विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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| ४३६ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० ३ |
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| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
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| ततस्सम्पूज्य ते व्यासं प्रशंसुः पुनः पुनः ।<br>यथाऽऽगतं द्विजा जग्मुर्व्यासोक्तिकृतनिश्चयाः ॥ ३८ | तदनन्तर उन्होंने व्यासजीका पूजनकर उनकी बारम्बार प्रशंसा की और उनके कथनानुसार निश्चयकर जहाँसे आये थे वहाँ चले गये ॥ ३८ ॥ |
| भवतोऽपि महाभाग रहस्यं कथितं मया ।<br>अत्यन्तदुष्टस्य कलेरयमेको महान्गुणः ।<br>कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तबन्धः परं व्रजेत् ॥ ३९ | हे महाभाग मैत्रेयजी! आपसे भी मैंने यह रहस्य कह दिया। इस अत्यन्त दुष्ट कलियुगमें यही एक महान् गुण है कि इस युगमें केवल कृष्णचन्द्रका नाम-संकीर्तन करनेसे ही मनुष्य परमपद प्राप्त कर लेता है ॥ ३९ ॥ |
| यच्चाहं भवता पृष्टो जगतामुपसंहृतिम् ।<br>प्राकृतामन्तरालां च तामप्येष वदामि ते ॥ ४० | अब आपने मुझसे जो संसारके उपसंहार—प्राकृत प्रलय और अवान्तर प्रलयके विषयमें पूछा था वह भी सुनाता हूँ ॥ ४० ॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
तीसरा अध्याय
निमेषादि काल-मान तथा नैमित्तिक प्रलयका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
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| सर्वेषामेव भूतानां त्रिविधः प्रतिसञ्चरः ।<br>नैमित्तिकः प्राकृतिकस्तथैवात्यन्तिको लयः ॥ १ | सम्पूर्ण प्राणियोंका प्रलय नैमित्तिक, प्राकृतिक और आत्यन्तिक तीन प्रकारका होता है ॥ १ ॥ |
| ब्राह्मो नैमित्तिकस्तेषां कल्पान्ते प्रतिसञ्चरः ।<br>आत्यन्तिकस्तु मोक्षाख्यः प्राकृतो द्विपरार्द्धकः ॥ २ | उनमेंसे जो कल्पान्तमें ब्राह्म प्रलय होता है वह नैमित्तिक, जो मोक्ष नामक प्रलय है वह आत्यन्तिक और जो दो परार्द्धके अन्तमें होता है वह प्राकृत प्रलय कहलाता है ॥ २ ॥ |
| श्रीमैत्रेय उवाच | श्रीमैत्रेयजी बोले— |
| परार्द्धसंख्यां भगवन्ममाचक्ष्व यया तु सः ।<br>द्विगुणीकृतया ज्ञेयः प्राकृतः प्रतिसञ्चरः ॥ ३ | भगवन् ! आप मुझे परार्द्धकी संख्या बतलाइये, जिसको दूना करनेसे प्राकृत प्रलयका परिमाण जाना जा सके ॥ ३ ॥ |
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
| स्थानात्स्थानं दशगुणमेकस्माद्गण्यते द्विज ।<br>ततोऽष्टादशमे भागे परार्द्धमभिधीयते ॥ ४ | हे द्विज ! एकसे लेकर क्रमशः दशगुण गिनते-गिनते जो अठारहवीं बार* गिनी जाती है वह संख्या परार्द्ध कहलाती है ॥ ४ ॥ |
| परार्द्धद्विगुणं यत्तु प्राकृतस्स लयो द्विज ।<br>तदाव्यक्तेऽखिलं व्यक्तं स्वहेतौ लयमेति वै ॥ ५ | हे द्विज! इस परार्द्धकी दूनी संख्यावाला प्राकृत प्रलय है, उस समय यह सम्पूर्ण जगत् अपने कारण अव्यक्तमें लीन हो जाता है ॥ ५ ॥ |
| निमेषो मानुषो योऽसौ मात्रा मात्राप्रमाणतः ।<br>तैः पञ्चदशभिः काष्ठा त्रिंशत्काष्ठा कला स्मृता ॥ ६ | मनुष्यका निमेष ही एक मात्रावाले अक्षरके उच्चारण-कालके समान परिमाणवाला होनेसे मात्रा कहलाता है; उन पन्द्रह निमेषोंकी एक काष्ठा होती है और तीस काष्ठाकी एक कला कही जाती है ॥ ६ ॥ |
| नाडिका तु प्रमाणेन सा कला दश पञ्च च ।<br>उन्मानेनाम्भसस्सा तु पलान्यर्द्धत्रयोदश ॥ ७ | पन्द्रह कला एक नाडिकाका प्रमाण है। वह नाडिका साढ़े बारह पल ताँबेके बने हुए जलके पात्रसे जानी जा सकती है ॥ ७ ॥ |
* वायुपुराणमें इन अठारह संख्याओंके इस प्रकार नाम हैं—एक, दस, शत, सहस्र, अयुत, नियुत, प्रयुत, अर्बुद, न्यर्बुद, वृन्द, खर्व, निखर्व, शंख, पद्म, समुद्र, मध्य, अन्त, परार्द्ध।