विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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अ० ४ ] * षष्ठ अंश * ४३९
| धाराभिरतिमात्राभिः प्लावयित्वाखिलं भुवम्।<br>भुवर्लोकं तथैवोर्ध्वं प्लावयन्ति हि ते द्विज ॥ ३९ | हे द्विज! अपनी अति स्थूल धाराओंसे भूर्लोकको जलमें डुबोकर वे भुवर्लोक तथा उसके भी ऊपरके लोकोंको भी जलमग्न कर देते हैं॥ ३९॥ इस प्रकार सम्पूर्ण संसारके अन्धकारमय हो जानेपर तथा सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जीवोंके नष्ट हो जानेपर भी वे महामेघ सौ वर्षसे अधिक कालतक बरसते रहते हैं॥ ४०॥ हे मुनिश्रेष्ठ! सनातन परमात्मा वासुदेवके माहात्म्यसे कल्पान्तमें इसी प्रकार यह समस्त विप्लव होता है॥ ४१॥ |
| अन्धकारीकृते लोके नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>वर्षन्ति ते महामेघा वर्षाणामधिकं शतम् ॥ ४० | |
| एवं भवति कल्पान्ते समस्तं मुनिसत्तम।<br>वासुदेवस्य माहात्म्यान्नित्यस्य परमात्मनः ॥ ४१ |
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
चौथा अध्याय
प्राकृत प्रलयका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| सप्तर्षिस्थानमाक्रम्य स्थितेऽम्भसि महामुने।<br>एकार्णवं भवत्येतत्त्रैलोक्यमखिलं ततः॥ १ | हे महामुने! जब जल सप्तर्षियोंके स्थानको भी पार कर जाता है तो यह सम्पूर्ण त्रिलोकी एक महासमुद्रके समान हो जाती है॥ १॥ |
| मुखनिःश्वासजो विष्णोर्वायुस्ताञ्जलदांस्ततः।<br>नाशयन्वाति मैत्रेय वर्षाणामपरं शतम्॥ २ | हे मैत्रेय! तदनन्तर, भगवान् विष्णुके मुख-निःश्वाससे प्रकट हुआ वायु उन मेघोंको नष्ट करके पुनः सौ वर्षतक चलता रहता है॥ २॥ |
| सर्वभूतमयोऽचिन्त्यो भगवान्भूतभावनः।<br>अनादिरादिर्विश्वस्य पीत्वा वायुमशेषतः॥ ३ | फिर जनलोकनिवासी सनकादि सिद्धगणसे स्तुत और ब्रह्मलोकको प्राप्त हुए मुमुक्षुओंसे ध्यान किये जाते हुए सर्वभूतमय, अचिन्त्य, अनादि, जगत्के आदिकारण, आदिकर्ता, भूतभावन, मधुसूदन भगवान् हरि विश्वके सम्पूर्ण वायुको पीकर अपनी दिव्य-मायारूपिणी योगनिद्राका आश्रय ले अपने वासुदेवात्मक स्वरूपका चिन्तन करते हुए उस महासमुद्रमें शेषशय्यापर शयन करते हैं॥ ३-६॥ |
| एकार्णवे ततस्तस्मिञ्छेषशय्यागतः प्रभुः।<br>ब्रह्मरूपधरश्शेते भगवानादिकृद्धरिः॥ ४ | |
| जनलोकगतैस्सिद्धैस्सनकाद्यैरभिष्टुतः।<br>ब्रह्मलोकगतैश्चैव चिन्त्यमानो मुमुक्षुभिः॥ ५ | |
| आत्ममायामयीं दिव्यां योगनिद्रां समास्थितः।<br>आत्मानं वासुदेवाख्यं चिन्तयन्मधुसूदनः॥ ६ | |
| एष नैमित्तिको नाम मैत्रेय प्रतिसञ्चरः।<br>निमित्तं तत्र यच्छेते ब्रह्मरूपधरो हरिः॥ ७ | हे मैत्रेय! इस प्रलयके होनेमें ब्रह्मारूपधारी भगवान् हरिका शयन करना ही निमित्त है; इसलिये यह नैमित्तिक प्रलय कहलाता है॥ ७॥ |
| यदा जागर्ति सर्वात्मा स तदा चेष्टते जगत्।<br>निमीलयत्येतदखिलं मायाशय्यां गतेऽच्युते॥ ८ | जिस समय सर्वात्मा भगवान् विष्णु जागते रहते हैं उस समय सम्पूर्ण संसारकी चेष्टाएँ होती रहती हैं और जिस समय वे अच्युत मायारूपी शय्यापर सो जाते हैं उस समय संसार भी लीन हो जाता है॥ ८॥ |
| पद्मयोनेर्दिनं यत्तु चतुर्युगसहस्रवत्।<br>एकार्णवीकृते लोके तावती रात्रिरिष्यते॥ ९ | जिस प्रकार ब्रह्माजीका दिन एक हजार चतुर्युगका होता है उसी प्रकार संसारके एकार्णवरूप हो जानेपर उनकी रात्रि भी उतनी ही बड़ी होती है॥ ९॥ |
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