विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 444, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २ ] * षष्ठ अंश * ४३३
वाङ्मनःकायजैर्दोषैरभिभूताः पुनः पुनः।
नराः पापान्यनुदिनं करिष्यन्त्यल्पमेधसः ॥ ५७
निस्सत्त्वानामशौचानां निर्ह्रीकाणां तथा नृणाम्।
यद्यद्दुःखाय तत्सर्वं कलिकाले भविष्यति ॥ ५८
निस्स्वाध्यायवषट्कारे स्वधास्वाहाविवर्जिते।
तदा प्रविरलो धर्मः क्वचिल्लोके निवत्स्यति ॥ ५९
तत्राल्पेनैव यत्नेन पुण्यस्कन्धमनुत्तमम्।
करोति यं कृतयुगे क्रियते तपसा हि सः ॥ ६०
उस समय अल्पबुद्धि पुरुष बारम्बार वाणी, मन और शरीरादिके दोषोंके वशीभूत होकर प्रतिदिन पुनः-पुनः पापकर्म करेंगे ॥ ५७ ॥ शक्ति, शौच और लज्जाहिन पुरुषोंको जो-जो दुःख हो सकते हैं कलियुगमें वे सभी दुःख उपस्थित होंगे ॥ ५८ ॥ उस समय संसारके स्वाध्याय और वषट्कारसे हीन तथा स्वधा और स्वाहासे वर्जित हो जानेसे कहीं-कहीं कुछ-कुछ धर्म रहेगा ॥ ५९ ॥ किंतु कलियुगमें मनुष्य थोड़ा-सा प्रयत्न करनेसे ही जो अत्यन्त उत्तम पुण्यराशि प्राप्त करता है वही सत्ययुगमें महान् तपस्यासे प्राप्त किया जा सकता है ॥ ६० ॥
इति श्रीविष्णुपुराणे षष्ठेऽंशे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
दूसरा अध्याय
श्रीव्यासजीद्वारा कलियुग, शूद्र और स्त्रियोंका महत्त्व-वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| व्यासश्चाह महाबुद्धिर्यदत्रैव हि वस्तुनि।<br>तच्छ्रूयतां महाभाग गदतो मम तत्त्वतः ॥ १ | हे महाभाग ! इसी विषयमें महामति व्यासदेवने जो कुछ कहा है वह मैं यथावत् वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ १ ॥ |
| कस्मिन्कालेऽल्पको धर्मो ददाति सुमहत्फलम्।<br>मुनीनां पुण्यवादोऽभूत्कैश्चासौ क्रियते सुखम् ॥ २ | एक बार मुनियोंमें [परस्पर] पुण्यके विषयमें यह वार्तालाप हुआ कि 'किस समयमें थोड़ा-सा पुण्य भी महान् फल देता है और कौन उसका सुखपूर्वक अनुष्ठान कर सकते हैं ?' ॥ २ ॥ |
| सन्देहनिर्णयार्थाय वेदव्यासं महामुनिम्।<br>ययुस्ते संशयं प्रष्टुं मैत्रेय मुनिपुङ्गवाः ॥ ३ | हे मैत्रेय ! वे समस्त मुनिश्रेष्ठ इस सन्देहका निर्णय करनेके लिये महामुनि व्यासजीके पास यह प्रश्न पूछने गये ॥ ३ ॥ |
| ददृशुस्ते मुनिं तत्र जाह्नवीसलिले द्विज।<br>वेदव्यासं महाभागमर्द्धस्नातं सुतं मम ॥ ४ | हे द्विज ! वहाँ पहुँचनेपर उन मुनिजनोंने मेरे पुत्र महाभाग व्यासजीको गंगाजीमें आधा स्नान किये देखा ॥ ४ ॥ |
| स्नानावसानं ते तस्य प्रतीक्षन्तो महर्षयः।<br>तस्थुस्तीरे महानद्यास्तरुषण्डमुपाश्रिताः ॥ ५ | वे महर्षिगण व्यासजीके स्नान कर चुकनेकी प्रतीक्षामें उस महानदीके तटपर वृक्षोंके तले बैठे रहे ॥ ५ ॥ |
| मग्नोऽथ जाह्नवीतोयादुत्थायाह सुतो मम।<br>शूद्रस्साधुः कलिस्साधुरित्येवं शृण्वतां वचः ॥ ६ | उस समय गंगाजीमें डुबकी लगाये मेरे पुत्र व्यासने जलसे उठकर उन मुनिजनोंके सुनते हुए 'कलियुग ही श्रेष्ठ है, शूद्र ही श्रेष्ठ है' यह वचन कहा। |
| तेषां मुनीनां भूयश्च ममज्ज स नदीजले।<br>साधु साध्विति चोत्थाय शूद्र धन्योऽसि चाब्रवीत् ॥ ७ | ऐसा कहकर उन्होंने फिर जलमें गोता लगाया और फिर उठकर कहा—"शूद्र ! तुम ही श्रेष्ठ हो, तुम ही धन्य हो" ॥ ६-७ ॥ |
| निमग्नश्च समुत्थाय पुनः प्राह महामुनिः।<br>योषितः साधु धन्यास्तास्ताभ्यो धन्यतरोऽस्ति कः ॥ ८ | यह कहकर वे महामुनि फिर जलमें मग्न हो गये और फिर खड़े होकर बोले—"स्त्रियाँ ही साधु हैं, वे ही धन्य हैं, उनसे अधिक धन्य और कौन है ?" ॥ ८ ॥ |