भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 435

४२४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३८

श्रीपराशर उवाच ततः पार्थो विनिःश्वस्य श्रूयतां भगवन्निति। उक्त्वा यथावदाचष्टे व्यासायात्मपराभवम्॥ ४२

अर्जुन उवाच यद्वलं यच्च मत्तेजो यद्वीर्यं यः पराक्रमः। या श्रीश्छाया च नः सोऽस्मान्परित्यज्य हरिर्गतः॥ ४३

ईश्वरेणापि महता स्मितपूर्वाभिभाषिणा। हीना वयं मुने तेन जातास्तृणमया इव॥ ४४

अस्त्राणां सायकानां च गाण्डीवस्य तथा मम। सारता याभवन्मूर्त्तिस्स गतः पुरुषोत्तमः॥ ४५

यस्यावलोकनादस्माञ्छ्रीर्जयः सम्पदन्नतिः। न तत्याज स गोविन्दस्त्यक्त्वास्मान्भगवान्गतः॥ ४६

भीष्मद्रोणाङ्गराजाद्यास्तथा दुर्योधनादयः। यत्प्रभावेण निर्दग्धास्स कृष्णस्त्यक्तवान्भुवम्॥ ४७

निर्यौवना गतश्रीका नष्टच्छायेव मेदिनी। विभाति तात नैकोऽहं विरहे तस्य चक्रिणः॥ ४८

यस्य प्रभावाद्भीष्माद्यैर्मय्यग्नौ शलभायितम्। विना तेनाद्य कृष्णेन गोपालैरस्मि निर्जितः॥ ४९

गाण्डीवस्त्रिषु लोकेषु ख्यातिं यदनुभावतः। गतस्तेन विनाभीरलगुडैस्स तिरस्कृतः॥ ५०

स्त्रीसहस्राण्यनेकानि मन्नाथानि महामुने। यततो मम नीतानि दस्युभिर्लगुडायुधैः॥ ५१

आनीयमानमाभीरैः कृष्ण कृष्णावरोधनम्। हृतं यष्टिप्रहरणैः परिभूय बलं मम॥ ५२

निश्रीकता न मे चित्रं यज्जीवामि तदद्भुतम्। नीचावमानपङ्काङ्की निर्लज्जोऽस्मि पितामह॥ ५३

श्रीव्यास उवाच अलं ते व्रीडया पार्थ न त्वं शोचितुमर्हसि। अवेहि सर्वभूतेषु कालस्य गतिरीदृशी॥ ५४

कालो भवाय भूतानामभावाय च पाण्डव। कालमूलमिदं ज्ञात्वा भव स्थैर्यपरोऽर्जुन॥ ५५


तो नहीं पड़ गयीं अथवा तुम्हें किसी हीनबल पुरुषने युद्धमें पराजित तो नहीं किया ? फिर तुम इस तरह हतप्रभ कैसे हो रहे हो ?''॥ ४१ ॥

श्रीपराशरजी बोले— तब अर्जुनने दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुए कहा—"‘भगवन्! सुनिये’' ऐसा कहकर उन्होंने अपने पराजयका सम्पूर्ण वृत्तान्त व्यासजीको ज्यों-का-त्यों सुना दिया॥ ४२ ॥

अर्जुन बोले— जो हरि मेरे एकमात्र बल, तेज, वीर्य, पराक्रम, श्री और कान्ति थे, वे हमें छोड़कर चले गये॥ ४३ ॥ जो सब प्रकार समर्थ होकर भी हमसे मित्रवत् हँस-हँसकर बातें किया करते थे, हे मुने! उन हरिके बिना हम आज तृणमय पुतलेके समान निःसत्त्व हो गये हैं॥ ४४ ॥ जो मेरे दिव्यास्त्रों, दिव्यबाणों और गाण्डीव धनुषके मूर्त्तिमान् सार थे वे पुरुषोत्तम भगवान् हमें छोड़कर चले गये हैं॥ ४५ ॥ जिनकी कृपादृष्टिसे श्री, जय, सम्पत्ति और उन्नतिने कभी हमारा साथ नहीं छोड़ा, वे ही भगवान् गोविन्द हमें छोड़कर चले गये हैं॥ ४६ ॥ जिनकी प्रभावानिमें भीष्म, द्रोण, कर्ण और दुर्योधन आदि अनेक शूरवीर दग्ध हो गये थे, उन कृष्णचन्द्रने इस भूमण्डलको छोड़ दिया है॥ ४७ ॥ हे तात! उन चक्रपाणि कृष्णचन्द्रके विरहमें एक मैं ही क्या, सम्पूर्ण पृथिवी ही यौवन, श्री और कान्तिसे हीन प्रतीत होती है॥ ४८ ॥ जिनके प्रभावसे अग्निरूप मुझमें भीष्म आदि महारथीगण पतंगवत् भस्म हो गये थे, आज उन्हीं कृष्णके बिना मुझे गोपोंने हरा दिया!॥ ४९ ॥ जिनके प्रभावसे यह गाण्डीव धनुष तीनों लोकोंमें विख्यात हुआ था उन्हींके बिना आज यह अहीरोंकी लाठियोंसे तिरस्कृत हो गया!॥ ५० ॥ हे महामुने! भगवान्‌की जो सहस्रों स्त्रियाँ मेरी देख-रेखमें आ रही थीं उन्हें, मेरे सब प्रकार यत्न करते रहनेपर भी दस्युगण अपनी लाठियोंके बलसे ले गये॥ ५१ ॥ हे कृष्णद्वैपायन! लाठियाँ ही जिनके हथियार हैं उन आभीरों ने आज मेरे बलको कुण्ठितकर मेरे द्वारा साथ लाये हुए सम्पूर्ण कृष्ण-परिवारको हर लिया॥ ५२ ॥ ऐसी अवस्थामें मेरा श्रीहीन होना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; हे पितामह! आश्चर्य तो यह है कि नीच पुरुषोंद्वारा अपमान-पंकमें सनकर भी मैं निर्लज्ज अभी जीवित ही हूँ॥ ५३ ॥

श्रीव्यासजी बोले— हे पार्थ! तुम्हारी लज्जा व्यर्थ है, तुम्हें शोक करना उचित नहीं है। तुम सम्पूर्ण भूतोंमें कालकी ऐसी ही गति जानो॥ ५४ ॥ हे पाण्डव! प्राणियोंकी उन्नति और अवनतिका कारण काल ही है,