विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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४१६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३७
| उत्सृज्य द्वारकां कृष्णस्त्यक्त्वा मानुष्यमात्मनः।<br>सांशो विष्णुमयं स्थानं प्रविवेश मुने निजम्॥ ४ | हे मुने! अन्तमें द्वारकापुरीको छोड़कर तथा अपने मानव-शरीरको त्यागकर श्रीकृष्णचन्द्रने अपने अंश (बलराम-प्रद्युम्नादि)-के सहित अपने विष्णुमय धाममें प्रवेश किया॥ ४॥ |
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| श्रीमैत्रेय उवाच | |
| स विप्रशापव्याजेन संजह्रे स्वकुलं कथम्।<br>कथं च मानुषं देहमुत्ससर्ज जनार्दनः॥ ५ | श्रीमैत्रेयजी बोले— हे मुने! श्रीजनार्दनने विप्रशापके मिषसे किस प्रकार अपने कुलका नाश किया और अपने मानव-देहको किस प्रकार छोड़ा?॥५॥ |
| श्रीपराशर उवाच | |
| विश्वामित्रस्तथा कण्वो नारदश्च महामुनिः।<br>पिण्डारके महातीर्थे दृष्टा यदुकुमारकैः॥ ६ | श्रीपराशरजी बोले— एक बार कुछ यदुकुमारोंने महातीर्थ पिण्डारक क्षेत्रमें विश्वामित्र, कण्व और नारद आदि महामुनियोंको देखा॥ ६॥ |
| ततस्ते यौवनोन्मत्ता भाविकार्यप्रचोदिताः।<br>साम्बं जाम्बवतीपुत्रं भूषयित्वा स्त्रियं यथा॥ ७ | तब यौवनसे उन्मत्त हुए उन बालकोंने होनहारकी प्रेरणासे जाम्बवतीके पुत्र साम्बका स्त्री वेष बनाकर उन मुनीश्वरोंको प्रणाम करनेके अनन्तर अति नम्रतासे पूछा—‘‘इस स्त्रीको पुत्रकी इच्छा है, हे मुनिजन ! कहिये यह क्या जनेगी ?’’ ॥ ७-८॥ |
| प्रश्रितास्तान्मुनीनूचुः प्रणिपातपुरस्सरम्।<br>इयं स्त्री पुत्रकामा वै ब्रूत किं जनयिष्यति॥ ८ | |
| श्रीपराशर उवाच | |
| दिव्यज्ञानोपपन्नास्ते विप्रलब्धाः कुमारकैः।<br>मुनयः कुपिताः प्रोचुर्मुसलं जनयिष्यति॥ ९ | श्रीपराशरजी बोले— यदुकुमारोंके इस प्रकार धोखा देनेपर उन दिव्य ज्ञानसम्पन्न मुनिजनोंने कुपित होकर कहा—‘‘यह एक लोकोत्तर मूसल जनेगी, जो समस्त यादवोंके नाशका कारण होगा और जिससे यादवोंका सम्पूर्ण कुल संसारमें निर्मूल हो जायगा॥९-१०॥ |
| सर्वयादवसंहारकारणं भुवनोत्तरम्।<br>येनाखिलकुलोत्सादो यादवानां भविष्यति॥ १० | |
| इत्युक्तास्ते कुमारास्तु आचचक्षुर्यथातथम्।<br>उग्रसेनाय मुसलं जज्ञे साम्बस्य चोदरात्॥ ११ | मुनिगणके इस प्रकार कहनेपर उन कुमारोंने सम्पूर्ण वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों राजा उग्रसेनसे कह दिया तथा साम्बके पेटसे एक मूसल उत्पन्न हुआ॥ ११॥ |
| तदुग्रसेनो मुसलमयश्चूर्णमकारयत्।<br>जज्ञे तदेरकाचूर्णं प्रक्षिप्तं तैर्महोदधौ॥ १२ | उग्रसेनने उस लोहमय मूसलका चूर्ण करा डाला और उसे उन बालकोंने [ले जाकर] समुद्रमें फेंक दिया, उससे वहाँ बहुत-से सरकण्डे उत्पन्न हो गये॥ १२॥ |
| मुसलस्याथ लोहस्य चूर्णितस्य तु यादवैः।<br>खण्डं चूर्णितशेषं तु ततो यत्तोमराकृति॥ १३ | यादवोंद्वारा चूर्ण किये गये इस मूसलके लोहेका जो भालेकी नोंकके समान एक खण्ड चूर्ण करनेसे बचा उसे भी समुद्रहीमें फिकवा दिया। |
| तदप्यम्बुनिधौ क्षिप्तं मत्स्यो जग्राह जालिभिः।<br>घातितस्योदरात्तस्य लुब्धो जग्राह तज्जराः॥ १४ | उसे एक मछली निगल गयी। उस मछलीको मछेरोंने पकड़ लिया तथा चीरनेपर उसके पेटसे निकले हुए उस मूसलखण्डको जरा नामक व्याधने ले लिया॥ १३-१४॥ |
| विज्ञातपरमार्थोऽपि भगवान्मधुसूदनः।<br>नैच्छत्तदन्यथा कर्तुं विधिना यत्समीहितम्॥ १५ | भगवान् मधुसूदन इन समस्त बातोंको यथावत् जानते थे तथापि उन्होंने विधाताकी इच्छाको अन्यथा करना न चाहा॥ १५॥ |
| देवैश्च प्रहितो वायुः प्रणिपत्याह केशवम्।<br>रहस्येवमहं दूतः प्रहितो भगवन्सुरैः॥ १६ | इसी समय देवताओंने वायुको भेजा। उसने एकान्तमें श्रीकृष्णचन्द्रको प्रणाम करके कहा—‘‘भगवन्! मुझे देवताओंने दूत बनाकर भेजा है॥ १६॥ |
| वस्वश्विमरुदादित्यरुद्रसाध्यादिभिस्सह।<br>विज्ञापयति शक्रस्त्वां तदिदं श्रूयतां विभो॥ १७ | ‘हे विभो! वसुगण, अश्विनीकुमार, रुद्र, आदित्य, मरुद्गण और साध्यादिके सहित इन्द्रने आपको जो सन्देश भेजा है वह सुनिये॥ १७॥ |