भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 443, कुल 558 में से

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पृष्ठ 443
४३२* श्रीविष्णुपुराण *[अ० १

भविता योषितां सूतिः पञ्चषट्सप्तवार्षिकी।
नवाष्टदशवर्षाणां मनुष्याणां तथा कलौ॥ ४१
पलितोद्भवश्च भविता तथा द्वादशवार्षिकः।
नातिजीवति वै कश्चित्कलौ वर्षाणि विंशतिः॥ ४२
अल्पप्रज्ञा वृथालिङ्गा दुष्टान्तःकरणाः कलौ।
यतस्ततो विनङ्क्ष्यन्ति कालेनाल्पेन मानवाः॥ ४३
यदा यदा हि मैत्रेय हानिर्धर्मस्य लक्ष्यते।
तदा तदा कलेर्वृद्धिरनुमेया विचक्षणैः॥ ४४
यदा यदा हि पाषण्डवृद्धिमैत्रेय लक्ष्यते।
तदा तदा कलेर्वृद्धिरनुमेया महात्मभिः॥ ४५
यदा यदा सतां हानिर्वेदमार्गानुसारिणाम्।
तदा तदा कलेर्वृद्धिरनुमेया विचक्षणैः॥ ४६
प्रारम्भाश्चावसीदन्ति यदा धर्मभृतां नृणाम्।
तदानुमेयं प्राधान्यं कलेर्मैत्रेय पण्डितैः॥ ४७
यदा यदा न यज्ञानामीश्वरः पुरुषोत्तमः।
इज्यते पुरुषैर्यज्ञैस्तदा ज्ञेयं कलेर्बलम्॥ ४८
न प्रीतिर्वेदवादेषु पाषण्डेषु यदा रतिः।
कलेर्वृद्धिस्तदा प्राज्ञैरनुमेया विचक्षणैः॥ ४९
कलौ जगत्पतिं विष्णुं सर्वस्रष्टारमीश्वरम्।
नार्चयिष्यन्ति मैत्रेय पाषण्डोपहता जनाः॥ ५०
किं देवैः किं द्विजैर्वेदैः किं शौचेनाम्बुजन्मना।
इत्येवं विप्र वक्ष्यन्ति पाषण्डोपहता जनाः॥ ५१
स्वल्पाम्बुवृष्टिः पर्जन्यः सस्यं स्वल्पफलं तथा।
फलं तथल्पसारं च विप्र प्राप्ते कलौ युगे॥ ५२
शाणीप्रायाणि वस्त्राणि शमीप्राया महीरुहाः।
शूद्रप्रायास्तथा वर्णा भविष्यन्ति कलौ युगे॥ ५३
अणुप्रायाणि धान्यानि अजाप्रायं तथा पयः।
भविष्यति कलौ प्राप्ते हौशीरं चानुलेपनम्॥ ५४
श्वश्रूश्वशुरभूयिष्ठा गुरवश्च नृणां कलौ।
श्यालाद्या हरिभार्याश्च सुहृदो मुनिसत्तम॥ ५५
कस्य माता पिता कस्य यथा कर्मानुगः पुमान्।
इति चोदाहरिष्यन्ति श्वशुरानुगता नराः॥ ५६


हिंदी अनुवाद:

कलिमें पाँच-छः अथवा सात वर्षकी स्त्री और आठ-नौ या दस वर्षके पुरुषोंके ही सन्तान हो जायगी॥ ४१॥ बारह वर्षकी अवस्थामें ही लोगोंके बाल पकने लगेंगे और कोई भी व्यक्ति बीस वर्षसे अधिक जीवित न रहेगा॥ ४२॥ कलियुगमें लोग मन्द-बुद्धि, व्यर्थ चिह्न धारण करनेवाले और दुष्ट चित्तवाले होंगे, इसलिये वे अल्पकालमें ही नष्ट हो जायँगे॥ ४३॥

हे मैत्रेय! जब-जब धर्मकी अधिक हानि दिखलायी दे तभी-तभी बुद्धिमान् मनुष्यको कलियुगकी वृद्धिका अनुमान करना चाहिये॥ ४४॥ हे मैत्रेय! जब-जब पाषण्ड बढ़ा हुआ दीखे तभी-तभी महात्माओंको कलियुगकी वृद्धि समझनी चाहिये॥ ४५॥ जब-जब वैदिक मार्गका अनुसरण करनेवाले सत्पुरुषोंका अभाव हो तभी-तभी बुद्धिमान् मनुष्य कलिकी वृद्धि हुई जाने॥ ४६॥ हे मैत्रेय! जब धर्मात्मा पुरुषोंके आरम्भ किये हुए कार्योंमें असफलता हो तब पण्डितजन कलियुगकी प्रधानता समझें॥ ४७॥ जब-जब यज्ञोंके अधीश्वर भगवान् पुरुषोत्तमका लोग यज्ञोंद्वारा यजन न करें तब-तब कलिका प्रभाव ही समझना चाहिये॥ ४८॥ जब वेद-वादमें प्रीतिका अभाव हो और पाषण्डमें प्रेम हो तब बुद्धिमान् प्राज्ञ पुरुष कलियुगको बढ़ा हुआ जानें॥ ४९॥

हे मैत्रेय! कलियुगमें लोग पाषण्डके वशीभूत हो जानेसे सबके रचयिता और प्रभु जगत्पति भगवान् विष्णुका पूजन नहीं करेंगे॥ ५०॥ हे विप्र! उस समय लोग पाषण्डके वशीभूत होकर कहेंगे—'इन देव, द्विज, वेद और जलसे होनेवाले शौचादिमें क्या रखा है?'॥ ५१॥ हे विप्र! कलिके आनेपर वृष्टि अल्प जलवाली होगी, खेती थोड़ी उपजवाली होगी और फलादि अल्प सारयुक्त होंगे॥ ५२॥ कलियुगमें प्रायः सनके बने हुए सबके वस्त्र होंगे, अधिकतर शमीके वृक्ष होंगे और चारों वर्ण बहुधा शूद्रवत् हो जायँगे॥ ५३॥ कलिके आनेपर धान्य अत्यन्त अणु होंगे, प्रायः बकरियोंका ही दूध मिलेगा और उशीर (खस) ही एकमात्र अनुलेपन होगा॥ ५४॥

हे मुनिश्रेष्ठ! कलियुगमें सास और ससुर ही लोगोंके गुरुजन होंगे और हृदयहारिणी भार्या तथा साले ही सुहृद् होंगे॥ ५५॥ लोग अपने ससुरके अनुगामी होकर कहेंगे कि 'कौन किसका पिता है और कौन किसकी माता; सब पुरुष अपने कर्मानुसार जन्मते-मरते रहते हैं'॥ ५६॥

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