विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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४३८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३
| ततः कालाग्निरुद्रोऽसौ भूत्वा सर्वहरो हरिः ।<br>शेषाहिश्विाससम्भूतः पातालाानि दहत्यधः ॥ २४ | तब सबको नष्ट करनेके लिये उद्यत हुए श्रीहरि कालाग्नि-रुद्ररूपसे शेषनागके मुखसे प्रकट होकर नीचेसे पातालोंको जलाना आरम्भ करते हैं ॥ २४ ॥ |
| पातालानि समस्तानि स दग्ध्वा ज्वलनो महान् ।<br>भूमिमभ्येत्य सकलं भभस्ति वसुधातलं ॥ २५ | वह महान् अग्नि समस्त पातालोंको जलाकर पृथ्वीपर पहुँचता है और सम्पूर्ण भूतलको भस्म कर डालता है ॥ २५ ॥ |
| भुवर्लोकं ततस्सर्वं स्वर्लोकं च सुदारुणः ।<br>ज्वालामालामहावर्तस्तत्रैव परिवर्तते ॥ २६ | तब वह दारुण अग्नि भुवर्लोक तथा स्वर्गलोकको जला डालता है और वह ज्वाला-समूहका महान् आवर्त वहीं चक्कर लगाने लगता है ॥ २६ ॥ |
| अम्बरीषमिवाभाति त्रैलोक्यमखिलं तदा ।<br>ज्वालावर्तपरीवारमुपक्षीणचराचरम् ॥ २७ | इस प्रकार अग्निके आवर्तोंसे घिरकर सम्पूर्ण चराचरके नष्ट हो जानेपर समस्त त्रिलोकी एक तप्त कराहके समान प्रतीत होने लगती है ॥ २७ ॥ |
| ततस्तापपरीतास्तु लोकद्वयनिवासिनः ।<br>कृताधिकारा गच्छन्ति महर्लोकं महामुने ॥ २८ | हे महामुने ! तदनन्तर अवस्थाके परिवर्तनसे परलोककी चाहवाले भुवर्लोक और स्वर्गलोकमें रहनेवाले [मन्वादि] अधिकारिगण अग्निज्वालासे सन्तप्त होकर महर्लोकको चले जाते हैं |
| तस्मादपि महातापतप्ता लोकात्ततः परम् ।<br>गच्छन्ति जनलोकं ते दशावृत्त्या परैषिणः ॥ २९ | किन्तु वहाँ भी उस उग्र कालानलके महातापसे सन्तप्त होनेके कारण वे उससे बचनेके लिये जनलोकमें चले जाते हैं ॥ २८-२९ ॥ |
| ततो दग्ध्वा जगत्सर्वं रुद्ररूपी जनार्दनः ।<br>मुखनिःश्वासजान्मेघान्करोति मुनिसत्तम ॥ ३० | हे मुनिश्रेष्ठ ! तदनन्तर रुद्ररूपी भगवान् विष्णु सम्पूर्ण संसारको दग्ध करके अपने मुख-निःश्वाससे मेघोंको उत्पन्न करते हैं ॥ ३० ॥ |
| ततो गजकुलप्रख्यास्तडित्वन्तोऽतिनादिनः ।<br>उत्तिष्ठन्ति तथा व्योम्नि घोरास्संवर्तका घनाः ॥ ३१ | तब विद्युत्से युक्त भयंकर गर्जना करनेवाले गजसमूहके समान बृहदाकार संवर्तक नामक घोर मेघ आकाशमें उठते हैं ॥ ३१ ॥ |
| केचिन्नीलोत्पलश्यामाः केचित्कुमुदसन्निभाः ।<br>धूम्रवर्णा घनाः केचित्केचित्पीताः पयोधराः ॥ ३२ | उनमेंसे कोई मेघ नील कमलके समान श्यामवर्ण, कोई कुमुद-कुसुमके समान श्वेत, कोई धूम्रवर्ण और कोई पीतवर्ण होते हैं ॥ ३२ ॥ |
| केचिद्रासभवर्णाभा लाक्षारसन्निभास्तथा ।<br>केचिद्वैडूर्यसंकाशा इन्द्रनीलनिभाः क्वचित् ॥ ३३ | कोई गधेके-से वर्णवाले, कोई लाखके-से रंगवाले, कोई वैडूर्य-मणिके समान और कोई इन्द्रनील-मणिके समान होते हैं ॥ ३३ ॥ |
| शङ्खकुन्दनिभाश्चान्ये जात्यञ्जननिभाः परे ।<br>इन्द्रगोपनिभाः केचित्तत्तशिखिनिभास्तथा ॥ ३४ | कोई शंख और कुन्दके समान श्वेत-वर्ण, कोई जाती (चमेली)-के समान उज्ज्वल और कोई कज्जलके समान श्यामवर्ण, कोई इन्द्रगोपके समान रक्तवर्ण और कोई मयूरके समान विचित्र वर्णवाले होते हैं ॥ ३४ ॥ |
| मनश्शिलाभाः केचिद्वै हरितालनिभाः परे ।<br>चाषपत्रनिभाः केचिदुत्तिष्ठन्ते महाघनाः ॥ ३५ | कोई गेरूके समान, कोई हरितालके समान और कोई महामेघ, नील-कण्ठके पंखके समान रंगवाले होते हैं ॥ ३५ ॥ |
| केचित्पुरवराकाराः केचित्पर्वतसन्निभाः ।<br>कूटागारनिभाश्चान्ये केचित्स्थलनिभा घनाः ॥ ३६ | कोई नगरके समान, कोई पर्वतके समान और कोई कूटागार (गृहविशेष)-के समान बृहदाकार होते हैं तथा कोई पृथवीतलके समान विस्तृत होते हैं ॥ ३६ ॥ |
| महारावा महाकायाः पूरयन्ति नभःस्थलम् ।<br>वर्षन्तस्ते महासारांस्तमग्निमतिभैरवम् ।<br>शमयन्त्यखिलं विप्र त्रैलोक्यान्तरधिष्ठितम् ॥ ३७ | वे घनघोर शब्द करनेवाले महाकाय मेघगण आकाशको आच्छादित कर लेते हैं और मूसलाधार जल बरसाकर त्रिलोकव्यापी भयंकर अग्निको शान्त कर देते हैं ॥ ३७ ॥ |
| नष्टे चाग्नौ च सततं वर्षमाणा ह्यहर्निशम् ।<br>प्लावयन्ति जगत्सर्वमम्भोभिर्मुनिंसत्तम ॥ ३८ | हे मुनिश्रेष्ठ ! अग्निके नष्ट हो जानेपर भी अहर्निश निरन्तर बरसते हुए वे मेघ सम्पूर्ण जगत्को जलमें डुबो देते हैं ॥ ३८ ॥ |
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