विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 445, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें४३४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २
ततः स्नात्वा यथान्यायमायान्तं च कृतक्रियम्। उपतस्थुर्महाभागं मुनयस्ते सुतं मम॥ ९ कृतसंवन्दनांश्चाह कृतासनपरिग्रहान्। किमर्थमागता यूयमिति सत्यवतीसुतः॥ १० तमूचुः संशयं प्रष्टुं भवन्तं वयमागताः। अलं तेनास्तु तावन्नः कथ्यतामपरं त्वया॥ ११ कलिरस्साध्विति यत्प्रोक्तं शूद्रः साध्विति योषितः। यदाह भगवान् साधु धन्याश्चेति पुनः पुनः॥ १२ तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामो न चेद् गुह्यं महामुने। तत्कथ्यतां ततो हृत्स्थं पृच्छामस्त्वां प्रयोजनम्॥ १३ श्रीपराशर उवाच इत्युक्तो मुनिभिर्व्यासः प्रहस्येदमथाब्रवीत्। श्रूयतां भो मुनिश्रेष्ठा यदुक्तं साधु साध्विति॥ १४ श्रीव्यास उवाच यत्कृते दशभिर्वर्षैस्त्रेतायां हायनेन तत्। द्वापरे तच्च मासेन ह्यहोरात्रेण तत्कलौ॥ १५ तपसो ब्रह्मचर्यस्य जपादेश्च फलं द्विजाः। प्राप्नोति पुरुषस्तेन कलिरस्साध्विति भाषितम्॥ १६ ध्यायन्कृते यजन् यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन्। यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम्॥ १७ धर्मोत्कर्षमतीवात्र प्राप्नोति पुरुषः कलौ। अल्पायासेन धर्मज्ञास्तेन तुष्टोऽस्म्यहं कलेः॥ १८ व्रतचर्यापरैर्ग्राह्या वेदाः पूर्वं द्विजातिभिः। ततस्स्वधर्मसम्प्राप्तैर्यष्टव्यं विधिवद्धनैः॥ १९ वृथा कथा वृथा भोज्यं वृथेज्या च द्विजन्मनाम्। पतनाय ततो भाव्यं तैस्तु संयमिभिस्सदा॥ २० असम्यक्करणे दोषस्तेषां सर्वेषु वस्तुषु। भोज्यपेयादिकं चैषां नेच्छाप्राप्तिकरं द्विजाः॥ २१ पारतन्त्र्यं समस्तेषु तेषां कार्येषु वै यतः। जयन्ति ते निजाँल्लोकान्क्लेशेन महता द्विजाः॥ २२
तदनन्तर जब मेरे महाभाग पुत्र व्यासजी स्नान करनेके अनन्तर नियमानुसार नित्यकर्मसे निवृत्त होकर आये तो वे मुनिजन उनके पास पहुँचे॥ ९॥ वहाँ आकर जब वे यथायोग्य अभिवादनादिके अनन्तर आसनोंपर बैठ गये तो सत्यवतीनन्दन व्यासजीने उनसे पूछा—"आपलोग कैसे आये हैं?"॥ १०॥
तब मुनियोंने उनसे कहा—"हमलोग आपसे एक सन्देह पूछनेके लिये आये थे, किंतु इस समय उसे तो जाने दीजिये, एक और बात हमें बतलाइये॥ ११॥ भगवन्! आपने जो स्नान करते समय कई बार कहा था कि 'कलियुग ही श्रेष्ठ है, शूद्र ही श्रेष्ठ हैं, स्त्रियाँ ही साधु और धन्य हैं', सो क्या बात है? हम यह सम्पूर्ण विषय सुनना चाहते हैं। हे महामुने! यदि गोपनीय न हो तो कहिये। इसके पीछे हम आपसे अपना आन्तरिक सन्देह पूछेंगे"॥ १२-१३॥
श्रीपराशरजी बोले—मुनियोंके इस प्रकार पूछनेपर व्यासजीने हँसते हुए कहा—"हे मुनिश्रेष्ठो! मैंने जो इन्हें बारम्बार साधु-साधु कहा था, उसका कारण सुनो"॥ १४॥
श्रीव्यासजी बोले—हे द्विजगण! जो फल सत्ययुगमें दस वर्ष तपस्या, ब्रह्मचर्य और जप आदि करनेसे मिलता है उसे मनुष्य त्रेतामें एक वर्ष, द्वापरमें एक मास और कलियुगमें केवल एक दिन-रातमें प्राप्त कर लेता है, इस कारण ही मैंने कलियुगको श्रेष्ठ कहा है॥ १५-१६॥ जो फल सत्ययुगमें ध्यान, त्रेतामें यज्ञ और द्वापरमें देवार्चन करनेसे प्राप्त होता है वही कलियुगमें श्रीकृष्णचन्द्रका नाम-कीर्तन करनेसे मिल जाता है॥ १७॥ हे धर्मज्ञगण! कलियुगमें थोड़े-से परिश्रमसे ही पुरुषको महान् धर्मकी प्राप्ति हो जाती है, इसीलिये मैं कलियुगसे अति सन्तुष्ट हूँ॥ १८॥
[अब शूद्र क्यों श्रेष्ठ हैं, यह बतलाते हैं] द्विजातियोंको पहले ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए वेदाध्ययन करना पड़ता है और फिर स्वधर्माचरणसे उपार्जित धनके द्वारा विधिपूर्वक यज्ञ करने पड़ते हैं॥ १९॥ इसमें भी व्यर्थ वार्तालाप, व्यर्थ भोजन और व्यर्थ यज्ञ उनके पतनके कारण होते हैं; इसलिये उन्हें सदा संयमी रहना आवश्यक है॥ २०॥ सभी कामोंमें अनुचित (विधिके विपरीत) करनेसे उन्हें दोष लगता है; यहाँतक कि भोजन और पानादि भी वे अपने इच्छानुसार नहीं भोग सकते॥ २१॥ क्योंकि उन्हें सम्पूर्ण कार्योंमें परतन्त्रता रहती है। हे द्विजगण! इस प्रकार वे अत्यन्त क्लेशसे पुण्य-लोकोंको प्राप्त करते हैं॥ २२॥
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