विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० ३८ ] * पञ्चम अंश * ४२१
| गते तस्मिन्स भगवान्संयोज्यात्मानमात्मनि।<br>ब्रह्मभूतेऽव्ययेऽचिन्त्ये वासुदेवमयेऽमले॥ ७४<br><br>अजन्मन्यमरे विष्ण्वावप्रमेयेऽखिलात्मनि।<br>तत्याज मानुषं देहमतीत्य त्रिविधां गतिम्॥ ७५ | उसके चले जानेपर भगवान् कृष्णचन्द्रने अपने आत्माको अव्यय, अचिन्त्य, वासुदेवस्वरूप, अमल, अजन्मा, अमर, अप्रमेय, अखिलात्मा और ब्रह्मस्वरूप विष्णुभगवान्में लीन कर त्रिगुणात्मक गतिको पार करके इस मनुष्य-शरीरको छोड़ दिया॥ ७४-७५ ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे सप्तत्रिंशोऽध्यायः॥ ३७॥
अड़तीसवाँ अध्याय
यादवोंका अन्त्येष्टि-संस्कार, परीक्षित्का राज्याभिषेक तथा पाण्डवोंका स्वर्गारोहण
| श्रीपराशर उवाच<br>अर्जुनोऽपि तदान्विष्य रामकृष्णकलेवरे।<br>संस्कारं लम्भयामास तथान्येषामनुक्रमात्॥ १<br>अष्टौ महिष्यः कथिता रुक्मिणीप्रमुखास्तु याः।<br>उपगुह्य हरेर्देहं विविशुस्ता हुताशनम्॥ २<br>रेवती चापि रामस्य देहमाश्लिष्य सत्तमा।<br>विवेश ज्वलितं वह्निं तत्सङ्गाह्लादशीतलम्॥ ३<br>उग्रसेनस्तु तच्छ्रुत्वा तथैवानकदुन्दुभिः।<br>देवकी रोहिणी चैव विविशुर्जातवेदसम्॥ ४<br>ततोऽर्जुनः प्रेतकार्यं कृत्वा तेषां यथाविधि।<br>निश्चक्राम जनं सर्वं गृहीत्वा वज्रमेव च॥ ५<br>द्वारवत्या विनिष्क्रान्ताः कृष्णपत्न्यः सहस्रशः।<br>वज्रं जनं च कौन्तेयः पालयञ्छनकैर्ययौ॥ ६<br>सभा सुधर्मा कृष्णेन मर्त्यलोके समुज्झिते।<br>स्वर्गं जगाम मैत्रेय पारिजातश्च पादपः॥ ७<br>यस्मिन्दिने हरिर्यातो दिवं सन्त्यज्य मेदिनीम्।<br>तस्मिन्नेवावतीर्णोऽयं कालकायो बली कलिः॥ ८<br>प्लावयामास तां शून्यां द्वारकां च महोदधिः।<br>वासुदेवगृहं त्वेकं न प्लावयति सागरः॥ ९<br>नातिक्रान्तुमलं ब्रह्मंस्तदद्यापि महोदधिः।<br>नित्यं सन्निहितस्तत्र भगवान्केशवो यतः॥ १० | **श्रीपराशरजी बोले—**अर्जुनने राम और कृष्ण तथा अन्यान्य मुख्य-मुख्य यादवोंके मृत देहोंकी खोज कराकर क्रमशः उन सबके और्ध्वदैहिक संस्कार किये॥ १॥ भगवान् कृष्णकी जो रुक्मिणी आदि आठ पटरानी बतलायी गयी हैं, उन सबने उनके शरीरका आलिंगन कर अग्निमें प्रवेश किया॥ २॥ सती रेवतीजी भी बलरामजीके देहका आलिंगन कर, उनके अंग-संगके आह्लादसे शीतल प्रतीत होती हुई प्रज्वलित अग्निमें प्रवेश कर गयीं॥ ३॥ इस सम्पूर्ण अनिष्टका समाचार सुनते ही उग्रसेन, वसुदेव, देवकी और रोहिणीने भी अग्निमें प्रवेश किया॥ ४॥<br>तदनन्तर अर्जुन उन सबका विधिपूर्वक प्रेत-कर्म कर वज्र तथा अन्यान्य कुटुम्बियोंको साथ लेकर द्वारकासे बाहर आये॥ ५॥ द्वारकासे निकली हुई कृष्णचन्द्रकी सहस्रों पत्नियों तथा वज्र और अन्यान्य बान्धवोंकी [सावधानीपूर्वक] रक्षा करते हुए अर्जुन धीरे-धीरे चले॥ ६॥ हे मैत्रेय! कृष्णचन्द्रके मर्त्यलोकका त्याग करते ही सुधर्मा सभा और पारिजात-वृक्ष भी स्वर्गलोकको चले गये॥ ७॥ जिस दिन भगवान् पृथिवीको छोड़कर स्वर्ग सिधारे थे, उसी दिनसे यह मलिनदेह महाबली कलियुग पृथिवीपर आ गया॥ ८॥ इस प्रकार जनशून्य द्वारकाको समुद्रने डुबो दिया, केवल एक कृष्णचन्द्रके भवनको वह नहीं डुबाता है॥ ९॥ हे ब्रह्मन्! उसे डुबानेमें समुद्र आज भी समर्थ नहीं है; क्योंकि उसमें भगवान् कृष्णचन्द्र सर्वदा निवास करते हैं॥ १०॥ |