विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० ३८] * पञ्चम अंश * ४२५
नद्यः समुद्रा गिरयस्सकला च वसुन्धरा। देवा मनुष्याः पशवस्तरवश्च सरीसृपाः ॥ ५६
सृष्टाः कालेन कालेन पुनर्यास्यन्ति संक्षयम्। कालात्मकमिदं सर्वं ज्ञात्वा शममवाप्नुहि ॥ ५७
कालस्वरूपी भगवान्कृष्णः कमलोचनः। यच्चात्थ कृष्णमाहात्म्यं तत्तथैव धनञ्जय ॥ ५८
भारावतारकार्यार्थमवतीर्णस्स मेदिनीम्। भाराक्रान्ता धरा याता देवानां समितिं पुरा ॥ ५९
तदर्थमवतीर्णोऽसौ कालरूपी जनार्दनः। तच्च निष्पादितं कार्यमशेषा भूभुजो हताः ॥ ६०
वृष्ण्यन्धककुलं सर्वं तथा पार्थोपसंहृतम्। न किञ्चिदन्यत्कर्तव्यं तस्य भूमितले प्रभोः ॥ ६१
अतो गतस्स भगवान्कृतकृत्यो यथेच्छया। सृष्टिं सर्गे करोत्येष देवदेवः स्थितौ स्थितिम्। अन्तेऽन्ताय समर्थोऽयं साम्प्रतं वै यथा गतः ॥ ६२
तस्मात्पार्थ न सन्तापस्त्वया कार्यः पराभवे। भवन्ति भावाः कालेषु पुरुषाणां यतः स्तुतिः ॥ ६३
त्वयैकेन हता भीष्मद्रोणकर्णादयो रणे। तेषामर्जुन कालोत्थः किं न्यूनाभिभवो न सः ॥ ६४
विष्णोस्तस्य प्रभावेण यथा तेषां पराभवः। कृतस्तथैव भवतो दस्युभ्यस्स पराभवः ॥ ६५
स देवेशश्शरीराणि समाविश्य जगत्स्थितिम्। करोति सर्वभूतानां नाशमन्ते जगत्पतिः ॥ ६६
भगोदये ते कौन्तेय सहायोऽभूज्जनार्दनः। तथान्ते तद्विपक्षास्ते केशवेन विलोकिताः ॥ ६७
कश्श्रद्धध्यात्सगाङ्गेयान्हन्यास्त्वं कौरवानिति। आभीरभ्यश्च भवतः कः श्रद्धध्यात्पराभवम् ॥ ६८
अतः हे अर्जुन! इन जय-पराजयोंको कालके अधीन समझकर तुम स्थिरता धारण करो ॥ ५५ ॥ नदियाँ, समुद्र, गिरिगण, सम्पूर्ण पृथिवी, देव, मनुष्य, पशु, वृक्ष और सरीसृप आदि सम्पूर्ण पदार्थ कालके ही रचे हुए हैं और फिर कालहीसे ये क्षीण हो जाते हैं, अतः इस सारे प्रपंचको कालात्मक जानकर शान्त होओ ॥ ५६-५७ ॥
हे धनंजय! तुमने कृष्णचन्द्रका जैसा माहात्म्य बतलाया है वह सब सत्य ही है; क्योंकि कमलनयन भगवान् कृष्ण साक्षात् कालस्वरूप ही हैं ॥ ५८ ॥ उन्होंने पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही मर्त्यलोकमें अवतार लिया था। एक समय पूर्वकालमें पृथिवी भाराक्रान्त होकर देवताओंकी सभामें गयी थी ॥ ५९ ॥ कालस्वरूपी श्रीजनार्दनने उसीके लिये अवतार लिया था। अब सम्पूर्ण दुष्ट राजा मारे जा चुके, अतः वह कार्य सम्पन्न हो गया ॥ ६० ॥ हे पार्थ! वृष्णि और अन्धक आदि सम्पूर्ण यदुकुलका भी उपसंहार हो गया; इसलिये उन प्रभुके लिये अब पृथिवीतलपर और कुछ भी कर्तव्य नहीं रहा ॥ ६१ ॥ अतः अपना कार्य समाप्त हो चुकनेपर भगवान् स्वेच्छानुसार चले गये, ये देवदेव प्रभु सर्गके आरम्भमें सृष्टि-रचना करते हैं, स्थितिके समय पालन करते हैं और अन्तमें ये ही उसका नाश करनेमें समर्थ हैं—जैसे इस समय वे [राक्षस आदिका संहार करके] चले गये हैं ॥ ६२ ॥
अतः हे पार्थ! तुझे अपनी पराजयसे दुःखी न होना चाहिये, क्योंकि अभ्युदय-काल उपस्थित होनेपर ही पुरुषोंसे ऐसे कर्म बनते हैं जिनसे उनकी स्तुति होती है ॥ ६३ ॥ हे अर्जुन! जिस समय तुझ अकेलेने ही युद्धमें भीष्म, द्रोण और कर्ण आदिको मार डाला था वह क्या उन वीरोंका कालक्रमसे प्राप्त हीनबल पुरुषसे पराभव नहीं था ? ॥ ६४ ॥ जिस प्रकार भगवान् विष्णुके प्रभावसे तुमने उन सबोंको नीचा दिखलाया था, उसी प्रकार तुझे दस्युओंसे दबना पड़ा है ॥ ६५ ॥ वे जगत्पति देवेश्वर ही शरीरोंमें प्रविष्ट होकर जगत्की स्थिति करते हैं और वे ही अन्तमें समस्त जीवोंका नाश करते हैं ॥ ६६ ॥
हे कौन्तेय ! जिस समय तेरा भाग्योदय हुआ था उस समय श्रीजनार्दन तेरे सहायक थे और जब उस (सौभाग्य)-का अन्त हो गया तो तेरे विपक्षियोंपर श्रीकेशवकी कृपादृष्टि हुई है ॥ ६७ ॥ तू गंगानन्दन भीष्मपितामहके सहित सम्पूर्ण कौरवोंको मार डालेगा—इस बातको कौन मान सकता था और फिर यह भी किसे विश्वास होगा कि तू आभीरोंसे हार जायगा ॥ ६८ ॥
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| ४२६ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ३८ |
|---|
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पार्थैतत्सर्वभूतस्य हरेर्लीलाविचेष्टितम्।<br>त्वया यत्कौरवा ध्वस्ता यदाभीरैर्भवाञ्जितः॥ ६९ | हे पार्थ! यह सब सर्वात्मा भगवान्की लीलाका ही कौतुक है कि तुझ अकेलेने कौरवोंको नष्ट कर दिया और फिर स्वयं अहीरोंसे पराजित हो गया॥ ६९॥ |
| गृहीता दस्युभिश्चाश्च भवाञ्छोचति ताःस्त्रियः।<br>एतस्याहं यथावृत्तं कथयामि तवार्जुन॥ ७० | हे अर्जुन! तू जो उन दस्युओंद्वारा हरण की गयी स्त्रियोंके लिये शोक करता है सो मैं तुझे उसका यथावत् रहस्य बतलाता हूँ॥ ७०॥ |
| अष्टावक्रः पुरा विप्रो जलवासरतोऽभवत्।<br>बहून्वर्षगणान्यार्थ गृणन्ब्रह्म सनातनम्॥ ७१ | एक बार पूर्वकालमें विप्रवर अष्टावक्रजी सनातन ब्रह्मकी स्तुति करते हुए अनेकों वर्षतक जलमें रहे॥ ७१॥ |
| जितेष्वसुरसङ्घेषु मेरुपृष्ठे महोत्सवः।<br>बभूव तत्र गच्छन्त्यो ददृशुस्तं सुरस्त्रियः॥ ७२<br>रम्भातिलोत्तमाद्यास्तु शतशोऽथ सहस्रशः।<br>तुष्टुवुस्तं महात्मानं प्रशंसुश्च पाण्डव॥ ७३ | उसी समय दैत्योंपर विजय प्राप्त करनेसे देवताओंने सुमेरु पर्वतपर एक महान् उत्सव किया। उसमें सम्मिलित होनेके लिये जाती हुई रम्भा और तिलोत्तमा आदि सैकड़ों-हजारों देवांगनाओंने मार्गमें उन मुनिवरको देखकर उनकी अत्यन्त स्तुति और प्रशंसा की॥ ७२-७३॥ |
| आकण्ठमग्नं सलिले जटाभारवहं मुनिम्।<br>विनयावनताश्चैनं प्रणेमुः स्तोत्रतत्पराः॥ ७४ | वे देवांगनाएँ उन जटाधारी मुनिवरको कण्ठपर्यन्त जलमें डूबे देखकर विनयपूर्वक स्तुति करती हुई प्रणाम करने लगीं॥ ७४॥ |
| यथा यथा प्रसन्नोऽसौ तुष्टुवुस्तं तथा तथा।<br>सर्वास्ताः कौरवश्रेष्ठ तं वरिष्ठं द्विजन्मनाम्॥ ७५ | हे कौरवश्रेष्ठ! जिस प्रकार वे द्विजश्रेष्ठ अष्टावक्रजी प्रसन्न हों उसी प्रकार वे अप्सराएँ उनकी स्तुति करने लगीं॥ ७५॥ |
| अष्टावक्र उवाच | अष्टावक्रजी बोले— |
| प्रसन्नोऽहं महाभागा भवतीनां यदिष्यते।<br>मत्तस्तद्व्रियतां सर्वं प्रदास्याम्यतिदुर्लभम्॥ ७६ | हे महाभागाओ! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, तुम्हारी जो इच्छा हो मुझसे वही वर माँग लो; मैं अति दुर्लभ होनेपर भी तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा॥ ७६॥ |
| रम्भातिलोत्तमाद्यास्तं वैदिक्योऽप्सरसोऽब्रुवन्।<br>प्रसन्ने त्वय्यपर्याप्तं किमस्माकमिति द्विज॥ ७७ | तब रम्भा और तिलोत्तमा आदि वैदिकी (वेदप्रसिद्ध) अप्सराओंने उनसे कहा—"हे द्विज! आपके प्रसन्न हो जानेपर हमें क्या नहीं मिल गया॥ ७७॥ |
| इतरास्त्वब्रुवन्विप्र प्रसन्नो भगवान्यदि।<br>तदिच्छामः पतिं प्राप्तुं विप्रेन्द्र पुरुषोत्तमम्॥ ७८ | तथा अन्य अप्सराओंने कहा—"यदि भगवान् हमपर प्रसन्न हैं तो हे विप्रेन्द्र! हम साक्षात् पुरुषोत्तमभगवान्को पतिरूपसे प्राप्त करना चाहती हैं"॥ ७८॥ |
| श्रीव्यास उवाच | श्रीव्यासजी बोले— |
| एवं भविष्यतीत्युक्त्वा ह्युत्ततार जलान्मुनिः।<br>तमुत्तीर्णं च ददृशुर्विरूपं वक्रमष्टधा॥ ७९ | तब 'ऐसा ही होगा'—यह कहकर मुनिवर अष्टावक्र जलसे बाहर आये। उनके बाहर आते समय अप्सराओंने आठ स्थानोंमें टेढ़े उनके कुरूप देहको देखा॥ ७९॥ |
| तं दृष्ट्वा गृहमानानां यासां हासः स्फुटोऽभवत्।<br>ताश्शशाप मुनिः कोपमवाप्य कुरुनन्दन॥ ८० | उसे देखकर जिन अप्सराओंकी हँसी छिपानेपर भी प्रकट हो गयी, हे कुरुनन्दन! उन्हें मुनिवरने क्रुद्ध होकर यह शाप दिया—॥ ८०॥ |
| यस्माद्विकृतरूपं मां मत्वा हासावमानना।<br>भवतीभिः कृता तस्मादेतं शापं ददामि वः॥ ८१<br>मत्प्रसादेन भर्तारं लब्ध्वा तु पुरुषोत्तमम्।<br>मच्छापोपहतास्सर्वा दस्युहस्तं गमिष्यथ॥ ८२ | "मुझे कुरूप देखकर तुमने हँसते हुए मेरा अपमान किया है, इसलिये मैं तुम्हें यह शाप देता हूँ कि मेरी कृपासे श्रीपुरुषोत्तमको पतिरूपसे पाकर भी तुम मेरे शापके वशीभूत होकर लुटेरोंके हाथोंमें पड़ोगी"॥ ८१-८२॥ |
| श्रीव्यास उवाच | श्रीव्यासजी बोले— |
| इत्युदीरितमाकर्ण्य मुनिस्ताभिः प्रसादितः।<br>पुनस्सुरेन्द्रलोकं वै प्राह भूयो गमिष्यथ॥ ८३ | मुनिका यह वाक्य सुनकर उन अप्सराओंने उन्हें फिर प्रसन्न किया, तब मुनिवरने उनसे कहा "उसके पश्चात् तुम फिर स्वर्गलोकमें चली जाओगी"॥ ८३॥ |
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अ० ३८ ] * पञ्चम अंश * ४२७
| एवं तस्य मुनेश्शापादष्टावक्रस्य चक्रिणम्।<br>भर्तारं प्राप्त ता याता दस्युहस्तं सुराङ्गनाः ॥ ८४ | इस प्रकार मुनिवर अष्टावक्रके शापसे ही वे देवांगनाएँ श्रीकृष्णचन्द्रको पति पाकर भी फिर दस्युओंके हाथमें पड़ीं हैं ॥ ८४ ॥ |
| तत्त्वया नात्र कर्त्तव्यश्शोकोऽल्पोऽपि हि पाण्डव।<br>तेनैवाखिलनाथेन सर्वं तदुपसंहृतम् ॥ ८५ | हे पाण्डव! तुझे इस विषयमें तनिक भी शोक न करना चाहिये क्योंकि उन अखिलेश्वरने ही सम्पूर्ण यदुकुलका उपसंहार किया है ॥ ८५ ॥ तथा तुमलोगोंका अन्त भी अब निकट ही है; इसलिये उन सर्वेश्वरने तुम्हारे बल, तेज, वीर्य और माहात्म्यका संकोच कर दिया है ॥ ८६ ॥ |
| भवतां चोपसंहार आसन्नस्तेन पाण्डव।<br>बलं तेजस्तथा वीर्यं माहात्म्यं चोपसंहृतम् ॥ ८६ | 'जो उत्पन्न हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है, उन्नतका पतन अवश्यम्भावी है, संयोगका अन्त वियोग ही है तथा संचय (एकत्र करने)-के अनन्तर क्षय (व्यय) होना सर्वथा निश्चित ही है'—ऐसा जानकर जो बुद्धिमान् पुरुष लाभ या हानिमें हर्ष अथवा शोक नहीं करते उन्हींकी चेष्टाका अवलम्बन कर अन्य मनुष्य भी अपना वैसा आचरण बनाते हैं ॥ ८७-८८ ॥ इसलिये हे नरश्रेष्ठ ! तुम ऐसा जानकर अपने भाइयोंसहित सम्पूर्ण राज्यको छोड़कर तपस्याके लिये वनको जाओ ॥ ८९ ॥ अब तुम जाओ तथा धर्मराज युधिष्ठिरसे मेरी ये सारी बातें कहो और जिस तरह परसों भाइयोंसहित वनको चले जा सको वैसा यत्न करो ॥ ९० ॥ |
| जातस्य नियतो मृत्युः पतनं च तथोन्नतेः।<br>विप्रयोगावसानस्तु संयोगः सञ्चये क्षयः ॥ ८७ | |
| विज्ञाय न बुधाश्शोकं न हर्षमुपयान्ति ये।<br>तेषामेवेतरे चेष्टां शिक्षन्तस्सन्ति तादृशाः ॥ ८८ | |
| तस्मात्त्वया नरश्रेष्ठ ज्ञात्वैतद्भातृभिस्सह।<br>परित्यज्याखिलं तन्त्रं गन्तव्यं तपसे वनम् ॥ ८९ | |
| तद्गच्छ धर्मराजाय निवेद्यैतद्वचो मम।<br>परश्वो भ्रातृभिस्सार्धं यथा यासि तथा कुरु ॥ ९० | |
| इत्युक्तोऽभ्येत्य पार्थाभ्यां यमाभ्यां च सहार्जुनः।<br>दृष्टं चैवानुभूतं च सर्वमाख्यातवांस्तथा ॥ ९१ | मुनिवर व्यासजीके ऐसा कहनेपर अर्जुनने [इन्द्रप्रस्थमें] आकर पृथा-पुत्र (युधिष्ठिर और भीमसेन) तथा यमजों (नकुल और सहदेव)—से उन्होंने जो कुछ जैसा-जैसा देखा और सुना था, सब ज्यों-का-त्यों सुना दिया ॥ ९१ ॥ उन सब पाण्डु-पुत्रोंने अर्जुनके मुखसे व्यासजीका सन्देश सुनकर राज्यपदपर परीक्षित्को अभिषिक्त किया और स्वयं वनको चले गये ॥ ९२ ॥ |
| व्यासवाक्यं च ते सर्वे श्रुत्वार्जुनमुखेरितम्।<br>राज्ये परीक्षितं कृत्वा ययुः पाण्डुसुता वनम् ॥ ९२ | |
| इत्येतत्तव मैत्रेय विस्तरेण मयोदितम्।<br>जातस्य यद्यदोर्वंशे वासुदेवस्य चेष्टितम् ॥ ९३ | हे मैत्रेय! भगवान् वासुदेवने यदुवंशमें जन्म लेकर जो-जो लीलाएँ की थीं, वह सब मैंने विस्तारपूर्वक तुम्हें सुना दीं ॥ ९३ ॥ जो पुरुष भगवान् कृष्णके इस चरित्रको सर्वदा सुनता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर अन्तमें विष्णुलोकको जाता है ॥ ९४ ॥ |
| यश्चैतच्चरितं तस्य कृष्णस्य शृणुयात्सदा।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ॥ ९४ |
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेऽंशे अष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥
इति श्रीपराशरमुनिविरचिते श्रीविष्णुपरतत्वनिर्णायके
श्रीमति विष्णुमहापुराणे पञ्चमोंऽशः समाप्तः।
A black and white woodcut-style illustration depicting a scene from Hindu mythology. At the top, a deity with a halo and a sword is shown. Below, a group of figures, including a central figure with a crown and a sword, are depicted. The background features a large, coiled serpent on the right and a dark, rocky landscape on the left.
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ॐ
श्रीमन्नारायणाय नमः
श्रीविष्णुपुराण
षष्ठ अंश
पहला अध्याय
कलिधर्मनिरूपण
श्रीमैत्रेय उवाच
व्याख्याता भवता सर्गवंशमन्वन्तरस्थितिः।
वंशानुचरितं चैव विस्तरेण महामुने॥ १
श्रोतुमिच्छाम्यहं त्वत्तो यथावदुपसंहृतिम्।
महाप्रलयसंज्ञां च कल्पान्ते च महामुने॥ २
श्रीमैत्रेयजी बोले— हे महामुने! आपने सृष्टिरचना, वंश-परम्परा और मन्वन्तरोंकी स्थितिका तथा वंशोंके चरित्रोंका विस्तारसे वर्णन किया॥ १॥ अब मैं आपसे कल्पान्तमें होनेवाले महाप्रलय नामक संसारके उपसंहारका यथावत् वर्णन सुनना चाहता हूँ॥ २॥
श्रीपराशर उवाच
मैत्रेय श्रूयतां मत्तो यथावदुपसंहृतिः।
कल्पान्ते प्राकृते चैव प्रलये जायते यथा॥ ३
अहोरात्रं पितॄणां तु मासोऽब्दस्त्रिदिवौकसाम्।
चतुर्युगसहस्रे तु ब्रह्मणो वै द्विजोत्तम॥ ४
कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुर्युगम्।
दिव्यैर्वर्षसहस्रैस्तु तद्द्वादशभिरुच्यते॥ ५
चतुर्युगाण्यशेषाणि सदृशानि स्वरूपतः।
आद्यं कृतयुगं मुक्त्वा मैत्रेयान्त्यं तथा कलिम्॥ ६
आद्ये कृतयुगे सर्गो ब्रह्मणा क्रियते यथा।
क्रियते चोपसंहारस्तथान्ते च कलौ युगे॥ ७
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! कल्पान्तके समय प्राकृत प्रलयमें जिस प्रकार जीवोंका उपसंहार होता है, वह सुनो॥ ३॥ हे द्विजोत्तम! मनुष्योंका एक मास पितृगणका, एक वर्ष देवगणका और दो सहस्र चतुर्युग ब्रह्माका एक दिन-रात होता है॥ ४॥ सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलि—ये चार युग हैं, इन सबका काल मिलाकर बारह हजार दिव्य वर्ष कहा जाता है॥ ५॥ हे मैत्रेय! [प्रत्येक मन्वन्तरके] आदि कृतयुग और अन्तिम कलियुगको छोड़कर शेष सब चतुर्युग स्वरूपसे एक समान हैं॥ ६॥ जिस प्रकार आद्य (प्रथम) सत्ययुगमें ब्रह्माजी जगत्की रचना करते हैं उसी प्रकार अन्तिम कलियुगमें वे उसका उपसंहार करते हैं॥ ७॥
श्रीमैत्रेय उवाच
कलेःस्वरूपं भगवन्विस्तराद्वक्तुमर्हसि।
धर्मश्चतुष्पाद्भगवान्यस्मिन्विप्लवमृच्छति॥ ८
श्रीमैत्रेयजी बोले— हे भगवन्! कलिके स्वरूपका विस्तारसे वर्णन कीजिये, जिसमें चार चरणोंवाले भगवान् धर्मका प्रायः लोप हो जाता है॥ ८॥
श्रीपराशर उवाच
कलेःस्वरूपं मैत्रेय यद्भावाच्छ्रोतुमिच्छति।
तन्निबोध समासेन वर्तते यन्महामुने॥ ९
वर्णाश्रमाचारवती प्रवृत्तिर्न कलौ नृणाम्।
न सामऋग्यजुर्धर्मविनिष्पादनहैतुकी॥ १०
विवाहा न कलौ धर्म्या न शिष्यगुरुसंस्थितिः।
न दाम्पत्यक्रमो नैव वह्निदेवात्मकः क्रमः॥ ११
श्रीपराशरजी बोले— हे मैत्रेय! आप जो कलियुगका स्वरूप सुनना चाहते हैं सो उस समय जो कुछ होता है वह संक्षेपसे सुनिये॥ ९॥ कलियुगमें मनुष्योंकी प्रवृत्ति वर्णाश्रम-धर्मानुकूल नहीं रहती और न वह ऋक्-साम-यजुरूप त्रयी-धर्मका सम्पादन करनेवाली ही होती है॥ १०॥ उस समय धर्मविवाह, गुरु-शिष्य-सम्बन्धकी स्थिति, दाम्पत्यक्रम और अग्निमें देवयज्ञक्रियाका क्रम (अनुष्ठान) भी नहीं रहता॥ ११॥
| ४३० | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० १ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यत्र कुत्र कुले जातो बली सर्वेश्वरः कलौ ।<br>सर्वेभ्य एव वर्णेभ्यो योग्यः कन्यावरोधने ॥ १२ | कलियुगमें जो बलवान् होगा वही सबका स्वामी होगा चाहे किसी भी कुलमें क्यों न उत्पन्न हुआ हो, वह सभी वर्णोंसे कन्या ग्रहण करनेमें समर्थ होगा ॥ १२ ॥ |
| येन केन च योगेन द्विजातिर्दीक्षितः कलौ ।<br>यैव सैव च मैत्रेय प्रायश्चित्तं कलौ क्रिया ॥ १३ | उस समय द्विजातिगण जिस-किसी उपायसे [अर्थात् निषिद्ध द्रव्य आदिसे] भी ‘दीक्षित’ हो जायँगे और जैसी-तैसी क्रियाएँ ही प्रायश्चित्त मान ली जायँगी ॥ १३ ॥ |
| सर्वमेव कलौ शास्त्रं यस्य यद्वचनं द्विज ।<br>देवता च कलौ सर्वा सर्वस्सर्वस्य चाश्रमः ॥ १४ | हे द्विज ! कलियुगमें जिसके मुखसे जो कुछ निकल जायगा वही शास्त्र समझा जायगा; उस समय सभी (भूत-प्रेत-मशान आदि) देवता होंगे और सभीके सब आश्रम होंगे ॥ १४ ॥ |
| उपवासस्तथायासो वित्तोत्सर्गस्तपः कलौ ।<br>धर्मो यथाभिरुचितैरनुष्ठानैरनुष्ठितः ॥ १५ | उपवास, तीर्थाटनादि कायक्लेश, धन-दान तथा तप आदि अपनी रुचिके अनुसार अनुष्ठान किये हुए ही धर्म समझे जायँगे ॥ १५ ॥ |
| वित्तेन भविता पुंसां स्वल्पेनाढ्यमदः कलौ ।<br>स्त्रीणां रूपमदश्चैव केशैरेव भविष्यति ॥ १६ | कलियुगमें अल्प धनसे ही लोगोंको धनाढ्यताका गर्व हो जायगा और केशोंसे ही स्त्रियोंको सुन्दरताका अभिमान होगा ॥ १६ ॥ |
| सुवर्णमणिरत्नादौ वस्त्रे चोपक्षयं गते ।<br>कलौ स्त्रियो भविष्यन्ति तदा केशैरलङ्कृताः ॥ १७ | उस समय सुवर्ण, मणि, रत्न और वस्त्रोंके क्षीण हो जानेसे स्त्रियाँ केश-कलापोंसे ही अपनेको विभूषित करेंगी ॥ १७ ॥ |
| परित्यक्ष्यन्ति भर्त्तारं वित्तहीनं तथा स्त्रियः ।<br>भर्त्ता भविष्यति कलौ वित्तवानेव योषिताम् ॥ १८ | जो पति धनहीन होगा उसे स्त्रियाँ छोड़ देंगी। कलियुगमें धनवान् पुरुष ही स्त्रियोंका पति होगा ॥ १८ ॥ |
| यो वै ददाति बहुलं स्वं स स्वामी सदा नृणाम् ।<br>स्वामित्वहेतुस्सम्बन्धो न चाभिजनता तथा ॥ १९ | जो मनुष्य [चाहे वह कितनाहू निन्द्य हो] अधिक धन देगा वही लोगोंका स्वामी होगा; यह धन-दानका सम्बन्ध ही स्वामित्वका कारण होगा, कुलीनता नहीं ॥ १९ ॥ |
| गृहान्ता द्रव्यसङ्घाता द्रव्यान्ता च तथा मतिः ।<br>अर्थाश्चात्मोपभोग्यान्ता भविष्यन्ति कलौ युगे ॥ २० | कलिमें सारा द्रव्य-संग्रह घर बनानेमें ही समाप्त हो जायगा [दान-पुण्यादिमें नहीं], बुद्धि धन-संचयमें ही लगी रहेगी [आत्मज्ञानमें नहीं], सारी सम्पत्ति अपने उपभोगमें ही नष्ट हो जायगी [उससे अतिथि-सत्कारादि न होगा] ॥ २० ॥ |
| स्त्रियः कलौ भविष्यन्ति स्वैरिण्यो ललितस्पृहाः ।<br>अन्यायावाप्तवित्तेषु पुरुषाः स्पृहयालवः ॥ २१ | कलिकालमें स्त्रियाँ सुन्दर पुरुषकी कामनासे स्वेच्छाचारिणी होंगी तथा पुरुष अन्यायोपार्जित धनके इच्छुक होंगे ॥ २१ ॥ |
| अभ्यर्थितापि सुहृदा स्वार्थहानिं न मानवाः ।<br>पणाधार्द्धाद्धंमात्रेऽपि करिष्यन्ति कलौ द्विज ॥ २२ | हे द्विज ! कलियुगमें अपने सुहृदोंके प्रार्थना करनेपर भी लोग एक-एक दमड़ीके लिये भी स्वार्थहानि नहीं करेंगे ॥ २२ ॥ |
| समानपौरुषं चेतो भावि विप्रेषु वै कलौ ।<br>क्षीरप्रदानसम्बन्धि भावि गोषु च गौरवम् ॥ २३ | कलिमें ब्राह्मणोंके साथ शूद्र आदि समानताका दावा करेंगे और दूध देनेके कारण ही गौओंका सम्मान होगा ॥ २३ ॥ |
| अनावृष्टिभयप्रायाः प्रजाः क्षुद्भयकातराः ।<br>भविष्यन्ति तदा सर्वे गगनासक्तदृष्टयः ॥ २४ | उस समय सम्पूर्ण प्रजा क्षुधाकी व्यथासे व्याकुल हो प्रायः अनावृष्टिके भयसे सदा आकाशकी ओर दृष्टि लगाये रहेगी ॥ २४ ॥ |
| कन्दमूलफलाहारास्तापसा इव मानवाः ।<br>आत्मानं घातयिष्यन्ति ह्यनावृष्ट्यादिदुःखिताः ॥ २५ | मनुष्य [अन्नका अभाव होनेसे] तपस्वियोंके समान केवल कन्द, मूल और फल आदिके सहारे ही रहेंगे तथा अनावृष्टिके कारण दुःखी होकर आत्मघात करेंगे ॥ २५ ॥ |
अ० १ ] * षष्ठ अंश * ४३१
दुर्भिक्षमेव सततं तथा क्लेशमनीश्वराः।
प्राप्स्यन्ति व्याहतसुखप्रमोदा मानवाः कलौ ॥ २६
कलियुगमें असमर्थ लोग सुख और आनन्दके नष्ट हो जानेसे प्रायः सर्वदा दुर्भिक्ष तथा क्लेश ही भोगेंगे ॥ २६ ॥
अस्नानभोजिनो नाग्निदेवतातिथिपूजनम्।
करिष्यन्ति कलौ प्राप्ते न च पिण्डोदकक्रियाम्॥ २७
कलिके आनेपर लोग बिना स्नान किये ही भोजन करेंगे, अग्नि, देवता और अतिथिका पूजन न करेंगे और न पिण्डोदक क्रिया ही करेंगे ॥ २७ ॥
लोलुपा ह्रस्वदेहाश्च बह्वन्नादनतत्पराः।
बहुप्रजाल्पभाग्याश्च भविष्यन्ति कलौ स्त्रियः ॥ २८
उस समयकी स्त्रियाँ विषयलोलुप, छोटे शरीरवाली, अति भोजन करनेवाली, अधिक सन्तान पैदा करनेवाली और मन्दभाग्या होंगी ॥ २८ ॥
उभाभ्यामपि पाणिभ्यां शिरःकण्डूयनं स्त्रियः।
कुर्वन्त्यो गुरुभर्तृणामाज्ञां भेत्स्यन्त्यनादराः ॥ २९
वे दोनों हाथोंसे सिर खुजलाती हुई अपने गुरुजनों और पतियोंके आदेशका अनादरपूर्वक खण्डन करेंगी ॥ २९ ॥
स्वपोषणपराः क्षुद्रा देहसंस्कारवर्जिताः।
परुषानृतभाषिण्यो भविष्यन्ति कलौ स्त्रियः ॥ ३०
कलियुगकी स्त्रियाँ अपना ही पेट पालनेमें तत्पर, क्षुद्र चित्तवाली, शारीरिक शौचसे हीन तथा कटु और मिथ्या भाषण करनेवाली होंगी ॥ ३० ॥
दुःशीला दुष्टशीलेषु कुर्वन्त्यस्सततं स्पृहाम्।
असद्वृत्ता भविष्यन्ति पुरुषेषु कुलाङ्गनाः ॥ ३१
उस समयकी कुलाङ्गनाएँ निरन्तर दुश्चरित्र पुरुषोंकी इच्छा रखनेवाली एवं दुराचारिणी होंगी तथा पुरुषोंके साथ असद्व्यवहार करेंगी ॥ ३१ ॥
वेदादानं करिष्यन्ति वटवश्चाकृतव्रताः।
गृहस्थाश्च न होष्यन्ति न दास्यन्त्युचितान्यपि ॥ ३२
ब्रह्मचारिगण वैदिक व्रत आदिसे हीन रहकर ही वेदाध्ययन करेंगे तथा गृहस्थगण न तो हवन करेंगे और न सत्पात्रको उचित दान ही देंगे ॥ ३२ ॥
वानप्रस्था भविष्यन्ति ग्राम्याहारपरिग्रहाः।
भिक्षवश्चापि मित्रादिस्नेहसम्बन्धयन्त्रणाः ॥ ३३
वानप्रस्थ [वनके कन्द-मूलादिको छोड़कर] ग्राम्य भोजनको स्वीकार करेंगे और संन्यासी अपने मित्रादिके स्नेह-बन्धनमें ही बँधे रहेंगे ॥ ३३ ॥
अरक्षितारो हर्तारश्शुल्कव्याजेन पार्थिवाः।
हारिणो जनवित्तानां सम्प्राप्ते तु कलौ युगे ॥ ३४
कलियुगके आनेपर राजालोग प्रजाकी रक्षा नहीं करेंगे, बल्कि कर लेनेके बहाने प्रजाका ही धन छीनेंगे ॥ ३४ ॥
यो योऽश्वरथनागाढ्यस्स स राजा भविष्यति।
यश्च यश्चाबलस्सर्वस्स स भृत्यः कलौ युगे ॥ ३५
उस समय जिस-जिसके पास बहुत-से हाथी, घोड़े और रथ होंगे वह-वह ही राजा होगा तथा जो-जो शक्तिहीन होगा वह-वह ही सेवक होगा ॥ ३५ ॥
वैश्याः कृषिवणिज्यादि सन्त्यज्य निजकर्म यत्।
शूद्रवृत्त्या प्रवर्त्स्यन्ति कारुकर्मोपजीविनः ॥ ३६
वैश्यगण कृषि-वाणिज्यादि अपने कर्मोंको छोड़कर शिल्पकारी आदिसे जीवन-निर्वाह करते हुए शूद्रवृत्तियोंमें ही लग जायँगे ॥ ३६ ॥
भैक्षव्रतपराः शूद्राः प्रव्रज्यालिङ्गिनोऽधमाः।
पाषण्डसंश्रयां वृत्तिमाश्रयिष्यन्ति सत्कृताः ॥ ३७
आश्रमादिके चिह्नसे रहित अधम शूद्रगण संन्यास लेकर भिक्षावृत्तिमें तत्पर रहेंगे और लोगोंसे सम्मानित होकर पाषण्ड-वृत्तिका आश्रय लेंगे ॥ ३७ ॥
दुर्भिक्षकरपीडाभिरतीवोपद्रुता जनाः।
गोधूमान्नयवान्नाढ्यान्देशान्यास्यन्ति दुःखिताः ॥ ३८
प्रजाजन दुर्भिक्ष और करकी पीड़ासे अत्यन्त उपद्रवयुक्त और दुःखित होकर ऐसे देशोंमें चले जायँगे जहाँ गेहूँ और जौकी अधिकता होगी ॥ ३८ ॥
वेदमार्गे प्रलीने च पाषण्डाढ्ये ततो जने।
अधर्मवृद्ध्या लोकानामल्पमायुर्भविष्यति ॥ ३९
उस समय वेदमार्गका लोप, मनुष्योंमें पाषण्डकी प्रचुरता और अधर्मकी वृद्धि हो जानेसे प्रजाकी आयु अल्प हो जायगी ॥ ३९ ॥
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यमानेषु वै तपः।
नरेषु नृपदोषेण बाल्ये मृत्युर्भविष्यति ॥ ४०
लोगोंके शास्त्रविरुद्ध घोर तपस्या करनेसे तथा राजाके दोषसे प्रजाओंकी बाल्यावस्थामें मृत्यु होने लगेगी ॥ ४० ॥
| ४३२ | * श्रीविष्णुपुराण * | [अ० १ |
|---|
भविता योषितां सूतिः पञ्चषट्सप्तवार्षिकी।
नवाष्टदशवर्षाणां मनुष्याणां तथा कलौ॥ ४१
पलितोद्भवश्च भविता तथा द्वादशवार्षिकः।
नातिजीवति वै कश्चित्कलौ वर्षाणि विंशतिः॥ ४२
अल्पप्रज्ञा वृथालिङ्गा दुष्टान्तःकरणाः कलौ।
यतस्ततो विनङ्क्ष्यन्ति कालेनाल्पेन मानवाः॥ ४३
यदा यदा हि मैत्रेय हानिर्धर्मस्य लक्ष्यते।
तदा तदा कलेर्वृद्धिरनुमेया विचक्षणैः॥ ४४
यदा यदा हि पाषण्डवृद्धिमैत्रेय लक्ष्यते।
तदा तदा कलेर्वृद्धिरनुमेया महात्मभिः॥ ४५
यदा यदा सतां हानिर्वेदमार्गानुसारिणाम्।
तदा तदा कलेर्वृद्धिरनुमेया विचक्षणैः॥ ४६
प्रारम्भाश्चावसीदन्ति यदा धर्मभृतां नृणाम्।
तदानुमेयं प्राधान्यं कलेर्मैत्रेय पण्डितैः॥ ४७
यदा यदा न यज्ञानामीश्वरः पुरुषोत्तमः।
इज्यते पुरुषैर्यज्ञैस्तदा ज्ञेयं कलेर्बलम्॥ ४८
न प्रीतिर्वेदवादेषु पाषण्डेषु यदा रतिः।
कलेर्वृद्धिस्तदा प्राज्ञैरनुमेया विचक्षणैः॥ ४९
कलौ जगत्पतिं विष्णुं सर्वस्रष्टारमीश्वरम्।
नार्चयिष्यन्ति मैत्रेय पाषण्डोपहता जनाः॥ ५०
किं देवैः किं द्विजैर्वेदैः किं शौचेनाम्बुजन्मना।
इत्येवं विप्र वक्ष्यन्ति पाषण्डोपहता जनाः॥ ५१
स्वल्पाम्बुवृष्टिः पर्जन्यः सस्यं स्वल्पफलं तथा।
फलं तथल्पसारं च विप्र प्राप्ते कलौ युगे॥ ५२
शाणीप्रायाणि वस्त्राणि शमीप्राया महीरुहाः।
शूद्रप्रायास्तथा वर्णा भविष्यन्ति कलौ युगे॥ ५३
अणुप्रायाणि धान्यानि अजाप्रायं तथा पयः।
भविष्यति कलौ प्राप्ते हौशीरं चानुलेपनम्॥ ५४
श्वश्रूश्वशुरभूयिष्ठा गुरवश्च नृणां कलौ।
श्यालाद्या हरिभार्याश्च सुहृदो मुनिसत्तम॥ ५५
कस्य माता पिता कस्य यथा कर्मानुगः पुमान्।
इति चोदाहरिष्यन्ति श्वशुरानुगता नराः॥ ५६
हिंदी अनुवाद:
कलिमें पाँच-छः अथवा सात वर्षकी स्त्री और आठ-नौ या दस वर्षके पुरुषोंके ही सन्तान हो जायगी॥ ४१॥ बारह वर्षकी अवस्थामें ही लोगोंके बाल पकने लगेंगे और कोई भी व्यक्ति बीस वर्षसे अधिक जीवित न रहेगा॥ ४२॥ कलियुगमें लोग मन्द-बुद्धि, व्यर्थ चिह्न धारण करनेवाले और दुष्ट चित्तवाले होंगे, इसलिये वे अल्पकालमें ही नष्ट हो जायँगे॥ ४३॥
हे मैत्रेय! जब-जब धर्मकी अधिक हानि दिखलायी दे तभी-तभी बुद्धिमान् मनुष्यको कलियुगकी वृद्धिका अनुमान करना चाहिये॥ ४४॥ हे मैत्रेय! जब-जब पाषण्ड बढ़ा हुआ दीखे तभी-तभी महात्माओंको कलियुगकी वृद्धि समझनी चाहिये॥ ४५॥ जब-जब वैदिक मार्गका अनुसरण करनेवाले सत्पुरुषोंका अभाव हो तभी-तभी बुद्धिमान् मनुष्य कलिकी वृद्धि हुई जाने॥ ४६॥ हे मैत्रेय! जब धर्मात्मा पुरुषोंके आरम्भ किये हुए कार्योंमें असफलता हो तब पण्डितजन कलियुगकी प्रधानता समझें॥ ४७॥ जब-जब यज्ञोंके अधीश्वर भगवान् पुरुषोत्तमका लोग यज्ञोंद्वारा यजन न करें तब-तब कलिका प्रभाव ही समझना चाहिये॥ ४८॥ जब वेद-वादमें प्रीतिका अभाव हो और पाषण्डमें प्रेम हो तब बुद्धिमान् प्राज्ञ पुरुष कलियुगको बढ़ा हुआ जानें॥ ४९॥
हे मैत्रेय! कलियुगमें लोग पाषण्डके वशीभूत हो जानेसे सबके रचयिता और प्रभु जगत्पति भगवान् विष्णुका पूजन नहीं करेंगे॥ ५०॥ हे विप्र! उस समय लोग पाषण्डके वशीभूत होकर कहेंगे—'इन देव, द्विज, वेद और जलसे होनेवाले शौचादिमें क्या रखा है?'॥ ५१॥ हे विप्र! कलिके आनेपर वृष्टि अल्प जलवाली होगी, खेती थोड़ी उपजवाली होगी और फलादि अल्प सारयुक्त होंगे॥ ५२॥ कलियुगमें प्रायः सनके बने हुए सबके वस्त्र होंगे, अधिकतर शमीके वृक्ष होंगे और चारों वर्ण बहुधा शूद्रवत् हो जायँगे॥ ५३॥ कलिके आनेपर धान्य अत्यन्त अणु होंगे, प्रायः बकरियोंका ही दूध मिलेगा और उशीर (खस) ही एकमात्र अनुलेपन होगा॥ ५४॥
हे मुनिश्रेष्ठ! कलियुगमें सास और ससुर ही लोगोंके गुरुजन होंगे और हृदयहारिणी भार्या तथा साले ही सुहृद् होंगे॥ ५५॥ लोग अपने ससुरके अनुगामी होकर कहेंगे कि 'कौन किसका पिता है और कौन किसकी माता; सब पुरुष अपने कर्मानुसार जन्मते-मरते रहते हैं'॥ ५६॥
अ० २ ] * षष्ठ अंश * ४३३
वाङ्मनःकायजैर्दोषैरभिभूताः पुनः पुनः।
नराः पापान्यनुदिनं करिष्यन्त्यल्पमेधसः ॥ ५७
निस्सत्त्वानामशौचानां निर्ह्रीकाणां तथा नृणाम्।
यद्यद्दुःखाय तत्सर्वं कलिकाले भविष्यति ॥ ५८
निस्स्वाध्यायवषट्कारे स्वधास्वाहाविवर्जिते।
तदा प्रविरलो धर्मः क्वचिल्लोके निवत्स्यति ॥ ५९
तत्राल्पेनैव यत्नेन पुण्यस्कन्धमनुत्तमम्।
करोति यं कृतयुगे क्रियते तपसा हि सः ॥ ६०
उस समय अल्पबुद्धि पुरुष बारम्बार वाणी, मन और शरीरादिके दोषोंके वशीभूत होकर प्रतिदिन पुनः-पुनः पापकर्म करेंगे ॥ ५७ ॥ शक्ति, शौच और लज्जाहिन पुरुषोंको जो-जो दुःख हो सकते हैं कलियुगमें वे सभी दुःख उपस्थित होंगे ॥ ५८ ॥ उस समय संसारके स्वाध्याय और वषट्कारसे हीन तथा स्वधा और स्वाहासे वर्जित हो जानेसे कहीं-कहीं कुछ-कुछ धर्म रहेगा ॥ ५९ ॥ किंतु कलियुगमें मनुष्य थोड़ा-सा प्रयत्न करनेसे ही जो अत्यन्त उत्तम पुण्यराशि प्राप्त करता है वही सत्ययुगमें महान् तपस्यासे प्राप्त किया जा सकता है ॥ ६० ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
दूसरा अध्याय
श्रीव्यासजीद्वारा कलियुग, शूद्र और स्त्रियोंका महत्त्व-वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| व्यासश्चाह महाबुद्धिर्यदत्रैव हि वस्तुनि।<br>तच्छ्रूयतां महाभाग गदतो मम तत्त्वतः ॥ १ | हे महाभाग ! इसी विषयमें महामति व्यासदेवने जो कुछ कहा है वह मैं यथावत् वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ १ ॥ |
| कस्मिन्कालेऽल्पको धर्मो ददाति सुमहत्फलम्।<br>मुनीनां पुण्यवादोऽभूत्कैश्चासौ क्रियते सुखम् ॥ २ | एक बार मुनियोंमें [परस्पर] पुण्यके विषयमें यह वार्तालाप हुआ कि 'किस समयमें थोड़ा-सा पुण्य भी महान् फल देता है और कौन उसका सुखपूर्वक अनुष्ठान कर सकते हैं ?' ॥ २ ॥ |
| सन्देहनिर्णयार्थाय वेदव्यासं महामुनिम्।<br>ययुस्ते संशयं प्रष्टुं मैत्रेय मुनिपुङ्गवाः ॥ ३ | हे मैत्रेय ! वे समस्त मुनिश्रेष्ठ इस सन्देहका निर्णय करनेके लिये महामुनि व्यासजीके पास यह प्रश्न पूछने गये ॥ ३ ॥ |
| ददृशुस्ते मुनिं तत्र जाह्नवीसलिले द्विज।<br>वेदव्यासं महाभागमर्द्धस्नातं सुतं मम ॥ ४ | हे द्विज ! वहाँ पहुँचनेपर उन मुनिजनोंने मेरे पुत्र महाभाग व्यासजीको गंगाजीमें आधा स्नान किये देखा ॥ ४ ॥ |
| स्नानावसानं ते तस्य प्रतीक्षन्तो महर्षयः।<br>तस्थुस्तीरे महानद्यास्तरुषण्डमुपाश्रिताः ॥ ५ | वे महर्षिगण व्यासजीके स्नान कर चुकनेकी प्रतीक्षामें उस महानदीके तटपर वृक्षोंके तले बैठे रहे ॥ ५ ॥ |
| मग्नोऽथ जाह्नवीतोयादुत्थायाह सुतो मम।<br>शूद्रस्साधुः कलिस्साधुरित्येवं शृण्वतां वचः ॥ ६ | उस समय गंगाजीमें डुबकी लगाये मेरे पुत्र व्यासने जलसे उठकर उन मुनिजनोंके सुनते हुए 'कलियुग ही श्रेष्ठ है, शूद्र ही श्रेष्ठ है' यह वचन कहा। |
| तेषां मुनीनां भूयश्च ममज्ज स नदीजले।<br>साधु साध्विति चोत्थाय शूद्र धन्योऽसि चाब्रवीत् ॥ ७ | ऐसा कहकर उन्होंने फिर जलमें गोता लगाया और फिर उठकर कहा—"शूद्र ! तुम ही श्रेष्ठ हो, तुम ही धन्य हो" ॥ ६-७ ॥ |
| निमग्नश्च समुत्थाय पुनः प्राह महामुनिः।<br>योषितः साधु धन्यास्तास्ताभ्यो धन्यतरोऽस्ति कः ॥ ८ | यह कहकर वे महामुनि फिर जलमें मग्न हो गये और फिर खड़े होकर बोले—"स्त्रियाँ ही साधु हैं, वे ही धन्य हैं, उनसे अधिक धन्य और कौन है ?" ॥ ८ ॥ |
४३४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २
ततः स्नात्वा यथान्यायमायान्तं च कृतक्रियम्। उपतस्थुर्महाभागं मुनयस्ते सुतं मम॥ ९ कृतसंवन्दनांश्चाह कृतासनपरिग्रहान्। किमर्थमागता यूयमिति सत्यवतीसुतः॥ १० तमूचुः संशयं प्रष्टुं भवन्तं वयमागताः। अलं तेनास्तु तावन्नः कथ्यतामपरं त्वया॥ ११ कलिरस्साध्विति यत्प्रोक्तं शूद्रः साध्विति योषितः। यदाह भगवान् साधु धन्याश्चेति पुनः पुनः॥ १२ तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामो न चेद् गुह्यं महामुने। तत्कथ्यतां ततो हृत्स्थं पृच्छामस्त्वां प्रयोजनम्॥ १३ श्रीपराशर उवाच इत्युक्तो मुनिभिर्व्यासः प्रहस्येदमथाब्रवीत्। श्रूयतां भो मुनिश्रेष्ठा यदुक्तं साधु साध्विति॥ १४ श्रीव्यास उवाच यत्कृते दशभिर्वर्षैस्त्रेतायां हायनेन तत्। द्वापरे तच्च मासेन ह्यहोरात्रेण तत्कलौ॥ १५ तपसो ब्रह्मचर्यस्य जपादेश्च फलं द्विजाः। प्राप्नोति पुरुषस्तेन कलिरस्साध्विति भाषितम्॥ १६ ध्यायन्कृते यजन् यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन्। यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम्॥ १७ धर्मोत्कर्षमतीवात्र प्राप्नोति पुरुषः कलौ। अल्पायासेन धर्मज्ञास्तेन तुष्टोऽस्म्यहं कलेः॥ १८ व्रतचर्यापरैर्ग्राह्या वेदाः पूर्वं द्विजातिभिः। ततस्स्वधर्मसम्प्राप्तैर्यष्टव्यं विधिवद्धनैः॥ १९ वृथा कथा वृथा भोज्यं वृथेज्या च द्विजन्मनाम्। पतनाय ततो भाव्यं तैस्तु संयमिभिस्सदा॥ २० असम्यक्करणे दोषस्तेषां सर्वेषु वस्तुषु। भोज्यपेयादिकं चैषां नेच्छाप्राप्तिकरं द्विजाः॥ २१ पारतन्त्र्यं समस्तेषु तेषां कार्येषु वै यतः। जयन्ति ते निजाँल्लोकान्क्लेशेन महता द्विजाः॥ २२
तदनन्तर जब मेरे महाभाग पुत्र व्यासजी स्नान करनेके अनन्तर नियमानुसार नित्यकर्मसे निवृत्त होकर आये तो वे मुनिजन उनके पास पहुँचे॥ ९॥ वहाँ आकर जब वे यथायोग्य अभिवादनादिके अनन्तर आसनोंपर बैठ गये तो सत्यवतीनन्दन व्यासजीने उनसे पूछा—"आपलोग कैसे आये हैं?"॥ १०॥
तब मुनियोंने उनसे कहा—"हमलोग आपसे एक सन्देह पूछनेके लिये आये थे, किंतु इस समय उसे तो जाने दीजिये, एक और बात हमें बतलाइये॥ ११॥ भगवन्! आपने जो स्नान करते समय कई बार कहा था कि 'कलियुग ही श्रेष्ठ है, शूद्र ही श्रेष्ठ हैं, स्त्रियाँ ही साधु और धन्य हैं', सो क्या बात है? हम यह सम्पूर्ण विषय सुनना चाहते हैं। हे महामुने! यदि गोपनीय न हो तो कहिये। इसके पीछे हम आपसे अपना आन्तरिक सन्देह पूछेंगे"॥ १२-१३॥
श्रीपराशरजी बोले—मुनियोंके इस प्रकार पूछनेपर व्यासजीने हँसते हुए कहा—"हे मुनिश्रेष्ठो! मैंने जो इन्हें बारम्बार साधु-साधु कहा था, उसका कारण सुनो"॥ १४॥
श्रीव्यासजी बोले—हे द्विजगण! जो फल सत्ययुगमें दस वर्ष तपस्या, ब्रह्मचर्य और जप आदि करनेसे मिलता है उसे मनुष्य त्रेतामें एक वर्ष, द्वापरमें एक मास और कलियुगमें केवल एक दिन-रातमें प्राप्त कर लेता है, इस कारण ही मैंने कलियुगको श्रेष्ठ कहा है॥ १५-१६॥ जो फल सत्ययुगमें ध्यान, त्रेतामें यज्ञ और द्वापरमें देवार्चन करनेसे प्राप्त होता है वही कलियुगमें श्रीकृष्णचन्द्रका नाम-कीर्तन करनेसे मिल जाता है॥ १७॥ हे धर्मज्ञगण! कलियुगमें थोड़े-से परिश्रमसे ही पुरुषको महान् धर्मकी प्राप्ति हो जाती है, इसीलिये मैं कलियुगसे अति सन्तुष्ट हूँ॥ १८॥
[अब शूद्र क्यों श्रेष्ठ हैं, यह बतलाते हैं] द्विजातियोंको पहले ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए वेदाध्ययन करना पड़ता है और फिर स्वधर्माचरणसे उपार्जित धनके द्वारा विधिपूर्वक यज्ञ करने पड़ते हैं॥ १९॥ इसमें भी व्यर्थ वार्तालाप, व्यर्थ भोजन और व्यर्थ यज्ञ उनके पतनके कारण होते हैं; इसलिये उन्हें सदा संयमी रहना आवश्यक है॥ २०॥ सभी कामोंमें अनुचित (विधिके विपरीत) करनेसे उन्हें दोष लगता है; यहाँतक कि भोजन और पानादि भी वे अपने इच्छानुसार नहीं भोग सकते॥ २१॥ क्योंकि उन्हें सम्पूर्ण कार्योंमें परतन्त्रता रहती है। हे द्विजगण! इस प्रकार वे अत्यन्त क्लेशसे पुण्य-लोकोंको प्राप्त करते हैं॥ २२॥
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अ० २ ] * षष्ठ अंश * ४३५
द्विजशुश्रूषयैवैष पाकयज्ञाधिकारवान्।
निजाञ्जयति वै लोकाञ्छूद्रो धन्यतरस्ततः॥ २३
भक्ष्याभक्ष्येषु नास्त्यस्ति पेयापेयेषु वै यतः।
नियमो मुनिशार्दूलास्तेनासौ साध्वितीरितः॥ २४
स्वधर्मस्याविरोधेन नरैर्लब्धं धनं सदा।
प्रतिपादनीयं पात्रेषु यष्टव्यं च यथाविधि॥ २५
तस्यार्जने महाक्लेशः पालने च द्विजोत्तमाः।
तथासद्विनियोगेन विज्ञातं गहनं नृणाम्॥ २६
एवमन्यैस्तथा क्लेशैः पुरुषा द्विजसत्तमाः।
निजाञ्जयन्ति वै लोकान्प्राजापत्यादिकान्क्रमात्॥ २७
योषिच्छुश्रूषणाद्भर्त्तुः कर्मणा मनसा गिरा।
तद्धिता शुभमाप्नोति तत्सालोक्यं यतो द्विजाः॥ २८
नातिक्लशेन महता तानेव पुरुषो यथा।
तृतीयं व्याहृतं तेन मया साध्विति योषितः॥ २९
एतद्वः कथितं विप्रा यन्निमित्तमिहागताः।
तत्पृच्छत यथाकामं सर्वं वक्ष्यामि वः स्फुटम्॥ ३०
ऋषयस्ते ततः प्रोचुर्यत्प्रष्टव्यं महामुने।
अस्मिन्नेव च तत् प्रश्ने यथावत्कथितं त्वया॥ ३१
श्रीपराशर उवाच
ततः प्रहस्य तानाह कृष्णद्वैपायनो मुनिः।
विस्मयोत्फुल्लनयनांस्तापसांस्तानुपागतान्॥ ३२
मयैष भवतां प्रश्नो ज्ञातो दिव्येन चक्षुषा।
ततो हि वः प्रसङ्गेन साधु साध्विति भाषितम्॥ ३३
स्वल्पेन हि प्रयत्नेन धर्मस्सिद्धयति वै कलौ।
नरैरात्मगुणाम्भोभिः क्षालिताखिलकिल्बिषैः॥ ३४
शूद्रैश्च द्विजशुश्रूषातत्परैर्द्विजसत्तमाः।
तथा स्त्रीभिरनायासात्पतिशुश्रूषयैव हि॥ ३५
ततस्त्रितयमप्येतन्मम धन्यतरं मतम्।
धर्मसम्पादने क्लेशो द्विजातीनां कृतादिषु॥ ३६
भवद्भिर्र्यदभिप्रेतं तदेतत्कथितं मया।
अपृष्टेनापि धर्मज्ञाः किमन्यत्क्रियतां द्विजाः॥ ३७
किंतु जिसे केवल [मन्त्रहीन] पाक-यज्ञका ही अधिकार है वह शूद्र द्विजोंकी सेवा करनेसे ही सद्गति प्राप्त कर लेता है, इसलिये वह अन्य जातियोंकी अपेक्षा धन्यतर है॥ २३॥ हे मुनिशार्दूलो! शूद्रको भक्ष्याभक्ष्य अथवा पेयापेयका कोई नियम नहीं है, इसलिये मैंने उसे साधु कहा है॥ २४॥
[अब स्त्रियोंको किसलिये श्रेष्ठ कहा, यह बतलाते हैं—] पुरुषोंको अपने धर्मानुकूल प्राप्त किये हुए धनसे ही सर्वदा सुपात्रको दान और विधिपूर्वक यज्ञ करना चाहिये॥ २५॥ हे द्विजोत्तमगण! इस द्रव्यके उपार्जन तथा रक्षणमें महान् क्लेश होता है और उसको अनुचित कार्यमें लगानेसे भी मनुष्योंको जो कष्ट भोगना पड़ता है वह मालूम ही है॥ २६॥ इस प्रकार हे द्विजसत्तमो! पुरुषगण इन तथा ऐसे ही अन्य कष्टसाध्य उपायोंसे क्रमशः प्राजापत्य आदि शुभ लोकोंको प्राप्त करते हैं॥ २७॥ किंतु स्त्रियाँ तो तन-मन-वचनसे पतिकी सेवा करनेसे ही उनकी हितकारिणी होकर पतिके समान शुभ लोकोंको अनायास ही प्राप्त कर लेती हैं जो कि पुरुषोंको अत्यन्त परिश्रमसे मिलते हैं। इसीलिये मैंने तीसरी बार यह कहा था कि ‘स्त्रियाँ साधु हैं’॥ २८-२९॥ ‘हे विप्रगण! मैंने आपलोगोंसे यह [अपने साधुवादका रहस्य] कह दिया, अब आप जिसलिये पधारे हैं वह इच्छानुसार पूछिये। मैं आपसे सब बातें स्पष्ट करके कह दूँगा’॥ ३०॥ तब ऋषियोंने कहा—‘हे महामुने! हमें जो कुछ पूछना था उसका यथावत् उत्तर आपने इसी प्रश्नमें दे दिया है। [इसलिये अब हमें और कुछ पूछना नहीं है]॥ ३१॥
श्रीपराशरजी बोले—तब मुनिवर कृष्णद्वैपायनने विस्मयसे खिले हुए नेत्रोंवाले उन समागत तपस्वियोंसे हँसकर कहा॥ ३२॥ मैं दिव्य दृष्टिसे आपके इस प्रश्नको जान गया था इसीलिये मैंने आपलोगोंके प्रसंगसे ही ‘साधु-साधु’ कहा था॥ ३३॥ जिन पुरुषोंने गुणरूप जलसे अपने समस्त दोष धो डाले हैं उनके थोड़े-से प्रयत्नसे ही कलियुगमें धर्म सिद्ध हो जाता है॥ ३४॥ हे द्विजश्रेष्ठो! शूद्रोंको द्विजसेवापरायण होनेसे और स्त्रियोंको पतिकी सेवामात्र करनेसे ही अनायास धर्मकी सिद्धि हो जाती है॥ ३५॥ इसीलिये मेरे विचारसे ये तीनों धन्यतर हैं, क्योंकि सत्ययुगादि अन्य तीन युगोंमें भी द्विजातियोंको ही धर्म सम्पादन करनेमें महान् क्लेश उठाना पड़ता है॥ ३६॥ हे धर्मज्ञ ब्राह्मणो! इस प्रकार आपलोगोंका जो अभिप्राय था वह मैंने आपके बिना पूछे ही कह दिया, अब और क्या करूँ?’॥ ३७॥
| ४३६ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ३ |
|---|
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| ततस्सम्पूज्य ते व्यासं प्रशंसुः पुनः पुनः ।<br>यथाऽऽगतं द्विजा जग्मुर्व्यासोक्तिकृतनिश्चयाः ॥ ३८ | तदनन्तर उन्होंने व्यासजीका पूजनकर उनकी बारम्बार प्रशंसा की और उनके कथनानुसार निश्चयकर जहाँसे आये थे वहाँ चले गये ॥ ३८ ॥ |
| भवतोऽपि महाभाग रहस्यं कथितं मया ।<br>अत्यन्तदुष्टस्य कलेरयमेको महान्गुणः ।<br>कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तबन्धः परं व्रजेत् ॥ ३९ | हे महाभाग मैत्रेयजी! आपसे भी मैंने यह रहस्य कह दिया। इस अत्यन्त दुष्ट कलियुगमें यही एक महान् गुण है कि इस युगमें केवल कृष्णचन्द्रका नाम-संकीर्तन करनेसे ही मनुष्य परमपद प्राप्त कर लेता है ॥ ३९ ॥ |
| यच्चाहं भवता पृष्टो जगतामुपसंहृतिम् ।<br>प्राकृतामन्तरालां च तामप्येष वदामि ते ॥ ४० | अब आपने मुझसे जो संसारके उपसंहार—प्राकृत प्रलय और अवान्तर प्रलयके विषयमें पूछा था वह भी सुनाता हूँ ॥ ४० ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
तीसरा अध्याय
निमेषादि काल-मान तथा नैमित्तिक प्रलयका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| सर्वेषामेव भूतानां त्रिविधः प्रतिसञ्चरः ।<br>नैमित्तिकः प्राकृतिकस्तथैवात्यन्तिको लयः ॥ १ | सम्पूर्ण प्राणियोंका प्रलय नैमित्तिक, प्राकृतिक और आत्यन्तिक तीन प्रकारका होता है ॥ १ ॥ |
| ब्राह्मो नैमित्तिकस्तेषां कल्पान्ते प्रतिसञ्चरः ।<br>आत्यन्तिकस्तु मोक्षाख्यः प्राकृतो द्विपरार्द्धकः ॥ २ | उनमेंसे जो कल्पान्तमें ब्राह्म प्रलय होता है वह नैमित्तिक, जो मोक्ष नामक प्रलय है वह आत्यन्तिक और जो दो परार्द्धके अन्तमें होता है वह प्राकृत प्रलय कहलाता है ॥ २ ॥ |
| श्रीमैत्रेय उवाच | श्रीमैत्रेयजी बोले— |
| परार्द्धसंख्यां भगवन्ममाचक्ष्व यया तु सः ।<br>द्विगुणीकृतया ज्ञेयः प्राकृतः प्रतिसञ्चरः ॥ ३ | भगवन् ! आप मुझे परार्द्धकी संख्या बतलाइये, जिसको दूना करनेसे प्राकृत प्रलयका परिमाण जाना जा सके ॥ ३ ॥ |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
| स्थानात्स्थानं दशगुणमेकस्माद्गण्यते द्विज ।<br>ततोऽष्टादशमे भागे परार्द्धमभिधीयते ॥ ४ | हे द्विज ! एकसे लेकर क्रमशः दशगुण गिनते-गिनते जो अठारहवीं बार* गिनी जाती है वह संख्या परार्द्ध कहलाती है ॥ ४ ॥ |
| परार्द्धद्विगुणं यत्तु प्राकृतस्स लयो द्विज ।<br>तदाव्यक्तेऽखिलं व्यक्तं स्वहेतौ लयमेति वै ॥ ५ | हे द्विज! इस परार्द्धकी दूनी संख्यावाला प्राकृत प्रलय है, उस समय यह सम्पूर्ण जगत् अपने कारण अव्यक्तमें लीन हो जाता है ॥ ५ ॥ |
| निमेषो मानुषो योऽसौ मात्रा मात्राप्रमाणतः ।<br>तैः पञ्चदशभिः काष्ठा त्रिंशत्काष्ठा कला स्मृता ॥ ६ | मनुष्यका निमेष ही एक मात्रावाले अक्षरके उच्चारण-कालके समान परिमाणवाला होनेसे मात्रा कहलाता है; उन पन्द्रह निमेषोंकी एक काष्ठा होती है और तीस काष्ठाकी एक कला कही जाती है ॥ ६ ॥ |
| नाडिका तु प्रमाणेन सा कला दश पञ्च च ।<br>उन्मानेनाम्भसस्सा तु पलान्यर्द्धत्रयोदश ॥ ७ | पन्द्रह कला एक नाडिकाका प्रमाण है। वह नाडिका साढ़े बारह पल ताँबेके बने हुए जलके पात्रसे जानी जा सकती है ॥ ७ ॥ |
* वायुपुराणमें इन अठारह संख्याओंके इस प्रकार नाम हैं—एक, दस, शत, सहस्र, अयुत, नियुत, प्रयुत, अर्बुद, न्यर्बुद, वृन्द, खर्व, निखर्व, शंख, पद्म, समुद्र, मध्य, अन्त, परार्द्ध।
अ० ३]
- षष्ठ अंश * ४३७
| मागधेन तु मानेन जलप्रस्थस्तु स स्मृतः।<br>हेममाषैः कृतच्छिद्रश्चतुर्भिश्चतुरङ्गुलैः॥ ८<br>नाडिकाभ्यामथ द्वाभ्यां मुहूर्तो द्विजसत्तम।<br>अहोरात्रं मुहूर्तास्तु त्रिंशन्मासो दिनैस्तथा॥ ९<br>मासैर्द्वादशभिर्वर्षमहोरात्रं तु तद्दिवि।<br>त्रिभिर्वर्षशतैर्वर्ष षष्ट्या चैवासुरद्विषाम्॥ १०<br>तैस्तु द्वादशसाहस्रैश्चतुर्युगमुदाहृतम्।<br>चतुर्युगसहस्रं तु कथ्यते ब्रह्मणो दिनम्॥ ११<br>स कल्पस्तत्र मनवश्चतुर्दश महामुने।<br>तदन्ते चैव मैत्रेय ब्राह्मो नैमित्तिको लयः॥ १२<br>तस्य स्वरूपमत्युग्रं मैत्रेय गदतो मम।<br>शृणुष्व प्राकृतं भूयस्तव वक्ष्याम्यहं लयम्॥ १३<br>चतुर्युगसहस्रान्ते क्षीणप्राये महीतले।<br>अनावृष्टििरतीवोग्रा जायते शतवार्षिकी॥ १४<br>ततो यान्यल्पसाराणि तानि सत्त्वान्यशेषतः।<br>क्षयं यान्ति मुनिश्रेष्ठ पार्थिवान्यनुपीडनात्॥ १५<br>ततः स भगवान्विष्णू रुद्ररूपधरोऽव्ययः।<br>क्षयाय यतते कर्तुमात्मस्थास्सकलाः प्रजाः॥ १६<br>ततस्स भगवान्विष्णुर्भानोस्सप्तसु रश्मिषु।<br>स्थितः पिबत्यशेषाणि जलानि मुनिसत्तम॥ १७<br>पीत्वाम्भांसि समस्तानि प्राणिभूमिगतान्यपि।<br>शोषं नयति मैत्रेय समस्तं पृथिवीतलम्॥ १८<br>समुद्रान्सरितः शैलनदीप्रस्रवणानि च।<br>पातालेषु च यत्तोयं तत्सर्वं नयति क्षयम्॥ १९<br>ततस्तस्यानुभावेन तोयाहारोपबृंहिताः।<br>त एव रश्मयस्सप्त जायन्ते सप्त भास्कराः॥ २०<br>अधश्चोर्ध्वं च ते दीप्तास्ततस्सप्त दिवाकराः।<br>दहन्त्यशेषं त्रैलोक्यं सपातालतलं द्विज॥ २१<br>दह्यमानं तु तैर्दीप्तैस्त्रैलोक्यं द्विज भास्करैः।<br>साद्रिनद्यर्णवाभोगं निस्नेहमभिजायते॥ २२<br>ततो निर्दग्धवृक्षाम्बु त्रैलोक्यमखिलं द्विज।<br>भवत्येषा च वसुधा कूर्मपृष्ठोपमाकृतिः॥ २३ | मगधदेशीय मापसे वह पात्र जलप्रस्थ कहलाता है; उसमें चार अंगुल लम्बी चार मासेकी सुवर्ण-शलाकासे छिद्र किया रहता है [उसके छिद्रको ऊपर करके जलमें डुबो देनेसे जितनी देरमें वह पात्र भर जाय उतने ही समयको एक नाडिका समझना चाहिये]॥ ८॥ हे द्विजसत्तम! ऐसी दो नाडिकाओंका एक मुहूर्त होता है, तीस मुहूर्तका एक दिन-रात होता है तथा इतने (तीस) ही दिन-रातका एक मास होता है॥ ९॥ बारह मासका एक वर्ष होता है, देवलोकमें यही एक दिन-रात होता है। ऐसे तीन सौ साठ वर्षोंका देवताओंका एक वर्ष होता है॥ १०॥ ऐसे बारह हजार दिव्य वर्षोंका एक चतुर्युग होता है और एक हजार चतुर्युगका ब्रह्माका एक दिन होता है॥ ११॥<br>हे महामुने! यही एक कल्प है। इसमें चौदह मनु बीत जाते हैं। हे मैत्रेय! इसके अन्तमें ब्रह्माका नैमित्तिक प्रलय होता है॥ १२॥ हे मैत्रेय! सुनो, मैं उस नैमित्तिक प्रलयका अत्यन्त भयानक रूप वर्णन करता हूँ। इसके पीछे मैं तुमसे प्राकृत प्रलयका भी वर्णन करूँगा॥ १३॥ एक सहस्र चतुर्युग बीतनेपर जब पृथिवी क्षीणप्राय हो जाती है तो सौ वर्षतक अति घोर अनावृष्टि होती है॥ १४॥ हे मुनिश्रेष्ठ! उस समय जो पार्थिव जीव अल्प शक्तिवाले होते हैं वे सब अनावृष्टिसे पीड़ित होकर सर्वथा नष्ट हो जाते हैं॥ १५॥ तदनन्तर, रुद्ररूपधारी अव्ययात्मा भगवान् विष्णु संसारका क्षय करनेके लिये सम्पूर्ण प्रजाको अपनेमें लीन कर लेनेका प्रयत्न करते हैं॥ १६॥ हे मुनिसत्तम! उस समय भगवान् विष्णु सूर्यकी सातों किरणोंमें स्थित होकर सम्पूर्ण जलको सोख लेते हैं॥ १७॥ हे मैत्रेय! इस प्रकार प्राणियों तथा पृथिवीके अन्तर्गत सम्पूर्ण जलको सोखकर वे समस्त भूमण्डलको शुष्क कर देते हैं॥ १८॥ समुद्र तथा नदियोंमें, पर्वतीय सरिताओं और स्रोतोंमें तथा विभिन्न पातालोंमें जितना जल है वे उस सबको सुखा डालते हैं॥ १९॥ तब भगवान्के प्रभावसे प्रभावित होकर तथा जलपानसे पुष्ट होकर वे सातों सूर्यरश्मियाँ सात सूर्य हो जाती हैं॥ २०॥ हे द्विज! उस समय ऊपर-नीचे सब ओर देदीप्यमान होकर वे सातों सूर्य पातालपर्यन्त सम्पूर्ण त्रिलोकीको भस्म कर डालते हैं॥ २१॥ हे द्विज! उन प्रदीप्त भास्करोंसे दग्ध हुई त्रिलोकी पर्वत, नदी और समुद्रादिके सहित सर्वथा नीरस हो जाती है॥ २२॥ उस समय सम्पूर्ण त्रिलोकीके वृक्ष और जल आदिके दग्ध हो जानेसे यह पृथिवी कछुएकी पीठके समान कठोर हो जाती है॥ २३॥ |
४३८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३
| ततः कालाग्निरुद्रोऽसौ भूत्वा सर्वहरो हरिः ।<br>शेषाहिश्विाससम्भूतः पातालाानि दहत्यधः ॥ २४ | तब सबको नष्ट करनेके लिये उद्यत हुए श्रीहरि कालाग्नि-रुद्ररूपसे शेषनागके मुखसे प्रकट होकर नीचेसे पातालोंको जलाना आरम्भ करते हैं ॥ २४ ॥ |
| पातालानि समस्तानि स दग्ध्वा ज्वलनो महान् ।<br>भूमिमभ्येत्य सकलं भभस्ति वसुधातलं ॥ २५ | वह महान् अग्नि समस्त पातालोंको जलाकर पृथ्वीपर पहुँचता है और सम्पूर्ण भूतलको भस्म कर डालता है ॥ २५ ॥ |
| भुवर्लोकं ततस्सर्वं स्वर्लोकं च सुदारुणः ।<br>ज्वालामालामहावर्तस्तत्रैव परिवर्तते ॥ २६ | तब वह दारुण अग्नि भुवर्लोक तथा स्वर्गलोकको जला डालता है और वह ज्वाला-समूहका महान् आवर्त वहीं चक्कर लगाने लगता है ॥ २६ ॥ |
| अम्बरीषमिवाभाति त्रैलोक्यमखिलं तदा ।<br>ज्वालावर्तपरीवारमुपक्षीणचराचरम् ॥ २७ | इस प्रकार अग्निके आवर्तोंसे घिरकर सम्पूर्ण चराचरके नष्ट हो जानेपर समस्त त्रिलोकी एक तप्त कराहके समान प्रतीत होने लगती है ॥ २७ ॥ |
| ततस्तापपरीतास्तु लोकद्वयनिवासिनः ।<br>कृताधिकारा गच्छन्ति महर्लोकं महामुने ॥ २८ | हे महामुने ! तदनन्तर अवस्थाके परिवर्तनसे परलोककी चाहवाले भुवर्लोक और स्वर्गलोकमें रहनेवाले [मन्वादि] अधिकारिगण अग्निज्वालासे सन्तप्त होकर महर्लोकको चले जाते हैं |
| तस्मादपि महातापतप्ता लोकात्ततः परम् ।<br>गच्छन्ति जनलोकं ते दशावृत्त्या परैषिणः ॥ २९ | किन्तु वहाँ भी उस उग्र कालानलके महातापसे सन्तप्त होनेके कारण वे उससे बचनेके लिये जनलोकमें चले जाते हैं ॥ २८-२९ ॥ |
| ततो दग्ध्वा जगत्सर्वं रुद्ररूपी जनार्दनः ।<br>मुखनिःश्वासजान्मेघान्करोति मुनिसत्तम ॥ ३० | हे मुनिश्रेष्ठ ! तदनन्तर रुद्ररूपी भगवान् विष्णु सम्पूर्ण संसारको दग्ध करके अपने मुख-निःश्वाससे मेघोंको उत्पन्न करते हैं ॥ ३० ॥ |
| ततो गजकुलप्रख्यास्तडित्वन्तोऽतिनादिनः ।<br>उत्तिष्ठन्ति तथा व्योम्नि घोरास्संवर्तका घनाः ॥ ३१ | तब विद्युत्से युक्त भयंकर गर्जना करनेवाले गजसमूहके समान बृहदाकार संवर्तक नामक घोर मेघ आकाशमें उठते हैं ॥ ३१ ॥ |
| केचिन्नीलोत्पलश्यामाः केचित्कुमुदसन्निभाः ।<br>धूम्रवर्णा घनाः केचित्केचित्पीताः पयोधराः ॥ ३२ | उनमेंसे कोई मेघ नील कमलके समान श्यामवर्ण, कोई कुमुद-कुसुमके समान श्वेत, कोई धूम्रवर्ण और कोई पीतवर्ण होते हैं ॥ ३२ ॥ |
| केचिद्रासभवर्णाभा लाक्षारसन्निभास्तथा ।<br>केचिद्वैडूर्यसंकाशा इन्द्रनीलनिभाः क्वचित् ॥ ३३ | कोई गधेके-से वर्णवाले, कोई लाखके-से रंगवाले, कोई वैडूर्य-मणिके समान और कोई इन्द्रनील-मणिके समान होते हैं ॥ ३३ ॥ |
| शङ्खकुन्दनिभाश्चान्ये जात्यञ्जननिभाः परे ।<br>इन्द्रगोपनिभाः केचित्तत्तशिखिनिभास्तथा ॥ ३४ | कोई शंख और कुन्दके समान श्वेत-वर्ण, कोई जाती (चमेली)-के समान उज्ज्वल और कोई कज्जलके समान श्यामवर्ण, कोई इन्द्रगोपके समान रक्तवर्ण और कोई मयूरके समान विचित्र वर्णवाले होते हैं ॥ ३४ ॥ |
| मनश्शिलाभाः केचिद्वै हरितालनिभाः परे ।<br>चाषपत्रनिभाः केचिदुत्तिष्ठन्ते महाघनाः ॥ ३५ | कोई गेरूके समान, कोई हरितालके समान और कोई महामेघ, नील-कण्ठके पंखके समान रंगवाले होते हैं ॥ ३५ ॥ |
| केचित्पुरवराकाराः केचित्पर्वतसन्निभाः ।<br>कूटागारनिभाश्चान्ये केचित्स्थलनिभा घनाः ॥ ३६ | कोई नगरके समान, कोई पर्वतके समान और कोई कूटागार (गृहविशेष)-के समान बृहदाकार होते हैं तथा कोई पृथवीतलके समान विस्तृत होते हैं ॥ ३६ ॥ |
| महारावा महाकायाः पूरयन्ति नभःस्थलम् ।<br>वर्षन्तस्ते महासारांस्तमग्निमतिभैरवम् ।<br>शमयन्त्यखिलं विप्र त्रैलोक्यान्तरधिष्ठितम् ॥ ३७ | वे घनघोर शब्द करनेवाले महाकाय मेघगण आकाशको आच्छादित कर लेते हैं और मूसलाधार जल बरसाकर त्रिलोकव्यापी भयंकर अग्निको शान्त कर देते हैं ॥ ३७ ॥ |
| नष्टे चाग्नौ च सततं वर्षमाणा ह्यहर्निशम् ।<br>प्लावयन्ति जगत्सर्वमम्भोभिर्मुनिंसत्तम ॥ ३८ | हे मुनिश्रेष्ठ ! अग्निके नष्ट हो जानेपर भी अहर्निश निरन्तर बरसते हुए वे मेघ सम्पूर्ण जगत्को जलमें डुबो देते हैं ॥ ३८ ॥ |
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अ० ४ ] * षष्ठ अंश * ४३९
| धाराभिरतिमात्राभिः प्लावयित्वाखिलं भुवम्।<br>भुवर्लोकं तथैवोर्ध्वं प्लावयन्ति हि ते द्विज ॥ ३९ | हे द्विज! अपनी अति स्थूल धाराओंसे भूर्लोकको जलमें डुबोकर वे भुवर्लोक तथा उसके भी ऊपरके लोकोंको भी जलमग्न कर देते हैं॥ ३९॥ इस प्रकार सम्पूर्ण संसारके अन्धकारमय हो जानेपर तथा सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जीवोंके नष्ट हो जानेपर भी वे महामेघ सौ वर्षसे अधिक कालतक बरसते रहते हैं॥ ४०॥ हे मुनिश्रेष्ठ! सनातन परमात्मा वासुदेवके माहात्म्यसे कल्पान्तमें इसी प्रकार यह समस्त विप्लव होता है॥ ४१॥ |
| अन्धकारीकृते लोके नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>वर्षन्ति ते महामेघा वर्षाणामधिकं शतम् ॥ ४० | |
| एवं भवति कल्पान्ते समस्तं मुनिसत्तम।<br>वासुदेवस्य माहात्म्यान्नित्यस्य परमात्मनः ॥ ४१ |
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
चौथा अध्याय
प्राकृत प्रलयका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| सप्तर्षिस्थानमाक्रम्य स्थितेऽम्भसि महामुने।<br>एकार्णवं भवत्येतत्त्रैलोक्यमखिलं ततः॥ १ | हे महामुने! जब जल सप्तर्षियोंके स्थानको भी पार कर जाता है तो यह सम्पूर्ण त्रिलोकी एक महासमुद्रके समान हो जाती है॥ १॥ |
| मुखनिःश्वासजो विष्णोर्वायुस्ताञ्जलदांस्ततः।<br>नाशयन्वाति मैत्रेय वर्षाणामपरं शतम्॥ २ | हे मैत्रेय! तदनन्तर, भगवान् विष्णुके मुख-निःश्वाससे प्रकट हुआ वायु उन मेघोंको नष्ट करके पुनः सौ वर्षतक चलता रहता है॥ २॥ |
| सर्वभूतमयोऽचिन्त्यो भगवान्भूतभावनः।<br>अनादिरादिर्विश्वस्य पीत्वा वायुमशेषतः॥ ३ | फिर जनलोकनिवासी सनकादि सिद्धगणसे स्तुत और ब्रह्मलोकको प्राप्त हुए मुमुक्षुओंसे ध्यान किये जाते हुए सर्वभूतमय, अचिन्त्य, अनादि, जगत्के आदिकारण, आदिकर्ता, भूतभावन, मधुसूदन भगवान् हरि विश्वके सम्पूर्ण वायुको पीकर अपनी दिव्य-मायारूपिणी योगनिद्राका आश्रय ले अपने वासुदेवात्मक स्वरूपका चिन्तन करते हुए उस महासमुद्रमें शेषशय्यापर शयन करते हैं॥ ३-६॥ |
| एकार्णवे ततस्तस्मिञ्छेषशय्यागतः प्रभुः।<br>ब्रह्मरूपधरश्शेते भगवानादिकृद्धरिः॥ ४ | |
| जनलोकगतैस्सिद्धैस्सनकाद्यैरभिष्टुतः।<br>ब्रह्मलोकगतैश्चैव चिन्त्यमानो मुमुक्षुभिः॥ ५ | |
| आत्ममायामयीं दिव्यां योगनिद्रां समास्थितः।<br>आत्मानं वासुदेवाख्यं चिन्तयन्मधुसूदनः॥ ६ | |
| एष नैमित्तिको नाम मैत्रेय प्रतिसञ्चरः।<br>निमित्तं तत्र यच्छेते ब्रह्मरूपधरो हरिः॥ ७ | हे मैत्रेय! इस प्रलयके होनेमें ब्रह्मारूपधारी भगवान् हरिका शयन करना ही निमित्त है; इसलिये यह नैमित्तिक प्रलय कहलाता है॥ ७॥ |
| यदा जागर्ति सर्वात्मा स तदा चेष्टते जगत्।<br>निमीलयत्येतदखिलं मायाशय्यां गतेऽच्युते॥ ८ | जिस समय सर्वात्मा भगवान् विष्णु जागते रहते हैं उस समय सम्पूर्ण संसारकी चेष्टाएँ होती रहती हैं और जिस समय वे अच्युत मायारूपी शय्यापर सो जाते हैं उस समय संसार भी लीन हो जाता है॥ ८॥ |
| पद्मयोनेर्दिनं यत्तु चतुर्युगसहस्रवत्।<br>एकार्णवीकृते लोके तावती रात्रिरिष्यते॥ ९ | जिस प्रकार ब्रह्माजीका दिन एक हजार चतुर्युगका होता है उसी प्रकार संसारके एकार्णवरूप हो जानेपर उनकी रात्रि भी उतनी ही बड़ी होती है॥ ९॥ |
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४४०
- श्रीविष्णुपुराण *
[ अ० ४ ]
ततः प्रबुद्धो रात्र्यन्ते पुनस्सृष्टिं करोत्यजः । ब्रह्मस्वरूपधृग्विष्णुर्यथा ते कथितं पुरा ॥ १० ॥ इत्येष कल्पसंहारोऽवान्तरप्रलयो द्विज । नैमित्तिकस्ते कथितः प्राकृतं शृण्वतः परम् ॥ ११ ॥ अनावृष्ट्यादिसम्पर्कात्कृते संक्षालने मुने । समस्तेष्वेव लोकेषु पातालेष्वखिलेषु च ॥ १२ ॥ महदादेर्विकारस्य विशेषान्तस्य संक्षये । कृष्णोच्छाकारिते तस्मिन्प्रवृत्ते प्रतिसञ्चरे ॥ १३ ॥ आपो ग्रसन्ति वै पूर्व भूमेर्गन्ध्यात्मकं गुणम् । आतगन्धा ततो भूमिः प्रलयत्याय कल्प्यते ॥ १४ ॥ प्रणष्टे गन्धतन्मात्रे भवत्युर्वी जलात्मिका । आपस्तदा प्रवृद्धास्तु वेगवत्यो महास्वनाः ॥ १५ ॥ सर्वमापूरयन्तीदं तिष्ठन्ति विचरन्ति च । सलिलेनोर्मिमालेन लोका व्याप्ताः समन्ततः ॥ १६ ॥ अपामपि गुणो यस्तु ज्योतिषा पीयते तु सः । नश्यन्त्यापस्ततस्ताश्च रसतन्मात्रसंक्षयात् ॥ १७ ॥ ततश्चापो ह्तरसा ज्योतिषं प्राप्नुवन्ति वै । अग्न्यवस्थे तु सलिले तेजसा सर्वतो वृते ॥ १८ ॥ स चाग्निः सर्वतो व्याप्य चादत्ते तज्जलं तथा । सर्वमापूर्यतेऽर्चिर्भिस्तदा जगदिदं शनैः ॥ १९ ॥ अर्चिर्भिस्संवृते तस्मिंस्तियर्गूर्ध्वमधस्तदा । ज्योतिषोऽपि परं रूपं वायुरिति प्रभाकरम् ॥ २० ॥ प्रलीने च ततस्तस्मिन्वायुभूतेऽखिलात्मनि । प्रणष्टे रूपतन्मात्रे ह्तरूपो विभावसुः ॥ २१ ॥ प्रशाम्यति तदा ज्योतिर्वायुर्दोर्धुयते महान् । निरालोके तथा लोके वाख्यवस्थे च तेजसि ॥ २२ ॥ ततस्तु मूलमासाद्य वायुसम्भवमात्मनः । ऊर्ध्वं चाधश्च तिर्यक्च दोधवीति दिशो दश ॥ २३ ॥ वायोरोपि गुणं स्पर्शमाकाशो ग्रसते ततः । प्रशाम्यति ततो वायुः खं तु तिष्ठत्यनावृतम् ॥ २४ ॥ अरूपरसमस्पर्शमिगन्धं न च मूर्तिमत् । सर्वमापूरयच्चैव सुमहतत्प्रकाशते ॥ २५ ॥
उस रात्रिका अन्त होनेपर अजन्मा भगवान् विष्णु जागते हैं और ब्रह्मरूप धारणकर, जैसा तुमसे पहले कहा था उसी क्रमसे फिर सृष्टि रचते हैं ॥ १० ॥
हे द्विज! इस प्रकार तुमसे कल्पान्तमें होनेवाले नैमित्तिक एवं अवान्तर-प्रलयका वर्णन किया। अब दूसरे प्राकृत प्रलयका वर्णन सुनो ॥ ११ ॥ हे मुने! अनावृष्टि आदिके संयोगसे सम्पूर्ण लोक और निखिल पातालोंके नष्ट हो जानेपर तथा भगवदिच्छासे उस प्रलयकालके उपस्थित होनेपर जब महत्त्वसे लेकर [पृथिवी आदि पंच] विशेषपर्यन्त सम्पूर्ण विकार क्षीण हो जाते हैं तो प्रथम जल पृथिवीके गुण गन्धको अपनेमें लीन कर लेता है। इस प्रकार गन्ध छिन्न लिये जानेसे पृथिवीका प्रलय हो जाता है ॥ १२—१४ ॥ गन्ध-तन्मात्राके नष्ट हो जानेपर पृथिवी जलमय हो जाती है, उस समय बड़े वेगसे घोर शब्द करता हुआ जल बढ़कर इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर लेता है। यह जल कभी स्थिर होता और कभी बहने लगता है। इस प्रकार तरंगमालाओंसे पूर्ण इस जलसे सम्पूर्ण लोक सब ओरसे व्याप्त हो जाते हैं ॥ १५—१६ ॥ तदनन्तर जलके गुण रसको तेज अपनेमें लीन कर लेता है। इस प्रकार रस-तन्मात्राका क्षय हो जानेसे जल भी नष्ट हो जाता है ॥ १७ ॥ तब रसहीन हो जानेसे जल अग्निरूप हो जाता है तथा अग्निके सब ओर व्याप्त हो जानेसे जलके अग्निमें स्थित हो जानेपर वह अग्नि सब ओर फैलकर सम्पूर्ण जलको सोख लेता है और धीरे-धीरे यह सम्पूर्ण जगत् ज्वालासे पूर्ण हो जाता है ॥ १८—१९ ॥ जिस समय सम्पूर्ण लोक ऊपर-नीचे तथा सब ओर अग्नि-शिखाओंसे व्याप्त हो जाता है उस समय अग्निके प्रकाशक स्वरूपको वायु अपनेमें लीन कर लेता है ॥ २० ॥ सबके प्राणस्वरूप उस वायुमें जब अग्निका प्रकाशक रूप लीन हो जाता है तो रूप-तन्मात्राके नष्ट हो जानेसे अग्नि रूपहीन हो जाता है ॥ २१ ॥ उस समय संसारके प्रकाशहीन और तेजके वायुमें लीन हो जानेसे अग्नि शान्त हो जाता है और अति प्रचण्ड वायु चलने लगता है ॥ २२ ॥ तब अपने उद्भवस्थान आकाशका आश्रय कर वह प्रचण्ड वायु ऊपर-नीचे तथा सब ओर दसों दिशाओंमें बड़े वेगसे चलने लगता है ॥ २३ ॥ तदनन्तर वायुके गुण स्पर्शको आकाश लीन कर लेता है; तब वायु शान्त हो जाता है और आकाश आवरणहीन हो जाता है ॥ २४ ॥ उस समय रूप, रस, स्पर्श, गन्ध तथा आकारसे रहित अत्यन्त महान् एक आकाश ही सबको व्याप्त करके प्रकाशित होता है ॥ २५ ॥
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अ० ४ ] * षष्ठ अंश * ४४१
| परिमण्डलं च सुषिरमाकाशं शब्दलक्षणम्।<br>शब्दमात्रं तदाकाशं सर्वमावृत्य तिष्ठति॥ २६ | उस समय चारों ओरसे गोल, छिद्रस्वरूप, शब्दलक्षण आकाश ही शेष रहता है; और वह शब्दमात्र आकाश सबको आच्छादित किये रहता है॥ २६॥ |
| ततश्शब्दगुणं तस्य भूतादिर्ग्रसते पुनः।<br>भूतेन्द्रियेषु युगपद्भूतादौ संस्थितेषु वै।<br>अभिमानात्मको ह्येष भूतादिस्तामसस्मृतः॥ २७ | तदनन्तर, आकाशके गुण शब्दको भूतादि ग्रस लेता है। इस भूतादिमें ही एक साथ पंचभूत और इन्द्रियोंका भी लय हो जानेपर केवल अहंकारात्मक रह जानेसे यह तामस (तमःप्रधान) कहलाता है |
| भूतादिं ग्रसते चापि महान्वै बुद्धिलक्षणः॥ २८ | फिर इस भूतादिको भी [सत्त्वप्रधान होनेसे] बुद्धिरूप महत्तत्त्व ग्रस लेता है॥ २७-२८॥ |
| उर्वी महांश्च जगतः प्रान्तेऽन्तर्बाह्यतस्तथा॥ २९ | जिस प्रकार पृथ्वी और महत्तत्त्व ब्रह्माण्डके अन्तर्जगतकी आदि-अन्त सीमाएँ हैं उसी प्रकार उसके बाह्य जगत्का भी हैं॥ २९॥ |
| एवं सप्त महाबुद्धे क्रमात्प्रकृतयस्मृताः।<br>प्रत्याहारे तु तास्सर्वाः प्रविशन्ति परस्परम्॥ ३० | हे महाबुद्धे! इसी तरह जो सात आवरण बताये गये हैं वे सब भी प्रलयकालमें [पूर्ववत् पृथिवी आदि क्रमसे] परस्पर (अपने-अपने कारणोंमें) लीन हो जाते हैं॥ ३०॥ |
| येनेदमावृतं सर्वमण्डमप्सु प्रलीयते।<br>सप्तद्वीपसमुद्रान्तं सप्तलोकं सपर्वतम्॥ ३१ | जिससे यह समस्त लोक व्याप्त है वह सम्पूर्ण भूमण्डल सातों द्वीप, सातों समुद्र, सातों लोक और सकल पर्वतश्रेणियोंके सहित जलमें लीन हो जाता है॥ ३१॥ |
| उदकावरणं यत्तु ज्योतिषा पीयते तु तत्।<br>ज्योतिर्वायौ लयं याति यात्याकाशे समीरणः॥ ३२ | फिर जो जलका आवरण है उसे अग्नि पी जाता है तथा अग्नि वायुमें और वायु आकाशमें लीन हो जाता है॥ ३२॥ |
| आकाशं चैव भूतादिर्ग्रसते तं तथा महान्।<br>महान्तमेभिस्सहितं प्रकृतिर्ग्रसते द्विज॥ ३३ | हे द्विज! आकाशको भूतादि (तामस अहंकार), भूतादिको महत्तत्त्व और इन सबके सहित महत्तत्त्वको मूल प्रकृति अपनेमें लीन कर लेती है॥ ३३॥ |
| गुणसाम्यमनुद्रिक्तमन्वूनं च महामुने।<br>प्रोच्यते प्रकृतिर्हेतुः प्रधानं कारणं परम्॥ ३४ | हे महामुने! न्यूनाधिकसे रहित जो सत्त्वादि तीनों गुणोंकी साम्यावस्था है उसीको प्रकृति कहते हैं; इसीका नाम प्रधान भी है। यह प्रधान ही सम्पूर्ण जगत्का परम कारण है॥ ३४॥ |
| इत्येषा प्रकृतिस्सर्वा व्यक्ताव्यक्तस्वरूपिणी।<br>व्यक्तस्वरूपमव्यक्ते तस्मान्मैत्रेय लीयते॥ ३५ | यह प्रकृति व्यक्त और अव्यक्तरूपसे सर्वमयी है। हे मैत्रेय! इसीलिये अव्यक्तमें व्यक्तरूप लीन हो जाता है॥ ३५॥ |
| एकश्शुद्धोऽक्षरो नित्यस्सर्वव्यापी तथा पुमान्।<br>सोऽप्यंशस्सर्वभूतस्य मैत्रेय परमात्मनः॥ ३६ | इससे पृथक् जो एक शुद्ध, अक्षर, नित्य और सर्वव्यापक पुरुष है वह भी सर्वभूत परमात्माका अंश ही है॥ ३६॥ |
| न सन्ति यत्र सर्वेशे नामजात्यादिकल्पनाः।<br>सत्तामात्रात्मके ज्ञेये ज्ञानात्मन्यात्मनः परे॥ ३७ | जिस सत्तामात्रस्वरूप आत्मा (देहादि संघात)-से पृथक् रहनेवाले ज्ञानात्मा एवं ज्ञातव्य सर्वेश्वरमें नाम और जाति आदिकी कल्पना नहीं है वही सबका परम आश्रय |
| तद्ब्रह्म परमं धाम परमात्मा स चेश्वरः।<br>स विष्णुस्सर्वमेवेदं यतो नावर्तते यतिः॥ ३८ | परब्रह्म परमात्मा है और वही ईश्वर है। वह विष्णु ही इस अखिल विश्वरूपसे अवस्थित है उसको प्राप्त हो जानेपर योगिजन फिर इस संसारमें नहीं लौटते॥ ३७-३८॥ |
| प्रकृतिर्या मयाऽऽख्याता व्यक्ताव्यक्तस्वरूपिणी।<br>पुरुषश्चाप्युभावेतौ लीयेते परमात्मनि॥ ३९ | जिस व्यक्त और अव्यक्तस्वरूपिणी प्रकृतिका मैंने वर्णन किया है वह तथा पुरुष—ये दोनों भी उस परमात्मामें ही लीन हो जाते हैं॥ ३९॥ |
| परमात्मा च सर्वेषामाधारः परमेश्वरः।<br>विष्णुनामा स वेदेषु वेदान्तेषु च गीयते॥ ४० | वह परमात्मा सबका आधार और एकमात्र अधीश्वर है; उसीका वेद और वेदान्तोंमें विष्णुनामसे वर्णन किया है॥ ४०॥ |
| ४४२ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ५ |
|---|
प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्म वैदिकम्।
ताभ्यामुभाभ्यां पुरुषैस्सर्वमूर्त्तिस्स इज्यते ॥ ४१
ऋग्यजुस्सामभिर्मार्गैः प्रवृत्तैरिज्यते ह्यसौ।
यज्ञेश्वरो यज्ञपुमान्युरुषैः पुरुषोत्तमः॥४२
ज्ञानात्मा ज्ञानयोगेन ज्ञानमूर्त्तिः स चेज्यते।
निवृत्ते योगिभिर्मार्गे विष्णुर्मुक्तिफलप्रदः ॥ ४३
ह्रस्वदीर्घप्लुतैर्यत्तु किञ्चिद्वस्त्वभिधीयते।
यच्च वाचामविषयं तत्सर्वं विष्णुरव्ययः ॥ ४४
व्यक्तस्स एव चाव्यक्तस्स एव पुरुषोऽव्ययः।
परमात्मा च विश्वात्मा विश्वरूपधरो हरिः ॥ ४५
व्यक्ताव्यक्तात्मिका तस्मिन्प्रकृतिस्सम्प्रलीयते।
पुरुषश्चापि मैत्रेय व्यापिन्यव्याहतात्मनि ॥ ४६
द्विपराद्धात्मकः कालः कथितो यो मया तव ।
तदहस्तस्य मैत्रेय विष्णोरीशस्य कथ्यते ॥ ४७
व्यक्ते च प्रकृतौ लीने प्रकृत्यां पुरुषे तथा।
तत्र स्थिते निशा चास्य तत्प्रमाणा महामुने ॥ ४८
नैवाहस्तस्य न निशा नित्यस्य परमात्मनः।
उपचारस्तथाप्येष तस्येशस्य द्विजोच्यते ॥ ४९
इत्येष तव मैत्रेय कथितः प्राकृतो लयः।
आत्यन्तिकमथो ब्रह्मन्निबोध प्रतिसञ्चरम् ॥ ५० | वैदिक कर्म दो प्रकारका है—प्रवृत्तिरूप (कर्मयोग) और निवृत्त रूप (सांख्ययोग)। इन दोनों प्रकारके कर्मोंसे उस सर्वभूत पुरुषोत्तमका ही यजन किया जाता है॥ ४१॥ ऋक्, यजुः और सामवेदोक्त प्रवृत्ति-मार्गसे लोग उन यज्ञपति पुरुषोत्तम यज्ञ-पुरुषका ही पूजन करते हैं॥ ४२॥ तथा निवृत्ति-मार्गमें स्थित योगिजन भी उन्हीं ज्ञानात्मा ज्ञानस्वरूप मुक्ति-फलदायक भगवान् विष्णुका ही ज्ञानयोगद्वारा यजन करते हैं॥ ४३॥ ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत—इन त्रिविध स्वरोंसे जो कुछ कहा जाता है तथा जो वाणीका विषय नहीं है वह सब भी अव्ययात्मा विष्णु ही है॥ ४४॥ वह विश्वरूपधारी विश्वरूप परमात्मा श्रीहरि ही व्यक्त, अव्यक्त एवं अविनाशी पुरुष हैं॥ ४५॥ हे मैत्रेय! उन सर्वव्यापक और अविकृतरूप परमात्मामें ही व्यक्ताव्यक्तरूपिणी प्रकृति और पुरुष लीन हो जाते हैं॥ ४६॥<br><br>हे मैत्रेय! मैंने तुमसे जो द्विपराद्धैकाल कहा है वह उन विष्णुभगवान्का केवल एक दिन है॥ ४७॥ हे महामुने! व्यक्त जगत्के अव्यक्त-प्रकृतिमें और प्रकृतिके पुरुषमें लीन हो जानेपर इतने ही कालकी विष्णुभगवान्की रात्रि होती है॥ ४८॥ हे द्विज! वास्तवमें तो उन नित्य परमात्माका न कोई दिन है और न रात्रि, तथापि केवल उपचार (अध्यारोप)-से ऐसा कहा जाता है॥ ४९॥ हे मैत्रेय! इस प्रकार मैंने तुमसे यह प्राकृत प्रलयका वर्णन किया, अब तुम आत्यन्तिक प्रलयका वर्णन और सुनो॥ ५०॥
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥
पाँचवाँ अध्याय
आध्यात्मिकादि त्रिविध तापोंका वर्णन, भगवान् तथा वासुदेव शब्दोंकी व्याख्या और भगवान्के पारमार्थिक स्वरूपका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| आध्यात्मिकादि मैत्रेय ज्ञात्वा तापत्रयं बुधः।<br>उत्पन्नज्ञानवैराग्यः प्राप्नोत्यात्यन्तिकं लयम् ॥ १ | हे मैत्रेय! आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—तीनों तापोंको जानकर ज्ञान और वैराग्य उत्पन्न होनेपर पण्डितजन आत्यन्तिक प्रलय प्राप्त करते हैं॥ १॥ |
| आध्यात्मिकोऽपि द्विविधश्शारीरो मानसस्तथा।<br>शारीरो बहुभिर्भेदैर्भिद्यते श्रूयतां च सः॥ २ | आध्यात्मिक ताप शारीरिक और मानसिक दो प्रकारके होते हैं; उनमें शारीरिक तापके भी कितने ही भेद हैं, वह सुनो॥ २॥ |
अ० ५ ]
- पञ्च अंश *
४४३
शिरोरोगप्रतिशयायज्वरशूलभगन्दरैः । गुल्माशः॥१॥ वयथुश्ववासच्छर्द्यादिभिरनेकधा ॥ ३ तथाक्षिरोगातीसारकुष्ठाङ्गामयसंज्ञितैः । भिद्यते देहजस्तापो मानसं श्रोतुमर्हसि ॥ ४ कामक्रोधभयद्वेषलोभमोहविषादजः । शोकासूयावमानेर्घ्यामात्सर्यादिमयस्तथा ॥ ५ मानसोऽपि द्विजश्रेष्ठ तापो भवति नैकधा । इत्येवमादिभिर्भेदैस्तापो ह्याध्यात्मिकः स्मृतः ॥ ६ मृगपक्षिमनुष्याद्यैः पिशाचोर्गराक्षसैः । सरीसृपाद्यैश्च नृणां जायते चाधिभौतिकः ॥ ७ शीतवातोष्णवर्षाम्बुवैद्युतादिसमुद्भवः । तापो द्विजवर श्रेष्ठैः कथ्यते चाधिदैविकः ॥ ८ गर्भजन्मजराजानमृत्युनारकजं तथा । दुःखं सहस्रशो भेदैर्भिद्यते मुनिसत्तम ॥ ९ सुकुमारतनुर्गर्भं जन्तुर्बहुमलावृते । उल्बसंवैष्टितो भुग्नपृष्ठग्रीवास्थिसंहतिः ॥ १० अत्यन्तकटुतीक्ष्णोष्णत्ववर्णैर्मातृभोजनैः । अत्यन्ततापैरत्यर्थं वर्द्धमानातिवेदनः ॥ ११ प्रसारणाकुञ्चनादौ नाङ्गानां प्रभुरात्मनः । शक्नुम्रूत्रमहापङ्कशायी सर्वत्र पीडितः ॥ १२ निरुच्छ्वासः सचैतन्यस्मरजन्मशतान्यथ । आस्ते गर्भेऽतिदुःखेन निजकर्मानिबन्धनः ॥ १३ जायमानः पुरीषासृङ्मूत्रशुक्राविलाननः । प्राजापत्येन वातेन पीड्यमानास्थिबन्धनः ॥ १४ अधोमुखो वै क्रियते प्रबलैस्सूतिमारुतैः । क्लेशान्निष्क्रान्तिमाप्नोति जठरान्मातुरातुरः ॥ १५ मूच्छ्रामवाप्य महतीं संस्पृष्टो बाह्यवायुना । विज्ञानभ्रंशमाप्नोति जातश्च मुनिसत्तम ॥ १६ कण्टकैरिव तुन्नाङ्गः क्रकचैरिव दारितः । पूतव्रणान्निपतितो धरण्यां कुमिको यथा ॥ १७ कण्ठूयनेऽपि चाशक्तः परिवर्तैऽप्यनीश्वरः । स्नानपानादिकाहारमप्याप्नोति परेच्छया ॥ १८
शिरोरोग, प्रतिशयाय (पीनस), ज्वर, शूल, भगन्दर, गुल्म, अर्श (बवासीर), शोथ (सूजन), श्वास (दमा), छर्दि तथा नेत्ररोग, अतिसार और कुष्ठ आदि शारीरिक कष्ट-भेदसे दैहिक तापके कितने ही भेद हैं। अब मानसिक तापोंको सुनो ॥ ३-४ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! काम, क्रोध, भय, द्वेष, लोभ, मोह, विषाद, शोक, असूया (गुणोंमें दोषारोपण), अपमान, ईर्ष्या और मात्सर्य आदि भेदोंसे मानसिक तापके अनेक भेद हैं। ऐस ही नाना प्रकारके भेदोंसे युक्त तापको आध्यात्मिक कहते हैं ॥ ५-६ ॥ मनुष्योंको जो दुःख मृग, पक्षी, मनुष्य, पिशाच, सर्प, राक्षस और सरीसृप (बिच्छू) आदिसे प्राप्त होता है उसे आधिभौतिक कहते हैं ॥ ७ ॥ तथा हे द्विजवर ! शीत, उष्ण, वायु, वर्षा, जल और विद्युत् आदिसे प्राप्त हुए दुःखको श्रेष्ठ पुरुष आधिदैविक कहते हैं ॥ ८ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ ! इनके अतिरिक्त गर्भ, जन्म, जरा, अज्ञान, मृत्यु और नरकसे उत्पन्न हुए दुःखके भी सहस्रों प्रकारके भेद हैं ॥ ९ ॥ अत्यन्त मलपूर्ण गर्भाशयमें उल्ब (गर्भकी झिल्ली)-से लिपटा हुआ यह सुकुमारशरीर जीव, जिसकी पीठ और ग्रीवाकी अस्थियाँ कुण्डलाकार मुड़ी रहती हैं, माताके खाये हुए अत्यन्त तापप्रद खट्टे, कड़वे, चरपरे, गर्म और खारे पदार्थोंसे जिसकी वेदना बहुत बढ़ जाती है, जो मल-मूत्ररूप महापंकमें पड़ा-पड़ा सम्पूर्ण अंगोंमें अत्यन्त पीड़ित होनेपर भी अपने अंगोंको फैलाने या सिकोड़नेमें समर्थ नहीं होता और चेतनायुक्त होनेपर भी श्वास नहीं ले सकता, अपने सैकड़ों पूर्वजन्मोंका स्मरण कर कर्मोंसे बँधा हुआ अत्यन्त दुःखपूर्वक गर्भमें पड़ा रहता है ॥ १०-१३ ॥ उत्पन्न होनेके समय उसका मुख मल, मूत्र, रक्त और वीर्य आदिमें लिपटा रहता है और उसके सम्पूर्ण अस्थिबन्धन प्राजापत्य (गर्भको संकुचित करनेवाली) वायुसे अत्यन्त पीड़ित होते हैं ॥ १४ ॥ प्रबल प्रसूति-वायु उसका मुख नीचेको कर देती है और वह आतुर होकर बड़े क्लेशके साथ माताके गर्भाशयसे बाहर निकल पाता है ॥ १५ ॥
हे मुनिसत्तम ! उत्पन्न होनेके अनन्तर बाह्य वायुका स्पर्श होनेसे अत्यन्त मच्छित होकर वह जीव बेसुध हो जाता है ॥ १६ ॥ उस समय वह जीव दुर्गन्धयुक्त फोड़ेमेंसे गिरे हुए किसी कण्टक-विद्ध अथवा ओरसे चिरे हुए कीड़ेके समान पृथ्वीपर गिरता है ॥ १७ ॥ उसे स्वयं खुजलाने अथवा करवट लेनेकी भी शक्ति नहीं रहती। वह स्नान तथा दुग्धपानादि आहार भी दूसरेहीकी इच्छासे प्राप्त करता है ॥ १८ ॥
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४४४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अशुचिप्रस्तरे सुप्तः कीटदंशादिभिस्तथा।<br>भक्ष्यमाणोऽपि नैवेषां समर्थो विनिवारणे ॥ १९ | अपवित्र (मल-मूत्रादिमें सने हुए) बिस्तरपर पड़ा रहता है, उस समय कीड़े और डाँस आदि उसे काटते हैं तथापि वह उन्हें दूर करनेमें भी समर्थ नहीं होता ॥ १९ ॥ |
| जन्मदुःखान्यनेकानि जन्मनोऽनन्तराणि च।<br>बालभावे यदाप्नोति ह्याधिभौतिकादिकानि च ॥ २० | इस प्रकार जन्मके समय और उसके अनन्तर बाल्यावस्थामें जीव आधिभौतिकादि अनेकों दुःख भोगता है ॥ २० ॥ |
| अज्ञानतमसाऽऽच्छन्नो मूढान्तःकरणो नरः।<br>न जानाति कुतः कोऽहं क्वाहं गन्ता किमात्मनः ॥ २१ | अज्ञानरूप अन्धकारसे आवृत होकर मूढ़हृदय पुरुष यह नहीं जानता कि 'मैं कहाँसे आया हूँ? कौन हूँ? कहाँ जाऊँगा ? तथा मेरा स्वरूप क्या है ? ॥ २१ ॥ |
| केन बन्धेन बद्धोऽहं कारणं किमकारणम्।<br>किं कार्यं किमकार्यं वा किं वाच्यं किं च नोच्यते ॥ २२ | मैं किस बन्धनसे बँधा हूँ? इस बन्धनका क्या कारण है? अथवा यह अकारण ही प्राप्त हुआ है? मुझे क्या करना चाहिये और क्या न करना चाहिये ? तथा क्या कहना चाहिये और क्या न कहना चाहिये ? ॥ २२ ॥ |
| को धर्मः कश्च वाधर्मः कस्मिन्व्र्तेऽथ वा कथम्।<br>किं कर्तव्यमकर्तव्यं किं वा किं गुणदोषवत् ॥ २३ | धर्म क्या है? अधर्म क्या है? किस अवस्थामें मुझे किस प्रकार रहना चाहिये ? क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य है? अथवा क्या गुणमय और क्या दोषमय है?' ॥ २३ ॥ |
| एवं पशुसमैर्मूढैरज्ञानप्रभवं महत्।<br>अवाप्यते नरैर्दुःखं शिश्नोदरपरायणैः ॥ २४ | इस प्रकार पशुके समान विवेकशून्य शिश्नोदर-परायण पुरुष अज्ञानजनित महान् दुःख भोगते हैं ॥ २४ ॥ |
| अज्ञानं तामसो भावः कार्यारम्भप्रवृत्तयः।<br>अज्ञानिनां प्रवर्तन्ते कर्मलोपास्ततो द्विज ॥ २५ | हे द्विज ! अज्ञान तामसिक भाव (विकार) है, अतः अज्ञानी पुरुषोंकी (तामसिक) कर्मोंके आरम्भमें प्रवृत्ति होती है; इससे वैदिक कर्मोंका लोप हो जाता है ॥ २५ ॥ |
| नरकं कर्मणां लोपात्फलमाहुर्मनीषिणः।<br>तस्मादज्ञानिनां दुःखमिह चामुत्र चोत्तमम् ॥ २६ | मनीषिजनोंने कर्म-लोपका फल नरक बतलाया है; इसलिये अज्ञानी पुरुषोंको इहलोक और परलोक दोनों जगह अत्यन्त ही दुःख भोगना पड़ता है ॥ २६ ॥ |
| जराजर्जरदेहश्च शिथिलावयवः पुमान्।<br>विगलच्छीर्णदशनो वलिस्नायुशिरावृतः ॥ २७ | शरीरके जरा-जर्जरित हो जानेपर पुरुषके अंग-प्रत्यंग शिथिल हो जाते हैं, उसके दाँत पुराने होकर उखड़ जाते हैं और शरीर झुर्रियों तथा नस-नाड़ियोंसे आवृत हो जाता है ॥ २७ ॥ |
| दूरप्रणष्टनयनो व्योमान्तर्गततारकः।<br>नासाविवरनिर्यांतलोमपुञ्जश्चलद्वपुः ॥ २८ | उसकी दृष्टि दूरस्थ विषयके ग्रहण करनेमें असमर्थ हो जाती है, नेत्रोंके तारे गोलकोंमें घुस जाते हैं, नासिकाके रन्ध्रोंमेंसे बहुत-से रोम बाहर निकल आते हैं और शरीर काँपने लगता है ॥ २८ ॥ |
| प्रकटीभूतसर्वास्थिर्नतपृष्ठास्थिसंहतिः।<br>उत्सन्नजठराग्नत्वादल्पाहारोऽल्पचेष्टितः ॥ २९ | उसकी समस्त हड्डियाँ दिखलायी देने लगती हैं, मेरुदण्ड झुक जाता है तथा जठराग्निके मन्द पड़ जानेसे उसके आहार और पुरुषार्थ कम हो जाते हैं ॥ २९ ॥ |
| कृच्छ्राच्चङ्क्रमणोत्थानशयनासनचेष्टितः।<br>मन्दीभवच्छ्रोत्रनेत्रस्रवल्लालाविलाननः ॥ ३० | उस समय उसकी चलना-फिरना, उठना-बैठना और सोना आदि सभी चेष्टाएँ बड़ी कठिनतासे होती हैं, उसके श्रोत्र और नेत्रोंकी शक्ति मन्द पड़ जाती है तथा लार बहते रहनेसे उसका मुख मलिन हो जाता है ॥ ३० ॥ |
| अनायत्तैस्समस्तैश्च करणैर्मरणोन्मुखः।<br>तत्क्षणेऽप्यनुभूतानामस्मर्त्ताखिलवस्तुनाम् ॥ ३१ | अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ स्वाधीन न रहनेके कारण वह सब प्रकार मरणासन्न हो जाता है तथा [स्मरणशक्तिके क्षीण हो जानेसे] वह उसी समय अनुभव किये हुए समस्त पदार्थोंको भी भूल जाता है ॥ ३१ ॥ |