भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 429, कुल 558 में से

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पृष्ठ 429
४१८* श्रीविष्णुपुराण *[ अ० ३७

भगवन्मन्मया कार्यं तदाज्ञापय साम्प्रतम्।
मन्ये कुलमिदं सर्वं भगवान्संहरिष्यति॥ ३२
नाशायास्य निमित्तानि कुलस्याच्युत लक्षये॥ ३३
श्रीभगवानुवाच
गच्छ त्वं दिव्यया गत्या मत्प्रसादसमुत्थया।
यद्बदर्याश्रमं पुण्यं गन्धमादनपर्वते।
नरनारायणस्थाने तत्पवित्रं महीतले॥ ३४
मन्मना मत्प्रसादेन तत्र सिद्धिमवाप्स्यसि।
अहं स्वर्गं गमिष्यामि ह्युपसंहृत्य वै कुलम्॥ ३५
द्वारकां च मया त्यक्तां समुद्रः प्लावयिष्यति।
मद्देशम चैकं मुक्त्वा तु भयान्मत्तो जलाशये।
तत्र सन्निहितश्चाहं भक्तानां हितकाम्यया॥ ३६
श्रीपराशर उवाच
इत्युक्तः प्रणिपत्यैनं जगामाशु तपोवनम्।
नरनारायणस्थानं केशवेनानुमोदितः॥ ३७
ततस्ते यादवास्सर्वे रथानारुह्य शीघ्रगान्।
प्रभासं प्रययुस्सार्धं कृष्णरामादिभिर्द्विज॥ ३८
प्रभासं समनुप्राप्ताः कुकुरान्धकवृष्णयः।
चक्रुस्तत्र महापानं वासुदेवेन चोदिताः॥ ३९
पिबतां तत्र चैतेषां सङ्घर्षेण परस्परम्।
अतिवादेन्धनो जज्ञे कलहाग्निः क्षयावहः॥ ४०
श्रीमैत्रेय उवाच
स्वं स्वं वै भुञ्जतां तेषां कलहः किन्निमित्तकः।
सङ्घर्षो वा द्विजश्रेष्ठ तन्ममाख्यातुमर्हसि॥ ४१
श्रीपराशर उवाच
मृष्टं मदीयमनं ते न मृष्टमिति जल्पताम्।
मृष्टामृष्टकथा जज्ञे सङ्घर्षकलहौ ततः॥ ४२
ततश्चान्योन्यमभ्येत्य क्रोधसंरक्तलोचनाः।
जघ्नुः परस्परं ते तु शस्त्रैर्देवबलात्कृताः॥ ४३
क्षीणशस्त्राश्च जगृहुः प्रत्यासन्नामथैरकाम्॥ ४४

कहा—॥ ३१॥ “भगवन्! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि अब आप इस कुलका नाश करेंगे; क्योंकि हे अच्युत! इस समय सब ओर इसके नाशके सूचक कारण दिखायी दे रहे हैं, अतः मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं क्या करूँ?”॥ ३२-३३॥
श्रीभगवान् बोले—हे उद्धव! अब तुम मेरी कृपासे प्राप्त हुई दिव्य गतिसे नर-नारायणके निवासस्थान गन्धमादनपर्वतपर जो पवित्र बदरिकाश्रम क्षेत्र है वहाँ जाओ। पृथवीतलपर वही सबसे पावन स्थान है॥ ३४॥ वहाँपर मुझमें चित्त लगाकर तुम मेरी कृपासे सिद्धि प्राप्त करोगे। अब मैं भी इस कुलका संहार करके स्वर्गलोकको चला जाऊँगा॥ ३५॥ मेरे छोड़ देनेपर सम्पूर्ण द्वारकाको समुद्र जलमें डुबो देगा; मुझसे भय माननेके कारण केवल मेरे भवनको छोड़ देगा; अपने इस भवनमें मैं भक्तोंकी हितकामनासे सर्वदा निवास करता हूँ॥ ३६॥
श्रीपराशरजी बोले—भगवान्‌के ऐसा कहनेपर उद्धवजी उन्हें प्रणामकर तुरन्त ही उनके बतलाये हुए तपोवन श्रीनरनारायणके स्थानको चले गये॥ ३७॥ हे द्विज! तदनन्तर कृष्ण और बलराम आदिके सहित सम्पूर्ण यादव शीघ्रगामी रथोंपर चढ़कर प्रभासक्षेत्रमें आये॥ ३८॥ वहाँ पहुँचकर कुकुर, अन्धक और वृष्णि आदि वंशोंके समस्त यादवोंने कृष्णचन्द्रकी प्रेरणासे महापान और भोजन$^१$ किया॥ ३९॥ पान करते समय उनमें परस्पर कुछ विवाद हो जानेसे वहाँ कुवाक्यरूप ईंधनसे युक्त प्रलयकारिणी कलहाग्नि धधक उठी॥ ४०॥
श्रीमैत्रेयजी बोले—हे द्विज! अपना-अपना भोजन करते हुए उन यादवोंमें किस कारणसे कलह (वाग्युद्ध) अथवा संघर्ष (हाथापाई) हुआ, सो आप कहिये॥ ४१॥
श्रीपराशरजी बोले—'मेरा भोजन शुद्ध है, तेरा अच्छा नहीं है।' इस प्रकार भोजनके अच्छे-बुरेकी चर्चा करते-करते उनमें परस्पर विवाद और हाथापाई हो गयी॥ ४२॥ तब वे दैवी प्रेरणासे विवश होकर आपसमें क्रोधसे रक्तनेत्र हुए एक-दूसरेपर शस्त्रप्रहार करने लगे और जब शस्त्र समाप्त हो गये तो पासहीमें उगे हुए सरकण्डे ले लिये॥ ४३-४४॥


१. मैत्रेयजीके अग्रिम प्रश्न और पराशरजीके उत्तरसे वहाँ यदुवंशियोंका अन्न-भोजन करना भी सिद्ध होता है।

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