भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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  • श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३७

तेनैव सह गन्तव्यं यत्र याति स कौरवः ॥ ६१ गत्वा च ब्रूहि कौन्तेयमर्जुनं वचनान्मम । पालनीयस्त्वया भक्त्या जनोऽयं मत्परिग्रहः ॥ ६२ त्वमर्जुनेन सहितो द्वारवत्यां तथा जनम् । गृहीत्वा याहि वज्रश्च यदुराजो भविष्यति ॥ ६३

श्रीपराशर उवाच इत्युक्तो दारुकः कृष्णं प्रणिपत्य पुनः पुनः । प्रदक्षिणं च बहुशः कृत्वा प्रायाद्यथोदितम् ॥ ६४ स च गत्वा तदाचष्ट द्वारकायां तथार्जुनम् । आनिनाय महाबुद्धिर्वज्रं चक्रे तथा नृपम् ॥ ६५ भगवानपि गोविन्दो वासुदेवात्मकं परम् । ब्रह्मात्मनि समारोप्य सर्वभूतेष्वधारयत् । निष्प्रपञ्चे महाभाग संयोज्यात्मानमात्मनि । तुर्यावस्थं सलीलं च शेते स्म पुरुषोत्तमः ॥ ६६ सम्मानयन्द्विजवचो दुर्वासा यदुवाच ह । योगयुक्तोऽभवत्पादं कृत्वा जानुनि सत्तम ॥ ६७ आययौ च जरानाम तदा तत्र स लुब्धकः । मुसलावशेषलोहैकसायकन्यस्ततोमरः ॥ ६८ स तत्पादं मृगाकारमवेक्ष्यारादवस्थितः । तले विव्याध तेनैव तोमरेण द्विजोत्तम ॥ ६९ ततश्च ददृशे तत्र चतुर्बाहुधरं नरम् । प्रणिपत्याह चैवैनं प्रसीदेति पुनः पुनः ॥ ७० अजानता कृतमिदं मया हरिणशंकया । क्षम्यतां मम पापेन दग्धं मां त्रातुमर्हसि ॥ ७१

श्रीपराशर उवाच ततस्तं भगवानाह न तेऽस्तु भयमण्वपि । गच्छ त्वं मत्प्रसादेन लुब्ध स्वर्गं सुरास्पदम् ॥ ७२ विमानमागतं सद्यस्तद्वाक्यसमनन्तरम् । आरुह्य प्रययौ स्वर्गं लुब्धकस्तत्प्रसादतः ॥ ७३

ही फिर कोई भी व्यक्ति द्वारकामें न रहे; जहाँ वे कुरुनन्दन जायँ वहीं सब लोग चले जायँ ॥ ६०-६१ ॥ कुन्तीपुत्र अर्जुनसे तुम मेरी ओरसे कहना कि "अपने सामर्थ्यानुसार तुम मेरे परिवारके लोगोंकी रक्षा करना" ॥ ६२ ॥ और तुम द्वारकावासी सभी लोगोंको लेकर अर्जुनके साथ चले जाना । [ हमारे पीछे] वज्र यदुवंशका राजा होगा ॥ ६३ ॥

श्रीपराशरजी बोले— भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके इस प्रकार कहनेपर दारुकने उन्हें बारम्बार प्रणाम किया और उनकी अनेक परिक्रमाएँ कर उनके कथनानुसार चला गया ॥ ६४ ॥ उस महाबुद्धिने द्वारकामें पहुँचकर सम्पूर्ण वृत्तान्त सुना दिया और अर्जुनको वहाँ लाकर वज्रको राज्याभिषिक्त किया ॥ ६५ ॥

इधर भगवान् कृष्णचन्द्रने समस्त भूतोंमें व्याप्त वासुदेवस्वरूप परब्रह्मको अपने आत्मामें आरोपित कर उनका ध्यान किया तथा हे महाभाग ! वे पुरुषोत्तम लीलासे ही अपने चित्तको निष्प्रपंच परमात्त्मामें लीनकर तुरीयपदमें स्थित हुए ॥ ६६ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! दुर्वासाजीने [ श्रीकृष्णचन्द्रके लिये] जैसा कहा था उस द्विज-वाक्यका* मान रखनेके लिये वे अपनी जानुओंपर चरण रखकर योगयुक्त होकर बैठे ॥ ६७ ॥ इसी समय, जिसने मूसलके बचे हुए तोमर (बाणमें लगे हुए लोहेके टुकड़े)-के आकारवाले लोहखण्डको अपने बाणकी नोंकपर लगा लिया था; वह जरा नामक व्याध वहाँ आया ॥ ६८ ॥ हे द्विजोत्तम ! उस चरणको मृगाकार देख उस व्याधने उसे दूरहीसे खड़े-खड़े उसी तोमरसे बींध डाला ॥ ६९ ॥ किंतु वहाँ पहुँचनेपर उसने एक चतुर्भुजधारी मनुष्य देखा । यह देखते ही वह चरणोंमें गिरकर बारम्बार उनसे कहने लगा—"प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये ॥ ७० ॥ मैंने बिना जाने ही मृगकी आशंकासे यह अपराध किया है, कृपया क्षमा कीजिये । मैं अपने पापसे दग्ध हो रहा हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिये" ॥ ७१ ॥

श्रीपराशरजी बोले— तब भगवान्ने उससे कहा—"लुब्धक ! तू तनिक भी न डर; मेरी कृपासे तू अभी देवताओंके स्थान स्वर्गलोकको चला जा ॥ ७२ ॥ इन भगवद्वाक्योंके समाप्त होते ही वहाँ एक विमान आया, उसपर चढ़कर वह व्याध भगवान्की कृपासे उसी समय स्वर्गको चला गया ॥ ७३ ॥


* महाभारतमें यह प्रसंग आया है कि—एक बार महर्षि दुर्वासा श्रीकृष्णचन्द्रजीके यहाँ आये और भगवान्‌से सत्कार पाकर उन्होंने कहा कि आप मेरा जूठा जल अपने सारे शरीरमें लगाइये । भगवान्‌ने वैसा ही किया, परंतु 'ब्राह्मणका जूठ पैरसे नहीं छूना चाहिये' ऐसा सोचकर पैरमें नहीं लगाया । इसपर दुर्वासाने शाप दिया कि आपके पैरमें कभी छेद हो जायगा ।