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भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 452, कुल 558 में से

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पृष्ठ 452

अ० ४ ] * षष्ठ अंश * ४४१


परिमण्डलं च सुषिरमाकाशं शब्दलक्षणम्।<br>शब्दमात्रं तदाकाशं सर्वमावृत्य तिष्ठति॥ २६उस समय चारों ओरसे गोल, छिद्रस्वरूप, शब्दलक्षण आकाश ही शेष रहता है; और वह शब्दमात्र आकाश सबको आच्छादित किये रहता है॥ २६॥
ततश्शब्दगुणं तस्य भूतादिर्ग्रसते पुनः।<br>भूतेन्द्रियेषु युगपद्भूतादौ संस्थितेषु वै।<br>अभिमानात्मको ह्येष भूतादिस्तामसस्मृतः॥ २७तदनन्तर, आकाशके गुण शब्दको भूतादि ग्रस लेता है। इस भूतादिमें ही एक साथ पंचभूत और इन्द्रियोंका भी लय हो जानेपर केवल अहंकारात्मक रह जानेसे यह तामस (तमःप्रधान) कहलाता है
भूतादिं ग्रसते चापि महान्वै बुद्धिलक्षणः॥ २८फिर इस भूतादिको भी [सत्त्वप्रधान होनेसे] बुद्धिरूप महत्तत्त्व ग्रस लेता है॥ २७-२८॥
उर्वी महांश्च जगतः प्रान्तेऽन्तर्बाह्यतस्तथा॥ २९जिस प्रकार पृथ्वी और महत्तत्त्व ब्रह्माण्डके अन्तर्जगतकी आदि-अन्त सीमाएँ हैं उसी प्रकार उसके बाह्य जगत्का भी हैं॥ २९॥
एवं सप्त महाबुद्धे क्रमात्प्रकृतयस्मृताः।<br>प्रत्याहारे तु तास्सर्वाः प्रविशन्ति परस्परम्॥ ३०हे महाबुद्धे! इसी तरह जो सात आवरण बताये गये हैं वे सब भी प्रलयकालमें [पूर्ववत् पृथिवी आदि क्रमसे] परस्पर (अपने-अपने कारणोंमें) लीन हो जाते हैं॥ ३०॥
येनेदमावृतं सर्वमण्डमप्सु प्रलीयते।<br>सप्तद्वीपसमुद्रान्तं सप्तलोकं सपर्वतम्॥ ३१जिससे यह समस्त लोक व्याप्त है वह सम्पूर्ण भूमण्डल सातों द्वीप, सातों समुद्र, सातों लोक और सकल पर्वतश्रेणियोंके सहित जलमें लीन हो जाता है॥ ३१॥
उदकावरणं यत्तु ज्योतिषा पीयते तु तत्।<br>ज्योतिर्वायौ लयं याति यात्याकाशे समीरणः॥ ३२फिर जो जलका आवरण है उसे अग्नि पी जाता है तथा अग्नि वायुमें और वायु आकाशमें लीन हो जाता है॥ ३२॥
आकाशं चैव भूतादिर्ग्रसते तं तथा महान्।<br>महान्तमेभिस्सहितं प्रकृतिर्ग्रसते द्विज॥ ३३हे द्विज! आकाशको भूतादि (तामस अहंकार), भूतादिको महत्तत्त्व और इन सबके सहित महत्तत्त्वको मूल प्रकृति अपनेमें लीन कर लेती है॥ ३३॥
गुणसाम्यमनुद्रिक्तमन्वूनं च महामुने।<br>प्रोच्यते प्रकृतिर्हेतुः प्रधानं कारणं परम्॥ ३४हे महामुने! न्यूनाधिकसे रहित जो सत्त्वादि तीनों गुणोंकी साम्यावस्था है उसीको प्रकृति कहते हैं; इसीका नाम प्रधान भी है। यह प्रधान ही सम्पूर्ण जगत्का परम कारण है॥ ३४॥
इत्येषा प्रकृतिस्सर्वा व्यक्ताव्यक्तस्वरूपिणी।<br>व्यक्तस्वरूपमव्यक्ते तस्मान्मैत्रेय लीयते॥ ३५यह प्रकृति व्यक्त और अव्यक्तरूपसे सर्वमयी है। हे मैत्रेय! इसीलिये अव्यक्तमें व्यक्तरूप लीन हो जाता है॥ ३५॥
एकश्शुद्धोऽक्षरो नित्यस्सर्वव्यापी तथा पुमान्।<br>सोऽप्यंशस्सर्वभूतस्य मैत्रेय परमात्मनः॥ ३६इससे पृथक् जो एक शुद्ध, अक्षर, नित्य और सर्वव्यापक पुरुष है वह भी सर्वभूत परमात्माका अंश ही है॥ ३६॥
न सन्ति यत्र सर्वेशे नामजात्यादिकल्पनाः।<br>सत्तामात्रात्मके ज्ञेये ज्ञानात्मन्यात्मनः परे॥ ३७जिस सत्तामात्रस्वरूप आत्मा (देहादि संघात)-से पृथक् रहनेवाले ज्ञानात्मा एवं ज्ञातव्य सर्वेश्वरमें नाम और जाति आदिकी कल्पना नहीं है वही सबका परम आश्रय
तद्ब्रह्म परमं धाम परमात्मा स चेश्वरः।<br>स विष्णुस्सर्वमेवेदं यतो नावर्तते यतिः॥ ३८परब्रह्म परमात्मा है और वही ईश्वर है। वह विष्णु ही इस अखिल विश्वरूपसे अवस्थित है उसको प्राप्त हो जानेपर योगिजन फिर इस संसारमें नहीं लौटते॥ ३७-३८॥
प्रकृतिर्या मयाऽऽख्याता व्यक्ताव्यक्तस्वरूपिणी।<br>पुरुषश्चाप्युभावेतौ लीयेते परमात्मनि॥ ३९जिस व्यक्त और अव्यक्तस्वरूपिणी प्रकृतिका मैंने वर्णन किया है वह तथा पुरुष—ये दोनों भी उस परमात्मामें ही लीन हो जाते हैं॥ ३९॥
परमात्मा च सर्वेषामाधारः परमेश्वरः।<br>विष्णुनामा स वेदेषु वेदान्तेषु च गीयते॥ ४०वह परमात्मा सबका आधार और एकमात्र अधीश्वर है; उसीका वेद और वेदान्तोंमें विष्णुनामसे वर्णन किया है॥ ४०॥