विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 446, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २ ] * षष्ठ अंश * ४३५
द्विजशुश्रूषयैवैष पाकयज्ञाधिकारवान्।
निजाञ्जयति वै लोकाञ्छूद्रो धन्यतरस्ततः॥ २३
भक्ष्याभक्ष्येषु नास्त्यस्ति पेयापेयेषु वै यतः।
नियमो मुनिशार्दूलास्तेनासौ साध्वितीरितः॥ २४
स्वधर्मस्याविरोधेन नरैर्लब्धं धनं सदा।
प्रतिपादनीयं पात्रेषु यष्टव्यं च यथाविधि॥ २५
तस्यार्जने महाक्लेशः पालने च द्विजोत्तमाः।
तथासद्विनियोगेन विज्ञातं गहनं नृणाम्॥ २६
एवमन्यैस्तथा क्लेशैः पुरुषा द्विजसत्तमाः।
निजाञ्जयन्ति वै लोकान्प्राजापत्यादिकान्क्रमात्॥ २७
योषिच्छुश्रूषणाद्भर्त्तुः कर्मणा मनसा गिरा।
तद्धिता शुभमाप्नोति तत्सालोक्यं यतो द्विजाः॥ २८
नातिक्लशेन महता तानेव पुरुषो यथा।
तृतीयं व्याहृतं तेन मया साध्विति योषितः॥ २९
एतद्वः कथितं विप्रा यन्निमित्तमिहागताः।
तत्पृच्छत यथाकामं सर्वं वक्ष्यामि वः स्फुटम्॥ ३०
ऋषयस्ते ततः प्रोचुर्यत्प्रष्टव्यं महामुने।
अस्मिन्नेव च तत् प्रश्ने यथावत्कथितं त्वया॥ ३१
श्रीपराशर उवाच
ततः प्रहस्य तानाह कृष्णद्वैपायनो मुनिः।
विस्मयोत्फुल्लनयनांस्तापसांस्तानुपागतान्॥ ३२
मयैष भवतां प्रश्नो ज्ञातो दिव्येन चक्षुषा।
ततो हि वः प्रसङ्गेन साधु साध्विति भाषितम्॥ ३३
स्वल्पेन हि प्रयत्नेन धर्मस्सिद्धयति वै कलौ।
नरैरात्मगुणाम्भोभिः क्षालिताखिलकिल्बिषैः॥ ३४
शूद्रैश्च द्विजशुश्रूषातत्परैर्द्विजसत्तमाः।
तथा स्त्रीभिरनायासात्पतिशुश्रूषयैव हि॥ ३५
ततस्त्रितयमप्येतन्मम धन्यतरं मतम्।
धर्मसम्पादने क्लेशो द्विजातीनां कृतादिषु॥ ३६
भवद्भिर्र्यदभिप्रेतं तदेतत्कथितं मया।
अपृष्टेनापि धर्मज्ञाः किमन्यत्क्रियतां द्विजाः॥ ३७
किंतु जिसे केवल [मन्त्रहीन] पाक-यज्ञका ही अधिकार है वह शूद्र द्विजोंकी सेवा करनेसे ही सद्गति प्राप्त कर लेता है, इसलिये वह अन्य जातियोंकी अपेक्षा धन्यतर है॥ २३॥ हे मुनिशार्दूलो! शूद्रको भक्ष्याभक्ष्य अथवा पेयापेयका कोई नियम नहीं है, इसलिये मैंने उसे साधु कहा है॥ २४॥
[अब स्त्रियोंको किसलिये श्रेष्ठ कहा, यह बतलाते हैं—] पुरुषोंको अपने धर्मानुकूल प्राप्त किये हुए धनसे ही सर्वदा सुपात्रको दान और विधिपूर्वक यज्ञ करना चाहिये॥ २५॥ हे द्विजोत्तमगण! इस द्रव्यके उपार्जन तथा रक्षणमें महान् क्लेश होता है और उसको अनुचित कार्यमें लगानेसे भी मनुष्योंको जो कष्ट भोगना पड़ता है वह मालूम ही है॥ २६॥ इस प्रकार हे द्विजसत्तमो! पुरुषगण इन तथा ऐसे ही अन्य कष्टसाध्य उपायोंसे क्रमशः प्राजापत्य आदि शुभ लोकोंको प्राप्त करते हैं॥ २७॥ किंतु स्त्रियाँ तो तन-मन-वचनसे पतिकी सेवा करनेसे ही उनकी हितकारिणी होकर पतिके समान शुभ लोकोंको अनायास ही प्राप्त कर लेती हैं जो कि पुरुषोंको अत्यन्त परिश्रमसे मिलते हैं। इसीलिये मैंने तीसरी बार यह कहा था कि ‘स्त्रियाँ साधु हैं’॥ २८-२९॥ ‘हे विप्रगण! मैंने आपलोगोंसे यह [अपने साधुवादका रहस्य] कह दिया, अब आप जिसलिये पधारे हैं वह इच्छानुसार पूछिये। मैं आपसे सब बातें स्पष्ट करके कह दूँगा’॥ ३०॥ तब ऋषियोंने कहा—‘हे महामुने! हमें जो कुछ पूछना था उसका यथावत् उत्तर आपने इसी प्रश्नमें दे दिया है। [इसलिये अब हमें और कुछ पूछना नहीं है]॥ ३१॥
श्रीपराशरजी बोले—तब मुनिवर कृष्णद्वैपायनने विस्मयसे खिले हुए नेत्रोंवाले उन समागत तपस्वियोंसे हँसकर कहा॥ ३२॥ मैं दिव्य दृष्टिसे आपके इस प्रश्नको जान गया था इसीलिये मैंने आपलोगोंके प्रसंगसे ही ‘साधु-साधु’ कहा था॥ ३३॥ जिन पुरुषोंने गुणरूप जलसे अपने समस्त दोष धो डाले हैं उनके थोड़े-से प्रयत्नसे ही कलियुगमें धर्म सिद्ध हो जाता है॥ ३४॥ हे द्विजश्रेष्ठो! शूद्रोंको द्विजसेवापरायण होनेसे और स्त्रियोंको पतिकी सेवामात्र करनेसे ही अनायास धर्मकी सिद्धि हो जाती है॥ ३५॥ इसीलिये मेरे विचारसे ये तीनों धन्यतर हैं, क्योंकि सत्ययुगादि अन्य तीन युगोंमें भी द्विजातियोंको ही धर्म सम्पादन करनेमें महान् क्लेश उठाना पड़ता है॥ ३६॥ हे धर्मज्ञ ब्राह्मणो! इस प्रकार आपलोगोंका जो अभिप्राय था वह मैंने आपके बिना पूछे ही कह दिया, अब और क्या करूँ?’॥ ३७॥