भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 428, कुल 558 में से

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पृष्ठ 428

अ० ३७ ]

  • पञ्चम अंश * ४१७

भारावतरणार्थाय वर्षाणामधिकं शतम्। भगवानवतीर्णोऽत्र त्रिदशैस्सह चोदितः ॥ १८

दुर्वृत्ता निहता दैत्या भुवो भारोऽवतारितः। त्वया सनाथास्त्रिदशा भवन्तु त्रिदिवे सदा ॥ १९

तदतीतं जगन्नाथ वर्षाणामधिकं शतम्। इदानीं गम्यतां स्वर्गो भवता यदि रोचते ॥ २०

देवैर्विज्ञाप्यते देव तथात्रैव रतिस्तव। तत्स्थीयतां यथाकालमाख्येयमनुजीविभिः ॥ २१

श्रीभगवानुवाच

यत्त्वमात्थाखिलं दूत वेद्म्येतदहमप्युत। प्रारब्ध एव हि मया यादवानां परिक्षयः ॥ २२

भुवो नाद्यापि भारोऽयं यादवर्रैनिबर्हितैः। अवतार्य करोम्येतत्सप्तरात्रेण सत्वरः ॥ २३

यथा गृहीतामम्भोधेर्दत्त्वाहं द्वारकाभुवम्। यादवानुपसंहृत्य यास्यामि त्रिदशालयम् ॥ २४

मनुष्यदेहमुत्सृज्य संकर्षणसहायवान्। प्राप्त एवास्मि मन्तव्यो देवेन्द्रेण तथामरैः ॥ २५

जरासन्धादयो येऽन्ये निहता भारहेतवः। क्षितेस्तेभ्यः कुमारोऽपि यदूनां नापचीयते ॥ २६

तदेतं सुमहाभारमवतार्य क्षितेरहम्। यास्याम्यमरलोकस्य पालनाय ब्रवीहि तान् ॥ २७

श्रीपराशर उवाच

इत्युक्तो वासुदेवेन देवदूतः प्रणम्य तम्। मैत्रेय दिव्यया गत्या देवराजान्तिकं ययौ ॥ २८

भगवानप्यथोत्पातान्दिव्यभौमान्तरिक्षजान्। ददर्श द्वारकापुर्यां विनाशाय दिवानिशम् ॥ २९

तान्दृष्ट्वा यादवानाह पश्यध्वमतिदारुणान्। महोत्पाताञ्छ्छमायैषां प्रभासं याम मा चिरम् ॥ ३०

श्रीपराशर उवाच

एवमुक्ते तु कृष्णेन यादवप्रवरस्ततः। महाभागवतः प्राह प्रणिपत्योद्धवो हरिम् ॥ ३१

हे भगवन्! देवताओंकी प्रेरणासे उनके ही साथ पृथिवीका भार उतारनेके लिये अवतीर्ण हुए आपको सौ वर्षसे अधिक बीत चुके हैं ॥ १८ ॥ अब आप दुराचारी दैत्योंको मार चुके और पृथिवीका भार भी उतार चुके, अतः [हमारी प्रार्थना है कि] अब देवगण सर्वदा स्वर्गमें ही आपसे सनाथ हों [अर्थात् आप स्वर्ग पधारकर देवताओंको सनाथ करें] ॥ १९ ॥ हे जगन्नाथ! आपको भूमण्डलमें पधारे हुए सौ वर्षसे अधिक हो गये, अब यदि आपको पसन्द आवे तो स्वर्गलोक पधारिये ॥ २० ॥ हे देव! देवगणका यह भी कथन है कि यदि आपको यहीं रहना अच्छा लगे तो रहें, सेवकोंका तो यही धर्म है कि [स्वामीको] यथासमय कर्तव्यका निवेदन कर दें' ॥ २१ ॥

श्रीभगवान् बोले— हे दूत! तुम जो कुछ कहते हो वह मैं सब जानता हूँ, इसलिये अब मैंने यादवोंके नाशका आरम्भ कर ही दिया है ॥ २२ ॥ इन यादवोंका संहार हुए बिना अभीतक पृथिवीका भार हल्का नहीं हुआ है, अतः अब सात रात्रिके भीतर [इनका संहार करके] पृथिवीका भार उतारकर मैं शीघ्र ही [जैसा तुम कहते हो] वही करूँगा ॥ २३ ॥ जिस प्रकार यह द्वारकाकी भूमि मैंने समुद्रसे माँगी थी इसे उसी प्रकार उसे लौटाकर तथा यादवोंका उपसंहार कर मैं स्वर्गलोकमें आऊँगा ॥ २४ ॥ अब देवराज इन्द्र और देवताओंको यह समझना चाहिये कि संकर्षणके सहित मैं मनुष्य-शरीरको छोड़कर स्वर्ग पहुँच ही चुका हूँ ॥ २५ ॥ पृथिवीके भारभूत जो जरासन्ध आदि अन्य राजागण मारे गये हैं, ये यदुकुमार भी उनसे कम नहीं हैं ॥ २६ ॥ अतः तुम देवताओंसे जाकर कहो कि मैं पृथिवीके इस महाभारको उतारकर ही देवलोकका पालन करनेके लिये स्वर्गमें आऊँगा ॥ २७ ॥

श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! भगवान् वासुदेवके इस प्रकार कहनेपर देवदूत वायु उन्हें प्रणाम करके अपनी दिव्य गतिसे देवराजके पास चले आये ॥ २८ ॥ भगवान्ने देखा कि द्वारकापुरीमें रात-दिन नाशके सूचक दिव्य, भौम और अन्तरिक्ष-सम्बन्धी महान् उत्पात हो रहे हैं ॥ २९ ॥ उन उत्पातोंको देखकर भगवान्ने यादवोंसे कहा— "देखो, ये कैसे घोर उपद्रव हो रहे हैं, चलो, शीघ्र ही इनकी शान्तिके लिये प्रभासक्षेत्रको चलें' ॥ ३० ॥

श्रीपराशरजी बोले— कृष्णचन्द्रके ऐसा कहनेपर महाभागवत यादवश्रेष्ठ उद्धवने श्रीहरिको प्रणाम करके

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