भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 430, कुल 558 में से

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पृष्ठ 430

अ० ३७ ] * पञ्चम अंश * ४१९

एरका तु गृहीता वै वज्रभूतेव लक्ष्यते ।<br>तया परस्परं जघ्नुस्संग्रहारे सुदारुणे ॥ ४५<br>प्रद्युम्नसाम्बप्रमुखाः कृतवर्माथ सात्यकिः ।<br>अनिरुद्धादयश्चान्ये पृथुर्विपृथुरेव च ॥ ४६<br>चारुवर्मा चारुकश्च तथाक्रूरादयो द्विज ।<br>एरकारूपिभिर्वज्रैस्ते निजघ्नुः परस्परम् ॥ ४७<br>निवारयामास हरिर्यादवांस्ते च केशवम् ।<br>सहायं मेनिरेऽरीणां प्राप्तं जघ्नुः परस्परम् ॥ ४८<br>कृष्णोऽपि कुपितस्तेषामेरकामुष्टिमाददे ।<br>वधाय सोऽपि मुसलं मुष्टिलोंहमभूत्तदा ॥ ४९<br>जघान तेन निश्शेषांन्यादवानात्ततायिनः ।<br>जघ्नुस्ते सहसाभ्येत्य तथान्येऽपि परस्परम् ॥ ५०<br>ततश्चार्णवमध्येन जैत्रोऽसौ चक्रिणो रथः ।<br>पश्यतो दारुकस्याथ प्रायादश्वैर्धृतो द्विज ॥ ५१<br>चक्रं गदा तथा शाङ्ग्रं तूणी शङ्खोऽसिरेव च ।<br>प्रदक्षिणं हरिं कृत्वा जग्मुरादित्यवर्त्मना ॥ ५२<br>क्षणेन नाभवत्कश्चिद्यादवानांमघातितः ।<br>ऋते कृष्णं महात्मानं दारुकं च महामुने ॥ ५३<br>चङ्क्रम्यमाणौ तौ रामं वृक्षमूले कृतासनम् ।<br>ददृशाते मुखाच्चास्य निष्क्रामन्तं महोरगम् ॥ ५४<br>निष्क्रम्य स मुखात्तस्य महाभोगो भुजङ्गमः ।<br>प्रययावर्णवं सिद्धैः पूज्यमानस्तथोरगैः ॥ ५५<br>ततोऽर्घ्यमादाय तदा जलधिस्सम्मुखं ययौ ।<br>प्रविवेश ततस्तोयं पूजितः पन्नगोत्तमैः ॥ ५६<br>दृष्ट्वा बलस्य निर्याणं दारुकं प्राह केशवः ।<br>इदं सर्वं समाचक्ष्व वसुदेवोग्रसेनयोः ॥ ५७<br>निर्याणं बलभद्रस्य यादवानां तथा क्षयम् ।<br>योगे स्थित्वाहमध्येतत्परित्यक्ष्ये कलेवरम् ॥ ५८<br>वाच्यश्च द्वारकावासी जनस्सर्वस्तथाहुकः ।<br>यथेमां नगरीं सर्वां समुद्रः प्लावयिष्यति ॥ ५९<br>तस्माद्भवद्भिस्सर्वैस्तु प्रतीक्ष्यो ह्यर्जुनागमः ।<br>न स्थेयं द्वारकामध्ये निष्क्रान्ते तत्र पाण्डवे ॥ ६०उनके हाथमें लगे हुए वे सरकण्डे वज्रके समान प्रतीत होते थे, उन वज्रतुल्य सरकण्डोंसे ही वे उस दारुण युद्धमें एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे ॥ ४५ ॥<br>हे द्विज ! प्रद्युम्न और साम्ब आदि कृष्णपुत्रगण, कृतवर्मा, सात्यकि और अनिरुद्ध आदि तथा पृथु, विपृथु, चारुवर्मा, चारुक और अक्रूर आदि यादवगण एक-दूसरेपर एरकारूपी वज्रोंसे प्रहार करने लगे ॥ ४६-४७ ॥ जब श्रीहरिने उन्हें आपसमें लड़नेसे रोका तो उन्होंने उन्हें अपने प्रतिपक्षीका सहायक होकर आये हुए समझा और [ उनकी बातकी अवहेलनाकर ] एक-दूसरेको मारने लगे ॥ ४८ ॥ कृष्णचन्द्रने भी कुपित होकर उनका वध करनेके लिये एक मुट्ठी सरकण्डे उठा लिये। वे मुट्ठीभर सरकण्डे लोहेके मूसल [ समान ] हो गये ॥ ४९ ॥ उन मूसलरूप सरकण्डोंसे कृष्णचन्द्र सम्पूर्ण आततायी यादवोंको मारने लगे तथा अन्य समस्त यादव भी वहाँ आ-आकर एक-दूसरेको मारने लगे ॥ ५० ॥ हे द्विज ! तदनन्तर भगवान् कृष्णचन्द्रका जैत्र नामक रथ घोड़ोंसे आकृष्ट हो दारुकके देखते-देखते समुद्रके मध्यपथसे चला गया ॥ ५१ ॥ इसके पश्चात् भगवान्‌के शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्गधनुष, तरकश और खड्ग आदि आयुध श्रीहरिकी प्रदक्षिणा कर सूर्यमार्गसे चले गये ॥ ५२ ॥<br>हे महामुने ! एक क्षणमें ही महात्मा कृष्णचन्द्र और उनके सारथी दारुकको छोड़कर और कोई यदुवंशी जीवित न बचा ॥ ५३ ॥ उन दोनोंने वहाँ घूमते हुए देखा कि श्रीबलरामजी एक वृक्षके तले बैठे हैं और उनके मुखसे एक बहुत बड़ा सर्प निकल रहा है ॥ ५४ ॥ वह विशाल फणधारी सर्प उनके मुखसे निकलकर सिद्ध और नागोंसे पूजित हुआ समुद्रकी ओर गया ॥ ५५ ॥ उसी समय समुद्र अर्घ्य लेकर उस (महासर्प)-के सम्मुख उपस्थित हुआ और वह नागश्रेष्ठोंसे पूजित हो समुद्रमें घुस गया ॥ ५६ ॥<br>इस प्रकार श्रीबलरामजीका प्रयाण देखकर श्रीकृष्णचन्द्रने दारुकसे कहा—"तुम यह सब वृत्तान्त उग्रसेन और वसुदेवजीसे जाकर कहो" ॥ ५७ ॥ बलभद्रजीका निर्याण, यादवोंका क्षय और मैं भी योगस्थ होकर शरीर छोड़ूँगा—[ यह सब समाचार उन्हें ] जाकर सुनाओ ॥ ५८ ॥ सम्पूर्ण द्वारकावासी और आहुक (उग्रसेन)-से कहना कि अब इस सम्पूर्ण नगरीको समुद्र डुबो देगा ॥ ५९ ॥ इसलिये आप सब केवल अर्जुनके आगमनकी प्रतीक्षा और करें तथा अर्जुनके यहाँसे लौटते

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