भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 436

अ० ३८] * पञ्चम अंश * ४२५

नद्यः समुद्रा गिरयस्सकला च वसुन्धरा। देवा मनुष्याः पशवस्तरवश्च सरीसृपाः ॥ ५६

सृष्टाः कालेन कालेन पुनर्यास्यन्ति संक्षयम्। कालात्मकमिदं सर्वं ज्ञात्वा शममवाप्नुहि ॥ ५७

कालस्वरूपी भगवान्कृष्णः कमलोचनः। यच्चात्थ कृष्णमाहात्म्यं तत्तथैव धनञ्जय ॥ ५८

भारावतारकार्यार्थमवतीर्णस्स मेदिनीम्। भाराक्रान्ता धरा याता देवानां समितिं पुरा ॥ ५९

तदर्थमवतीर्णोऽसौ कालरूपी जनार्दनः। तच्च निष्पादितं कार्यमशेषा भूभुजो हताः ॥ ६०

वृष्ण्यन्धककुलं सर्वं तथा पार्थोपसंहृतम्। न किञ्चिदन्यत्कर्तव्यं तस्य भूमितले प्रभोः ॥ ६१

अतो गतस्स भगवान्कृतकृत्यो यथेच्छया। सृष्टिं सर्गे करोत्येष देवदेवः स्थितौ स्थितिम्। अन्तेऽन्ताय समर्थोऽयं साम्प्रतं वै यथा गतः ॥ ६२

तस्मात्पार्थ न सन्तापस्त्वया कार्यः पराभवे। भवन्ति भावाः कालेषु पुरुषाणां यतः स्तुतिः ॥ ६३

त्वयैकेन हता भीष्मद्रोणकर्णादयो रणे। तेषामर्जुन कालोत्थः किं न्यूनाभिभवो न सः ॥ ६४

विष्णोस्तस्य प्रभावेण यथा तेषां पराभवः। कृतस्तथैव भवतो दस्युभ्यस्स पराभवः ॥ ६५

स देवेशश्शरीराणि समाविश्य जगत्स्थितिम्। करोति सर्वभूतानां नाशमन्ते जगत्पतिः ॥ ६६

भगोदये ते कौन्तेय सहायोऽभूज्जनार्दनः। तथान्ते तद्विपक्षास्ते केशवेन विलोकिताः ॥ ६७

कश्श्रद्धध्यात्सगाङ्गेयान्हन्यास्त्वं कौरवानिति। आभीरभ्यश्च भवतः कः श्रद्धध्यात्पराभवम् ॥ ६८


अतः हे अर्जुन! इन जय-पराजयोंको कालके अधीन समझकर तुम स्थिरता धारण करो ॥ ५५ ॥ नदियाँ, समुद्र, गिरिगण, सम्पूर्ण पृथिवी, देव, मनुष्य, पशु, वृक्ष और सरीसृप आदि सम्पूर्ण पदार्थ कालके ही रचे हुए हैं और फिर कालहीसे ये क्षीण हो जाते हैं, अतः इस सारे प्रपंचको कालात्मक जानकर शान्त होओ ॥ ५६-५७ ॥

हे धनंजय! तुमने कृष्णचन्द्रका जैसा माहात्म्य बतलाया है वह सब सत्य ही है; क्योंकि कमलनयन भगवान् कृष्ण साक्षात् कालस्वरूप ही हैं ॥ ५८ ॥ उन्होंने पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही मर्त्यलोकमें अवतार लिया था। एक समय पूर्वकालमें पृथिवी भाराक्रान्त होकर देवताओंकी सभामें गयी थी ॥ ५९ ॥ कालस्वरूपी श्रीजनार्दनने उसीके लिये अवतार लिया था। अब सम्पूर्ण दुष्ट राजा मारे जा चुके, अतः वह कार्य सम्पन्न हो गया ॥ ६० ॥ हे पार्थ! वृष्णि और अन्धक आदि सम्पूर्ण यदुकुलका भी उपसंहार हो गया; इसलिये उन प्रभुके लिये अब पृथिवीतलपर और कुछ भी कर्तव्य नहीं रहा ॥ ६१ ॥ अतः अपना कार्य समाप्त हो चुकनेपर भगवान् स्वेच्छानुसार चले गये, ये देवदेव प्रभु सर्गके आरम्भमें सृष्टि-रचना करते हैं, स्थितिके समय पालन करते हैं और अन्तमें ये ही उसका नाश करनेमें समर्थ हैं—जैसे इस समय वे [राक्षस आदिका संहार करके] चले गये हैं ॥ ६२ ॥

अतः हे पार्थ! तुझे अपनी पराजयसे दुःखी न होना चाहिये, क्योंकि अभ्युदय-काल उपस्थित होनेपर ही पुरुषोंसे ऐसे कर्म बनते हैं जिनसे उनकी स्तुति होती है ॥ ६३ ॥ हे अर्जुन! जिस समय तुझ अकेलेने ही युद्धमें भीष्म, द्रोण और कर्ण आदिको मार डाला था वह क्या उन वीरोंका कालक्रमसे प्राप्त हीनबल पुरुषसे पराभव नहीं था ? ॥ ६४ ॥ जिस प्रकार भगवान् विष्णुके प्रभावसे तुमने उन सबोंको नीचा दिखलाया था, उसी प्रकार तुझे दस्युओंसे दबना पड़ा है ॥ ६५ ॥ वे जगत्पति देवेश्वर ही शरीरोंमें प्रविष्ट होकर जगत्की स्थिति करते हैं और वे ही अन्तमें समस्त जीवोंका नाश करते हैं ॥ ६६ ॥

हे कौन्तेय ! जिस समय तेरा भाग्योदय हुआ था उस समय श्रीजनार्दन तेरे सहायक थे और जब उस (सौभाग्य)-का अन्त हो गया तो तेरे विपक्षियोंपर श्रीकेशवकी कृपादृष्टि हुई है ॥ ६७ ॥ तू गंगानन्दन भीष्मपितामहके सहित सम्पूर्ण कौरवोंको मार डालेगा—इस बातको कौन मान सकता था और फिर यह भी किसे विश्वास होगा कि तू आभीरोंसे हार जायगा ॥ ६८ ॥


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