भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 448, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 448

अ० ३]

  • षष्ठ अंश * ४३७
मागधेन तु मानेन जलप्रस्थस्तु स स्मृतः।<br>हेममाषैः कृतच्छिद्रश्चतुर्भिश्चतुरङ्गुलैः॥ ८<br>नाडिकाभ्यामथ द्वाभ्यां मुहूर्तो द्विजसत्तम।<br>अहोरात्रं मुहूर्तास्तु त्रिंशन्मासो दिनैस्तथा॥ ९<br>मासैर्द्वादशभिर्वर्षमहोरात्रं तु तद्दिवि।<br>त्रिभिर्वर्षशतैर्वर्ष षष्ट्या चैवासुरद्विषाम्॥ १०<br>तैस्तु द्वादशसाहस्रैश्चतुर्युगमुदाहृतम्।<br>चतुर्युगसहस्रं तु कथ्यते ब्रह्मणो दिनम्॥ ११<br>स कल्पस्तत्र मनवश्चतुर्दश महामुने।<br>तदन्ते चैव मैत्रेय ब्राह्मो नैमित्तिको लयः॥ १२<br>तस्य स्वरूपमत्युग्रं मैत्रेय गदतो मम।<br>शृणुष्व प्राकृतं भूयस्तव वक्ष्याम्यहं लयम्॥ १३<br>चतुर्युगसहस्रान्ते क्षीणप्राये महीतले।<br>अनावृष्टििरतीवोग्रा जायते शतवार्षिकी॥ १४<br>ततो यान्यल्पसाराणि तानि सत्त्वान्यशेषतः।<br>क्षयं यान्ति मुनिश्रेष्ठ पार्थिवान्यनुपीडनात्॥ १५<br>ततः स भगवान्विष्णू रुद्ररूपधरोऽव्ययः।<br>क्षयाय यतते कर्तुमात्मस्थास्सकलाः प्रजाः॥ १६<br>ततस्स भगवान्विष्णुर्भानोस्सप्तसु रश्मिषु।<br>स्थितः पिबत्यशेषाणि जलानि मुनिसत्तम॥ १७<br>पीत्वाम्भांसि समस्तानि प्राणिभूमिगतान्यपि।<br>शोषं नयति मैत्रेय समस्तं पृथिवीतलम्॥ १८<br>समुद्रान्सरितः शैलनदीप्रस्रवणानि च।<br>पातालेषु च यत्तोयं तत्सर्वं नयति क्षयम्॥ १९<br>ततस्तस्यानुभावेन तोयाहारोपबृंहिताः।<br>त एव रश्मयस्सप्त जायन्ते सप्त भास्कराः॥ २०<br>अधश्चोर्ध्वं च ते दीप्तास्ततस्सप्त दिवाकराः।<br>दहन्त्यशेषं त्रैलोक्यं सपातालतलं द्विज॥ २१<br>दह्यमानं तु तैर्दीप्तैस्त्रैलोक्यं द्विज भास्करैः।<br>साद्रिनद्यर्णवाभोगं निस्नेहमभिजायते॥ २२<br>ततो निर्दग्धवृक्षाम्बु त्रैलोक्यमखिलं द्विज।<br>भवत्येषा च वसुधा कूर्मपृष्ठोपमाकृतिः॥ २३मगधदेशीय मापसे वह पात्र जलप्रस्थ कहलाता है; उसमें चार अंगुल लम्बी चार मासेकी सुवर्ण-शलाकासे छिद्र किया रहता है [उसके छिद्रको ऊपर करके जलमें डुबो देनेसे जितनी देरमें वह पात्र भर जाय उतने ही समयको एक नाडिका समझना चाहिये]॥ ८॥ हे द्विजसत्तम! ऐसी दो नाडिकाओंका एक मुहूर्त होता है, तीस मुहूर्तका एक दिन-रात होता है तथा इतने (तीस) ही दिन-रातका एक मास होता है॥ ९॥ बारह मासका एक वर्ष होता है, देवलोकमें यही एक दिन-रात होता है। ऐसे तीन सौ साठ वर्षोंका देवताओंका एक वर्ष होता है॥ १०॥ ऐसे बारह हजार दिव्य वर्षोंका एक चतुर्युग होता है और एक हजार चतुर्युगका ब्रह्माका एक दिन होता है॥ ११॥<br>हे महामुने! यही एक कल्प है। इसमें चौदह मनु बीत जाते हैं। हे मैत्रेय! इसके अन्तमें ब्रह्माका नैमित्तिक प्रलय होता है॥ १२॥ हे मैत्रेय! सुनो, मैं उस नैमित्तिक प्रलयका अत्यन्त भयानक रूप वर्णन करता हूँ। इसके पीछे मैं तुमसे प्राकृत प्रलयका भी वर्णन करूँगा॥ १३॥ एक सहस्र चतुर्युग बीतनेपर जब पृथिवी क्षीणप्राय हो जाती है तो सौ वर्षतक अति घोर अनावृष्टि होती है॥ १४॥ हे मुनिश्रेष्ठ! उस समय जो पार्थिव जीव अल्प शक्तिवाले होते हैं वे सब अनावृष्टिसे पीड़ित होकर सर्वथा नष्ट हो जाते हैं॥ १५॥ तदनन्तर, रुद्ररूपधारी अव्ययात्मा भगवान् विष्णु संसारका क्षय करनेके लिये सम्पूर्ण प्रजाको अपनेमें लीन कर लेनेका प्रयत्न करते हैं॥ १६॥ हे मुनिसत्तम! उस समय भगवान् विष्णु सूर्यकी सातों किरणोंमें स्थित होकर सम्पूर्ण जलको सोख लेते हैं॥ १७॥ हे मैत्रेय! इस प्रकार प्राणियों तथा पृथिवीके अन्तर्गत सम्पूर्ण जलको सोखकर वे समस्त भूमण्डलको शुष्क कर देते हैं॥ १८॥ समुद्र तथा नदियोंमें, पर्वतीय सरिताओं और स्रोतोंमें तथा विभिन्न पातालोंमें जितना जल है वे उस सबको सुखा डालते हैं॥ १९॥ तब भगवान्‌के प्रभावसे प्रभावित होकर तथा जलपानसे पुष्ट होकर वे सातों सूर्यरश्मियाँ सात सूर्य हो जाती हैं॥ २०॥ हे द्विज! उस समय ऊपर-नीचे सब ओर देदीप्यमान होकर वे सातों सूर्य पातालपर्यन्त सम्पूर्ण त्रिलोकीको भस्म कर डालते हैं॥ २१॥ हे द्विज! उन प्रदीप्त भास्करोंसे दग्ध हुई त्रिलोकी पर्वत, नदी और समुद्रादिके सहित सर्वथा नीरस हो जाती है॥ २२॥ उस समय सम्पूर्ण त्रिलोकीके वृक्ष और जल आदिके दग्ध हो जानेसे यह पृथिवी कछुएकी पीठके समान कठोर हो जाती है॥ २३॥