातिभीषणाम्।
कृत्यामनुजगामाशु विष्णुचक्रं सुदर्शनम्॥ ३७
चक्रप्रतापनिर्दग्धा कृत्या माहेश्वरी तदा।
ननाश वेगिनी वेगात्तदप्यनुजगाम ताम्॥ ३८
कृत्या वाराणसीमेव प्रविवेश त्वरान्विता।
विष्णुचक्रप्रतिहतप्रभावा मुनिसत्तम॥ ३९
ततः काशीबलं भूरि प्रमथानां तथा बलम्।
समस्तशस्त्रास्त्रयुतं चक्रस्याभिमुखं ययौ॥ ४०
शस्त्रास्त्रमोक्षचतुरं दग्ध्वा तद्वलमोजसा।
कृत्यागर्भामशेषां तां तदा वाराणसीं पुरीम्॥ ४१
सभूभृद्भृत्यपौराँ तु साश्वमातङ्गमानवाम्।
अशेषगोष्ठकोशां तां दुर्निरीक्ष्यां सुरैरपि॥ ४२
जब उसके पुत्रको मालूम हुआ कि उसे श्रीवासुदेवने मारा है तो उसने अपने पुरोहितके साथ मिलकर भगवान् शंकरको सन्तुष्ट किया॥ २९॥ अविमुक्त महाक्षेत्रमें उस राजकुमारसे सन्तुष्ट होकर श्रीशंकरने कहा—‘वर माँग’॥ ३०॥ वह बोला—‘‘हे भगवन्! हे महेश्वर!! आपकी कृपासे मेरे पिताका वध करनेवाले कृष्णका नाश करनेके लिये (अग्निसे) कृत्या उत्पन्न हो’’*॥ ३१॥
श्रीपराशरजी बोले— भगवान् शंकरने कहा, ‘ऐसा ही होगा।’ उनके ऐसा कहनेपर दक्षिणाग्निका चयन करनेके अनन्तर उससे उस अग्निका ही विनाश करनेवाली कृत्या उत्पन्न हुई॥ ३२॥ उसका कराल मुख ज्वालामालाओंसे पूर्ण था तथा उसके केश अग्निशिखाके समान दीप्तिमान् और ताम्रवर्ण थे। वह क्रोधपूर्वक ‘कृष्ण! कृष्ण!!’ कहती द्वारकापुरीमें आयी॥ ३३॥
हे मुने! उसे देखकर लोगोंने भय-विचलित नेत्रोंसे जगद्गति भगवान् मधुसूदनकी शरण ली॥ ३४॥ जब भगवान् चक्रपाणिने जाना कि श्रीशंकरकी उपासना कर काशिराजके पुत्रने ही यह महाकृत्या उत्पन्न की है तो अक्षक्रीडामें लगे हुए उन्होंने लीलासे ही यह कहकर कि ‘इस अग्निज्वालामयी जटाओंवाली भयंकर कृत्याको मार डाल’ अपना चक्र छोड़ा॥ ३५-३६॥
तब भगवान् विष्णुके सुदर्शनचक्रने उस अग्नि-मालामण्डित जटाओंवाली और अग्निज्वालाओंके कारण भयानक मुखवाली कृत्याका पीछा किया॥ ३७॥ उस चक्रके तेजसे दग्ध होकर छिन्न-भिन्न होती हुई वह माहेश्वरी कृत्या अति वेगसे दौड़ने लगी तथा वह चक्र भी उतने ही वेगसे उसका पीछा करने लगा॥ ३८॥ हे मुनिश्रेष्ठ! अन्तमें विष्णुचक्रसे हतप्रभाव हुई कृत्याने शीघ्रतासे काशीमें ही प्रवेश किया॥ ३९॥ उस समय काशी-नरेशकी सम्पूर्ण सेना और प्रथमगण अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित होकर उस चक्रके सम्मुख आये॥ ४०॥
तब वह चक्र अपने तेजसे शस्त्रास्त्र-प्रयोगमें कुशल उस सम्पूर्ण सेनाको दग्धकर कृत्याके सहित सम्पूर्ण वाराणसीको जलाने लगा॥ ४१॥ जो राजा, प्रजा और सेवकोंसे पूर्ण थी; घोड़े, हाथी और मनुष्योंसे भरी थी; सम्पूर्ण गोष्ठ और कोशोंसे युक्त थी और देवताओंके
* इस वाक्यका अर्थ यह भी होता है कि 'मेरे वधके लिये मेरे पिताके मारनेवाले कृष्णके पास कृत्या उत्पन्न हो।' इसलिये यदि इस वरका विपरीत परिणाम हुआ तो उसमें शंका नहीं करनी चाहिये।
अ० ३५ ] * पञ्चम अंश * ४११
| ज्वालापरिष्कृताशेषगृहप्राकारचत्वराम्।<br>ददाह तद्धरेश्चक्रं सकलामेव तां पुरीम्॥ ४३<br><br>अक्षीणामर्षमत्युग्रसाध्यसाधनसस्पृहम्।<br>तच्चक्रं प्रस्फुरद्दीप्ति विष्णोरभ्याययौ करम्॥ ४४ | लिये भी दुर्दर्शनीय थी, उसी काशीपुरीको भगवान् विष्णुके उस चक्रने उसके गृह, कोट और चबूतरोंमें अग्निकी ज्वालाएँ प्रकटकर जला डाला॥ ४२-४३॥ अन्तमें, जिसका क्रोध अभी शान्त नहीं हुआ था तथा जो अत्यन्त उग्र कर्म करनेको उत्सुक था और जिसकी दीप्ति चारों ओर फैल रही थी, वह चक्र फिर लौटकर भगवान् विष्णुके हाथमें आ गया॥ ४४॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४॥
पैंतीसवाँ अध्याय
साम्बका विवाह
| श्रीमैत्रेय उवाच<br>भूय एवाहमिच्छामि बलभद्रस्य धीमतः।<br>श्रोतुं पराक्रमं ब्रह्मन् तन्ममाख्यातुमर्हसि॥ १<br>यमुनाकर्षणादीनि श्रुतानि भगवन्मया।<br>तत्कथ्यतां महाभाग यदन्यत्कृतवान्बलः॥ २<br><br>श्रीपराशर उवाच<br>मैत्रेय श्रूयतां कर्म यद्रामेणाभवत्कृतम्।<br>अनन्तेनाप्रमेयेन शेषेण धरणीधृता॥ ३<br>सुयोधनस्य तनयां स्वयंवरकृतक्षणाम्।<br>बलादादत्तवान्वीरस्साम्बो जाम्बवतीसुतः॥ ४<br>ततः क्रुद्धा महावीर्याः कर्णदुर्योधनादयः।<br>भीष्मद्रोणादयश्चैनं बबन्धुर्युधि निर्जितम्॥ ५<br>तच्छ्रुत्वा यादवास्सर्वे क्रोधं दुर्योधनादिषु।<br>मैत्रेय चक्रुः कृष्णश्च तान्निहन्तुं महोद्यमम्॥ ६<br>तान्निवार्य बलः प्राह मदलोलक़लाक्षरम्।<br>मोक्ष्यन्ति ते मद्वचनाद्यास्याम्येको हि कौरवान्॥ ७<br><br>श्रीपराशर उवाच<br>बलदेवस्ततो गत्वा नगरं नागसाह्वयम्।<br>बाह्योपवनमध्येऽभून्न विवेश च तत्पुरम्॥ ८<br>बलमागतमाज्ञाय भूपा दुर्योधनादयः।<br>गामर्घ्यमुदकं चैव रामाय प्रत्यवेदयन्॥ ९ | श्रीमैत्रेयजी बोले—हे ब्रह्मन्! अब मैं फिर मतिमान् बलभद्रजीके पराक्रमकी वार्ता सुनना चाहता हूँ, आप वर्णन कीजिये॥ १॥ हे भगवन्! मैंने उनके यमुनाकर्षणादि पराक्रम तो सुन लिये; अब हे महाभाग! उन्होंने जो और-और विक्रम दिखलाये हैं, उनका वर्णन कीजिये॥ २॥<br><br>श्रीपराशरजी बोले—हे मैत्रेय! अनन्त, अप्रमेय, धरणीधर शेषावतार श्रीबलरामजीने जो कर्म किये थे, वह सुनो—॥ ३॥<br><br>एक बार जाम्बवतीनन्दन वीरवर साम्बने स्वयंवरके अवसरपर दुर्योधनकी पुत्रीको बलात् हरण किया॥ ४॥ तब महावीर कर्ण, दुर्योधन, भीष्म और द्रोण आदिने क्रुद्ध होकर उसे युद्धमें हराकर बाँध लिया॥ ५॥ यह समाचार पाकर कृष्णचन्द्र आदि समस्त यादवोंने दुर्योधनादिपर क्रुद्ध होकर उन्हें मारनेके लिये बड़ी तैयारी की॥ ६॥ उनको रोककर श्रीबलरामजीने मदिराके उन्मादसे लड़खड़ाते हुए शब्दोंमें कहा—"कौरवगण मेरे कहनेसे साम्बको छोड़ देंगे, अतः मैं अकेला ही उनके पास जाता हूँ"॥ ७॥<br><br>श्रीपराशरजी बोले—तदनन्तर, श्रीबलदेवजी हस्तिनापुरके समीप पहुँचकर उसके बाहर एक उद्यानमें ठहर गये; उन्होंने नगरमें प्रवेश नहीं किया॥ ८॥ बलरामजीको आये जान दुर्योधन आदि राजाओंने उन्हें गौ, अर्घ्य और पाद्यादि निवेदन किये॥ ९॥ |
४१२ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० ३५
गृहीत्वा विधिवत्सर्वं ततस्तानाह कौरवान्। आज्ञापयत्युग्रसेनस्साम्बमाशु विमुच्यता ॥१० ततस्तद्वचनं श्रुत्वा भीष्मद्रोणादयो नृपाः। कर्णदुर्योधनाद्याश्च चुक्षुभुर्द्विजसत्तम ॥ ११ ऊचुश्च कुपितास्सर्वे बाह्लिकाद्याश्च कौरवाः। अराज्यार्हं यदोर्वंशमवेक्ष्य मुसलायुधम् ॥ १२ भो भो किमेतद्भवता बलभद्रेरितं वचः। आज्ञां कुरुकुलोत्थानां यादवः कः प्रदास्यति ॥ १३ उग्रसेनोऽपि यद्याज्ञां कौरवाणां प्रदास्यति। तदलं पाण्डुरैश्छत्रैर्नृपयोग्यैर्विडम्बनैः॥ १४ तद्गच्छ बल मा वा त्वं साम्बमन्यायचेष्टितम्। विमोक्ष्यामो न भवतश्चोग्रसेनस्य शासनात् ॥ १५ प्रणतिर्या कृतास्माकं मान्यानां कुकुरा Clerkन्धकैः। ननाम सा कृता केयमाज्ञा स्वामिनि भृत्यतः ॥ १६ गर्वमारोपिता यूयं समानासनभोजनैः। को दोषो भवतां नीतिर्यत्प्रीत्या नावलोकिता ॥ १७ अस्माभिर्घो भवतो योऽयं बल निवेदितः। प्रेम्णैतन्नैतदस्माकं कुलाद्युष्मत्कुलोचितम् ॥ १८ श्रीपराशर उवाच इत्युक्त्वा कुरवः साम्बं मुञ्चामो न हरेस्सुतम्। कृतैकनिश्चयास्तूर्णं विविशुर्गजसाह्वयम् ॥ १९ मत्तः कोपेन चाघूर्णंस्ततोऽधिक्षेपजन्मना। उत्थाय पाष्ण्र्या वसुधां जघान स हलायुधः ॥ २० ततो विदारिता पृथ्वी पाणि्रघातान्महात्मनः। आस्फोटयामास तदा दिशश्शब्देन पूरयन् ॥ २१ उवाच चातिताम्राक्षो भृकुटीकुटिलाननः ॥ २२ अहो मदावलेपोऽयमसारणां दुरात्मनाम्। कौरवाणां महीपत्वमस्माकं किल कालजम्। उग्रसेनस्य ये नाज्ञां मन्यन्तेऽद्यापि लङ्घनम् ॥ २३ उग्रसेनः समध्यास्ते सुधर्मां न शचीपतिः। धिङ्मानुषशतोच्छिष्टे तुष्टिरेषां नृपासने ॥ २४
उन सबको विधिवत् ग्रहण कर बलभद्रजीने कौरवोंसे कहा—"राजा उग्रसेनकी आज्ञा है आपलोग साम्बको तुरन्त छोड़ दें" ॥१०॥ हे द्विजसत्तम ! बलरामजीके इन वचनोंको सुनकर भीष्म, द्रोण, कर्ण और दुर्योधन आदि राजाओंको बड़ा क्षोभ हुआ॥ ११॥ और यदुवंशको राज्यपदके अयोग्य समझ बाह्लिक आदि सभी कौरवगण कुपित होकर मूसलधारी बलभद्रजीसे कहने लगे - ॥ १२॥ "हे बलभद्र ! तुम यह क्या कह रहे हो; ऐसा कौन यदुवंशी है जो कुरुकुलोत्पन्न किसी वीरको आज्ञा दे ? ॥ १३ ॥ यदि उग्रसेन भी कौरवोंको आज्ञा दे सकता है तो राजाओंके योग्य कौरवोंके इस श्वेत छत्रका क्या प्रयोजन है? ॥ १४ ॥ अतः हे बलराम ! तुम जाओ अथवा रहो, हमलोग तुम्हारी या उग्रसेनकी आज्ञासे अन्यायकर्मा साम्बको नहीं छोड़ सकते ॥ १५ ॥ पूर्वकालमें कुकुर और अन्धकवंशीय यादवगण हम माननीयोंको प्रणाम किया करते थे सो अब वे ऐसा नहीं करते तो न सही, किन्तु स्वामीको यह सेवककी ओरसे आज्ञा देना कैसा ? ॥ १६ ॥ तुमलोगोंके साथ समान आसन और भोजनका व्यवहार करके तुम्हें हमहीने गर्वीला बना दिया है; इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है; क्योंकि हमने ही प्रीतिवश नीतिका विचार नहीं किया ॥ १७ ॥ हे बलराम ! हमने जो तुम्हें यह अर्घ्य आदि निवेदन किया है यह प्रेमवश ही किया है, वास्तवमें हमारे कुलकी तरफसे तुम्हारे कुलको अर्घ्यादि देना उचित नहीं है" ॥ १८॥ श्रीपराशरजी बोले- ऐसा कहकर कौरवगण यह निश्चय करके कि "हम कृष्णके पुत्र साम्बको नहीं छोड़ेंगे" तुरन्त हस्तिनापुरमें चले गये ॥ १९॥ तदनन्तर हलायुध श्रीबलरामजीने उनके तिरस्कारसे उत्पन्न हुए क्रोधसे मत्त होकर घूरते हुए पृथिवीमें लात मारी ॥ २० ॥ महात्मा बलरामजीके पाद-प्रहारसे पृथिवी फट गयी और वे अपने शब्दसे सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजाकर कम्पायमान करने लगे तथा लाल- लाल नेत्र और टेढ़ी भृकुटि करके बोले- ॥ २१-२२॥ "अहो ! इन सारहीन दुरात्मा कौरवोंको यह कैसा राजमदका अभिमान है। कौरवोंका महीपालत्व तो स्वतःसिद्ध है और हमारा सामयिक - ऐसा समझकर ही आज ये महाराज उग्रसेनकी आज्ञा नहीं मानते; बल्कि उसका उल्लंघ्न कर रहे हैं ॥ २३॥ आज राजा उग्रसेन सुधर्मा-सभामें स्वयं विराजमान होते हैं, उसमें शचीपति इन्द्र भी नहीं बैठने पाते। परन्तु इन
अ० ३५ ] * पञ्चम अंश * ४१३
पारिजाततरोः पुष्पमञ्जरीर्वनि Node -> पारिजाततरोः पुष्पमञ्जरीर्वनि Node? Let's check text: पारिजाततरोः पुष्पमञ्जरीर्वनि Node -> पारिजाततरोः पुष्पमञ्जरीर्वनिताजनः। पारिजाततरोः पुष्पमञ्जरीर्वनिताजनः । बिभर्ति यस्य भृत्यानां सोऽप्येषां न महीपतिः ॥ २५
समस्तभूभृतां नाथ उग्रसेनस्स तिष्ठतु । अद्य निष्कौरवामुर्वीं कृत्वा यास्यामि तत्पुरीम् ॥ २६
कर्णं दुर्योधनं द्रोणमद्य भीष्मं सबाह्लिकम् । दुश्शासनादीन्भूरिं च भूरिश्रवसमेव च ॥ २७
सोमदत्तं शलं चैव भीमार्जुनयुधिष्ठिरान् । यमौ च कौरवांश्चान्यान्हत्वा साश्वरथद्विपान् ॥ २८
वीरमादाय तं साम्बं सपत्नीकं ततः पुरीम् । द्वारकामुग्रसेनादीन्गत्वा द्रक्ष्यामि बान्धवान् ॥ २९
अथ वा कौरवावासं समस्तैः कुरुभिस्सह । भागीरथ्यां क्षिपाम्याशु नगरं नागसाह्वयम् ॥ ३०
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्त्वा मदरक्ताक्षः कर्षणाधोमुखं हलम् । प्राकारवप्रदुर्गस्य चकर्ष मुसलायुधः ॥ ३१
आघूर्णितं तत्सहसा ततो वै हास्तिनं पुरम् । दृष्ट्वा संक्षुब्धहृदयाश्चचुक्षुभुः सर्वकौरवाः ॥ ३२
राम राम महाबाहो क्षम्यतां क्षम्यतां त्वया । उपसंह्रियतां कोपः प्रसीद मुसलायुध ॥ ३३
एष साम्बस्सपत्नीकस्तव निर्यांतितो बल । अविज्ञातप्रभावाणां क्षम्यतामपराधिनाम् ॥ ३४
श्रीपराशर उवाच
ततो निर्यातयामासुस्साम्बं पत्नीसमन्वितम् । निष्क्रम्य स्वपुरात्तूर्णं कौरवा मुनिपुङ्गव ॥ ३५
भीष्मद्रोणकृपादीनां प्रणम्य वदतां प्रियम् । क्षान्तमेव मयेत्याह बलो बलवतां वरः ॥ ३६
अद्याप्याघूर्णिताकारं लक्ष्यते तत्पुरं द्विज । एष प्रभावो रामस्य बलशौर्योपलक्षणः ॥ ३७
ततस्तु कौरवास्साम्बं सम्पूज्य हलिना सह । प्रेषयामासुरुद्वाहधनभार्यासमन्वितम् ॥ ३८
कौरवोंको धिक्कार है जिन्हें सैकड़ों मनुष्योंके उच्छिष्ट राजसिंहासनमें इतनी तुष्टि है॥ २४॥ जिनके सेवकोंकी स्त्रियाँ भी पारिजात-वृक्षकी पुष्प-मंजरी धारण करती हैं वह भी इन कौरवोंके महाराज नहीं हैं? [यह कैसा आश्चर्य है?] ॥ २५॥ वे उग्रसेन ही सम्पूर्ण राजाओंके महाराज बनकर रहें। आज मैं अकेला ही पृथिवीको कौरवहीन करके उनकी द्वारकापुरीको जाऊँगा॥ २६॥ आज कर्ण, दुर्योधन, द्रोण, भीष्म, बाह्लिक, दुश्शासनादि, भूरि, भूरिश्रवा, सोमदत्त, शल, भीम, अर्जुन, युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव तथा अन्यान्य समस्त कौरवोंको उनके हाथी-घोड़े और रथके सहित मारकर तथा नववधूके साथ वीरवर साम्बको लेकर ही मैं द्वारकापुरीमें जाकर उग्रसेन आदि अपने बन्धु-बान्धवोंको देखूँगा॥ २७-२९॥ अथवा समस्त कौरवोंके सहित उनके निवासस्थान इस हस्तिनापुर नगरको ही अभी गंगाजीमें फेंके देता हूँ' ॥ ३० ॥
**श्रीपराशरजी बोले—**ऐसा कहकर मदसे अरुणनयन मुसलायुध श्रीबलभद्रजीने हलकी नोंकको हस्तिनापुरके खाईं और दुर्गसे युक्त प्राकारके मूलमें लगाकर खींचा ॥ ३१ ॥ उस समय सम्पूर्ण हस्तिनापुर सहसा डगमगाता देख समस्त कौरवगण क्षुब्धचित्त होकर भयभीत हो गये ॥ ३२ ॥ [और कहने लगे—] “हे राम! हे राम! हे महाबाहो! क्षमा करो, क्षमा करो। हे मुसलायुध! अपना कोप शान्त करके प्रसन्न होइये ॥ ३३ ॥ हे बलराम! हम आपको पत्नीके सहित इस साम्बको सौंपते हैं। हम आपका प्रभाव नहीं जानते थे, इसीसे आपका अपराध किया; कृपया क्षमा कीजिये'' ॥ ३४ ॥
**श्रीपराशरजी बोले—**हे मुनिश्रेष्ठ! तदनन्तर कौरवोंने तुरन्त ही अपने नगरसे बाहर आकर पत्नीसहित साम्बको श्रीबलरामजीके अर्पण कर दिया ॥ ३५ ॥ तब प्रणामपूर्वक प्रिय वाक्य बोलते हुए भीष्म, द्रोण, कृप आदिसे वीरवर बलरामजीने कहा—"अच्छा मैंने क्षमा किया' ॥ ३६ ॥ हे द्विज! इस समय भी हस्तिनापुर [गंगाकी ओर] कुछ झुका हुआ-सा दिखायी देता है, यह श्रीबलरामजीके बल और शूरवीरताका परिचय देनेवाला उनका प्रभाव ही है ॥ ३७ ॥ तदनन्तर कौरवोंने बलरामजीके सहित साम्बका पूजन किया तथा बहुत-से दहेज और वधूके सहित उन्हें द्वारकापुरी भेज दिया ॥ ३८ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
४१४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३६
छत्तीसवाँ अध्याय
द्विविद-वध
| श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! बलशाली बलरामजीका ऐसा ही पराक्रम था। अब, उन्होंने जो और एक कर्म किया था वह भी सुनो॥ १॥ द्विविद नामक एक महावीर्यशाली वानरश्रेष्ठ देवविरोधी दैत्यराज नरकासुरका मित्र था॥ २॥ भगवान् कृष्णने देवराज इन्द्रकी प्रेरणासे नरकासुरका वध किया था, इसलिये वीर वानर द्विविदने देवताओंसे वैर ठाना॥ ३॥ [उसने निश्चय किया कि] "मैं मर्त्यलोकका क्षय कर दूँगा और इस प्रकार यज्ञ-यागादिका उच्छेद करके सम्पूर्ण देवताओंसे इसका बदला चुका लूँगा"॥ ४॥ तबसे वह अज्ञानमोहित होकर यज्ञोंको विध्वंस करने लगा और साधुमर्यादाको मिटाने तथा देहधारी जीवोंको नष्ट करने लगा॥ ५॥ वह वन, देश, पुर और भिन्न-भिन्न ग्रामोंको जला देता तथा कभी पर्वत गिराकर ग्रामादिकोंको चूर्ण कर डालता॥ ६॥ कभी पहाड़ोंकी चट्टान उखाड़कर समुद्रके जलमें छोड़ देता और फिर कभी समुद्रमें घुसकर उसे क्षुभित कर देता॥ ७॥ हे द्विज! उससे क्षुभित हुआ समुद्र ऊँची-ऊँची तरंगोंसे उठकर अति वेगसे युक्त हो अपने तीरवर्ती ग्राम और पुर आदिको डुबो देता था॥ ८॥ वह कामरूपी वानर महान् रूप धारणकर लोटने लगता था और अपने लुण्ठनके संघर्षसे सम्पूर्ण धान्यों (खेतों)-को कुचल डालता था॥ ९॥ हे द्विज! उस दुरात्माने इस सम्पूर्ण जगत्को स्वाध्याय और वषट्कारसे शून्य कर दिया था, जिससे यह अत्यन्त दुःखमय हो गया॥ १०॥ |
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| मैत्रेयैतद्बलं तस्य बलस्य बलशालिनः।<br>कृतं यदन्यत्तेनाभूत्तदपि श्रूयतां त्वया॥ १ | |
| नरकस्यासुरेन्द्रस्य देवपक्षविरोधिनः।<br>सखाभवन्महावीर्यो द्विविदो वानरर्षभः॥ २ | |
| वैरानुबन्धं बलवान्स चकार सुरान्प्रति।<br>नरकं हतवान्कृष्णो देवराजेन चोदितः॥ ३ | |
| करिष्ये सर्वदेवानां तस्मादेतत्प्रतिक्रियाम्।<br>यज्ञविध्वंसनं कुर्वन् मर्त्यलोकक्षयं तथा॥ ४ | |
| ततो विध्वंसयामास यज्ञानज्ञानमोहितः।<br>बिभेद साधुमर्यादां क्षयं चक्रे च देहिनाम्॥ ५ | |
| ददाह सवनान्देशान्पुर्ग्रामान्तराणि च।<br>क्वचिच्च पर्वताक्षेपैर्ग्रामादीन्ससमचूर्णयत्॥ ६ | |
| शैलानुत्पाट्य तोयेषु मुमोचाम्बुनिधौ तथा।<br>पुनश्चार्णवमध्यस्थः क्षोभयामास सागरम्॥ ७ | |
| तेन विक्षोभितश्चाब्धिरुद्वेलो द्विज जायते।<br>प्लावयंस्तीरजान्ग्रामान्पुरादीनतिवेगवान्॥ ८ | |
| कामरूपी महारूपं कृत्वा सस्यान्यशेषतः।<br>लुठन्भ्रमणसम्मर्दैस्सञ्चूर्णयति वानरः॥ ९ | |
| तेन विप्रकृतं सर्वं जगदेतदुरात्मना।<br>निस्स्वाध्यायवषट्कारं मैत्रेयासीत्सुदुःखितम्॥ १० | |
| एकदा रैवतोद्याने पपौ पानं हलायुधः।<br>रेवती च महाभागा तथैवान्या वरस्त्रियः॥ ११ | एक दिन श्रीबलभद्रजी रैवतोद्यानमें [क्रीड़ासक्त होकर] मद्यपान कर रहे थे। साथ ही महाभागा रेवती तथा अन्य सुन्दर रमणियाँ भी थीं॥ ११॥ उस समय यदुश्रेष्ठ श्रीबलरामजी मन्दराचलपर्वतपर कुबेरके समान [रैवतकपर स्वयं] रमण कर रहे थे॥ १२॥ इसी समय वहाँ द्विविद वानर आया और श्रीहलधरके हल और मूसल लेकर उनके सामने ही उनकी नकल करने लगा॥ १३॥ वह दुरात्मा वानर उन स्त्रियोंकी ओर देख-देखकर हँसने लगा और उसने मदिरासे भरे हुए घड़े फोड़कर फेंक दिये॥ १४॥ |
| उद्गीयमानो विलसल्ललनामौलिमध्यगः।<br>रेमे यदुकुलश्रेष्ठः कुबेर इव मन्दरे॥ १२ | |
| ततस्स वानरोऽभ्येत्य गृहीत्वा सीरिणो हलम्।<br>मुसलं च चकारास्य सम्मुखं च विडम्बनम्॥ १३ | |
| तथैव योषितां तासां जहासाभिमुखं कपिः।<br>पानपूर्णांश्च करकाञ्जिक्षेपाहत्य वै तदा॥ १४ |
अ० ३७ ] * पञ्चम अंश * ४१५
ततः कोपपरीतात्मा भर्त्सयामास तं हली।
तथापि तमवज्ञाय चक्रे किलकिलध्वनिम् ॥ १५
ततः स्मयित्वा स बलो जग्राह मुसलं रुषा।
सोऽपि शैलशिलां भीमां जग्राह प्लवगोत्तमः ॥ १६
चिक्षेप स च तां क्षिप्तां मुसलेन सहस्रधा।
बिभेद यादवश्रेष्ठस्सा पपात महीतले ॥ १७
अथ तन्मुसलं चासौ समुल्लङ्घ्य प्लवङ्गमः।
वेगेनागत्य रोषेण करेणोरस्यताडयत् ॥ १८
ततो बलेन कोपेन मुष्टिना मूर्ध्नि ताडितः।
पपात रुधिरोद्गारी द्विविदः क्षीणजीवितः ॥ १९
पतता तच्छरीरेण गिरेशृङ्गमशीर्यत।
मैत्रेय शतधा वज्रिवज्रेणेव विदारितम् ॥ २०
पुष्पवृष्टिं ततो देवा रामस्योपरि चिक्षिपुः।
प्रशंसुस्ततोऽभ्येत्य साध्वेतत्ते महत्कृतम् ॥ २१
अनेन दुष्टकपिना दैत्यपक्षोपकारिणा।
जगन्निराकृतं वीर दिष्ट्या स क्षयमागतः ॥ २२
इत्युक्त्वा दिवमाजग्मुर्देवा हृष्टास्सगुह्यकाः ॥ २३
श्रीपराशर उवाच
एवंविधान्यनेकानि बलदेवस्य धीमतः।
कर्माण्यपरिमेयानि शेषस्य धरणीभृतः ॥ २४
तब श्रीहलधरने क्रुद्ध होकर उसे धमकाया तथापि वह उनकी अवज्ञा करके किलकारी मारने लगा ॥ १५ ॥
तदनन्तर श्रीबलरामजीने मुसकाकर क्रोधसे अपना मूसल उठा लिया तथा उस वानरने भी एक भारी चट्टान ले ली ॥ १६ ॥ और उसे बलरामजीके ऊपर फेंकी, किन्तु यदुवीर बलभद्रजीने मूसलसे उसके हजारों टुकड़े कर दिये; जिससे वह पृथिवीपर गिर पड़ी ॥ १७ ॥
तब उस वानरने बलरामजीके मूसलका वार बचाकर रोषपूर्वक अत्यन्त वेगसे उनकी छातीमें घूँसा मारा ॥ १८ ॥ तत्पश्चात् बलभद्रजीने भी क्रुद्ध होकर द्विविदके सिरमें घूँसा मारा जिससे वह रुधिर वमन करता हुआ निर्जीव होकर पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ १९ ॥
हे मैत्रेय ! उसके गिरते समय उसके शरीरका आघात पाकर इन्द्र-वज्रसे विदीर्ण होनेके समान उस पर्वतके शिखरके सैकड़ों टुकड़े हो गये ॥ २० ॥
उस समय देवतालोग बलरामजीके ऊपर फूल बरसाने लगे और वहाँ आकर "आपने यह बड़ा अच्छा किया" ऐसा कहकर उनकी प्रशंसा करने लगे ॥ २१ ॥ "हे वीर ! दैत्यपक्षके उपकारक इस दुष्ट वानरने संसारको बड़ा कष्ट दे रखा था; यह बड़े ही सौभाग्यका विषय है कि आज यह आपके हाथों मारा गया।" ऐसा कहकर गुह्यकोंके सहित देवगण अत्यन्त हर्षपूर्वक स्वर्गलोकको चले आये ॥ २२-२३ ॥
श्रीपराशरजी बोले— शेषावतार धरणीधर धीमान् बलभद्रजीके ऐसे ही अनेकों कर्म हैं, जिनका कोई परिमाण (तुलना) नहीं बताया जा सकता ॥ २४ ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
सैंतीसवाँ अध्याय
ऋषियोंका शाप, यदुवंशविनाश तथा भगवान्का स्वधाम सिधारना
श्रीपराशर उवाच
एवं दैत्यवधं कृष्णो बलदेवसहायवान्।
चक्रे दुष्टक्षितीशानां तथैव जगतः कृते ॥ १
क्षितेश्च भारं भगवान्फाल्गुनेन समन्वितः।
अवतारयामास विभुस्समस्ताक्षौहिणीवधात् ॥ २
कृत्वा भारावतरणं भुवो हत्वाखिलान्नृपान्।
शापव्याजेन विप्राणामुपसंहृतवान्कुलम् ॥ ३
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! इसी प्रकार संसारके उपकारके लिये बलभद्रजीके सहित श्रीकृष्णचन्द्रने दैत्यों और दुष्ट राजाओंका वध किया ॥ १ ॥ तथा अन्तमें अर्जुनके साथ मिलकर भगवान् कृष्णने अठारह अक्षौहिणी सेनाको मारकर पृथिवीका भार उतारा ॥ २ ॥ इस प्रकार सम्पूर्ण राजाओंको मारकर पृथिवीका भारावतरण किया और फिर ब्राह्मणोंके शापके मिषसे अपने कुलका भी उपसंहार कर दिया ॥ ३ ॥