विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 434, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ३८ ] * पञ्चम अंश * ४२३
ततश्शरेषु क्षीणेषु धनुष्कोट्या धनञ्जयः ।
जघान दस्यूंस्ते चास्य प्रहाराञ्जहसुर्मुने ॥ २७
प्रेक्षतस्तस्य पार्थस्य वृष्ण्यन्धकवरस्त्रियः ।
जग्मुरादाय ते म्लेच्छाः समस्ता मुनिसत्तम ॥ २८
ततस्सुदुःखितो जिष्णुः कष्टं कष्टमिति ब्रुवन् ।
अहो भगवतानेन वञ्चितोऽस्मि रुरोद ह ॥ २९
तद्धनुस्तानि शस्त्राणि स रथस्ते च वाजिनः ।
सर्वमेकपदे नष्टं दानमश्रोत्रिये यथा ॥ ३०
अहोऽतिबलवद्दैवं विना तेन महात्मना ।
यदसामर्थ्ययुक्तेऽपि नीचवर्गे जयप्रदम् ॥ ३१
तौ बाहू स च मे मुष्टिः स्थानं तत्सोऽस्मि चार्जुनः ।
पुण्येनैव विना तेन गतं सर्वमसारताम् ॥ ३२
ममार्जुनत्वं भीमस्य भीमत्वं तत्कृते ध्रुवम् ।
विना तेन यदाभीरैर्जितोऽहं रथिनां वरः ॥ ३३
श्रीपराशर उवाच
इत्थं वदन्ययौ जिष्णुरिन्द्रप्रस्थं पुरोत्तमम् ।
चकार तत्र राजानं वज्रं यादवनन्दनम् ॥ ३४
स ददर्श ततो व्यासं फाल्गुनः काननाश्रयम् ।
तमुपेत्य महाभागं विनयेनाभ्यवादयत् ॥ ३५
तं वन्दमानं चरणाववलोक्य मुनिश्चिरम् ।
उवाच वाक्यं विच्छायः कथमद्य त्वमीदृशः ॥ ३६
अवीरजोऽनुगमनं ब्रह्महत्या कृताथ वा ।
दृढाशाभङ्गदुःखीव भ्रष्टच्छायोऽसि साम्प्रतम् ॥ ३७
सान्तानिकादयो वा ते याचमाना निराकृताः ।
अगम्यस्त्रीरतिर्वा त्वं येनासि विगतप्रभः ॥ ३८
भुङ्क्तेऽप्रदाय विप्रेभ्यो मिष्टमेकोऽथ वा भवान् ।
किं वा कृपणवित्तानि हृतानि भवताऽर्जुन ॥ ३९
कच्चिन्नु शूर्पवातस्य गोचरत्वं गतोऽर्जुन ।
दुष्टचक्षुर्हतो वाऽसि निश्श्रीकः कथमन्था ॥ ४०
स्पृष्टो नखाम्भसा वाथ घटवार्युक्षितोऽपि वा ।
केन त्वं वासि विच्छायो न्यूनैर्वा युधि निर्जितः ॥ ४१
बाणोंके समाप्त हो जानेपर धनंजय अर्जुनने धनुषकी नोंकसे ही प्रहार करना आरम्भ किया, किन्तु हे मुने! वे दस्युगण उन प्रहारोंकी और भी हँसी उड़ाने लगे ॥ २७ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार अर्जुनके देखते-देखते वे म्लेच्छगण वृष्टि और अन्धकवंशकी उन समस्त स्त्रियोंको लेकर चले गये ॥ २८ ॥ तब सर्वदा जयशील अर्जुन अत्यन्त दुःखी होकर 'हा! कैसा कष्ट है? कैसा कष्ट है?' ऐसा कहकर रोने लगे [और बोले—] “अहो! मुझे उन भगवान्ने ही ठग लिया ॥ २९ ॥ देखो, वही धनुष है, वे ही शस्त्र हैं, वही रथ है और वे ही अश्व हैं, किन्तु अश्रोत्रियको दिये हुए दानके समान आज सभी एक साथ नष्ट हो गये ॥ ३० ॥ अहो! दैव बड़ा प्रबल है, जिसने आज उन महात्मा कृष्णके न रहनेपर असमर्थ और नीच अहीरोंको जय दे दी ॥ ३१ ॥ देखो! मेरी वे ही भुजाएँ हैं, वही मेरी मुष्टि (मुट्ठी) है, वही (कुरुक्षेत्र) स्थान है और मैं भी वही अर्जुन हूँ तथापि पुण्यदर्शन कृष्णके बिना आज सब सारहीन हो गये ॥ ३२ ॥ अवश्य ही मेरा अर्जुनत्व और भीमका भीमत्व भगवान् कृष्णकी कृपासे ही था। देखो, उनके बिना आज महारथियोंमें श्रेष्ठ मुझको तुच्छ आभीरोंने जीत लिया'' ॥ ३३ ॥
**श्रीपराशरजी बोले—**अर्जुन इस प्रकार कहते हुए अपनी राजधानी इन्द्रप्रस्थमें आये और वहाँ यादवनन्दन वज्रका राज्याभिषेक किया ॥ ३४ ॥ तदनन्तर वे विपिनवासी व्यासमुनिसे मिले और उन महाभाग मुनिवरके निकट जाकर उन्हें विनयपूर्वक प्रणाम किया ॥ ३५ ॥ अर्जुनको बहुत देरतक अपने चरणोंकी वन्दना करते देख मुनिवरने कहा— ‘‘आज तुम ऐसे कान्तिहीन क्यों हो रहे हो ? ॥ ३६ ॥ क्या तुमने भेड़ोंकी धूलिका अनुगमन किया है अथवा ब्रह्महत्या की है या तुम्हारी कोई सुदृढ़ आशा भंग हो गयी है ? जिसके दुःखसे तुम इस समय इतने श्रीहीन हो रहे हो ॥ ३७ ॥ तुमने किसी सन्तानके इच्छुकका विवाहके लिये याचना करनेपर निरादर तो नहीं किया अथवा किसी अगम्य स्त्रीसे रमण तो नहीं किया, जिससे तुम ऐसे तेजोहीन हो रहे हो ॥ ३८ ॥ हे अर्जुन! तुम ब्राह्मणोंको बिना दिये मिष्टान्न अकेले तो नहीं खा लेते हो अथवा तुमने किसी कृपणका धन तो नहीं हर लिया है ॥ ३९ ॥ हे अर्जुन! तुमने सूपकी वायुका तो सेवन नहीं किया ? क्या तुम्हारी आँखें दुखती हैं अथवा तुम्हें किसीने मारा है ? तुम इस प्रकार श्रीहीन कैसे हो रहे हो ? ॥ ४० ॥ तुमने नखजलका स्पर्श तो नहीं किया ? तुम्हारे ऊपर घड़ेसे छलके हुए जलकी छींटें