भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 426

अ० ३७ ] * पञ्चम अंश * ४१५


ततः कोपपरीतात्मा भर्त्सयामास तं हली।
तथापि तमवज्ञाय चक्रे किलकिलध्वनिम् ॥ १५

ततः स्मयित्वा स बलो जग्राह मुसलं रुषा।
सोऽपि शैलशिलां भीमां जग्राह प्लवगोत्तमः ॥ १६

चिक्षेप स च तां क्षिप्तां मुसलेन सहस्रधा।
बिभेद यादवश्रेष्ठस्सा पपात महीतले ॥ १७

अथ तन्मुसलं चासौ समुल्लङ्घ्य प्लवङ्गमः।
वेगेनागत्य रोषेण करेणोरस्यताडयत् ॥ १८

ततो बलेन कोपेन मुष्टिना मूर्ध्नि ताडितः।
पपात रुधिरोद्गारी द्विविदः क्षीणजीवितः ॥ १९

पतता तच्छरीरेण गिरेशृङ्गमशीर्यत।
मैत्रेय शतधा वज्रिवज्रेणेव विदारितम् ॥ २०

पुष्पवृष्टिं ततो देवा रामस्योपरि चिक्षिपुः।
प्रशंसुस्ततोऽभ्येत्य साध्वेतत्ते महत्कृतम् ॥ २१

अनेन दुष्टकपिना दैत्यपक्षोपकारिणा।
जगन्निराकृतं वीर दिष्ट्या स क्षयमागतः ॥ २२

इत्युक्त्वा दिवमाजग्मुर्देवा हृष्टास्सगुह्यकाः ॥ २३

श्रीपराशर उवाच
एवंविधान्यनेकानि बलदेवस्य धीमतः।
कर्माण्यपरिमेयानि शेषस्य धरणीभृतः ॥ २४

तब श्रीहलधरने क्रुद्ध होकर उसे धमकाया तथापि वह उनकी अवज्ञा करके किलकारी मारने लगा ॥ १५ ॥
तदनन्तर श्रीबलरामजीने मुसकाकर क्रोधसे अपना मूसल उठा लिया तथा उस वानरने भी एक भारी चट्टान ले ली ॥ १६ ॥ और उसे बलरामजीके ऊपर फेंकी, किन्तु यदुवीर बलभद्रजीने मूसलसे उसके हजारों टुकड़े कर दिये; जिससे वह पृथिवीपर गिर पड़ी ॥ १७ ॥
तब उस वानरने बलरामजीके मूसलका वार बचाकर रोषपूर्वक अत्यन्त वेगसे उनकी छातीमें घूँसा मारा ॥ १८ ॥ तत्पश्चात् बलभद्रजीने भी क्रुद्ध होकर द्विविदके सिरमें घूँसा मारा जिससे वह रुधिर वमन करता हुआ निर्जीव होकर पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ १९ ॥
हे मैत्रेय ! उसके गिरते समय उसके शरीरका आघात पाकर इन्द्र-वज्रसे विदीर्ण होनेके समान उस पर्वतके शिखरके सैकड़ों टुकड़े हो गये ॥ २० ॥
उस समय देवतालोग बलरामजीके ऊपर फूल बरसाने लगे और वहाँ आकर "आपने यह बड़ा अच्छा किया" ऐसा कहकर उनकी प्रशंसा करने लगे ॥ २१ ॥ "हे वीर ! दैत्यपक्षके उपकारक इस दुष्ट वानरने संसारको बड़ा कष्ट दे रखा था; यह बड़े ही सौभाग्यका विषय है कि आज यह आपके हाथों मारा गया।" ऐसा कहकर गुह्यकोंके सहित देवगण अत्यन्त हर्षपूर्वक स्वर्गलोकको चले आये ॥ २२-२३ ॥

श्रीपराशरजी बोले— शेषावतार धरणीधर धीमान् बलभद्रजीके ऐसे ही अनेकों कर्म हैं, जिनका कोई परिमाण (तुलना) नहीं बताया जा सकता ॥ २४ ॥

इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥


सैंतीसवाँ अध्याय

ऋषियोंका शाप, यदुवंशविनाश तथा भगवान्‌का स्वधाम सिधारना

श्रीपराशर उवाच
एवं दैत्यवधं कृष्णो बलदेवसहायवान्।
चक्रे दुष्टक्षितीशानां तथैव जगतः कृते ॥ १

क्षितेश्च भारं भगवान्फाल्गुनेन समन्वितः।
अवतारयामास विभुस्समस्ताक्षौहिणीवधात् ॥ २

कृत्वा भारावतरणं भुवो हत्वाखिलान्नृपान्।
शापव्याजेन विप्राणामुपसंहृतवान्कुलम् ॥ ३

श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! इसी प्रकार संसारके उपकारके लिये बलभद्रजीके सहित श्रीकृष्णचन्द्रने दैत्यों और दुष्ट राजाओंका वध किया ॥ १ ॥ तथा अन्तमें अर्जुनके साथ मिलकर भगवान् कृष्णने अठारह अक्षौहिणी सेनाको मारकर पृथिवीका भार उतारा ॥ २ ॥ इस प्रकार सम्पूर्ण राजाओंको मारकर पृथिवीका भारावतरण किया और फिर ब्राह्मणोंके शापके मिषसे अपने कुलका भी उपसंहार कर दिया ॥ ३ ॥