विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० ३८ ] * पञ्चम अंश * ४२७
| एवं तस्य मुनेश्शापादष्टावक्रस्य चक्रिणम्।<br>भर्तारं प्राप्त ता याता दस्युहस्तं सुराङ्गनाः ॥ ८४ | इस प्रकार मुनिवर अष्टावक्रके शापसे ही वे देवांगनाएँ श्रीकृष्णचन्द्रको पति पाकर भी फिर दस्युओंके हाथमें पड़ीं हैं ॥ ८४ ॥ |
| तत्त्वया नात्र कर्त्तव्यश्शोकोऽल्पोऽपि हि पाण्डव।<br>तेनैवाखिलनाथेन सर्वं तदुपसंहृतम् ॥ ८५ | हे पाण्डव! तुझे इस विषयमें तनिक भी शोक न करना चाहिये क्योंकि उन अखिलेश्वरने ही सम्पूर्ण यदुकुलका उपसंहार किया है ॥ ८५ ॥ तथा तुमलोगोंका अन्त भी अब निकट ही है; इसलिये उन सर्वेश्वरने तुम्हारे बल, तेज, वीर्य और माहात्म्यका संकोच कर दिया है ॥ ८६ ॥ |
| भवतां चोपसंहार आसन्नस्तेन पाण्डव।<br>बलं तेजस्तथा वीर्यं माहात्म्यं चोपसंहृतम् ॥ ८६ | 'जो उत्पन्न हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है, उन्नतका पतन अवश्यम्भावी है, संयोगका अन्त वियोग ही है तथा संचय (एकत्र करने)-के अनन्तर क्षय (व्यय) होना सर्वथा निश्चित ही है'—ऐसा जानकर जो बुद्धिमान् पुरुष लाभ या हानिमें हर्ष अथवा शोक नहीं करते उन्हींकी चेष्टाका अवलम्बन कर अन्य मनुष्य भी अपना वैसा आचरण बनाते हैं ॥ ८७-८८ ॥ इसलिये हे नरश्रेष्ठ ! तुम ऐसा जानकर अपने भाइयोंसहित सम्पूर्ण राज्यको छोड़कर तपस्याके लिये वनको जाओ ॥ ८९ ॥ अब तुम जाओ तथा धर्मराज युधिष्ठिरसे मेरी ये सारी बातें कहो और जिस तरह परसों भाइयोंसहित वनको चले जा सको वैसा यत्न करो ॥ ९० ॥ |
| जातस्य नियतो मृत्युः पतनं च तथोन्नतेः।<br>विप्रयोगावसानस्तु संयोगः सञ्चये क्षयः ॥ ८७ | |
| विज्ञाय न बुधाश्शोकं न हर्षमुपयान्ति ये।<br>तेषामेवेतरे चेष्टां शिक्षन्तस्सन्ति तादृशाः ॥ ८८ | |
| तस्मात्त्वया नरश्रेष्ठ ज्ञात्वैतद्भातृभिस्सह।<br>परित्यज्याखिलं तन्त्रं गन्तव्यं तपसे वनम् ॥ ८९ | |
| तद्गच्छ धर्मराजाय निवेद्यैतद्वचो मम।<br>परश्वो भ्रातृभिस्सार्धं यथा यासि तथा कुरु ॥ ९० | |
| इत्युक्तोऽभ्येत्य पार्थाभ्यां यमाभ्यां च सहार्जुनः।<br>दृष्टं चैवानुभूतं च सर्वमाख्यातवांस्तथा ॥ ९१ | मुनिवर व्यासजीके ऐसा कहनेपर अर्जुनने [इन्द्रप्रस्थमें] आकर पृथा-पुत्र (युधिष्ठिर और भीमसेन) तथा यमजों (नकुल और सहदेव)—से उन्होंने जो कुछ जैसा-जैसा देखा और सुना था, सब ज्यों-का-त्यों सुना दिया ॥ ९१ ॥ उन सब पाण्डु-पुत्रोंने अर्जुनके मुखसे व्यासजीका सन्देश सुनकर राज्यपदपर परीक्षित्को अभिषिक्त किया और स्वयं वनको चले गये ॥ ९२ ॥ |
| व्यासवाक्यं च ते सर्वे श्रुत्वार्जुनमुखेरितम्।<br>राज्ये परीक्षितं कृत्वा ययुः पाण्डुसुता वनम् ॥ ९२ | |
| इत्येतत्तव मैत्रेय विस्तरेण मयोदितम्।<br>जातस्य यद्यदोर्वंशे वासुदेवस्य चेष्टितम् ॥ ९३ | हे मैत्रेय! भगवान् वासुदेवने यदुवंशमें जन्म लेकर जो-जो लीलाएँ की थीं, वह सब मैंने विस्तारपूर्वक तुम्हें सुना दीं ॥ ९३ ॥ जो पुरुष भगवान् कृष्णके इस चरित्रको सर्वदा सुनता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर अन्तमें विष्णुलोकको जाता है ॥ ९४ ॥ |
| यश्चैतच्चरितं तस्य कृष्णस्य शृणुयात्सदा।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ॥ ९४ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे अष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥
इति श्रीपराशरमुनिविरचिते श्रीविष्णुपरतत्वनिर्णायके
श्रीमति विष्णुमहापुराणे पञ्चमोंऽशः समाप्तः।