भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 451, कुल 558 में से

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पृष्ठ 451

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  • श्रीविष्णुपुराण *

[ अ० ४ ]

ततः प्रबुद्धो रात्र्यन्ते पुनस्सृष्टिं करोत्यजः । ब्रह्मस्वरूपधृग्विष्णुर्यथा ते कथितं पुरा ॥ १० ॥ इत्येष कल्पसंहारोऽवान्तरप्रलयो द्विज । नैमित्तिकस्ते कथितः प्राकृतं शृण्वतः परम् ॥ ११ ॥ अनावृष्ट्यादिसम्पर्कात्कृते संक्षालने मुने । समस्तेष्वेव लोकेषु पातालेष्वखिलेषु च ॥ १२ ॥ महदादेर्विकारस्य विशेषान्तस्य संक्षये । कृष्णोच्छाकारिते तस्मिन्प्रवृत्ते प्रतिसञ्चरे ॥ १३ ॥ आपो ग्रसन्ति वै पूर्व भूमेर्गन्ध्यात्मकं गुणम् । आतगन्धा ततो भूमिः प्रलयत्याय कल्प्यते ॥ १४ ॥ प्रणष्टे गन्धतन्मात्रे भवत्युर्वी जलात्मिका । आपस्तदा प्रवृद्धास्तु वेगवत्यो महास्वनाः ॥ १५ ॥ सर्वमापूरयन्तीदं तिष्ठन्ति विचरन्ति च । सलिलेनोर्मिमालेन लोका व्याप्ताः समन्ततः ॥ १६ ॥ अपामपि गुणो यस्तु ज्योतिषा पीयते तु सः । नश्यन्त्यापस्ततस्ताश्च रसतन्मात्रसंक्षयात् ॥ १७ ॥ ततश्चापो ह्तरसा ज्योतिषं प्राप्नुवन्ति वै । अग्न्यवस्थे तु सलिले तेजसा सर्वतो वृते ॥ १८ ॥ स चाग्निः सर्वतो व्याप्य चादत्ते तज्जलं तथा । सर्वमापूर्यतेऽर्चिर्भिस्तदा जगदिदं शनैः ॥ १९ ॥ अर्चिर्भिस्संवृते तस्मिंस्तियर्गूर्ध्वमधस्तदा । ज्योतिषोऽपि परं रूपं वायुरिति प्रभाकरम् ॥ २० ॥ प्रलीने च ततस्तस्मिन्वायुभूतेऽखिलात्मनि । प्रणष्टे रूपतन्मात्रे ह्तरूपो विभावसुः ॥ २१ ॥ प्रशाम्यति तदा ज्योतिर्वायुर्दोर्धुयते महान् । निरालोके तथा लोके वाख्यवस्थे च तेजसि ॥ २२ ॥ ततस्तु मूलमासाद्य वायुसम्भवमात्मनः । ऊर्ध्वं चाधश्च तिर्यक्च दोधवीति दिशो दश ॥ २३ ॥ वायोरोपि गुणं स्पर्शमाकाशो ग्रसते ततः । प्रशाम्यति ततो वायुः खं तु तिष्ठत्यनावृतम् ॥ २४ ॥ अरूपरसमस्पर्शमिगन्धं न च मूर्तिमत् । सर्वमापूरयच्चैव सुमहतत्प्रकाशते ॥ २५ ॥

उस रात्रिका अन्त होनेपर अजन्मा भगवान् विष्णु जागते हैं और ब्रह्मरूप धारणकर, जैसा तुमसे पहले कहा था उसी क्रमसे फिर सृष्टि रचते हैं ॥ १० ॥

हे द्विज! इस प्रकार तुमसे कल्पान्तमें होनेवाले नैमित्तिक एवं अवान्तर-प्रलयका वर्णन किया। अब दूसरे प्राकृत प्रलयका वर्णन सुनो ॥ ११ ॥ हे मुने! अनावृष्टि आदिके संयोगसे सम्पूर्ण लोक और निखिल पातालोंके नष्ट हो जानेपर तथा भगवदिच्छासे उस प्रलयकालके उपस्थित होनेपर जब महत्त्वसे लेकर [पृथिवी आदि पंच] विशेषपर्यन्त सम्पूर्ण विकार क्षीण हो जाते हैं तो प्रथम जल पृथिवीके गुण गन्धको अपनेमें लीन कर लेता है। इस प्रकार गन्ध छिन्न लिये जानेसे पृथिवीका प्रलय हो जाता है ॥ १२—१४ ॥ गन्ध-तन्मात्राके नष्ट हो जानेपर पृथिवी जलमय हो जाती है, उस समय बड़े वेगसे घोर शब्द करता हुआ जल बढ़कर इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर लेता है। यह जल कभी स्थिर होता और कभी बहने लगता है। इस प्रकार तरंगमालाओंसे पूर्ण इस जलसे सम्पूर्ण लोक सब ओरसे व्याप्त हो जाते हैं ॥ १५—१६ ॥ तदनन्तर जलके गुण रसको तेज अपनेमें लीन कर लेता है। इस प्रकार रस-तन्मात्राका क्षय हो जानेसे जल भी नष्ट हो जाता है ॥ १७ ॥ तब रसहीन हो जानेसे जल अग्निरूप हो जाता है तथा अग्निके सब ओर व्याप्त हो जानेसे जलके अग्निमें स्थित हो जानेपर वह अग्नि सब ओर फैलकर सम्पूर्ण जलको सोख लेता है और धीरे-धीरे यह सम्पूर्ण जगत् ज्वालासे पूर्ण हो जाता है ॥ १८—१९ ॥ जिस समय सम्पूर्ण लोक ऊपर-नीचे तथा सब ओर अग्नि-शिखाओंसे व्याप्त हो जाता है उस समय अग्निके प्रकाशक स्वरूपको वायु अपनेमें लीन कर लेता है ॥ २० ॥ सबके प्राणस्वरूप उस वायुमें जब अग्निका प्रकाशक रूप लीन हो जाता है तो रूप-तन्मात्राके नष्ट हो जानेसे अग्नि रूपहीन हो जाता है ॥ २१ ॥ उस समय संसारके प्रकाशहीन और तेजके वायुमें लीन हो जानेसे अग्नि शान्त हो जाता है और अति प्रचण्ड वायु चलने लगता है ॥ २२ ॥ तब अपने उद्भवस्थान आकाशका आश्रय कर वह प्रचण्ड वायु ऊपर-नीचे तथा सब ओर दसों दिशाओंमें बड़े वेगसे चलने लगता है ॥ २३ ॥ तदनन्तर वायुके गुण स्पर्शको आकाश लीन कर लेता है; तब वायु शान्त हो जाता है और आकाश आवरणहीन हो जाता है ॥ २४ ॥ उस समय रूप, रस, स्पर्श, गन्ध तथा आकारसे रहित अत्यन्त महान् एक आकाश ही सबको व्याप्त करके प्रकाशित होता है ॥ २५ ॥

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