विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 442, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १ ] * षष्ठ अंश * ४३१
दुर्भिक्षमेव सततं तथा क्लेशमनीश्वराः।
प्राप्स्यन्ति व्याहतसुखप्रमोदा मानवाः कलौ ॥ २६
कलियुगमें असमर्थ लोग सुख और आनन्दके नष्ट हो जानेसे प्रायः सर्वदा दुर्भिक्ष तथा क्लेश ही भोगेंगे ॥ २६ ॥
अस्नानभोजिनो नाग्निदेवतातिथिपूजनम्।
करिष्यन्ति कलौ प्राप्ते न च पिण्डोदकक्रियाम्॥ २७
कलिके आनेपर लोग बिना स्नान किये ही भोजन करेंगे, अग्नि, देवता और अतिथिका पूजन न करेंगे और न पिण्डोदक क्रिया ही करेंगे ॥ २७ ॥
लोलुपा ह्रस्वदेहाश्च बह्वन्नादनतत्पराः।
बहुप्रजाल्पभाग्याश्च भविष्यन्ति कलौ स्त्रियः ॥ २८
उस समयकी स्त्रियाँ विषयलोलुप, छोटे शरीरवाली, अति भोजन करनेवाली, अधिक सन्तान पैदा करनेवाली और मन्दभाग्या होंगी ॥ २८ ॥
उभाभ्यामपि पाणिभ्यां शिरःकण्डूयनं स्त्रियः।
कुर्वन्त्यो गुरुभर्तृणामाज्ञां भेत्स्यन्त्यनादराः ॥ २९
वे दोनों हाथोंसे सिर खुजलाती हुई अपने गुरुजनों और पतियोंके आदेशका अनादरपूर्वक खण्डन करेंगी ॥ २९ ॥
स्वपोषणपराः क्षुद्रा देहसंस्कारवर्जिताः।
परुषानृतभाषिण्यो भविष्यन्ति कलौ स्त्रियः ॥ ३०
कलियुगकी स्त्रियाँ अपना ही पेट पालनेमें तत्पर, क्षुद्र चित्तवाली, शारीरिक शौचसे हीन तथा कटु और मिथ्या भाषण करनेवाली होंगी ॥ ३० ॥
दुःशीला दुष्टशीलेषु कुर्वन्त्यस्सततं स्पृहाम्।
असद्वृत्ता भविष्यन्ति पुरुषेषु कुलाङ्गनाः ॥ ३१
उस समयकी कुलाङ्गनाएँ निरन्तर दुश्चरित्र पुरुषोंकी इच्छा रखनेवाली एवं दुराचारिणी होंगी तथा पुरुषोंके साथ असद्व्यवहार करेंगी ॥ ३१ ॥
वेदादानं करिष्यन्ति वटवश्चाकृतव्रताः।
गृहस्थाश्च न होष्यन्ति न दास्यन्त्युचितान्यपि ॥ ३२
ब्रह्मचारिगण वैदिक व्रत आदिसे हीन रहकर ही वेदाध्ययन करेंगे तथा गृहस्थगण न तो हवन करेंगे और न सत्पात्रको उचित दान ही देंगे ॥ ३२ ॥
वानप्रस्था भविष्यन्ति ग्राम्याहारपरिग्रहाः।
भिक्षवश्चापि मित्रादिस्नेहसम्बन्धयन्त्रणाः ॥ ३३
वानप्रस्थ [वनके कन्द-मूलादिको छोड़कर] ग्राम्य भोजनको स्वीकार करेंगे और संन्यासी अपने मित्रादिके स्नेह-बन्धनमें ही बँधे रहेंगे ॥ ३३ ॥
अरक्षितारो हर्तारश्शुल्कव्याजेन पार्थिवाः।
हारिणो जनवित्तानां सम्प्राप्ते तु कलौ युगे ॥ ३४
कलियुगके आनेपर राजालोग प्रजाकी रक्षा नहीं करेंगे, बल्कि कर लेनेके बहाने प्रजाका ही धन छीनेंगे ॥ ३४ ॥
यो योऽश्वरथनागाढ्यस्स स राजा भविष्यति।
यश्च यश्चाबलस्सर्वस्स स भृत्यः कलौ युगे ॥ ३५
उस समय जिस-जिसके पास बहुत-से हाथी, घोड़े और रथ होंगे वह-वह ही राजा होगा तथा जो-जो शक्तिहीन होगा वह-वह ही सेवक होगा ॥ ३५ ॥
वैश्याः कृषिवणिज्यादि सन्त्यज्य निजकर्म यत्।
शूद्रवृत्त्या प्रवर्त्स्यन्ति कारुकर्मोपजीविनः ॥ ३६
वैश्यगण कृषि-वाणिज्यादि अपने कर्मोंको छोड़कर शिल्पकारी आदिसे जीवन-निर्वाह करते हुए शूद्रवृत्तियोंमें ही लग जायँगे ॥ ३६ ॥
भैक्षव्रतपराः शूद्राः प्रव्रज्यालिङ्गिनोऽधमाः।
पाषण्डसंश्रयां वृत्तिमाश्रयिष्यन्ति सत्कृताः ॥ ३७
आश्रमादिके चिह्नसे रहित अधम शूद्रगण संन्यास लेकर भिक्षावृत्तिमें तत्पर रहेंगे और लोगोंसे सम्मानित होकर पाषण्ड-वृत्तिका आश्रय लेंगे ॥ ३७ ॥
दुर्भिक्षकरपीडाभिरतीवोपद्रुता जनाः।
गोधूमान्नयवान्नाढ्यान्देशान्यास्यन्ति दुःखिताः ॥ ३८
प्रजाजन दुर्भिक्ष और करकी पीड़ासे अत्यन्त उपद्रवयुक्त और दुःखित होकर ऐसे देशोंमें चले जायँगे जहाँ गेहूँ और जौकी अधिकता होगी ॥ ३८ ॥
वेदमार्गे प्रलीने च पाषण्डाढ्ये ततो जने।
अधर्मवृद्ध्या लोकानामल्पमायुर्भविष्यति ॥ ३९
उस समय वेदमार्गका लोप, मनुष्योंमें पाषण्डकी प्रचुरता और अधर्मकी वृद्धि हो जानेसे प्रजाकी आयु अल्प हो जायगी ॥ ३९ ॥
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यमानेषु वै तपः।
नरेषु नृपदोषेण बाल्ये मृत्युर्भविष्यति ॥ ४०
लोगोंके शास्त्रविरुद्ध घोर तपस्या करनेसे तथा राजाके दोषसे प्रजाओंकी बाल्यावस्थामें मृत्यु होने लगेगी ॥ ४० ॥