विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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| ४२६ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ३८ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
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| पार्थैतत्सर्वभूतस्य हरेर्लीलाविचेष्टितम्।<br>त्वया यत्कौरवा ध्वस्ता यदाभीरैर्भवाञ्जितः॥ ६९ | हे पार्थ! यह सब सर्वात्मा भगवान्की लीलाका ही कौतुक है कि तुझ अकेलेने कौरवोंको नष्ट कर दिया और फिर स्वयं अहीरोंसे पराजित हो गया॥ ६९॥ |
| गृहीता दस्युभिश्चाश्च भवाञ्छोचति ताःस्त्रियः।<br>एतस्याहं यथावृत्तं कथयामि तवार्जुन॥ ७० | हे अर्जुन! तू जो उन दस्युओंद्वारा हरण की गयी स्त्रियोंके लिये शोक करता है सो मैं तुझे उसका यथावत् रहस्य बतलाता हूँ॥ ७०॥ |
| अष्टावक्रः पुरा विप्रो जलवासरतोऽभवत्।<br>बहून्वर्षगणान्यार्थ गृणन्ब्रह्म सनातनम्॥ ७१ | एक बार पूर्वकालमें विप्रवर अष्टावक्रजी सनातन ब्रह्मकी स्तुति करते हुए अनेकों वर्षतक जलमें रहे॥ ७१॥ |
| जितेष्वसुरसङ्घेषु मेरुपृष्ठे महोत्सवः।<br>बभूव तत्र गच्छन्त्यो ददृशुस्तं सुरस्त्रियः॥ ७२<br>रम्भातिलोत्तमाद्यास्तु शतशोऽथ सहस्रशः।<br>तुष्टुवुस्तं महात्मानं प्रशंसुश्च पाण्डव॥ ७३ | उसी समय दैत्योंपर विजय प्राप्त करनेसे देवताओंने सुमेरु पर्वतपर एक महान् उत्सव किया। उसमें सम्मिलित होनेके लिये जाती हुई रम्भा और तिलोत्तमा आदि सैकड़ों-हजारों देवांगनाओंने मार्गमें उन मुनिवरको देखकर उनकी अत्यन्त स्तुति और प्रशंसा की॥ ७२-७३॥ |
| आकण्ठमग्नं सलिले जटाभारवहं मुनिम्।<br>विनयावनताश्चैनं प्रणेमुः स्तोत्रतत्पराः॥ ७४ | वे देवांगनाएँ उन जटाधारी मुनिवरको कण्ठपर्यन्त जलमें डूबे देखकर विनयपूर्वक स्तुति करती हुई प्रणाम करने लगीं॥ ७४॥ |
| यथा यथा प्रसन्नोऽसौ तुष्टुवुस्तं तथा तथा।<br>सर्वास्ताः कौरवश्रेष्ठ तं वरिष्ठं द्विजन्मनाम्॥ ७५ | हे कौरवश्रेष्ठ! जिस प्रकार वे द्विजश्रेष्ठ अष्टावक्रजी प्रसन्न हों उसी प्रकार वे अप्सराएँ उनकी स्तुति करने लगीं॥ ७५॥ |
| अष्टावक्र उवाच | अष्टावक्रजी बोले— |
| प्रसन्नोऽहं महाभागा भवतीनां यदिष्यते।<br>मत्तस्तद्व्रियतां सर्वं प्रदास्याम्यतिदुर्लभम्॥ ७६ | हे महाभागाओ! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, तुम्हारी जो इच्छा हो मुझसे वही वर माँग लो; मैं अति दुर्लभ होनेपर भी तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा॥ ७६॥ |
| रम्भातिलोत्तमाद्यास्तं वैदिक्योऽप्सरसोऽब्रुवन्।<br>प्रसन्ने त्वय्यपर्याप्तं किमस्माकमिति द्विज॥ ७७ | तब रम्भा और तिलोत्तमा आदि वैदिकी (वेदप्रसिद्ध) अप्सराओंने उनसे कहा—"हे द्विज! आपके प्रसन्न हो जानेपर हमें क्या नहीं मिल गया॥ ७७॥ |
| इतरास्त्वब्रुवन्विप्र प्रसन्नो भगवान्यदि।<br>तदिच्छामः पतिं प्राप्तुं विप्रेन्द्र पुरुषोत्तमम्॥ ७८ | तथा अन्य अप्सराओंने कहा—"यदि भगवान् हमपर प्रसन्न हैं तो हे विप्रेन्द्र! हम साक्षात् पुरुषोत्तमभगवान्को पतिरूपसे प्राप्त करना चाहती हैं"॥ ७८॥ |
| श्रीव्यास उवाच | श्रीव्यासजी बोले— |
| एवं भविष्यतीत्युक्त्वा ह्युत्ततार जलान्मुनिः।<br>तमुत्तीर्णं च ददृशुर्विरूपं वक्रमष्टधा॥ ७९ | तब 'ऐसा ही होगा'—यह कहकर मुनिवर अष्टावक्र जलसे बाहर आये। उनके बाहर आते समय अप्सराओंने आठ स्थानोंमें टेढ़े उनके कुरूप देहको देखा॥ ७९॥ |
| तं दृष्ट्वा गृहमानानां यासां हासः स्फुटोऽभवत्।<br>ताश्शशाप मुनिः कोपमवाप्य कुरुनन्दन॥ ८० | उसे देखकर जिन अप्सराओंकी हँसी छिपानेपर भी प्रकट हो गयी, हे कुरुनन्दन! उन्हें मुनिवरने क्रुद्ध होकर यह शाप दिया—॥ ८०॥ |
| यस्माद्विकृतरूपं मां मत्वा हासावमानना।<br>भवतीभिः कृता तस्मादेतं शापं ददामि वः॥ ८१<br>मत्प्रसादेन भर्तारं लब्ध्वा तु पुरुषोत्तमम्।<br>मच्छापोपहतास्सर्वा दस्युहस्तं गमिष्यथ॥ ८२ | "मुझे कुरूप देखकर तुमने हँसते हुए मेरा अपमान किया है, इसलिये मैं तुम्हें यह शाप देता हूँ कि मेरी कृपासे श्रीपुरुषोत्तमको पतिरूपसे पाकर भी तुम मेरे शापके वशीभूत होकर लुटेरोंके हाथोंमें पड़ोगी"॥ ८१-८२॥ |
| श्रीव्यास उवाच | श्रीव्यासजी बोले— |
| इत्युदीरितमाकर्ण्य मुनिस्ताभिः प्रसादितः।<br>पुनस्सुरेन्द्रलोकं वै प्राह भूयो गमिष्यथ॥ ८३ | मुनिका यह वाक्य सुनकर उन अप्सराओंने उन्हें फिर प्रसन्न किया, तब मुनिवरने उनसे कहा "उसके पश्चात् तुम फिर स्वर्गलोकमें चली जाओगी"॥ ८३॥ |
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