विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 433, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४२२ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ३८ |
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तदतीव महापुण्यं सर्वपातकनाशनम्।
विष्णुश्रियान्वितं स्थानं दृष्ट्वा पापाद्विमुच्यते॥ ११
अर्थ— वह भगवदैश्वर्यसम्पन्न स्थान अति पवित्र और समस्त पापोंको नष्ट करनेवाला है; उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे छूट जाता है॥ ११॥
पार्थः पञ्चनदे देशे बहुधान्यधनान्विते।
चकार वासं सर्वस्य जनस्य मुनिसत्तमः॥ १२
अर्थ— हे मुनिश्रेष्ठ ! अर्जुनने उन समस्त द्वारकावासियोंको अत्यन्त धन-धान्य-सम्पन्न पंचनद (पंजाब) देशमें बसाया॥ १२॥
ततो लोभस्समभवत्पार्थेनैकेन धन्विना।
दृष्ट्वा स्त्रियो नीयमाना दस्यूनां निहतेश्वराः॥ १३
अर्थ— उस समय अनाथा स्त्रियोंको अकेले धनुर्धारी अर्जुनको ले जाते देख लुटेरोंको लोभ उत्पन्न हुआ॥ १३॥
ततस्ते पापकर्माणो लोभोपहतचेतसः।
आभीरा मन्त्रयामासुस्समेत्यात्यन्तदुर्मदाः॥ १४
अर्थ— तब उन अत्यन्त दुर्मद, पापकर्मा और लुब्धहृदय आभीर दस्यूओंने परस्पर मिलकर सम्मति की—॥ १४॥
अयमेकोऽर्जुनो धन्वी स्त्रीजनं निहतेश्वरम्।
नयत्यस्मानतिक्रम्य धिगेतद्भवतां बलम्॥ १५
अर्थ— 'देखो, यह धनुर्धारी अर्जुन अकेला ही हमारा अतिक्रमण करके इन अनाथा स्त्रियोंको लिये जाता है; हमारे ऐसे बल-पुरुषार्थको धिक्कार है!॥ १५॥
हत्वा गर्वसमारूढो भीष्मद्रोणजयद्रथान्।
कर्णादींश्च न जानाति बलं ग्रामनिवासिनाम्॥ १६
अर्थ— यह भीष्म, द्रोण, जयद्रथ और कर्ण आदि [नगर-निवासियों]-को मारकर ही इतना अभिमानी हो गया है, अभी हम ग्रामीणोंके बलको यह नहीं जानता॥ १६॥
यष्टिहस्तानवेक्ष्यास्मानधनुष्पाणिस्स दुर्मतिः।
सर्वानैवावजानाति किं वो बाहुभिरुन्नतैः॥ १७
अर्थ— हमारे हाथोंमें लाठी देखकर यह दुर्मति धनुष लेकर हम सबकी अवज्ञा करता है, फिर हमारी इन ऊँची-ऊँची भुजाओंसे क्या लाभ है?'॥ १७॥
ततो यष्टिप्रहरणा दस्यवो लोष्टधारिणः।
सहस्रशोऽभ्यधावन्त तं जनं निहतेश्वरम्॥ १८
अर्थ— ऐसी सम्मतिकर वे सहस्रों लुटेरे लाठी और ढेले लेकर उन अनाथ द्वारकावासियोंपर टूट पड़े॥ १८॥
ततो निर्भर्त्स्य कौन्तेयः प्राहाभीरान्हसन्निव।
निवर्त्तध्वमधर्मज्ञा यदि न स्थ मुमूर्षवः॥ १९
अर्थ— तब अर्जुनने उन लुटेरोंको झिड़ककर हँसते हुए कहा—'अरे पापियो! यदि तुम्हें मरनेकी इच्छा न हो तो अभी लौट जाओ'॥ १९॥
अवज्ञाय वचस्तस्य जगृहुस्ते तदा धनम्।
स्त्रीधनं चैव मैत्रेय विष्वक्सेनपरिग्रहम्॥ २०
अर्थ— किन्तु हे मैत्रेय! लुटेरोंने उनके कथनपर कुछ भी ध्यान न दिया और भगवान् कृष्णके सम्पूर्ण धन और स्त्रीधनको अपने अधीन कर लिया॥ २०॥
ततोऽर्जुनो धनुर्दिव्यं गाण्डीवमजरं युधि।
आरोपयितुमारेभे न शशाक च वीर्यवान्॥ २१
अर्थ— तब वीरवर अर्जुनने युद्धमें अक्षीण अपने गाण्डीव धनुषको चढ़ाना चाहा; किन्तु वे ऐसा न कर सके॥ २१॥
चकार सज्यं कृच्छ्राच्च तच्चाभूच्छिथिलं पुनः।
न सस्मार ततोऽस्त्राणि चिन्तयन्नपि पाण्डवः॥ २२
अर्थ— उन्होंने जैसे-तैसे अति कठिनतासे उसपर प्रत्यंचा (डोरी) चढ़ा भी ली तो फिर वे शिथिल हो गये और बहुत कुछ सोचनेपर भी उन्हें अपने अस्त्रोंका स्मरण न हुआ॥ २२॥
शरान्मुमोच चैतेषु पार्थो वैरिष्वमर्षितः।
त्वग्भेदं ते परं चक्रुरस्ता गाण्डीवधन्विना॥ २३
अर्थ— तब वे क्रुद्ध होकर अपने शत्रुओंपर बाण बरसाने लगे; किन्तु गाण्डीवधारी अर्जुनके छोड़े हुए उन बाणोंने केवल उनकी त्वचाको ही बींधा॥ २३॥
वह्निना येऽक्षया दत्ताश्शरास्तेऽपि क्षयं ययुः।
युद्ध्यतस्सह गोपालैरर्जुनस्य भवक्षये॥ २४
अर्थ— अर्जुनका उद्भव क्षीण हो जानेके कारण अग्निसे दिये हुए उनके अक्षय बाण भी उन अहीरोंके साथ लड़नेमें नष्ट हो गये॥ २४॥
अचिन्तयच्च कौन्तेयः कृष्णस्यैव हि तद्बलम्।
यन्मया शरसङ्घातैस्सकला भूभृतो हताः॥ २५
अर्थ— तब अर्जुनने सोचा कि मैंने जो अपने शरसमूहसे अनेकों राजाओंको जीता था, वह सब कृष्णचन्द्रका ही प्रभाव था॥ २५॥
मिषतः पाण्डुपुत्रस्य ततस्ताः प्रमदोत्तमाः।
आभीरैरपकृष्यन्त कामं चान्याः प्रदुद्रुवुः॥ २६
अर्थ— अर्जुनके देखते-देखते वे अहीर उन स्त्रीरत्नोंको खींच-खींचकर ले जाने लगे तथा कोई-कोई अपनी इच्छानुसार इधर-उधर भाग गयीं॥ २६॥