विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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४१४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३६
छत्तीसवाँ अध्याय
द्विविद-वध
| श्रीपराशर उवाच | **श्रीपराशरजी बोले—**हे मैत्रेय! बलशाली बलरामजीका ऐसा ही पराक्रम था। अब, उन्होंने जो और एक कर्म किया था वह भी सुनो॥ १॥ द्विविद नामक एक महावीर्यशाली वानरश्रेष्ठ देवविरोधी दैत्यराज नरकासुरका मित्र था॥ २॥ भगवान् कृष्णने देवराज इन्द्रकी प्रेरणासे नरकासुरका वध किया था, इसलिये वीर वानर द्विविदने देवताओंसे वैर ठाना॥ ३॥ [उसने निश्चय किया कि] "मैं मर्त्यलोकका क्षय कर दूँगा और इस प्रकार यज्ञ-यागादिका उच्छेद करके सम्पूर्ण देवताओंसे इसका बदला चुका लूँगा"॥ ४॥ तबसे वह अज्ञानमोहित होकर यज्ञोंको विध्वंस करने लगा और साधुमर्यादाको मिटाने तथा देहधारी जीवोंको नष्ट करने लगा॥ ५॥ वह वन, देश, पुर और भिन्न-भिन्न ग्रामोंको जला देता तथा कभी पर्वत गिराकर ग्रामादिकोंको चूर्ण कर डालता॥ ६॥ कभी पहाड़ोंकी चट्टान उखाड़कर समुद्रके जलमें छोड़ देता और फिर कभी समुद्रमें घुसकर उसे क्षुभित कर देता॥ ७॥ हे द्विज! उससे क्षुभित हुआ समुद्र ऊँची-ऊँची तरंगोंसे उठकर अति वेगसे युक्त हो अपने तीरवर्ती ग्राम और पुर आदिको डुबो देता था॥ ८॥ वह कामरूपी वानर महान् रूप धारणकर लोटने लगता था और अपने लुण्ठनके संघर्षसे सम्पूर्ण धान्यों (खेतों)-को कुचल डालता था॥ ९॥ हे द्विज! उस दुरात्माने इस सम्पूर्ण जगत्को स्वाध्याय और वषट्कारसे शून्य कर दिया था, जिससे यह अत्यन्त दुःखमय हो गया॥ १०॥ |
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| मैत्रेयैतद्बलं तस्य बलस्य बलशालिनः।<br>कृतं यदन्यत्तेनाभूत्तदपि श्रूयतां त्वया॥ १ | |
| नरकस्यासुरेन्द्रस्य देवपक्षविरोधिनः।<br>सखाभवन्महावीर्यो द्विविदो वानरर्षभः॥ २ | |
| वैरानुबन्धं बलवान्स चकार सुरान्प्रति।<br>नरकं हतवान्कृष्णो देवराजेन चोदितः॥ ३ | |
| करिष्ये सर्वदेवानां तस्मादेतत्प्रतिक्रियाम्।<br>यज्ञविध्वंसनं कुर्वन् मर्त्यलोकक्षयं तथा॥ ४ | |
| ततो विध्वंसयामास यज्ञानज्ञानमोहितः।<br>बिभेद साधुमर्यादां क्षयं चक्रे च देहिनाम्॥ ५ | |
| ददाह सवनान्देशान्पुर्ग्रामान्तराणि च।<br>क्वचिच्च पर्वताक्षेपैर्ग्रामादीन्ससमचूर्णयत्॥ ६ | |
| शैलानुत्पाट्य तोयेषु मुमोचाम्बुनिधौ तथा।<br>पुनश्चार्णवमध्यस्थः क्षोभयामास सागरम्॥ ७ | |
| तेन विक्षोभितश्चाब्धिरुद्वेलो द्विज जायते।<br>प्लावयंस्तीरजान्ग्रामान्पुरादीनतिवेगवान्॥ ८ | |
| कामरूपी महारूपं कृत्वा सस्यान्यशेषतः।<br>लुठन्भ्रमणसम्मर्दैस्सञ्चूर्णयति वानरः॥ ९ | |
| तेन विप्रकृतं सर्वं जगदेतदुरात्मना।<br>निस्स्वाध्यायवषट्कारं मैत्रेयासीत्सुदुःखितम्॥ १० | |
| एकदा रैवतोद्याने पपौ पानं हलायुधः।<br>रेवती च महाभागा तथैवान्या वरस्त्रियः॥ ११ | एक दिन श्रीबलभद्रजी रैवतोद्यानमें [क्रीड़ासक्त होकर] मद्यपान कर रहे थे। साथ ही महाभागा रेवती तथा अन्य सुन्दर रमणियाँ भी थीं॥ ११॥ उस समय यदुश्रेष्ठ श्रीबलरामजी मन्दराचलपर्वतपर कुबेरके समान [रैवतकपर स्वयं] रमण कर रहे थे॥ १२॥ इसी समय वहाँ द्विविद वानर आया और श्रीहलधरके हल और मूसल लेकर उनके सामने ही उनकी नकल करने लगा॥ १३॥ वह दुरात्मा वानर उन स्त्रियोंकी ओर देख-देखकर हँसने लगा और उसने मदिरासे भरे हुए घड़े फोड़कर फेंक दिये॥ १४॥ |
| उद्गीयमानो विलसल्ललनामौलिमध्यगः।<br>रेमे यदुकुलश्रेष्ठः कुबेर इव मन्दरे॥ १२ | |
| ततस्स वानरोऽभ्येत्य गृहीत्वा सीरिणो हलम्।<br>मुसलं च चकारास्य सम्मुखं च विडम्बनम्॥ १३ | |
| तथैव योषितां तासां जहासाभिमुखं कपिः।<br>पानपूर्णांश्च करकाञ्जिक्षेपाहत्य वै तदा॥ १४ |